Nawab ने कैद कर ली थी Fazilka की यह Singer

बचपन था … मां बाप अल्लाह को प्यारे हो गए … अनाथ हो गई … आवाज मीठी थी … दर्द भरे गीत गाए … युवावस्था में आई … शादी हुई … पति की मौत हो गई … उसके वियोग में गीत … मशहूरी दूर दराज तक … रंग सावला … मगर नवाब बेईमान हो गया … लोगों ने बचाया … फिर विभाजन हो गया … पाकिस्तान चली गई … उसके बाद वो कभी फाजिल्का नहीं लौटी … मगर उसके दर्दभरे गीत … आज भी बुजुर्ग सुनते हैं … नहीं भूल पाए उस कलाकाल को … जो बंगला (फाजिल्का) की रहने वाली थी … आज भी गांवों में चलता है उसका गीत … रोंदी दे नैन चो गए … वो कलाकार … दुक्की (Dukki urf Nisha Kanjri) … जिसे निशा कंजरी के नाम से भी जाना जाता था …

      फाजिल्का के उत्तर की तरफ 16 मील दूर गांव है Bagheki… उसके उत्तर की तरफ Doger Cast और दक्षिण की तरफ गांव प्रभात सिंह वाला उर्फ सुभाज के में Joeus Cast के लोगों का कबीला बसता था… इसके साथ ही गांव है प्रभात सिंह वाला (सुभाजके) … जहां गरीब परिवार के घर 1922 में एक बेटी ने जन्म लिया…जिसका नाम निशा रखा गया … मगर जल्द ही उसके मां-बाप की मौत हो गई … अनाथ बच्ची घरों से रोटी मांग कर अपना गुजारा करने लगी … भगवान ने उसे सुरीली आवाज दी … उसकी शैली … नखरा और अंदाज के साथ-साथ सुंदर नैन-नक्श भी दिए … जब वह घरों से मांगने के लिए जाती तो साथ ही कुछ गुणगुनाने लग जाती … बड़ी हुई तो उसकी आवाज और सुरीली होती गई… लोगों ने उसे दुक्की का नाम दिया … वह इस कदर गायिका बनी कि लोग उसकी आवाज के जादू से कायल हो जाते…उसने आसपास के क्षेत्र में प्रसिद्धी हासिल की, लेकिन एक तो गरीब और दूसरा जंगल जैसे गांव में रहने वाली बिन मां-बाप की बेटी दूर तक नहीं जा पाई… वह नाच-गाकर गुजारा करती … मगर गांव वाले उसे बहुत प्यार करते थे … ग्रामीणों को अपना मां-बाप ही समझती थी … छोटा कद और सांवले रंग की दुक्की के बारे में ग्रामीणों का कहना है कि उसकी शादी उसके चाचा के लडक़े के साथ की गई… अभी शादी को कुछ ही महीने हुए थे कि उसके पति की भी मौत हो गई।

              पहले वह मांबाप के दुख में गाया करती थी तो अब पति के वियोग ने उसे दर्द भरे गीत गाने को मजबूर कर दियाजब उसने गीत गाना तो गीत के साथ उसके नाच को देखकर भी लोग हैरान रह जातेलोग उसे दुक्की या निशा कंजरी के नाम से पुकारते थेउसकी आवाज इस कदर तेज थी कि जब उसका अखाड़ा लगता तो दूर तक जा रहे राहगीर भी रूक जातेबग्घेकी गांव के गुरदित्त सिंह बताते हैं कि वह अधिकतर पीपल या बोहड़ के नीचे गाती थीउनके गांव की चौपाल में पीपल का पेड़ था, जहां वह अक्सर गाया करती थी। उस का कोई गुरू पीर नहीं था, बस भगवान को आंखों में बसाकर गाती थीउसके गीतों की रिकार्डिंग होती थीजो घरघर सुने जाते थे और परिवार में मिल बैठकर सुनने के योग्य थेविवाहशादी पर गांवों में आज भी जब स्पीकर वाले बुक किए जाते हैं तो लोग कहते है कि दुक्की के रिकॉर्ड (तवे) हों तो ले आना, नहीं तो आनावह अपने साथ एक सारंगी वाला और तबले वाला रखती थीकान पर हाथ रखकर जब आवाज बुलन्द करती थी तो लोग मस्त हो जाते … 1945 के आसपास उसके 25 से 30 तक गीत रिकॉर्ड हुए थे। मगर अब तो रिकॉर्ड इतने खराब हो चुके हैं कि उसके गीतों की समझ भी नहीं आती, मगर ग्रामीण समझ लेते हैंरोंदी दे नैन चो गए, यह उसका प्रथम रिकॉर्ड हैदुक्की के रिकॉर्ड दोबारा नए छोटे तवों में 1970 में पाकिस्तान ने आज़ाज किएएक रिकॉर्ड में ही आठ गाने थे जिसका नम्बर है।

              गांव के बुजुर्ग सरदार काला सिंह का कहना है कि मेरा जन्म हुआ तो रीतों पर दुक्की को बुलाया गया थाउस समय दुक्की ने जो गीत सुनाया उसके बोल थेरूता ने फिरीयां, कई वन्जाने ने घुम्मे, घूक  चरखडिय़ां तेरे सांवे ने मुन्नेवह बताते हैं कि  जब गांव में किसी लडक़ी की शादी होती तो वह अखाड़े में मिला पैसा उसकी शादी पर खर्च करती थीएक बार नवाब ने अखाड़ा लगवाया तो इनाम के तौर पर दुक्की ने नवाब से कहा कि वह बग्घेकी उताड़ से हिठाड़ तक सडक़ बनवा देंतब वह सडक़ बनाई गई

          ग्रामीण बताते हैं कि इस गांव से 15 किलोमीटर दूर गांव अटारी के साथ मंडी हीरा है … वहा नवाब ने दुक्की का अखाड़ा लगवाया…जब अखाड़ा खत्म हुआ तो नवाब दुक्की पर बेईमान हो गया और उसे कैद कर लिया … किसी तरह दुक्की ने गांव में संदेश भेजा …जिसमें लिखा था कि मेरे गांव के लोगों, मैं भी तुम्हारी बेटी-बहन हूं… मुझे ले जाओ… गांव में पचांयत हुई और दुक्की को वापस लाने का फैसला लिया गया … गुरदित्त सिंह वड़वाल और सरदार इशर सिंह ने सतलुज दरिया पार किया और जोगी का भेष बनाकर नवाब की हवेली में पहुंच गए… वहां जोगियों की भाषा में उन्होंने दुक्की को बताया कि वह रात के वक्त आएंगे और चौबारे में रस्सा फैंक देंगे…आप नीचे आ जाना। रात हुई और वह इसमें कामयाब हो गए। मगर नवाब को इसका पता चल गया। उसने पीछे बदमाश भेजे मगर तब तक वह दरिया पार करने में कामयाब हो गए… तब दुक्की ने गीत गाया कि जंगली चीज़ा छुट्टिया, फे र कदी नहीं हत्थी आईया, नवांबा तेरी जेल चो, घुड़ के मेरीयां ले चले ने बाहयां। फिर भारत विभाजन हो गया और दुक्की के कहने पर ग्रामीण उसे दरिया पार तक छोड़ आए… विभाजन के बाद दुक्की का कुछ पता नहीं चला…मगर गांवों में उसके गीत आज भी विवाह शादियों में गंूजते हैं। (Thanks- Dr. Vijay Parveen)

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