
फाजिल्का को जिला बनाने के लिए एकदम आवाज नहीं उठी…जो हजूम खड़ा हुआ था वो उसी समय नहीं हुआ…कई कारण थे…लोगों ने फाजिल्का को कटते हुए देखा था…टुकड़ों को देखा था…उन्हें समेटना जरूरी हो गया था…अच्छा किया…समेटा गया…वरणा आज यह एक कस्बा होता…बिखरा हुआ…टूटा हुआ…

बात वर्ष 1885 की है, जब फाजिल्का की उत्तर की तरफ ममदोट, दक्षिण की तरफ बीकानेर, पूर्व की तरफ सिरसा और पश्चिम की तरफ बहावलपुर की सरहद थी…फाजिल्का को पहली बार 10 दिसंबर 1885 में सिरसा से काट कर फिरोजपुर जिले से मिलाया गया और इसकी सीमा कम होनी शुरू हो गई…भारत विभाजन हुआ तो कुछ हिस्सा पाकिस्तान में चला गया…फिर कुछ हिस्सा राजस्थान और हरियाणा में मिला दिया गया…पंजाब में जब जिला बनने का सिलसिला शुरू हुआ तो 7 अगस्त 1972 में मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने फरीदकोट को पंजाब का जिला घोषित कर दिया और फाजिल्का के कई गांव फरीदकोट से जोड़ दिए गए…1986 में अबोहर सब डवीजन बनी तो फाजिल्का के कुछ गांव उसके साथ जुड़ गए। जलालाबाद और अरनीवाला फाजिल्का तहसील से तोड़ दिए गए…फिर बन गया त्रिभुज आकार का फाजिल्का… यानि फाजिल्का बिखरता गया…

फिर शुरू हुआ इसे समेटने का सिलसिला…सबसे पहले 1992 में 45 दिन के आंदोलन के जरिए इसे समेटने का प्रयास असफल रहा…एक जुलाई 2004 से 31 दिसंबर 2004 तक जिला बनाओ संघर्ष समिति का आंदोलन चला…नाकाम रहे…एक जुलाई 2006 को शहीदों की समाधि आसफवाला से फिर जिले की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ…करीब 35 हजार लोगों के हस्ताक्षर भी हुए, लेकिन असफलता के अलावा कुछ नहीं मिला…इसके पीछे एक कारण यह था कि आंदोलन वकीलों की ओर से शुरू किया जाता था…जिसमें समाजसेवी संस्थाओं के अलावा आमजन का सहयोग कम था। आमजन का सहयोग हासिल करने के लिए फिर अगस्त 2010 में सांझा मोर्चा बनाया गया…जिसकी अगुवाई के लिए पार्षद कंचन शर्मा, फाजिल्का के प्रथम विधायक चौ. वधावा राम के सुपुत्र कामरेड शक्ति, शिक्षाविद् राज किशोर कालड़ा, बलजिन्द्र सिंह बराड़, व्यापार मंडल के महा सचिव सतीश धींगड़ा, एडवोकेट यशवंत पुरी, एडवोकेट सुखजीत सिंह राए को शामिल किया गया…इसका प्रधान एडवोकेट सुशील गुंबर को बनाया गया…

पहले बार एसोसिएशन की ओर से काले बिल्ले लगाकर आंदोलन की शुरूआत की गई…बाद में 14 अगस्त को शहर में एक रैली निकालकर जिला बनाने की मांग की गई…इसके बाद रैलियों का सिलसिला शुरू हो गया…जिसमें हरेक सियासी पार्टियों ने सहयोग दिया…फिर शुरू हुआ धरने और भूख हड़ताल का दौर…घंटा घर चौक में भूख हड़ताल शुरू हो गई…रोजाना लोग धरने पर बैठते…इससे सरकार में कुछ हिलजुल हुई, लेकिन सरकार कांपी नहीं…

जब फाजिल्का के विधायक सुरजीत कुमार ज्याणी ने घोषणा की कि अगर फाजिल्का जिला घोषित नहीं किया गया तो वह मरणव्रत पर बैठ जाएंगे…तब सियासत में एक भूचाल सा आ गया…सरकार में हिलजुल हुई…क्योंकि सुरजीत कुमार ज्याणी ने जिला बनाने की मांग को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ मरणव्रत की घोषणा की थी…पहले सरकार ने भी इसे हलके से लिया, लेकिन 5 जनवरी 2011 के दिन जब सुरजीत ज्याणी लाव लश्कर के साथ मरणव्रत पर बैठने के लिए चौक घंटा घर पर पहुंचे तो इलाके के लोगों को हजूम उनके साथ खड़ा हो गया…उनके साथ अकाली दल बादल के सर्कल अध्यक्ष जत्थेदार चरण सिंह भी मरणव्रत पर बैठ गए…इससे पहले हवन यज्ञ किया गया…इसके बाद 6 जनवरी को नगर सुधार ट्रस्ट के चेयरमैन महिन्द्र प्रताप धींगड़ा भी मरणव्रत पर बैठ गए…व्यापार मंडल के प्रधान अशोक गुलब्द्धर के आह्वान पर फाजिल्का बंद कर दिया गया…बाजारों में सन्नाटा…अगर कोई आवाज थी तो वह सिर्फ फाजिल्का को जिला बनाने की मांग थी…

सरकार थर्रथरा गई और सरकार की ओर से सुरजीत ज्याणी को मनाने के लिए दूत के रूप में वनमंत्री तीक्षण सूद को 7 जनवरी की सांय भेजा गया…8 जनवरी को वनमंत्री ने वादा किया कि फाजिल्का को जिला बना दिया जाएगा…जिस पर आंदोलन शांत कर दिया गया…

फिर दिन आया 27 जुलाई का …जब फाजिल्का को पंजाब का 22वां जिला घोषित कर दिया गया…आज ही के दिन यानि 27 जुलाई 2011 को पंजाब सरकार ने गज़ट नोटिफिकेशन नंबर 1/1/2011-आरई- ढ्ढढ्ढ(ढ्ढ) /14554 के तहत फाजिल्का को घोषित होने के बाद सडक़ों पर खुशी का माहौल रहा… फाजिल्का जिले में सब डवीजन फाजिल्का, जलालाबाद और अबोहर व सब तहसील अरनीवाला शेख सुभाण, सीतो गुनो और खुईयां सरवर के अलावा गांव 314 (रेवन्यू) को मिलाकर एक सुंदर जिला बना दिया गया…
