Indo-Pak Partition-13

Part-2 बात 1911-12 की है, जब इलाके में ऊन और रूईं का व्यापार यौवन पर था…उस समय यहां ओम प्रैस कंपनी के नाम से कारखाना खुला…जिसमें ऊन की गांठे बांधने का कार्य होता था…इसके बाद 1913 में राम प्रैस की स्थापना की गई…यहां का हिसाब किताब देवनागरी में किया जाता था…फाजिल्का की ऊन मंडी ऐशिया में प्रसिद्ध हो चुकी थी, लेकिन 1920 में प्रतिकूल स्थिति के कारण व्यापारियों को लाखों से अधिक नुकसान हो गया…क्योंकि लीवरपूल में जो ऊन दिसंबर 1916 के नीलाम में 35 पैनी प्रति रतल के भाव से बिकी थी… वह 1920 के विक्रय में उसका भाव 16 पैनी रह गया…इसके साथ ही विलायत की हुंडी का भाव भी बदल गया…13 फरवरी 1920 को उसका भाव 2 शिलिंग 10/1 पैनी था, जो 28 दिसंबर 1920 को 1 शिलिंग 6/18 पैनी हो गया…जिस कारण व्यापारियों को 50 लाख रूपये से अधिक नुकसान हुआ। इस बारे में 16 जनवरी 1921 को लाहौर के दैनिक समाचार पत्र देश में लेख भी प्रकाशित हुआ …इसके बाद 1931 में एक बार पुन: इस व्यापार में हानि हुई।

फाजिल्का में ऊन के कई कारखाने चल रहे थे…जिन में कुछ ईस्ट इंडिया कंपनी के थे और कुछ स्थानीय लोगों के…इस बीच बनाई गई अशोक कॉटन फैक्ट्री…हालांकि इस फैक्ट्री के संचालकों ने इससे भारी मुनाफा कमाया, लेकिन इसकी दास्तां बड़ी दर्दनाक है…यह फैक्ट्री करीब डेढ़ साल के बच्चे अशोक की याद को ताजा रखने के लिए निर्मित की गई थी…उस समय इलाके में प्रसिद्ध सेठ चानन लाल आहूजा की ओर से यह फैक्ट्री बनाई गई थी…उन्हें 27 अप्रैल 1931 के दिन पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई…जिसका नाम अशोक रखा गया, लेकिन वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गए। जिस कारण 6 सितंबर 1932 को अशोक का निधन हो गया…जिस कारण यह परिवार एकदम टूट गया…फैक्ट्री के लिए 26 जनवरी 1934 को भूमि खरीद की गई… उन दिनों वहां 500 से 700 गांठों की कपास एक सीजन में आती थी…कांशी राम चावला ने अपनी पुस्तक अशोक रहस्य में लिखा है कि उस समय प्रदेश में करीब एक हजार गांठों तक कपास की फसल उत्पन्न होती थी…फाजिल्का में जो पैदावार होती थी वह देसी किस्म की थी…जिस कारण कपास अन्य शहरों या राज्यों से आती थी।

जहां देसी कपास की जगह अमेरिकन कपास और एल.एस.एस. कपास की उपज होती थी… सेठ चानन लाल व अन्यों के समझाने पर फाजिल्का में भी अमेरिकन कपास और एल.एस.एस. कपास की पैदावार की गई…जिस कारण रूईं का काम करीब 17 हजार गांठों तक पहुंच गया। यह क्वालिटी लायलपुर जैसी प्रसिद्ध मंडी से भी उत्तम थी। जिस कारण पल्लेदारों, गाड़ी चलाने वाले, दलालों, तोलों के रोजगार में इजाफा हुआ… इलाके में रूईं, बिनौला की आढ़त में लाखों की कमाई की…मगर1939 में फैक्ट्री को काफी हानि हुई।

साईं राम प्रकाश खुंगर के पिता हरीश चंद्र खुंगर की फर्म हरीश खुंगर दी हट्टी के नाम से प्रसिद्ध रही है…साईं राम प्रकाश बताते हैं कि उस समय इलाके में खजान चंद मुंशी राम, किशोरी लाल परमानंद, तारा चंद मक्खन लाल, गोबिन्द राम गंगा राम की फर्म ऊन बाजार में थी और काफी मशहूर थी…उस समय मै. खजान चंद मुंशी राम और गोबिन्द राम गंगा राम को स्टार मिला था…जिसका जिक्र England से प्रकाशित पुस्तक इंडिया एंड पाकिस्तान वूल हौजरी एंड फैब्रिक में किया गया था…

उस समय मरी हुई भेड की जो खाल उतारी जाती थी…उसे खोसा कहा जाता था…इस कार्य के लिए पूरन राम खटीक, संत लाल, प्रकाश और माम राज प्रसिद्ध रहे हैं। By- Krishan Taneja 92566-12340
