Indo-Pak Partition-7

जीवन में मैं कई ऐसे बुजुर्गों से मिला हूं, जिन्होंने भारत का विभाजन देखा है…उनसे देश के विभाजन की बात करते हैं तो याद करते हुए दहल उठते हैं…बटवारे की टीस से से उनकी आंखें एक बार फिर से अश्कों से भर जाती हैं…खून से सनी सडक़ें जो देखी थी…हत्याएं होती देखी थी…महिलाओं को कुंओं में छलांग लगाते हुए देखा था…टीस तो उठनी ही थी…ऐसे दृश्य तो सबको रूला देते हैं…फिर जिसका गला सूखा रहा हो…पानी की बूंद बंूद को तरस रहा हो…अचानक दूर से पानी का नाला नजर आए…जाहिर है…प्यास बुझाने के लिए वो दौडक़र पानी के नाले की तरफ जाएगी…अगर वहां उसे पानी तो मिले, लेकिन खून से लबालब…तब उसके दिल पर क्या गुजरती होगी…साथ ही अगर बच्चा हो…उसे भी प्यास लगी हो…बच्चा रो–रोकर बोल रहा हो…मां…मां…पानी…पानी दो मां…मेरा गला सूख रहा है…तब यह दर्द…वो मां ही जानती है…या वो लोग जानते हैं…जिन्होंने वो समय और मंजर देखा हो…ऐसा ही देखा था शाहमद वट्टू गांव तहसील दीपालपुर जिला मिंट गुमरी (पाकिस्तान) से भारत विभाजन दौरान उजडक़र आए गुरांदित्ता राम जसूजा ने…उनकी दर्द भरी यह दास्तां वाक्य ही रौंगटे खड़े कर देने वाली है…देश का बटवारा हुआ…तो वह 24 साल के युवा थे…तीन भाई एक बहन से बड़े गुरांदित्ता राम की माता चंदा देवी और पिता सुंदर दास जसूजा ने भी विभाजन दौरान नहीं सोचा था कि जिस घर को वह छोड़ रहे हैं…वहां कभी लौटकर नहीं आएंगे…सोचा था…एक दो सप्ताह बाद सब शांत हो जाएगा…मगर कुछ दंगो ने डरा दिया…प्रशासन ने…शाहमद वट्टू गांव और आसपास के वो मुसलमान भी दुश्मन बन गए…जिनके साथ कभी अच्छे रिश्ते थे…दोस्ती थी…और प्यार था…विभाजन ने सबकुछ नष्ट कर दिया…विभाजन की आग ने न दोस्ती देखी…न पड़ोसी देखा…कहीं दंगे उन पर भारी न पड़ जाएं…इसलिए वहां से निकलना ही बेहतर समझा…

उनकी शिक्षा दीक्षा बंटवारे से पहले पाकिस्तान में अपने जन्म स्थली गांव के स्कूल में ही हुई…जहां उन्होंने तीन कक्षायें उर्दू और दरबार साहिब की चौकी…विभाजन हुआ तो 1952 में हिंदी रतन और 10वीं की पढ़ाई मुकम्मल की…उन दिनों फाजिल्का के ऊन बाजार के राम मंदिर में कक्षायें लगती थी…उनका विवाह सरदारी लाल नागपाल के घर जन्मी पार्वती के साथ उनका विवाह गांव हैड सुलेमानकी में हुआ…दो दिन तक बारात वहां रूकी…एक दिन लडक़ी वालों के घर और दूसरे दिन गांव के जैलदार जैमल खां के घर उनके आग्रह पर रूकी…(हैड सुलेमान के बारे में किसी दिन ब्लॉग में ही बताया जाएगा)।

वह बताते हैं कि उनके पास बैलगाडी, घोड़ा या मोटर गाडी नहीं थी…विभाजन हुआ…वह परिवार सहित पैदल ही चल पड़े…खाली हाथ…कुछ आटा…घी वगैरा था…पता नहीं था…कहां जाना है…न कोई मंजिल…न ठिकाना…चल पड़े भगवान के सहारे…कच्चा रास्ता था…कहीं लाशें मिली तो कहीं कटे हुए हाथ…पांव…धड़…सिर…कहीं कुंआ लाशों से भरा हुआ था…बस जुबान पर एक ही शब्द था…हे भगवान…किसी ठिकाने पर पहुंचा दे…आखिर वह पहुंच गए…एक शरणार्थी कैंप में…जो कुछ मिला…भगवान का प्रसाद समझ कर खा लिया…बाद में गांव जंडवाला में मेहनत मजदूरी कर अपना व परिवार का पालन पोषण किया…उस समय 3 रुपये प्रति दिहाड़ी मिला करती थी…उन्होंने गांधी चौंक पर कंडा लगाया…तूड़ी तोल कर बेचनी शुरू की…दो बरस तक गरीबी के घेरे न बांधे रखा…बाद में डीएफएसओ चौ. लाल सिंह ने 1952 में उन्हें डिपो की अलाटमैंट कर दी…2338 रुपये भारत सरकार को देकर उन्होंने अपनी करियाने की दुकान की रजिस्ट्री करवाई…26 अक्तूबर 2003 उनकी धर्मपत्नी पारवती देवी का निधन हो गया…बड़े बेटे शाम लाल का 31 दिसंबर 2011 को निधन हो गया…96 वर्ष की आयु…नजर व दांत एक दम सही सलामत…सुबह 4:30 बजे उठने का नियम है…कोई नशा नहीं…वह अपने पुत्र कृष्ण लाल जसूजा बहु सुषमा रानी, पौते पौतियों व पड़पोत्र के साथ हंसी खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। (Writer-Krishan Taneja 92566-12340)
