
दरिया अगर उफान पर हो तो तबाही मचा देता है…अगर शांत हो तो जीवन बना देता है…इन दिनों जैसे घग्गर दरिया ने तबाही मचाई हुई है…बंगले का इलाका भी दरिया किनारे बसा हुआ है…सतलुज दरिया…जिसने इस इलाके को जीवनदान दिया है…साथ ही तबाही का मंजर भी बिखेरा…1908 में सतलुज में बाढ़ आई तो शहर पानी में घिर गया…डाक बंगला, रेलवे स्टेशन, पुलिस थाना सहित कई इमारतें इसकी चपेट में आई…इसके अलावा ब्रिटिश व मुगलकालीन कलाकृति से बनी भव्य इमारतें और किले भी मिट्टी का ढर्रा बन गए… वो ढर्रा जो आज तक कच्चे किले का दोबारा रूप धारन नहीं कर सका।

उस समय यहां किलों की कोई कम पहचान नही थी…किले पर चित्रकारी…ऊंचे गुंबद…खुला आंगन…बीच में पानी का कुआं और किले की शोभा को चार चांद लगाती फुलवाड़ी…मदमस्त मौसम सावन में जब राष्ट्रीय पक्षी मोर अपना मनमोहक नाच दिखाता तो किला धरती पर जन्नत का अनुठा नजारा बन जाता…किले के मुख्य द्वार पर उर्दू या हिन्दी में लिखे हर्फ अपनत्व दिखाते थे…ऐसा प्रतीत होता था शायद यही BANGLA हैं…Train जब फजिल्का जंक्शन पर रुकती तो दोनों ओर किले देखकर अनपढ़ भी अंदाजा लगा लेता था कि वह बंगला के रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया है यानि कच्चे किले खुद ही बता देते थे कि इस पवित्र धरती का नाम बंगला है…ग्रामीण इलाके में तो आज भी कई किले मौजूद हैं, लेकिन फाजिल्का शहर के किले को तो भारत विभाजन ने निगल लिया या फिर बूढ़े हो चुके किले खंडहर बनने के बाद अपना नामोनिशान तक खो बैठे…

अगर उनकी संभाल होती तो शायद आज वे पर्यटन स्थल होते, लेकिन सरकार के साथ–साथ किसी ने भी उन्हें संभालने का प्रयास नही किया…संभाले भी तो कैसे? अगर कोई कोशिश करता तो सतलुज दरिया की बाढ़ उन्हें अपनी चपेट में ले लेती…अगर कुछ बचा तो आयु किसी को नही बख्शती…बंगले की इमारत ही इनकी भेंट नही चढ़ी, बल्कि रेलवे स्टेशन के सामने (जहां बी.डी.पी.ओ कार्यालय है)अंग्रेजों की ओर से बनाया गया कच्चा किला भी बिखर गया…इसके साथ ही बिखर गये पर्यटन स्थल बनाने के सपने…आई.आई.टी रूडक़ी के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. भूपेन्द्र ङ्क्षसह ने अपनी पुस्तक फाजिल्का दा टाऊन ऑफ लन्र्ड पीपल ने इस बात का खुलासा किया है कि रेलवे स्टेशन के पास कच्चा किला था…जहां अंग्रेजों के सैनिक ठहरते थे…
बड़े सुन्दर और प्यारे ढंग से बनाये गए इस किले की इमारत तो कच्ची थी, लेकिन चीनी मिट्टी से बनी मोटी दीवारों पर प्लस्टर किया गया था…जो गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्मी का अहसास कराती…गर्मी के दिनों में खुले रोशनदानों से आने वाली हवा इंसान को ठंडा–ठंडा होने का अहसास कराती थी…जब अंग्रेजों के सैनिक रेल गाड़ी से उतरते तो किले में रात बिताते, लेकिन अफसोस है कि फाजिल्का की शान रहे किले याद तक नही रह गई, जो यहां कभी कच्चे किला होने का अहसास कराए…समय के साथ–साथ सब कुछ बदल गया…यहां कुछ रहा है तो वे हैं भूली बिसरी यादें….सिर्फ यादें।
वहीं Satluj River के पार 13 गांव व ढ़ाणियां हैं…सरकार ने दरिया के इस तरफ तो मजबूत बांध बना दिया, लेकिन दूसरी तरफ मजबूत बांध नहीं है…दरिया का जलस्तर बढ़ता है तो वह गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं…भले ही आज वो दरिया नहीं रहा…मगर दरिया की बाढ़ से मची तबाही तो तबाही है…वो न तो इंसान और फसल देखती है और न ही किला…

Excellent story
पसंद करेंLiked by 1 व्यक्ति