भारत विभाजन निगल गया ऐशिया की प्रसिद्ध ऊन मंडी

Indo-Pak Partition-12

    कहते हैं कि वह गांव, कस्बा, शहर, प्रदेश या देश कभी उन्नति नही कर सकता, जहां उद्योग होंऔद्योगिक क्रांति के बिना तो गांव से लेकर देश तक आर्थिक तौर पर कमजोर हो जाते हैंभारत विभाजन ने देश में कई उद्योगों को कमजोर कियाकईयों को खत्म ही कर दियाखत्म हुए उद्योगों में फाजिल्का क्षेत्र का उद्योग भी शामिल हैऊन उद्योगऊन उद्योग यहां ऐसा उद्योग था, जो महापंजाब ही नहीं, बल्कि एशिया और यूरोप की मंडियों में प्रसिद्ध रहा हैवह था ऊन का व्यापार, लेकिन विभाजन के बाद ऊन उद्योग समाप्त हो गयाफाजिल्का के इतिहास में ऊन का व्यापार सिर्फ सुनहरे पन्नों की याद बनकर रह गयाब्रिटिश साम्राज्य में यहां ऊन के व्यापार को बढ़ावा मिलाऊन के व्यापार को क्षेत्र की जनता को संभाला, संवारा और फाजिल्का को आर्थिक तौर पर मजबूत किया, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के बाद उद्योग बिखर गयाकहां से आएगी फाजिल्का से कराची तक चलने वाली रेल गाडी? कहां मिलेगा अमरूका रेलवे स्टेशन? वह हिस्सा तो विभाजन की भेंट चढक़र पाकिस्तान जा चुका हैकराची की बंदरगाह से यूरोप तक मंडियों का संपर्क टूटे तो दशकों बीत गएदशकों के उस सफर में एशिया में प्रसिद्ध रही ऊन मंडी फाजिल्का के टुकड़ों से उड़ी धूल तो दूर तक जा पहुंची हैजो समेटने से भी नही सिमट सकतीयहां रह गई एक बिखरी आस के पन्नों की दास्तान।

      वो दास्तानजो ब्रिटिश साम्राज्य मेें शुरू हुई थीउन्होंने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए व्यापार को बढ़ावा दियाब्रिटिश साम्राज्य के लिए कारखानों में कच्चे माल की जरूरत थीइसलिए ब्रिटिश अफसरों ने भारत में व्यापार की तरफ खास रूचि दिखाईफाजिल्का में भी इंग्लैंड की क्रांति ने अहम योगदान दिया…31 दिसंबर 1600 को लंदन में इंग्लैंड के व्यापारियों के मर्चेंट एंडवेंचर्स नामक समूह की ओर से शुरू की गई ईस्ट इंडिया कंपनी को 15 वर्षो के लिए भारत से व्यापार करने का एकाधिकार मिला और 1602 में कंपनी स्थापना का बीज धीरेधीरे फाजिल्का तक पहुंचाईस्ट इंडिया कंपनी भारत को इसके बदले सिर्फ कली, सिक्का पारा या कपड़े ही देती थीभारतीयों को मुख्य रूप से कपड़े चाहिए थेदेश की जनता को महात्मा गांधी के चरखे पर बुने कपड़े पहनने की आदत तो बाद में पड़ी थीइससे पहले जनता पर ब्रिटिश साम्राज्य में विदेशी कपड़े का जादू चला हुआ थाधीरेधीरे यहां ऊनी, सूती, रेशमी कपड़े का व्यापार शुरू कर दिया गयाइस व्यापार के मद्देनजर ही ब्रिटिश साम्राज्य ने फाजिल्का पर जादू की छड़ी फेर दी।

       ब्रिटिश अफसर पैट्रिक एलेगजंडर वन्स एगन्यू ने यहां 1844 . में बंगला बनाया…1846 में यहां पधारे अफसर जे. एच. ओलिवर ने ओलिवर गार्डन और ओलीवर मार्केट बनवाईउन्होंने यहां फाजिल्का शहर आबाद कियाउन्होंने व्यापार के लिए दूरदूर से व्यापारी वर्ग को न्योता दिया गयाजिनमें मारवाड़ी, पेड़ीवाल, अग्रवाल और अरोड़वंश आदि जाति के लोग शामिल थेऊन उद्योग कला फाजिल्का की जनता के हाथों की अनूठी कला थी और ऊन का व्यापार चल निकलाभारत के अन्य शहरों के साथसाथ फाजिल्का में भी वूल फैक्ट्रियां अस्तित्व में गईवेस्ट पेटेंट प्रैस कंपनी लिमिटिड एक ऐसी कंपनी थी, जहां कॉटन और वूल के कच्चे माल की पैकिंग की जाती थी और फिर तैयार माल बाहर भेजा जाता थाइंग्लैंड पेटेंट प्रैस और दो लोकल प्रैस प्राईवेट इंट्रप्राईजिस जहां गांठें तैयार करके लिवरपूल, कानपुर और अन्य स्थानों पर भेजी जाती थीवैस्ट पेटेंट प्रैस कंपनी लिमटिड, लीवर पूल वूल प्रोसैसिंग, मनचैस्टर वूल फैक्टरी, कंपनी प्रैस काफी यौवन पर थी। धीरेधीरे ऊन उद्योग यहां का महत्वपूर्ण उद्योग बन गयाजो क्षेत्र के विकास में सहायक बन गयाऊन का व्यापार एक ऐसा साधन था जो फाजिल्का की आर्थिक व्यवस्था के लिए एक ईंजन का काम करता था।

