कटती रही सोने की चिडिय़ा…फडफ़ड़ाती हुई उड़ गई

Indo Pak Border

सोने की चिडिय़ा…अगर पिंजरे में कैद होती तो आज आजाद हो जाती…मगर मुझे काटा गया…कभी कहीं से तो कभी कहीं से…टुकड़े टुकड़े हो गए…कोई टुकड़ा कहीं तो कोई टुकड़ा कहीं जोड़ा गया…सियासत की कैंची से कटती रही…वर्ना…एक समय था, जब मैं सिरसा जिला की तहसील थी…मेरे एक तरफ बीकानेर तो दूसरी तरफ ममदोट की सीमा थी…तीसरी तरफ पाकपटन और देपालपुर की सीमा थी…अब सिर्फ फाजिल्का रह गया हूं।

           वो फाजिल्का, जो 1800 के आसपास बहावलपुर में था…ममदोट और बोदला परगना मुझ में समाया हुआ था…1884 में जिला सिरसा था…तोडक़र फिरोजपुर के साथ जोड़ा गया…विधान सभा सीट (फाजिल्का मुहम्मदन) भी काफी लंबी चौड़ी थी…अबोहर भी इसी का हिस्सा था…ममदोट भी…

            कहर…कहर तो तब टूटा…जब देश का बटवारा हो गया…बटवारा क्या हुआ…फाजिल्का का काफी हिस्सा पाकिस्तान में चला गया…सीमा पाकिस्तान के साथ लग गई…विवाद…तनाव…हमेशा रहता है सरहद पर…उधर सिरसा हरियाणा में चला गया तो इधर राजस्थान भी बन गया…एक सीमा जलालाबाद तक रह गई…दूसरी सीमा अबोहर तक…बीच में रह गया एक टुकड़ा…फाजिल्का…वो टुकड़ा…जहां कभी गोल्डन ट्रैक था…अब कहां से आए कराची तक का ट्रैक…यहां का माल कराची की बंदरगाह तक कैसे जाए…असंभव…हां…सियासत चाहे तो शायद कुछ हो सकता है…वो भी दोनों देशों की सियासत।

           सोचते थे…विभाजन के बाद शायद विशाल फाजिल्का बन जाए…मगर हुआ क्या ? वो टुकड़ा भी बिखरने लगा…किसी ने नहीं समेटा…लोकसभा सीट थी फाजिल्का…वो भी गई…(पूरा ब्योरा लिखा जाएगा अन्य ब्लॉग में) विधान सभा सीट भी सीमट गई…फरीदकोट जिला बना तो फाजिल्का का एक हिस्सा काटकर फरीदकोट के साथ जोड़ दिया गया।

          शुक्र है कि लोग जागे…जागे और इसके टुकड़े न करने की मांग होती शुरू हो गई…फिर शुरू हुई मांग…वो मांग जो असंभव सी लगती थी…मगर यहां के लोग…जो रंगले बंगले फाजिल्का को प्यार करते हैं…बीड़ा उठाया…मांग उठी…जिला बनाओ…मांग तेज हुई…धरना, प्रदर्शन, रैलियां, रेल रोको, अधिकारियों व सियासत पर पूरा दवाब…बंद…मरणव्रत…फिर एक दिन हो गई घोषणा…कि…फाजिल्का पंजाब का 22वां जिला घोषित…इस खुशी के माहौल में यह जरूर हो गया कि अब इसके टुकड़े नहीं होंगे…सोने की चिडिय़ा न बन पाए तो गम नहीं…मगर जो है वो तो यहां रहेगा…कहीं और तो नहीं जाएगा।

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