रघुवर भवन – – खंडहर में तो कुछ जान होती है . . यह तो बेजान हो गया

सांस्कृतिक पुरातन एवं म्यूजियम विभाग से मिल चुका है हैरीटेज का दर्जा

माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट इंकलाब नागपाल घूमने के बहुत शौकीन हैं. . .रघुवर भवन पहुंचे तो बोले . . यह क्या ! ! ! 1901 में बना रघुवर भवन तो खंडहर बन चुका है . . . खंडहर में तो कुछ जान होती है . . . लेकिन यह तो बेजान हो चुका है . . . तेज आंधी या तेज बारिश आने से इसके गिरने की संभावना अधिक है . . . फाजिल्का के उत्तर की तरफ मौहल्ला नईं आबादी इस्लामबाद के अंतिम छोर पर बने रघुवर भवन के हालात तो वाक्य ही दयानीय हैं . . . मैने कहा . . तीन कमरे टूटे हुए . . . छत्त पर चढऩे के लिए सीढ़ीयां टूट हुई और मुख्य गेट का कुछ हिस्सा भी बीते दिन टूट गया . . . खैर, इंकलाब नागपाल की जिज्ञासा को देखते हुए मैने बताया कि यह ऐतिहासिक इमारत ब्रिटिश भवन निर्माण और वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसकी वास्तुशैली भारतीय, मुगलकालीन एवं ब्रिटिश वास्तुकला के घटकों का अनोखा संगम है. . कारीगरों की हस्तकला की खूबसूरती को देखकर एक बारगी तो 21वीं सदी के भवन निर्माण कला माहिर भी दाद देते हैं। आलोकिक सुंदरता से भरपूर भवन की शोभा एक अचंभा है। बंगले के निर्माण के बाद निर्मित इस भवन की तर्ज पर आज की ग्रीन बिल्डिंगस तैयार की जा रही हैं . . . भवन के उत्तर दिशा की ओर मुख्यद्वार है। आर्च कंट्रक्शन से सजे द्वार के ऊपर ओम रघुवर भवन लिखा गया है। इसके नीचे ठेकद्वार अंकित है। मुख्यद्वार के ऊपर हिन्दू देवता शिवजी का प्रतीक नाग अंकित किया गया है। जो हिन्दु वास्तुकला के घटकों का एकीकृत संयोजन है। यह हिन्दू मन्दिरों में भी पाया जाता है। मुख्यद्वार पर ही विजय और हर्ष का प्रतीक गुलाबी रंग के दो स्तंभ मुगलशैली की वास्तुकला को दिखाते हैं। सतम्भों पर बाहर से नजर आने वाली कलाकृति मुगलकालीन भवन निर्माण कला और ब्रिटिश भवन निमार्ण कला के सुमेल को बड़े ही सुंदर रूप से दर्शाते हैं। इसके प्रवेशद्वार की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसके स्तम्भों पर फूल और पत्तियां तराशी गई हैं। इसे तराशने वालों ने इतनी कुशलता से तराशा है कि मन प्रसन्न हो उठता है। भवन अपने आप में एक ऊंचे मंच पर बनाया गया है। इसकी नींव के प्रत्येक कोने से उठने वाली दीवारें भवन को पर्याप्त संतुलन देती हैं।

