Indo-Pak Partition-11

मुसलमानों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया…उनमें कई ऐसे थे…जो महिलाओं की इज्जत लूटने की फिराक में थे…कोई जान से मारना चाहता था तो कोई माल लूटने के चक्कर में था…इज्जत न जाए…इसलिए उनके परिवार कुछ महिलाओं ने घर के खुले आंगण में बने कूएं में छलांग लगाकर खुदकशी कर ली…उनके एक मुस्लिम दोस्त खुदा हयार ने वहां से बचाया और उन्हें चक्क नूर मुहम्मद रेलवे स्टेशन पर पहुंचाया…इसके बाद भी इस परिवार ने जो कष्ट झेले…उन्हें सुनकर एक बार तो आम आदमी की भी आंखों में अश्क बह ही जाते हैं…मगर जिस परिवार के साथ यह हादसा हुआ है…

उस पर क्या बीती होगी…यह परिवार तो आज भी उस बात को याद करके सहम सा जाता है…वर्ना यह परिवार वो परिवार था…जो दलेर था और आज भी वैसे ही दलेर है…भारत विभाजन से पहले यह परिवार लाहौर जिले की सीमा पर स्थित गांव कुम्हारी वाला में रहता था…इन दिनो फाजिल्का जिले में रहता है…कालड़ा जाति के इस परिवार का मुखिया था लाला जट्टू राम…पाकपटन और कुम्हारी वाला में इनकी करीब 1500 एकड़ भूमि थी…अमीर और दलेर कौम के जट्टू राम का कद छोटा था और बड़ी पगड़ी बांधते थे…कद भले ही छोटा था…मगर दलेरी की महिमा दूरदराज तक भी मशहूर थी…एक बार जग्गा डाकू उनकी हवेली में डाका मारने के लिए पहुंचा…इस दौरान जग्गा डाकू के दोस्त झंडा सिंह निर्मलके और ठाकुर सिंह मंडियाली भी उनके साथ थे…

लाला जट्टू राम को पता चला तो फायर करते हुए ललकारा…बोला…अगर तुम्हे कोई चीज चाहिए तो ले जा सकते थे…अगर मेरे किसी आदमी को मारा तो एक के बदले दस मार दूंगा…जग्गा भी सूरमा था।…उसकी बहादुरी पर खुश हुआ और खाली हाथ लौट गया…इसके बाद जग्गे ने एक सुनार के घर में डाका मारकर वहां से सोना लूटा और बही खातों को आग के हवाले कर दिया…वैसे कालड़ा परिवार धार्मिक परिवार था…इसकी मिसाल इससे मिलती है कि गांव के पंचायती मंदिर में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में पूरा परिवार सेवा करता था…

बात विभाजन की हो रही है तो बात 25 अगस्त 1947 की भी बता दूं…जब विभाजन के बाद हिन्दू-मुस्लिम टकराव हो गया…लाला जट्टू राम के पोत्र राज कुमार कालड़ा बताते हैं कि दादा जी की गली में मुसलमानों का एक झुंड हथियारों से लैस होकर आ धमका…कत्ल-ए-आम शुरू हो गया…लाला जट्टू राम की हवेली के निकट कुआँ था…कई महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए उसे कुएं में छलाग लगाकर अपनी जान दे दी…वहां से उनके मुस्लिम दोस्त ने निकाला और चक्क नूर मुहम्मद रेलवे स्टेशन पर पहुंचाया…वहां भी मुसलमानों ने उन्हे घेर लिया और एक हवेली में ले गए…जहां उन्हें मुस्लमान बनने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन वहां से किसी तरह से वह बच निकले तो रास्ते में उन्हें फिर घेर लिया गया…जहां उन्हें गोमास खाने के लिए मजबूर किया गया…जो महिलाएं उनके साथ थी…वह घुंघट निकालती थी और उनके आगे मुस्लमानों ने गौमास परोस कर रख दिया…

लेकिन महिलाओं ने गौमास को घुंघट का सहारा लेकर कपड़े में ही छुपा लिया। वहां ध्यान चंद, पार्वती, रघुनाथ राए और हंस राज को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया…जब वहां पहुंची गोरखा और डोगरा रेजीमेंट…तो उन्होंने वहां से बचाया…जब वह सुलेमानकी हैड पर पहुंचे…फिर मुस्लिमों के एक काफिले ने उन्हें घेर लिया और महिलाओं की इज्जत को तार-तार करना चाहा, लेकिन महिलाओं ने इज्जत को हाथ नहीं लगाने दिया और सुलेमानकी हैड से छलांग लगाकर जान दे दी…इस कत्लेआम के गवाह राज कालड़ा के पिता लाल चंद कालड़ा, ताया लाला लखपत राए कालड़ा और चाचा राम कृष्ण कालड़ा के अलावा हरबंस लाल कालड़ा, सतनाम राए कालड़ा, इशर सिंह कालड़ा आदि परिवारों सहित बामुश्किल फाजिल्का पहुंचे और यहां आकर बस गए…आज भी जब वह 25 अगस्त को याद करते हैं तो उनकी आंखों में अश्क बहने लगते हैं…उनकी याद में श्री हनुमान मंदिर में पाठ पूजा भी की जाती है।(कलम@ कृष्ण तनेजा-92566-12340)