       ऊन के विकास ने समाज को आधुनिक समाज में बदला और फाजिल्का खुशहाल नगर बन गया…इसके बाद फाजिल्का के लोगों में जागृति आ गई और 1930 में फाजिल्का के कई लोग अमरीका और आस्ट्रेलियां से आर्ट एंड क्रॉफ्ट की शिक्षा लेकर यहां पहुंचे…बहावलपुर, शिकारपुर, बीकानेर, मुल्तान आदि शहरों से फर्मे यहां पहुंची और उन्होंंने अपनी ब्रांचे खोली। तब तक यहां ऊन की फैक्ट्रियां फायर बिग्रेड कार्यालय के सामने खुल चुकी थी… आर्ट एंड क्राफ्ट की कला से माहिर फाजिल्का के लोगों ने भी यहां कई फैक्ट्रीयां लगाई, जिनमें सलेम शाह रोड़ पर राम प्रैस, बीकानेरी रोड पर महावीर कॉटन फैक्ट्री, मलकाना मुहल्ला के निकट अशोका वूल फैक्ट्री, दि अशोका कॉटन फैक्ट्री, भूसरी प्रैस और ब्रह्मा प्रैस मुख्य थी…जिनसे तैयार माल का व्यापार यूरोप की मंडियों तक पहुंचा। रेल नैरोगेज लाइन वाया कोटकपूरा, बठिंडा और ब्रॉडगेज लाइन वाया मैकलोडगंज से कराची तक जाती थी और फिर वहां से बंदरगाहों के जरिए यूरोप की मंडियों तक माल पहुंचाया जाता… देखते ही देखते फाजिल्का एशिया की प्रसिद्ध मंडियों की कतार में जा पहुंचा। ऊन के महान व्यापार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुल्तान, हवेली, मिंटगुमरी, बहावलपुर, बीकानेर आदि क्षेत्रो सें व्यापार के लिए ऊन यहां आती थी। फैक्ट्रीयों के अलावा ऊन का बाजार भी था…जहां ऊन की मंडी लगती थी। यहां के अधिकांश लोग ऊन का कारोबार करते थे… ऊन के व्यापार की चमक-दमक देखकर ही बाहरी इलाकों से कई लोग यहां पहुंचे…यहां ऊन की दो किस्में थी, एक सावनी वूल और दूसरी चेत्री वूल… यहां मैरीनो किस्म की भेड़ सबसे बेहतर थी। मैरिनों भेड़ लम्बे रेशे वाली थी। यहां भारी संख्या में लघु उद्योग …पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे तक इस कारोबार को अपनाए हुए थे…गंाव जंडवाला भीमेंशाह के स. इकबाल सिंह भट्टी ने बताया कि कॉलेज रोड पर शिवपुरी के नजदीक एक विशाल मैदान था…जहां भेडों को नहलाया जाता था…वहीं भेडों की ऊन उतारी जाती थी… मुल्तानी चुंगी के नजदीक ऊन की क्वालिटी सुधारने के लिए एक कुआं था… जहां ऊन धोने का काम किया जाता था…यहां करीब चार एकड़ जगह थी… जहां ऊन साफ की जाती थी…यह कारोबार कचहरी रोड से लेकर सरकारी एम. आर. कॉलेज तक फैला हुआ था…शायद यही कारण है कि घंटाघर के निकट के बाजार का नाम आज भी ऊन बाजार है…इस बीच ऊन के व्यापार पर कभी दरिया की बाढ़ ने अपनी गिद्ध दृष्टि डाली तो कभी विश्व युद्ध ने, लेकिन यहां के साहसी लोगों ने इसे बनाए रखा और व्यापार को प्रफुल्लित किया। मगर भारत विभाजन के बाद यह व्यापार ठप्प हो गया…विभाजन के बाद लोग यहां से विभिन्न स्थानों पर पलायन कर गए…कराची तक चलने वाली ट्रेन बंद हो गई और व्यापार खत्म हो गया…अगर अब यहां बाकी कुछ बचा है तो वह है ऊन मंडी की अमिट यादें . . . . . और सिर्फ यादें।(जारी )

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