न मोटरगाडी, न बैलगाडी-खिलौनों की जगह विभाजन का दर्द

Indo Pak Partition-4

कोई काफिला इधर आ रहा था तो कोई उधर जा रहा था…कोई मोटर गाडी पर था तो कोई बैलगाडी पर…मगर उनके पास न मोटर गाडी थी न ही बैलगाडी…उम्र भी सिर्फ 9 वर्ष…खिलोनों से खेलने के दिन थे…खिलौनों की जगह सिर पर था…वो दर्द…वो बोझ…जो उस समय सबके सिर पर था…चाहे वो हिन्दु हो…चाहे सिख या फिर मुसलमान…अकेला तो कोई नहीं…अकेला मिलता तो मार दिया जाता…महिला अकेली दिखाई देती तो काफिर उस पर टूट पड़ते…कई तो अपनी अस्मत बचाने के लिए दरिया या हैड में कूद गई…कई हैवानियत की बली चढ़ गई…इस बीच ही एक काफिला था…उसी में था नन्हा बालक जोगिन्द्र सिंह…जिसे आज लोग जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह तनेजा के नाम से जानते हैं…उनसे मिलने मैं गांधी नगर पहुंच गया…विभाजन की कुछ जानकारी लेने के लिए…दुआ सलाम हुई…चाय की चुस्कियां का दौर भी चला…फिर शुरू हुई उनकी दास्तान।

Joginder Singh

जिला लाहौर के शहर चूहनी 15 सितम्बर 1938 को दरबारा सिंह व माता महेन्द्र कौर के घर में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया… जो भारत विभाजन के बाद फाजिल्का में जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ…विभाजन से करीब एक साल पहले ही उनके पिता दरबारा सिंह की मौत हो चुकी थी…जिस कारण वह विभाजन का दर्द उनके दिल में ही दब गया…जिन्दगी का हर बोझ उनके सिर पर था…हालांकि स. प्रताप सिंह उनके बड़े भाई थे और फाजिल्का में काफी समय तक नगर कौंसिल में कर्मचारी रहे…जोगिन्द्र सिंह खुद दर्जी का काम करते रहे हैंं, लेकिन उनके खानदान में पहले कोई दर्जी नहीं रहा…उनके पिता स. दरबारा सिंह व स. दरबारा सिंह का भाई व पिता दोनो हकीम थे।

पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि वह विभाजन से पहले गांव खाने पीरे की में रहते थे…वहां हिन्दुओं का सिर्फ एक परिवार था और एक परिवार सिख था…जबकि बाकी सभी परिवार मुस्लिम थे… मगर इन सभी में भाईचारा और मुहब्बत काफी थी…किसी भी धर्म का पर्व हो, वह एक दूसरे को मिठाई देना न भूलते और बधाई भी देते हुए उस पर्व को मिलजुल कर मनाते थे। हालांकि आजकल शहरों की दूरी काफी निपट गई है, लेकिन उस समय दूरियां काफी थी…एक याद को फिर ताजा करते हुए वह बताते हैं कि वह पहली बार अपने चाचे के साथ घोड़ी पर शहर गए थे। समय भी विवाह का था और बरात घोड़ों पर गई थी…वह दिन उन्हें आज भी याद है कि उसके साथ उसका हमउम्र चाचे का बेटा भी था।

S.Joginder Singh Taneja with his wife Joginder Kour

विभाजन के समय सतलुज दरिया उफान पर था…वहां से गुजरते हुए वह जलालाबाद (प) के गांव घागां में आकर बस गए…वहां उन्होंने करीब पांच वर्ष सघंर्ष किया और बाद में फाजिल्का में अपने ननिहाल सरदार गुरबख्श सिंह सचदेवा के पास आकर रहने लगे…1952 में इन की शादी होदां गांव निवासी ग्रंथी सरदार गन्डा सिंह की बेटी जोगिन्द्र कौर से हुई… वह बताते हैं उन्होंने दर्जी का काम उस्ताद हरी देव छिम्बा से सीखा और दर्जी के काम की बरीकियां उन्होंने अपने मामा के बेटे से सीखीं…इनके घर तीन बेटों और तीन बेटियों ने जन्म लिया। उन सभी की शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके हैं।

Joginder Singh-Joginder Kour with His Late Grandson Sukhwinder Singh

जलालाबाद से फाजिल्का आने के बाद उन्होंने अपनी मौसी जी के बेटे गोपाल सिंह के साथ घंटाघर के पास दर्जी की दुकान खोली…15 वर्ष की आयु में उन्होंने फाजिल्का के नजदीकी गांव में सिलाई मशीनें बेचने का काम शुरू किया…और साथ ही कपड़े का काम भी गांव में श्ुारू किया था…दिल्ली और अमृतसर से कपड़े लाकर गुरू नानक क्लाथ हाउस के नाम पर दुकान खोली…उन्होंने बताया कि दुकान के हिसाब-किताब के लिए कृष्ण लाल शर्मा जो उस वक्त रोशन लाल खुंगर के पास मुनीम का कार्य करते थे…उन्हें अपनी दुकान पर 25 रूपये मासिक वेतन पर मुनीम रखा…उस के बाद उन्होंने किसी पडिंत के पास लण्डे सिखें… दुकान का हिसाब-किताब भी खुद देखने लगे। जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह अकाली दल बादल में बरसों तक महासचिव रहे। उनकी पूर्व मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल के साथ काफी नजदीकियां थी…स. बादल जब भी फाजिल्का आते तो उनकी दुकान पर जरूर पहुंचते

बात 1982 की है, जब रात के समय वह अपनी माता के पास बैठे थे…माता ने उन्हें जिन्दगी के कई तुजुर्बे सांझे किए…अच्छाई और ईमानदारी की जिन्दगी का अमूल्य तोहफा बताया…बातें अभी जारी थी कि उनकी माता महेन्द्र कौर इस फानी जहां को अलविदा कर गई…मां के साथ उनका वही आखरी सफर था…जैसे विभाजन से पहले उनकी पैतृक भूमि …चूहनी…चूहनी शहर…चूहनी शहर का आखरी सफर था…देश का विभाजन। (Writer- Krishan Taneja 92566-12340)

Krishan Taneja with Joginder Singh & His Friend Bihari Lal Setia

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