गोल गोल गप्पा, गप्पे विच …

भीषण गर्मी है …इस गर्मी व चिलचिलाती धूप में हर कोई हैरान परेशान तो हो ही जाता है…गर्मी से बचना भी है…फिर पानी पीने की इच्छा तो होगी…चलो…पानी ही पीना है तो गोलगप्पे खाकर पानी पीएं…टेस्ट भी आएगा और तरोताजा भी हो जाएंगे…वैसे भी हर मार्केट व मौहल्ले में गोलगप्पे के ठेले वाला तो मिल ही जाता है…अगर मिल जाए तो मौका न जाने देना…हां, अगर भीड़ को देखकर गोलगप्पा खाएं तो मजा ही कुछ और आता है…यह एक ऐसी डिश है, जिसे देखते ही मुंह में पानी भर आता है…यह सिर्फ मुंह का टेस्ट ही नहीं बदलता, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है…खासकर इसके साथ मिलने वाला पानी।

             अगर आप पंजाब में हैं तो गोलगप्पा…हरियाणा में हैं तो पानी के पताशे…महारष्ट्र में हों तो पानी पुरी… उत्तर प्रदेश में पानी के बताशे या पताशी या फुल्की भी बोल सकते हैं…वेस्ट बंगाल में पुचके…उड़ीसा में गुपचुप और गुजरात में पकाड़ी के नाम से पुकारते हैं…

               बच्चे को कोई और कविता आए या न आए, लेकिन

गोल गोल गप्पा…

गप्पे विच पानी…

मेरी मम्मी रानी…

मेरा पापा राजा…

फल खाओ ताजा…

जरूर आती है…अगर नन्हें कदम चलते चलते यह कविता बोलें तो फिर गोल गप्पों का टेस्ट तो बचपन से ही शुरू हो जाता है…आप ने अगर बचपन में इसका टेस्ट नहीं लिया तो जवानी में चौंक चौराहों में खड़े होकर जरूर खाया होगा…अगर फिर भी नहीं खाया तो यह नहीं हो सकता कि आपकी नईं नईं शादी हुई हो और पत्नी के साथ घूमने निकलो तो …गोलगप्पा न खाओ…यह तो संभाव नहीं होगा!!!

           मेरे गली में ही हरी चंद गोल गप्पे बनाता है…उसके घर के आगे से रोजना गुजरना हूं…सुबह फ्री होता हूं, इसलिए गली में तीन चार चक्कर तो लग ही जाते हैं…हरी चंद भी गोल गप्पे बनाने के काम में जुटा होता है…उसकी पत्नी पूरा सहयोग करती है…वो आटे या सूजी के बाउल बनाने के बाद लोइयां बना रही होती है तो हरी चंद उन्हें तेल में तल रहे होते हैं…दोनों मिलकर सबकुछ तैयार कर लेते हैं और हरी चंद चौंक चौहारों पर ठेले पर लेकर इन्हें बेचने के लिए चला जाता है…कई बार खाये…गोल गप्पे के बाद जब पुदीने, हरे धनिया, इमली, हरी मिच, काली मिच, काला नमक, भूना हुआ जीरा आदि में मिला पानी मिलता है तो मुंह से निकल ही जाता है…नजारा आ गया !!!

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