Indo Pak Partition-2

विभाजन भारत का…एक देश था…1947 में दो टुकड़े हो गए…कोई जानता नहीं था कि दंगे भी होंगे…एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ेगा…अगर यह पता होता तो एडवोकेट गोकल चंद कुक्कड़ और लाला सुनाम राय एम.ए. Mukatsar की कचहरी में न जाते…उन्हें क्या पता था कि देश के विभाजन की घोषणा के बाद सबकुछ बंद हो जाएगा…न बसें चल रही थी…न ट्रेन…काफी समय की इंतजार के बाद एक ट्रक आया…दोनों ट्रक पर चढ़ गए…अबोहर पहुंचे और अबोहर बायपास पर उतर गए।
वहां खड़ी थी मुसलमानों की एक टुकड़ी…उन्होंने दोनों को पकड़ लिया…बोले…जान से मार दो इन्हें…मगर दोनों का रूतबा था…नाम बताया तो इनकी सूचना M.L.A तक पहुंचाई गई…दोनों को अबोहर की सुखेरा बस्ती की एक हवेली में बैठे M.L.A. Bagh Ali Sukhera के पास ले जाया गया…एडवोकेट गोकल चंद के सुपुत्र एडवोकेट उमेश कुक्कड़ बताते हैं कि उनके पिता और लाला सुनाम राय एम.ए. को विधायक सुखेरा ने चाय पानी पिलाया…मिया सुखेरा ने राय साहेब कुंदन लाल, दौलत राम नागपाल, बिहारी लाल अहूजा, सरदारी लाल कटारिया, परमानंद सेतिया और गंगा राम मिड्ढ़ा को बुलाया…दोनों को कोई मार न दे…इसलिए दोनों को उन्हें सौंप दिया…अब बात करते हैं कि मिया बाघ अली सुखेरा की दास्तान की।

बात 1828 की है, जब फाजिल्का और अबोहर रेतीला इलाका था…तब मौजूदा हरियाणा स्टेट के शहर फतेहाबाद के गांव बिगड़ से कई मुस्लिम परिवार अमरा सुखेरा के नेतृत्व में अबोहर आकर बस गए…उस समय अबोहर के पश्चिम की ओर भटनेर, मलोट, गुड्डा, सलेमशाह और गोरदियाणा गांव थे…दक्षिण-पश्चिम की तरफ करीब 100 मील तक कोई गांव नहीं था…ब्रिटिश साम्राज्य के कैप्टन थोरेबी ने अबोहर के आसपास के गांवों को आबाद करने के लिए 777 स्केयर किलोमीटर जगह अमरा सुखेरा व अन्य मुसलमानों को लीज पर दे दी…मुस्लिम परिवारों ने अबोहर में 1400 घर बनाए…जिस कारण अबोहर की एक बस्ती का नाम सुखेरा बस्ती पड़ गया।
इन परिवारों का मुख्य कारोबार पशु पालन था…इनके पास करीब एक लाख पशु थे…जिनके लिए वार्टर बनाए गए…पशुओं की नस्ल अच्छी थी… दूध भी काफी था…जिनसे वह रोजाना लगभग 60 मन घी निक ालते थे…इस घी को बेचकर जो उन्हें कमाई हुई, उससे उन्होंने राज्य में कई बस्तियों का निर्माण करवाया…इसके बाद उन में से कई परिवार फाजिल्का आकर बस गए। फाजिल्का में बसने वाले वट्टू परिवारों के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे… 1944 में अबोहर की सुखेरा बस्ती में मियां सुखेरा ने अपनी अम्मी जान की याद में मस्जिद का निर्माण भी शुरू करवाया…मगर भारत विभाजन हो गया और मस्जिद का निर्माण अधूरा रह गया।

लैंडलॉर्ड होने के कारण भारत सरकार की ओर से बाघ अली सुखेरा को मैंबर ऑफ पार्लियामेंट अफेयर्स नियुक्त किया था…बाघ अली सुखेरा के दिलशाद हुसैन सुखेरा, मियां गोहर अली सुखेरा, मियां मुस्ताख अहमद सुखेरा और मियां नाजिर अहमद सुखेरा को अपनी बाजू मानते थे…उनके बल पर वह फाजिल्का मुहम्मदन सीट से विधायक बने…उनका कार्यकाल 21 मार्च 1946 से लेकर 4 जुलाई 1947 तक रहा…विधायक बनने के बाद जालंधर डिवीजन के कमिश्नर ए.सी. मेकलोड सुखेरा बस्ती अबोहर में उनके घर बधाई देने पहुंचे थे…यानि देश भर में इस परिवार का रूतबा था।

मगर विभाजन ने उनके रूतबे को भी निगल लिया…सबकुछ बिखर गया…हजारों गऊओं को यहीं छोडऩा पड़ा…हवेलियां सुनसान हो गई…जो हिन्दु…सिख…मुस्लिमों की एकता की बात करते थे…वही एक दूसरे के दुश्मन बन गए…एक बड़ा काफिला…मिया सुखेरा की अगवाई…हिन्दुमलकोट की रास्ता…पार किया तो उनके कदम एक नए देश में पड़े…जिसका नाम था…पाकिस्तान…इसके बाद 1952 में वह एक बार अबोहर की सुखेरा बस्ती में आए…बड़े बेटे इकरम सुखेरा के साथ…अपनी जन्म भूमि को सिजदा किया…फिर वो ऐसे गए…वहीं के बनकर रह गए…हमेशा के लिए…
