Indo-Pak Partition-3

विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में एक है हड़प्पा सभ्यता…जो फाजिल्का से करीब 111 किलोमीटर दूर है…उस शहर में रहते थे पंजाब राम ढल्ला…जो इन दिनों फाजिल्का के मौहल्ला गांधी नगर में रह रहे हैं…जिंदगी के 84 बसंत देख चुके खुशमिजाज और हरदिल अजीज व्यक्तित्व के मालिक पंजाब राम ढल्ला का घर पूछा तो गली में खेल रहे एक बच्चे ने तुरंत उसकी पहचान तक बता दी…बच्चे ने तो यहां तक बता दिया कि वह घर के आंगण में कुर्सी पर बैठे हैं…
मैं (कृष्ण तनेजा) और मेरा साथी राजेश सेतिया ने जब पंजाब राम ढल्ला से बातचीत की और विभाजन से पूर्व के निवास व याद पलों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताने में न तो कोई संकोच किया और न ही कुछ याद किया…जवाब भी ऐसे दिया कि जैसे कल की बात हो…1935 को जिला साहीवाल के शहर हड़प्पा में सावन राम – सत्तां बाई के घर पैदा हुए पंजाब राज ढल्ला बताते हैं कि उनके पिता सुनार का काम करते थे…शेर चंद(रमनदीप के पिता) व पहलवान चंद (मदन लाल व राकेश कुमार के पिता) सहित पांच बहनों के भाई पंजाब राम…

पाकिस्तान के हड़प्पा शहर में आज भले ही मुस्लिमों की संख्या अधिक है, लेकिन उस समय वहां हिन्दु बहुताद में थे…शहर में ही सरकारी मिडल स्कूल था, जिसमें वह चौथी कक्षा में पढ़ते थे और दिवान चंद, मुकंद लाल, अमर लाल, कसतूरी लाल, मुहम्मद शफी, केवल कृष्ण, सलेम, वजीर, गुल मुहम्मद उनके सहपाठी थे…हैडमास्टर मिठ्ठा मल्ल थे और चुनी लाल, गुलाम फरीद, मुहम्मद हुसैन, लोकू राम, हरी चंद, गुलाम जिलानी, मलिक खां अध्यापक थे…अभी उन्होंने पांचवीं कक्षा में दाखिला लिया ही था कि भारत विभाजन हो गया…जिनके साथ वह बड़े प्यार और भाईचारे के साथ रहते थे, वहीं एक दूसरों के दुश्मन बन गए…पता नहीं था कि घर बार छोडऩा पड़ेगा…अचानक उनके घर में मुस्लिमों ने धावा बोल दिया और घर में पड़ा करीब डेढ़ किलो सोने के आभूषण व एक क्विंटल दस किलोग्राम चांदी के आभूषण लूट लिए…वह किसी तरह से वहां जान बचा कर निकले और 50-60 हिन्दुओं के काफिले को सैना के चार जवान उन्हें एक ट्रक में लाकर अमृतसर में शराणार्थी कैंप में छोड़ दिया…वहां कुछ दिन का दर्दभरा जीवन यापन के बाद वह जालंधर के डीएवी कालेज में लगे शरणार्थी कैंप में पहुंच गए…जहां सरकार ने इन्हें वस्त्र व राशन वगैरा दिया…पीछे की यादे, दोस्त बने दुश्मने और बर्बाद हुए जीवन को संभालने के बारे में वह सोचते और रात कट जाती…पता नहीं था कि जीवन में क्या होगा, जीवन कैसे कटेगा, रिश्तेदार कभी मिलेंगे या नहीं…कई दिन बाद सोनीपत में रहने वाले उनके रिश्तेदारों को पता चला तो वह उन्हें लेने के लिए जालंधर पहुंच गए…कुछ हौंसला बंधा और वह वहां से सोनीपत के मिशन स्कूल में बने शराणर्थी कैंप में चले गए…वहां करीब दस माह तक रहे और फिर वहां से फिरोजपुर के गांव कासूबेगू के शराणर्थी कैंप में पहुंच गए…उनकी किस्मत थी कि वह पूरे भरे परिवार के साथ दुख झेलते झेलते आखिरकार फाजिल्का में आकर बस गए।
जहां इन्हें सरकार ने 4500 रूपये उस जगह व समान के दिए जो वह हड़प्पा में छोडक़र आए थे…उस पैसे में से इन्होंने घर बार बसाया…इस पैसे में से दो मकान इनके चाचे व एक मकान पंजाब राम ढल्ला ने बनवाया…प्रति मकान लागत 682 रूपये थी…घर बार बना तो रोजगार की चिंता…हाथ में हुनर था और रोजगार की तलाश भी थी…तब इन्होंने खेतीबाड़ी के औजार दाती, कस्सी, कुल्हाड़ी आदि बनाने का काम शुरू कर लिया…फिर वह चिंतामुक्त होने लगे…बरसों के दर्दों को वह भूले नहीं थे, लेकि न चेहरे की मुस्कान के पिछले पर्दे में छिपे दर्द को कोई नहीं जानता था…मगर 1958 में निहाल चंद-भरीयां बाई की सुपुत्री राम प्यारी उनकी जीवन साथी बनी…उनके घर चार बेटे और तीन बेटियों ने जन्म लिया और इन किलकारियों ने पंजाब राम ढल्ला के जीवन के सब कष्टों और दर्दों को भुला दिया।