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गलियारे में दक्षिण की ओर शयन कक्ष है। शयन कक्ष के दाएं और बाएं के दो छोटे कमरे हैं। जिनके द्वार पूर्व और पश्चिम की तरफ खुलते है। भवन के केन्द्र में खुला हाल बनाया गया है। जहां सर्दी के मौसम से बचने के लिए चिमनी बनाई गई है। जहांं बैठकर आग का लुत्फ उठाया जाता है। चिमनी को इस ढ़ंग से बनाया गया है कि आग का धंूआ चिमनी के जरिए बाहर चला जाता है। ब्रिटिश काल की तर्ज पर निर्मित इमारतों में ऐसी चिमनी मिल जाती है। उसके दोनो ओर दो कमरे हैं। जिनमें हाल से गेट द्वारा अंदर जाया जा सकता है। कमरे दिल्ली के लाल किले में निर्मित दीवाने-आम और दीवाने-खास की यादों को ताजा करते हैं। भवन के पीछे दक्षिण की तरफ  तीन कमरे हैं। जिनका दरवाजा दक्षिण की तरफ है। कमरों की खासियत यह है कि सभी कमरों को गेट के द्वारा मुख्य हाल से जोड़ा गया है। इनके बीचो-बीच घुमावदार 22 सीढीयां बनाई गई थी। जिससे कमरों की छत्त पर पहुंचा जा सकता था। कमरों की छत्त द्वारा मुख्य हाल की छत्त पर चढऩे के लिए फिर आठ सीढ़ीयां बनाई गई थी। जिनसे मुख्य हाल की छत्त पर पहुंचा जा सकता था। मुख्य हाल के ऊपर चार गुम्बद सुशोभित हैं। इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है। भवन के चारों ओर छोटे गुम्बदों की सख्या दस है। छोटे गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार की प्रतिलिपियाँ ही हैं, केवल नाप का फर्क है। छत्त पर चढक़र चारों ओर नजर दौडाऩे से बाधा झील के हरे भरे वृक्ष, बंगला, गोल कोठी, ओलिवर गार्डन, रेलवे स्टेशन और शहर की अन्य इमारतों की शोभा को निहारा जाता है। कला के अद्भुत नमूने रघुवर भवन का भीतरी वातावरण हर मौसम में रहने के लायक बनाया गया है। उत्तर दिशा की तरफ मुख्यद्वार का निर्माण इस तरह किया गया है कि पूरा दिन भवन के हर हिस्से में रोशनी और हवा का तालमेल बना रहे।

    सर्दी के मौसम में भवन के गलियारे तक सूर्य की किरणें पहंचती हैं। भवन की मोटी दीवारों में 18 इंच और 36 इंच की ईंटों का प्रयोग किया गया है। दीवारों की चिनाई पक्की ईंटों, चूना और सूर्खी की गई है। भवन निर्माण में बाखूबी दिखाने वाले कारीगरों ने भवन में ईंटों की चिनाई इंग्लिश और फलेमिश जोड़ से की है। भवन में गर्मी के मौसम दौरान ठंड और सर्दी के मौसम में गर्मी का अहसास होता हैे। भवन के कमरों में प्रकाश के लिए चारों दिशायों में रोशनदान लगाये गये हैं। भारत-पाक विभाजन से पूर्व अंदाजन 20 एकड़ भूमि के विशाल आंगन में फैले इस भवन के चारों और बाग-बगीचा थे, जो भवन को आनंदमय बना देते थे। बाग के फूलों की महक, अनार, आम, अमरूद और मालटा की मिठास तथा हरियाली से वातावरण ही आन्नदमय होता था। रिमझिम बारिश के मौसम दौरान जब बागों में मोर नाचता तो मदमस्त मौसम का नजारा स्वर्ग बन जाता। कोयल की सुरीली आवाज और चिडिय़ों का चहचहाना कानों मेंं मीठे संगीत का अहसास दिलाते थे। भवन के विशाल प्रांगण में फैले बाग के बीच दो कूएं थे। जिन्हें टिण्डा वाला कुआं के रूप में जाना जाता था। सेठ मुन्शी राम अग्रवाल का परिवार जब फाजिल्का में व्यापार के लिए आया तो उन्होंने यहां भूमि खरीद की। जिसमें रघुवर भवन की इमारत बनी हुई थी। रघुवर भवन की इमारत सबसे पुरानी ऐतिहासिक इमारत है, जिसे हैरीटेज का दर्जा दिलाने के लिए नईं आबादी, टीचर कालोनी, बस्ती चंदोरां और धींगड़ा कालोनी के बाशिंदों ने 2014 में लगातार एक माह तक आंदोलन किया, इसके बाद पंजाब के सांस्कृतिक पुरातन एवं म्यूजियम विभाग ने रघुवर भवन को हैरीटेज का दर्जा दिया . . . मगर दर्जा मिलने के बाद भी न तो विभाग ने संभाला और न ही प्रशासन व सरकार ने. . . उनकी अनदेखी के कारण ही रघुवर भवन खंडहर का रूप धारन कर गया . . .

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