मुलतान में क्यों मारा गया बंगले का निर्माणकर्ता

उम्र सिर्फ 22 साल की थीजब ब्रिटिश अधिकारी पैट्रिक एलैगजेंडर वंस एगन्यू बंगले के निर्माणकर्ता बन गएयह उनकी सोच थी कि बंगला अगर बाधा झील किनारे फूलों की खुश्बू के बीच निर्मित किया जाए तो इसकी महिमा दूर दूर तक होगीयुवा थेजोश थापंजाबी भी जानते थे और उनकी खासियत यह भी थी कि वह शहर बसाने में काफी माहिर थेलोगों से मिलना जुलना उनकी फितरत थीमगर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य में सिर्फ सात साल ही सेवा कीसिरसा, फाजिल्का, फिरोजपुर, लाहौर के बाद मुलतान उनकी जिंदगी का आखरी सफर था।

फाजिल्का के इतिहास में बंगले की दास्तान के जिक्र दौरान मुस्लमान फजल खां वट्टू के नाम के साथ वंस एगन्यू का जिक्र जरूर होगापिता के नक्शे कदमों पर चलकर ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने वाले वंस एगन्यू बंगाल सिविल सर्विस में तैनात हुएइसके बाद उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भटियाणा में सहायक सुपरिटेडेंट के पद पर तैनात किया गयावह एक सियासी अधिकारी की कला में माहिर हो गए। हालांकि उनकी आयु कम थी, मगर ब्रिटिश अफसरों में उनका प्रदर्शन अच्छा रहाउनका मनपसंद काम था शहरों को आबाद करनावह जहां भी गए, शहरों के विकास में उनका अह्म योगदन रहा। बात चाहे फाजिल्का की हो या लाहौर की। वह तीन बातों में इतफाक रखते थे, पहली बात किसी चीज को आरंभ करने के लिए सही जगह क्या है? दूसरा किन लोगों को मिलना या सुनना चाहिए? उनके जहन में तीसरी बात यह थी कि सब से महत्वपूर्ण कार्य क्या है, जिसे प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। इस सोच को आधार मानकर ही उन्होंने फाजिल्का शहर बसाने में प्राथमिकता से काम किया।                      

     फाजिल्का में बंगले के निर्माणकर्ता ब्रिटिश अधिकारी पैट्रिक एलेगजेंडर वन्स एगन्यू ने भले ही ब्रिटिश साम्राज्य में सिर्फ 7 साल तक सेवा की, लेकिन इस सेवा दौरान उन्होंने ऐसी कई भूली बिसरी यादें छोड़ी जो अमिट यादें बनकर रह गईकलकत्ता में उन्होंने 3 साल गुजारे तो फाजिल्का में वह 2 साल रहे। फाजिल्का में उन्होंने एक ऐसे बंगले का निर्माण करवाया। जिसके नाम पर क्षेत्र का नाम बंगला ही पड़ गया। हॉर्श शू लेक किनारे निर्मित इस बंगले की धूम दूरदूर तक रही है। बंगला नामक इस कस्बे को खुशहाली देने के पश्चात उन्हें लाहौर में तैनात कर दिया गया। वहां से मुलतान तक के सफर में उन्हें कई खट्टेमीठे अनुभव हुए। मुलतान में दूसरा सिक्ख एंग्लो युद्ध शुरू हुआ तो उनकी जिंदगी का अंतिम सफर भी समाप्त हो गया।

    वन्स एगन्यू का जन्म 21 अप्रैल 1822 को नागपुर में पैट्रिक वन्स एगन्यू के घर हुआ। उसकी माता का नाम कैथराइन फरेसर था। उनके पिता मद्रास आर्मी में लेफ्टीनेंट कर्नल थेजिन्होंने सिक्ख ब्रिटिश साम्राज्य के निणार्यक युद्ध पहले एंगलो सिख युद्ध सन् 1845-1846 में भी भाग लिया। मार्च 1841 में बंगाल सिविल सर्विस में ज्वाइंन करने वाला युवा वंस एगन्यू 1844 में फाजिल्का में बंगले का निर्माणकर्ता बन गयाउन्होंने बहावलपुर के नवाब मुहम्मद बहावल खान।।। से जगह ली और बाधा झील यानि हार्श शू लेक के किनारे एक विशाल बंगले का निर्माण करवायाबंगले में हर सरकारी गैर सरकारी काम होने लगेदूरदराज से लोग यहां न्याय पाने के लिए आने लगेबंगला नाम प्रत्येक व्यक्तिकी जुबान पर चढ़ गया। सब लोग बंगला का नाम पुकारने लगे। यही कारण है कि फाजिल्का नाम से पहले नगर का नाम बंगला हुआ करता थाबुजुर्ग आज भी शहर को फाजिल्का कम और बंगला ज्यादा पुकारते हैं।

