Indo-Pak Partition-5

देश का विभाजन…दंगे…हत्याएं…दुष्कर्म…खून से लबालब सडक़ें…दर्द…आहें…इधर भी…उधर भी…मगर दोनों देशों को बांटती सरहद की सही लकीर कहां है…सही तो कोई नहीं जानता…इसलिए हदबंदी के पिल्लर लगाए गए…पिल्लर…तांकि हर व्यक्ति को…देश के जवानों को…पता चले…सही हदबंदी का…न कोई इधर आ सके…न कोई उधर जा सके…उस समय पिल्लर लगाने के लिए की गई हदबंदी के गवाह थे फाजिल्का के रहने वाले सुखदेव राज वोहरा…जो इन दिनों कैंट रोड पर रहते हैं…उस समय वह भारत की तरफ से पटवारी थे…उन्होंने जो देखा…वही जुबानी…एक कहानी।

in Front : Son Arun Vohra and His wife Veena Vohra
हदबंदी के लिए उनके साथ Chiman Lal Maini, Satpal, Sukhdev or Balwant Singh पटवारी थे…दो कानूनगों भी…सभी Pakistan के पटवारियों व काननूगो के साथ बैठक करते…ताकि पिल्लरों को लेकर दोनों देशों में किसी तरह का कोई विवाद न हो…जब पाकिस्तान में बैठक होती थी तो वह यहां से केले व पान के पत्ते लेकर जाते…ताकि पाकिस्तान के पटवारियों को दी जा सके…रिटर्न गिफ्ट…यानि बदले में…उपहार…रंगला दातुन, पक्खी और सेंधा नमक मिलता था…सख्ती तो उस समय भी थी…जिसकी मिसाल वह बताते हैं…एक बार जब वह बैठक के लिए पाकिस्तान के लाहौर में थे तो चिमन लाल मैनी बिना सूचना दिए अपने मामा के घर चला गया था…बाद में पता चला कि इस कारण उसके मामा को पाकिस्तान की खुफिया एजैंसी के कर्मियों ने उठा लिया था।

Sukhdev Raj Vohra 15 अक्तूबर 1932 को Teh. Kasoor, Distt. Lahor -Pakistan में गुरांदित्ता मल वोहरा के घर माला देवी की कोख से पैदा हुए…वहां इस परिवार की 16 एकड़ भूमि थी और फालसे व अन्य फलों का बाग था, जिसका फालसा तोडऩे पर उन्हें दो पैसे प्रति किलो खर्च मिलता था…बचपन था…इसलिए उनके लिए तो यह खर्च काफी था…इसके साथ ही वह फालसे के पत्तों का बंडल बनाते और दुकानों पर जाकर बेच आते…जिसका खर्च उन्हें अलग से प्राप्त होता…मगर जब विभाजन हुआ तो उन्हें फिरोजपुर के अर्बन ऐरिया में सिर्फ छह एकड़ भूमि ही मिली।

in Front : Arun Vohra (Son), Alisha Vohra (Grand Daughter) , and Veena Vohra (Daughter in law)
बात उनके बचपन से शुरू हुई तो उन्होंने बताया कि उनकी प्राथमिक शिक्षा कसूर के सरकारी प्राइमरी स्कूल से हुई और मिडल भी कसूर से की…मगर दसवीं कक्षा दिल्ली से पास की…जब वह 15 वर्ष के हो गए तो देश का विभाजन हो गया… ज्यादा पता नहीं था कि Partition क्या होता है…मगर जब वह Partition दौरान पैदल आ फिरोजपुर की तरफ आ रहे थे तो रास्ते में लुटेरों ने उनके काफिले पर हमला बोल दिया…काफिले ने मुकाबला किया…मुकाबला कड़ा था…सुखदेव राज वोहरा के पिता गुरां दित्ता व भाई बलदेव पर लुटेरे भारी पड़ गए और उनकी हत्या कर दी गई…इस दर्द ने उन्हें अंदर से झंझोड़ कर रख दिया, लेकिन एक दर्द यह भी साथ रहा कि विभाजन की लूटपाट के चलते उनके चाचा राम कृष्ण पाकिस्तान में ही छुप गए…जो करीब छह माह बाद भारत आए।
वोहरा बताते हैं कि विभाजन दौरान वह refugee camp Firozepur में आ गए…इसके बाद 1948-49 में सतलुज दरिया में बाढ़ आ गई…बाढ़ भी इस कदर कि दरिया का बांध ही टूट गया…पानी तेजी से फिरोजपुर की तरफ बढ़ा तो वह अन्य लोगों के साथ रेलवे पुल पर आकर बैठ गए…बताते हैं कि बाढ़ का पानी कासू बेगू गांव तक पहुंच गया था…इसके बाद वह अपनी मोसी के पास दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने दसवीं कक्षा पास की। साथ ही 30 रूपये प्रति माह नौकरी भी की। रिश्तेदारों व बुआ के बेटों ने सहायता की और उन्होंने डेढ़ वर्ष का पटवार कोर्स किया…इसके बाद 22 दिसम्बर 1953 को उन्हें पटवारी की नौकरी मिल गई…डयूटी Mamdot में लगी, जहां उन्हें साढ़े 32 रूपये मासिक वेतन मिलता था।

in Front : Dr. Raman Vohra (Grand son), Arun Vohra (Son), and Veena Vohra (Daughter in law)
30 अप्रैल 1955 को इनकी शादी बलवंत राएपुरी-सरसवती की बेटी स्वर्ण कांता से हुई…इनके घर दो बेटियों व 3 बेटों ने जन्म लिया। 1966 में घल्लू इनका तबादला फाजिल्का के गांव घल्लू में हुआ और इन्होंने अपनी रिहायश Fazilka में कर ली और यहां स्थायी तौर पर बस गए।

वह 40 दिन के भारत भ्रमण दौरान चारों धाम की छह बार यात्रा भी कर चुके हैं…यादों को ताजा करते हुए 1965 के भारत पाक युद्ध के समय अपने दोस्त गुरदियाल सिंह को काफी याद करते हैं, क्योंकि इस युद्ध दौरान गुरदियाल सिंह ने वोहरा परिवार की एक माह तक अपने पैतृक घर मोगा में रखकर काफी सेवा की थी…जिन पर वह आज भी मान करते हैं…दो बार परमिट पर पाकिस्तान जा चुके श्री वोहरा को मान तो बचपन के दोस्त मुहम्मद सैय्यद व सतपाल पर भी करते हैं…बचपन में उनके साथ जो खेले थे। 1990 में सेवानिवृत सुखदेव राज वोहरा के सुपत्र गुरमीत राए मंडी सुपरवाइजर रिटायर्ड हैं और शरनपाल कनेडा रहते हैं, जबकि अरूण कुमार पटवारी हैं। (कृष्ण तनेजा फाजिल्का 92566-12340)

