North India के अनुपम शहर के नाम पर Steam Ship Fazilka

भले ही आज यह शहर देश की अंतिम छोर पर बसा हुआ है…मगर इसका नाम पहले भी दुनिया में शुमार रहा है…चाहे आज की बात हो या भारत विभाजन से पहले ही…आपने गोल्डन ट्रैक का नाम तो सुना होगा…जो ऐशिया में प्रसिद्ध था और फाजिल्का की आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी था…अगर गोल्डन ट्रैक प्रसिद्ध था तो यहां फाजिल्का के नाम पर एक स्टीम शिप भी मशहूर रही है…ऐसी स्टीम शिप, जो फाजिल्का से फिजी तक चलती थी…रिकॉर्ड यह भी है…कि इसे सागर में ही ठीक किया गया था…आज इस बारे में बात करते हैं।

बात बीसवीं सदी के आगाज की है, जब बोयर युद्ध शुरू हो चुका था…इस भयंकर युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की जरूरत थी…साऊथ अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की कमीं थी…ब्रिटिश साम्राज्य के सिखलाई प्राप्त सैनिक भारत में थे…उन्होंने भारत से सैनिक मंगवाये…जिन्हें एक विशाल और मजबूत स्टीम शिप में सवारकर साऊथ अफ्रीका पहुंचाया गया…उस शिप का नाम नार्थ इंडिया के अनुपम शहर फाजिल्का के नाम पर रखा गया था…स्टीम शिप का नाम था स्टीम शिप फाजिल्का…उस शिप में ब्रिटिश सैनिकों की टोलियों को साऊथ अफ्रीका पहुंचाया गया था…शिप में सवार सैनिकों को 30 जनवरी 1900 के दिन पोर्ट नेटल नामक जगह पर छोड़ दिया गया…शिप को भारत वापस लेकर आने की तैयारी की जा रही थी कि चार दिन बाद मॉजेम्बिक सागर पार करते समय शिप की दो स्थानों पर पिछली शॉफ्ट टूट गई…

फाजिल्का स्टीम शिप में ऐसी खराबी आई कि उसके प्रथम भाग ने भी कार्य करना बंद कर दिया…शिप में सवार कारीगरों ने इसे रस्सी से बांधकर चलाया…उन्हें आशा थी कि शिप चलकर भारत पहुंच जाएगी…मगर रस्सी से बांधनेे के बाद शिप की गति धीमी हो गई…शिप को ठीक करने के लिए सूझवान इंजीनियरों को बुलाया गया…उन्होंने मिस्टर ब्राऊन के नेतृत्व में फाजिल्का स्टीम शिप शाफ्ट को रिपेयर करने का कार्य युद्ध स्तर पर आरंभ कर दिया…मगर उसे ठीक करने में कामयाबी नहीं मिली…इंजीनियरों ने फिर फैसला लिया कि शिप में हाई प्रैशर इंजन डाला जाये और इसे कलम्प से अच्छी तरह से जोड़ दिया जाए…शिप की शॉफ्ट को काबू करने में हाई प्रैशर इंजन असरदार रहा। फिर शिप के पिछले भाग को थामसन कप्लिंग से जोडऩे का कार्य शुरू हुआ…उसमें कोलम्बो में तैयार किया गया लो-प्रैशर इंजन लगाया गया…इस इंजन में खासियत थी कि लो-प्रैशर इंजन की स्पीड 9 कनॉटस की थी…फाजिल्का स्टीम शिप संसार की पहली ऐसी शिप थी…जिसे सागर में ही रिपेयर किया गया…शिप को ठीक करने वाला इंजीनियर जॉहन मैक्डोनॉल्ड संसार का चौथा ऐसा इंजीनियर बन गया, जिसने बर्बाद हुए जहाज को दोबारा जीवित किया…शिप को ठीक करने वाले इस इंजीनीयर की चर्चा हुई और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया। उसे 31 अक्तूबर 1919 को नीकोबार आईलैंड पर सम्मान से नवाजा गया।

फाजिल्का स्टीम शिप को पेनांग से कलकत्ता की समुद्री यात्रा के लिये यात्रियों को भी प्रयोग किया गया…फाजिल्का स्टीम शिप को 31 अक्तूबर 1904 के दिन लंदन से ब्रिसबेन ले जाने के लिये भी प्रयोग किया गया…फाजिल्का के नाम से बनी इस शिप को विलियम डॉक्स फोर्ड एंड सन्ज द्वारा 1890 में ब्रिटिस इंडिया नेवीगेशन कम्पनी (बी.आई.एस.एन.) के लिये इजाज किया था…जिसका भार 4152 टन था…शिप की चौड़ाई 48.2 फुट, लंबाई 366 फुट और ऊंचाई 26.5 फुट थी…ट्रिपल एक्सपेंशन वाली फाजिल्का स्टीम शिप की स्पीड 12.5 कनोटस थी…फाजिल्का स्टीम शिप से यत्रियों को फिजी तक लेजाया गया…शिप ने छह बार 4972 यात्रियों को फिजी देश तक पहुंचाया…पहली बार शिप 28 मार्च 1901 को शिप 804 यात्रि लेकर आई…दूसरी बार 18 जून 1901 को 776, तीसरी बार 20 जून 1902 को 840, चौथी बार 17 अप्रैल 1906 को 881, पांचवी बार 28 जनवरी 1907 को शिप में 875 यात्रि सवार हुउ तो अंतिम बार 25 अप्रैल 1907 को शिप भारत पहुंची…जिसमें कुल 796 यात्री सवार थे…इस शिप से फाजिल्का का नाम दुनिया में प्रसिद्ध हुआ।

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