जो मन को भाय, वही पुकारों गांव का नाम
देश में एक नाम के कई गांव तो हो सकते हैं, लेकिन एक गांव के दो-दो नाम बहुत कम नजर आते हैं। पंजाब में कई ऐसे गांव हैं, जिन्हें दो दो नामों से पुकारा जाता है। कई सरकारी कागजातों में बकायदा गांवों के दो दो नाम दर्ज हैं। कई गांवों में तो साइन बोर्ड पर भी दो दो नाम दर्ज हैं। स्कूलों और दुकानों के आगे भी दो दो नाम लिखे गए हैं। इन सब के बीच उर्फ लिखा गया है। यानि एक गांव को दो नामों में से किसी भी एक नाम से पुकारा जा सकता है।

विभाजन से पहले और बाद के नाम
भारत विभाजन से पहले पंजाब के कई गांवों में मुसलमानों की संख्या अधिक थी और मुसलमानों ने उन गांवों को जो नाम दिया था, वह नाम आज भी पुकारा जाता है। विभाजन के बाद जब मुसलमान पाकिस्तान चले गए और हिन्दु सिख उन गांवों में आकर बस गए। उन्होंने इन गांवों को अपना नाम भी दे दिया। जिस कारण कई गांवों को दो दो नामों से जाना जाता है। अगर जिला फाजिल्का के इन गांवों पर नजर दौड़ाई जाए तो अधिकांश गांवों के नाम में एक नाम मुसलमानों की ओर से रखा गया नजर आता है। जबकि बाद में आकर बसे हिन्दु – सिख परिवारों ने इन गांवों को अपना नाम भी दिया। मिसाल के तौर पर फाजिल्का का गांव कुतुबदीन उर्फ बेरीवाला है।


इन गांवों के दो-दो नाम
फाजिल्का के गांव ही नहीं फाजिल्का को भी दो नामों से पुकारा जाता है। कई लोग आज भी फाजिल्का को बंगला नाम से पुकारते हैं। वहीं फाजिल्का के गांव घड़ूमी उर्फ गुरमुख खेड़ा, राम नगर उर्फ जट्टवाली, चिमनेवाला उर्फ जोरा जंड, ढिप्पांवाली उर्फ गोदां वाली, ओडियां उर्फ मुहम्मदपुर, झोट्टियांवाली उर्फ रतनपुरा, पाकां उर्फ जमूरावाला, ढ़ाणी मुंशी राम उर्फ आबादी बहक, बेरीवाला उर्फ कुतुबदीन, कोठा उर्फ लुकमानपुरा, मुहार खीवा उर्फ भैणीके, मुहार सोना उर्फ नाकी के, न्योलां उर्फ शेमन, घुडिय़ाणी उर्फ लशकरदीन, नूरशाह उर्फ वल्लेशाह उत्ताड़, म्याणी बस्ती उर्फ अब्दुल खालिक, आवा उर्फ वरियाम पुरा आदि के दो दो नाम हैं।
