
अभिषेक बच्चन और करीना कपूर की Film थी…Refugee…इसमें शारणार्थियों के दिल का दर्द ब्यां करने वाला गीत था…पंछी, नदिया, पवन के झौंके… कोई सरहद न इन्हें रोके… सरहद इंसानों के लिए है, सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसान होके… बहुत बढिय़ा गाना था…शरणार्थी, रिफ्यूजी, मुहाजिर कोई भी नाम पुकार लो …किन लोगों को कहते हैं यह सब…दूसरों के रहमो करम पर जीने वालों को…उन ल ोगों को…जो किसी न किसी कारण अपना घर…सबकुछ…किसी मजबूरी के कारण छोडक़र आएं हों…वो अभागे लोग…आज बात Film की नहीं होगी…उन अभागे लोगों की होगी…जिन्होंने दर्द सहा है…उनका दर्द सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं…फिर फिल्म तो क्या चीज है…बात उनकी है…जो भारत विभाजन के दौरान उजड़ कर आए हैं और आकर Fazilka या फिर किसी अन्य शहरों में आकर बसे हैं।
वो लोग भारत बटवारे के दौरान हुए कत्ल-ए-आम को आज तक नहीं भूल पाए हैं और फाजिल्का के एक बड़े हिस्से के छिन जाने का दर्द भी उन्होंने अपने जहन में समेटा हुआ है…अगर महफिल में भारत विभाजन की बात होती है तो उसकी टीस से एक बारगी तो शरीर मुर्दा सा प्रतीत होने लगता है…फिर भी उस टीस की दर्द भरी नब्ज पकडक़र दिल को दिलासा दिया जाता है…यहां के लोग हिम्मत वाले है, जिन्होंने यहां पुनर्वास कर फाजिल्का के आस्तित्व को कायम रखा…आखिर कैसे हुआ फाजिल्का के लोगों का पुनर्वास? यह दास्तान बड़ी दर्दनाक है…विभिन्न स्थानों से उजडक़र आए लोगों के तन पर न कपड़ा था और न ही पेट में रोटी…पेट की भूखी आंतडिय़ों की झलक साफ दिख रही थी…कई महिलाओं की आबरू छिन गई…जो पाकिस्तान से आए, उनके गहने…खेत…मकान…पशुधन व अन्य समान तो वहां रहा गया…जिनका बसेरा यहां पर था…वे भी बर्बाद हो चुके थे…परिवार बिछुड़ गए…कई मर गए और कई घायल हो गए…अगर पास कुछ बचा तो रोते बिलखते चेहरे, आँखों में अश्क…दर्द भरी आंहें…और बिखरी यादों के पन्ने।

रिफ्युजी कैंप से सहायता तो मिली, लेकिन खाने को मन नही कर रहा था…उनका सब कुछ तो उजड़ गया…किसी तरह वे बिखरी यादों को भुलाने का प्रयास कर रहे थे…मगर हाथों में तलवारें…कॉपे…कुल्हाडिय़ों और लाठियों से लैस लुटेरों की ओर से लूटमार का दृश्य आँखों के सामने आ जाता…जिससे पुन: आखों में अश्क बहने लगते…फिर भी उन्होंने हौंसला बुलंद रखा…खुद की हिम्मत और सरकार द्वारा सहयोग देने से पुनर्वास की आशा की किरण जीने का हौंसला देती रही।

पुनर्वास की योजना का आधार रखा गया…पहले आओ, पहले पाओ…लेकिन इससे अमीर वर्ग का अधिक फायदा हुआ…गरीब व अनपढ़ लोग पीछे रह गए…अगर किसी को पता चल जाता कि खाली पड़ी भूमि या मकान किसी मुसलमान का है तो वहां कब्जा शुरू हो जाता…स्थानीय माल अधिकारी से मिल कर कब्जाधारी उस भूमि या मकान को अपने नाम करवा लेता…1948 में सरकार ने पुनर्वासियों से कलेम मांगें गए…जिसमें यह ब्यौरा मांगा गया कि वे कितनी भूमि पाकिस्तान में छोड़ कर आए हैं…इस में दर्ज और कटौती वाली प्रणाली इजाद की गई…अन्य सुविधाओं में एक मॉडल स्टेंडर्ड एकड़ मुताबिक भूमि की कीमत तय की गई जो भूमि से होने वाली उपज की कीमत के बराबर थी…इसमें क्षेत्रफल को शामिल नही किया गया…पाकिस्तान की भूमि और भारतीय भूमि की उपज समर्था अनुसार मुल्य तय किया गया…जब यह सारा रिकॉर्ड पूरा हो जाता तो उस पर इतराज सुना जाता…इसके बाद पक्की अलॉटमेंट की जाती, जो उस व्यक्ति की जायदाद बन जाती…लोगों ने वहां बसेरा किया और फिर बन गया सुनहरे सपनों का शहर फाजिल्का।
फिर फाजिल्का को खुशहाल बनाने का दौर शुरू किया गया…लोगों ने कड़ा परिश्रम किया और फाजिल्का उन्नति की ओर अग्रसर होने लगा…इसके बावजूद विभाजन का दर्द नही भूला…जब-जब सरहद की तरफ नजरें जाती हैं या ख्याल आता है तो अश्क पानी की तरह बहने लगते हैं…अश्क भले ही सूख गए हों, लेकिन विभाजन की टीस और बीते लम्हों की दर्द भरी दास्तान आज भी दर्द उकेरती है, लेकिन फाजिल्का शहर में बसे बड़े दिल वाले लोगों का हौंसला बुलंद है और वे उस विशाल क्षेत्र को बनाने में जुटे हैं जो विभाजन से पहले था।
