
पंछी…नदिया…पवन के झोकें…कोई सरदह इनको न रोके…लेकिन जब बात इंसानों की आती है तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर 1947 में भारत–पाक विभाजन की प्रतीक रैड क्लिफ लाइन आड़े आ जाती है…इसके बावजूद सरहद की सादकी बॉर्डर, वाहगा बॉर्डर और हुसैनीवाला बॉर्डर पर हजारों की संख्या में लोग इस उम्मीद से भी पहुंचते हैं…कि वह शायद इस साल भारत विभाजन के दौरान बिछुुड़े अपनों की एक झलक पा सकें…कोई दिल्ली से आता है तो कोई राजस्थान थे…कोई हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से…दोनों देशों के मध्य सियासतदानों द्वारा उकेरी गई सरहद की सीमा रेखा उनके मिलन में बेशक बाधा बनी हुई है…परंतु इस दिन कई लोगों के कम से कम दूर से ही अपनों से बिछुड़े परिवारों के दीदार तो हो ही जाते हंै…कई बार उन्हें निराश ही लौटना पड़ता है…यह मौका होता है भारत के आजादी दिवस का…सीमा सुरक्षा बल द्वारा यह ध्यान भी रखा जाता है कि इस दौरान कोई गैर समाजिक तत्व किसी तरह की हरकत न कर पाये…अब 2012 के सीन देखते हैं…जब कुछ लोग अपनों से मिले…मगर दूर से…बीच तारबंदी थी…बस दुआ सलाम ही हुई।

INDO-PAK BORDER SADQI POST
जिला बहावल नगर के मुहम्मल सुलतान…पाकिस्तानी रेंजर की आवाज थी…वो आगे आया तो भारत की तरफ से महिला बोली —– भाई…मैं कमला, याद करो, भारत पाक विभाजन के समय की दास्तान…जब माता को कुछ लोगों ने तेजधार हथियारों से काट डाला था…तुम जान बचाने के लिए पाकिस्तान की ओर भाग गए और मुझे पिता उठाकर भारत में ले आए…मैने आपको वाहगा बार्डर पर देखा…हुसैनीवाला बार्डर पर भी देखा, लेकिन आप नहीं मिले…आज आपकी झलक पाई है…भाई, मैं राजस्थान के श्री गंगानगर में रहती हूं।

कमला बहन…मैं मुहम्मद सुलतान हूं…मुझे सब याद है…शुक्र है अल्लाह का कि 66 साल बाद मैने अपनी बहन को देखा है…बहन…मैं बेरवाला, जिला बहावल नगर में रहता हूं…मैं वीजा लगवाने का प्रयास करूंगा…आप भी वीजा भर दें…ताकि हम दोनों मिल सकें…मुझे अल्लाह पर विश्वास था कि वह मुझे बहन से जरूर मिलाएगा…आज मैने अपनी बहन को देख लिया।

इससे एक साल पहले 2011 में राजस्थान की रावला मंडी से बुजुर्ग बखता भी आई थी…तीन घंटे के इंतजार के बाद उसने पाक में रहने वाले अपने रिश्तेदारों की झलक पाई तो अश्क बहाने लगी…भले ही रिश्तेदार बखता की धीमी आवाज नहीं सुन पाए…लेकिन आंखों की आंखों में हालचाल जान गए…नूरा बाधा ने चिश्तीया (पाक) स्थित अपने मामा मुहम्मद बखश के परिवार का हालचाल जाना…सरदारगढ़ के रियासत अली, दौलत खान, हनुमान गढ़ के मुहम्मद सरवर व मुहम्मद आरफ ने बताया कि उनके मामा जान बहावल नगर के गांव अक्कू का में रहते हैं… पहले दो बार वह उनसे मिल चुके हैं और आज फिर मिलकर उन्हें सकून मिला है…

उनकी तरह पाकिस्तान के मिनचंदाबाद रेलवे स्टेशन पर रहने वाले परनानी पैड़ो की झलक नन्ही खुशीयां बानो और सकीना ने भी पाई…चौथी पीढ़ी को देखकर पैड़ो ने आशीर्वाद दिया…पिता मुहम्मद रफीक के साथ आया नन्हा आरिफ भले ही कुछ बोल नहीं पाया, लेकिन उसकी आंखें बता रही थी कि वह अपने परदादा की झलक पाकर खुश है… अगर पंजाब के वाहगा, हुसैनीवाला और सादकी बॉर्डर पर दोनों देशों के हुकमरान बिछुड़ों के दर्द को समझते हुए आज्ञा देते हैं तो हजारों लोग अपनों से कम से कम बात तो कर पाऐं…अपनो की एक झलक उन्हें जो सकून देगी…वह हर व्यक्ति समझ सकता है…मगर यह सब हुकमरानों के बस की बात है।