       वंस एगन्यू सियासी ब्रिटिश अफसर थे, इस कारण हर सियासी नेता का यहां आनाजाना था। सियासी नेता ही नहीं, प्रत्येक ब्रिटिश अफसर भी यहां पहुंचते। सिरसा के अलावा मालवा, सतलुज राज्य की बैठकें यहां होने लगी। एक युवा अफसर के नेतृत्व में बंगला का नाम चंद ही महीनों में मशहूर हो गया। यहीं से शुरू हुआ बंगला नगर के निर्माण का कार्य। इधर वंस एगन्यू ने 1844 में बंगले का निर्माण करवाया, उधर दीवान मूल चंद को मुल्तान का गर्वनर बनाया गया।

BANGLA

          इस पद के बदले वह लाहौर सरकार को 20 लाख रूपए वार्षिक अदा करता था। जबकि कई इतिहासकारों ने इस की अदायगी की रकम 12 लाख रूपए बताई है। सभराओं की लड़ार्ई में विजयी होने के बाद अंग्रेजों ने लाहौर की तरफ कूच किया तो किसी ने उन की खिलाफत नहीं कीआखिर 20 फरवरी 1846 को अंग्रेज सेना लाहौर पहुंच गईइस बीच बंगला नगर की प्रसिद्धी पंख फैला रही थीएक खुशहाल और एगन्यू के सपनों का नगर बसने की योजना तैयार हो रही थी कि वंस एगन्यू का यहां से 13-12-1845 को फिरोजपुर का अतिरिक्त चार्ज दे दिया गयाजहां वह से 23-02-1846 तक रहेउसके बाद एगन्यू का तबादला लाहौर कर दिया गयालाहौर सिक्खों की राजधानी थीवहां भी वंस एगन्यू ने शहर के विकास को ओर आगे बढ़ाया। उधर ब्रिटिश साम्राज्य ने काहन सिंह को मुलतान का सूबेदार घोषित कर दिया। उनकी सहायता के लिए बंगला (फाजिल्का ) के निर्माणकर्ता वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन को भेजा गया। 19 अप्रैल 1848 को दीवान मूल राज ने खुशीपूर्वक नए सूबेदार को चार्ज दे दिया। अंग्रेजों की ओर से नया सूबेदार बनाने से मुल्तानी सैनिक खुश नहीं थे। उन्होंने विद्रोह शुरू कर दिया। जब वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना विद्रोह दबाने के लिए मुलतान की ओर बढ़ी तो मुलतानी सैनिक और भडक़ उठे। सिक्खोंं को पता चला कि ब्रिटिश सैनिक वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन के नेतृत्व  मेेंं आगे बढ़ रहे हंै तो उन्होंने बृज पार करते समय दोनों अंग्रेज अफसरों को घोड़े से नीचे उतार लिया और उन्हें बुरी तरह से मारपीट करके घायल कर दिया गया। युद्ध शुरू हो गया। सिक्ख ब्रिटिश सैनिकों के तेजधार हथियार एक दूसरे पर धड़ाधड बरसने लगे। मैदान लहूलुहान हो गया।

    वहां से घायल वंस एगन्यू व विलियम ऐंडरसन को ब्रिटिश सैनिक पनाह यानि ईदगाह में ले गए। मुलतानी सैनिकों में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति नफरत की ज्वाला पूरी तरह भडक़ चुकी थी। 20 अप्रैल 1848 की सांय सिक्खों का झुंड वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन की पनाहगाह में घुस गया और दोनों ब्रिटिश अफसरों को मार दिया। यहीं से बंगला के निर्माणकर्ता वंस एगन्यू की जिंदगी के सफर की आखरी राह बंद हो गई।

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