
भांडे कली करा लो . . . गीत तो आपने सुना होगा . . . गलियों में भांडे कली करा लो.. की आवाजें लगाने वाले भी देखे होंगे . . . मगर अब तो वह कभी कभार ही दिखाई देते हैं. . . वो भी कभी त्योहारों के मौसम में . . . दीपावली पर्व से पहले धनतेरस के अवसर पर लोग पीतल के नए बर्तन खरीदते हैं और पुराने बर्तन भी कली करवाया करते हैं। मगर फैशन की हवा क्या चली कि तकरीबन हर घर में सेहत के लिए हानीकारक धातुओं के बर्तन जीवन का अंग बन गए हैं। तांबे व पीतल के बर्तन तो पुरानी परंपरा बनकर रह गई है . . . जिस कारण बर्तन कली करने वाले कारीगरों पर हानीकारक धातुओं की परंपरा की परत चढ़ गई है . . . यानि बर्तन कली करने वाले . .
वैसे भी लोगों का रूझान अब सिल्वर, स्टील व प्लास्टिक के बर्तन की तरफ अधिक है . . . क्योंकि यह पीतल व तांबे से सस्ते पड़ते हैं . . . वैसे भी इनकी लुक, डिजाइनिंग बढिय़ा है . . नए पीतल का रेट स्टील से तीन गुणा ज्यादा है। प्लास्टिक के बर्तन को रेट तो डिजाइन के हिसाब से बिकते हैं . . . शादियों में आम परिवारों में पीतल, तांबा व कांस्य का बर्तन देने की परंपरा है . . . कडाही, बाल्टी, गडवी, पतीला आदि दहेज के रूप में दिए जाते हैं . . . अब तो यह परंपरा भी खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. . . कुछ समय पहले की बात है . . . जब लोग गंगा जाते थे तो निशानी के रूप में पीतल व तांबे की कोई निशानी लेकर आते थे. . . अब बहुत कम . . . जबकि एक समय यह भी था जब सोने चांदी के जेवरात की तरह पीतल व चांदी के बर्तनों को पूंजी के रूप में रखा जाता था . . . जरूरत होती तो उसे बेच दिया जाता . .
अगर माहिरों की माने तो सेहत के लिए पीतल, तांबा व कांस्य बेहद उपयुक्त धातुएं हैं। देश की आजादी से पहले अंग्रेज कैदियों को जेलों में जो खाना देते थे वह भी पीतल या तांबे के बर्तन में ही दिया जाता था। मगर अब प्लास्टिक व अन्य हानीकारक धातुओं को रिवाज अधिक होने के कारण बीमारियों में भी इजाफा हो गया है . . हां. . . कुछ लोग डाक्टरों के सुझाव के बाद पीतल व तांबे के बर्तनों का प्रयोग जरूर करने लगे हैं . . . इससे पहले कि हमें डाक्टर कहें . . . क्यों न हम खुद ही पीतल या तांबे के बर्तन को प्रयोग में लें . . . .
Bhande Kali Kara Lo.. Bhande
Bhande Kali Kara Lo.. Bhande
Bhande Kali Karaa Lao
Praata De Paod Lawaa Lo
Kadaahiya De Thalle Lawaa Lo