हालांकि यहां भी उनका रोजगार अच्छा था, लेकिन उनका एक सपना था कि वह किसी अन्य देश में पहुंचकर अपनी कला का लौहा मनवाए…इस सपने को पूरा करने लिए वह 1980 में इराक की राजधानी बगदाद पहुंचे, जहां करीब 6 माह तक बार-बैडरिंग का काम किया… इस बीच इरान और इराक में युद्ध छिड़ गया तो वह अपने देश भारत लौट आए…1997 को वीजा लगवाकर वह 28 दिन के लिए अपने बेटे के साथ पाकिस्तान स्थित अपनी जन्म भूमि हड़प्पा शहर में पहुंचे…जहां वह 120 गुणा 70 फीट की अपनी हवेली पहुंचे, जहां फाजिल्का के दूसरे विधायक बाघ अली सुखेरा के रिश्तेदारों का डेरा बना हुआ था…मगर वहां उनके पड़ोसी निहाल चंद बठला, माहला राम बठला व गोपाल चंद बठला का परिवार रहता था…न ही बठला परिवार की चारपाई व वाण की दुकान थी…न ही वहां सावन भक्त की करियाने की दुकान थी। वहां लाल चंद के आटे की चक्की भी कहीं नजर न आई…उसकी दिल कहता था कि वह बोघे माछी का तंदूर की रोटी खाए, लेकिन वहां बोघा माछी तो नहीं था, हां उसकी पुत्रवधु नूरी उसी तंदूर पर रोटी बना रही थी…जिसे देखकर पंजाब राम ढल्ला बचपन की यादों में गुम हो गया…यह भी पता चला कि वहां वो रामलीला भी बंद हो चुकी थी…जिसका मंच संचालन रोशन लाल सिडाना करते थे…रावण का अभिनय सांझा राम नारंग और ताडक़ा का अभिनय नानक दास नानकू बाखूबी निभाते थे…मगर वहां 9 गज पीर की मजार जरूर थी…जहां पूरी रोनक थी। वहीं नानकसर गुरूद्वारा में हर साल चेत्र मास की 4 तारीख को मेला लगता था…जहां दूर दराज से लोग पहुंचते थे…पंजाब राम ढल्ला ने नानकसर गुरूद्वारा के अलावा कृष्णा मंदिर में भी माथा टेका…
पंजाब राम ढल्ला पाकिस्तानी गायकी के काफी मुरीद हैं। गायक मलकू, मंसूर मलंगी, जाफर अली, मुरातब अली की गायकी में मोहित होने वाली श्री ढल्ला बताते हैं कि हड़प्पा के साथ गांव है लक्कां वाला चक्क है, जहां अल्ला दत्ता लूने वाला गायक का प्रोग्राम था।…उनकी गायकी के भी मुरीद थे…इसलिए वह प्रोग्राम सुनने के लिए पहुंच गए…जहां अल्ला दत्ता लूने वाला का गीत जित्थे चलेंगा, चल्लूंगी नाल तेरे वे टिकटां दो लै लईं . .. . सुना तो लुत्फ आ गया…दिल तो करता था कि वह वहां रहें, लेकिन दोनों देशों में बनी सरहदों ने उन्हें इजाजत नहीं दी…वैसे पंजाब राम ढल्ला की यादशक्ति की भी दाद देनी पड़ेगी, क्योंकि वह इस आयु में भी अपनी सातवीं पीढ़ी तक याद है…उन्हें याद है कि वह आडेदान ढल्ला के बाद मुल्तानी राम, मोती राम, सज्जन राम, रज्जन राम, सावन राम तक पंजाब राम ढल्ला को याद है। अगर उनकी आगे की पीढ़ी की बात करें तो उनके बेटे प्रेम कुमार, केवल कृष्ण, राज कुमार व रतन लाल हैं और अगली पीढ़ी में पोते राहुल, चेतन, ललित कुमार व कर्ण कुमार हंै। भले ही उनका परिवार हराभरा है, लेकिन उनकी जीवनसाथी श्रीमती राम प्यारी 10 फरवरी 2016 को उन्हें अलविदा कह गई।
Written by- Krishan Taneja Mob. No.92566-12340

Good 👍
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Thanks Sir
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