
बचपन में कहानी पढ़ी थी…किसान और उसके चार पुत्र…जो आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे…जिस कारण उन्हें नुकसान हो रहा था…उनके किसान पिता ने बुलाया…एक लडक़ी तोडऩे को दी…जो उन्होंने बारी बारी आसानी से तोड़ दी…लकडिय़ों का गठ्ठा दिया तो उनसे टूट नहीं पाया…यही शिक्षा थी…जो फाजिल्का को जिला बनवाने की मांग को लेकर फाजिल्का वासियों ने प्रयोग की। गौर करें…
कल यानि 27 जुलाई को Distt. Fazilka की सालगिरह है…आप यह भी जानते हैं कि Fazilka को जिला बनाने के लिए कितना लंबा संघर्ष चला…जिले की मांग पहले भी पूरी हो सकती थी, लेकिन नहीं हुई…उसके पीछे फाजिल्का वासियों की आपसी फूट थी…सियासी श्रेय…या फिर यूं समझ लें कि सियासत की Fazilka के प्रति फूट…कुछ भी हो फूट तो फूट है…
भारत विभाजन से पहले भी कई बार कई मुद्दों को लेकर आंदोलन हो चुके हैं…मगर उनमें अधिकांश आंदोलन नाकाम रहे हैं…एक आंदोलन यहां बुचडख़ाने को लेकर भी हुआ था…मगर नाकाम रहा…कारण वही आपसी फूट…क्योंकि यहां मुसलमानों की संख्या अधिक थी…इनमें अनेक मुसलमानों ने बूचडख़ाने खोल रखे थे…मगर हिन्दु और सिख भाईचारा इसके खिलाफ था…बात 1928 की है, जब हिन्दु–सिक्ख समुदाय ने मिलकर इसकी खिलाफत करते हुए आंदोलन शुरू कर दिया…यह आंदोलन 21 दिन तक चला।
आंदोलन नाकाम न हो, इसलिए सभी का सहयोग जरूरी था…इसके लिए हिन्दु परिवारों का फाजिल्का में अधिवेशन बुलाया गया…यह अधिवेशन Fazilka की बड़ी धर्मशाला में हुआ था…बड़ी धर्मशाल…जानते हैं आप…यह धर्मशाला Clock Tower के निकट जहां गीता भवन मंदिर है…वहां थी…उस अधिवेशन में प्रस्ताव दिया गया कि अगर मुसलमान बूचडख़ाने बंद नहीं करते तो उनका असहयोग कर दिया जाए…यानी हुक्का पानी सब बंद…इस प्रस्ताव पर काफी देर तक बहस होती रही, लेकिन प्रस्ताव पास नहीं हुआ तो 22वें दिन आंदोलन बंद कर दिया गया…आंदोलन नाकाम रहा…सिर्फ आपसी फूट के कारण…
एक्ट की खिलाफत
एक आंदोलन तब शुरू हुआ, जब व्यापारियों से पैसा वसूलने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य में मार्किटिंग बिल एवं बिक्री टैक्स एक्ट शुरू शुरू किया था…व्यापारी वर्ग को यह मंजूर नहीं था…जिस कारण पंजाब में आंदोलन शुरू हो गया…इसके तहत फाजिल्का में भी आंदोलन हुआ…जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख जातियों के व्यापारी सम्मलित थे…इस आंदोलन की अगुवाई सेठ चानन लाल कर रहे थे…इस दौरान Fazilka बंद रखा गया…(जैसे फाजिल्का जिला बनाने की मांग को लेकर किया गया) जो ऐतिहासिक रहा…फिर क्या हुआ…वही फूट…व्यापारियों की आपसी फूट शुरू हो गई…कुछ दिन बाद ही कुछ लोग अंग्रेजो के साथ हो लिए…जिससे खफा सेठ चानन लाल आहूजा ने प्रधान पद से इस्तीफा दे दिया…जो 5 जुलाई 1941 को फाजिल्का से प्रकाशित समाचार पत्र निशात में प्रकाशित किया गया था…
आज की पीढ़ी कुछ समझदार हो चुकी है…वह जानती है…किसान और उसके बेटे की कहानी…वो इस कहानी को रिपीट करना नहीं चाहती…करनी भी नहीं चाहिए…जो इस कहानी से शिक्षा नहीं ले रहे…वह न तो अपने घर का भला कर सकते हैं…न शहर…प्रदेश और देश का।
