
भारत विभाजन से पूर्व चक्क बेदी (अब पाकिस्तान में) भारी मेला हुआ करता था…लोग दूर-दूर से मेले में शामिल होते थे…भारत विभाजन के बाद बेदी परिवार फाजिल्का में आकर बस गया…उन्होंने मेले की मान्यता कम नहीं होने दी…विभाजन के बाद गांव लालोवाली में मेला शुरू हो गया…उन दिनों मेले में कबड्डी और कुश्ती होती थी…बेदी परिवार के कंवर महिन्द्र सिंह बेदी खुद कुश्ती में माहिर थे…

बात विभाजन के बाद की है, जब इस मेले में सुप्रसिद्ध पहलवान गामा कुश्ती लडऩे के लिए आए…एक तरफ गामा पहलवान तो दूसरी तरफ उनका मुकाबला करने वाले थे गुंगा पहलवान…दोनो की कुश्ती देश-विदेश में प्रसिद्ध थी…साफ है कि उनकी कुश्ती देखने के लिए भारी तादाद में दर्शक पहुंचे थे…कंवर लाजिन्द्र सिंह बेदी मेले की देखरेख कर रहे थे… दोनों में कुश्ती शुरू हो गई…भारी जमावड़े के बीच गामा पहलवान गुंगा पहलवान पर भारी पड़े और उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया…

खेल मुकाबलों के अलावा मेले में झूमर और भंगड़े के मुकाबलों की ख्याति भी दूर तक थी…बात 1967-68 की है…उस समय बाबा पोखर सिंह और जम्मू राम की झूमर की धूम थी…दोनों की टीमों में झूमर का कड़ा मुकाबला हुआ…एक-एक कदम और हाथों की हरकत तक नजर रखी गई…इस बीच यह मुकाबला बाबा पोखर सिंह की टीम ने मुकाबला जीत लिया और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया…

अब बात करते हैं कि यह मेला क्यों लगाया जाता है…इसके पीछे भी एक दमदार तथ्य है…कैप्टन एम.एस.बेदी बताते हैं उनके पड़दादा के पिता बाबा खेम सिंह बेदी ने तीन शादियां की थी…पहली पत्नी की कोख से चार बेटों ने जन्म लिया…मगर उनका निधन हो गया…उसके बाद दूसरी शादी की तो उसमें से कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ। तीसरी शादी की तो दो लडक़े पैदा हुए…इस पर बाबा खेम सिंह जी की दूसरी पत्नी ने कहा कि उनकी कोख से बच्चा नहीं होने के कारण उनका नाम कोई नहीं लेगा…इस पर कैप्टन बेदी के पड़दादा बाबा हरदित्त सिंह ने उन्हें वादा किया कि जब तक वह जिन्दा रहेंगे, उनके नाम को याद रखने के लिए मेला आयोजित किया जाएगा…बाबा हरदित्त सिंह जी का स्वर्गवास हो गया तो उनके सुपुत्र (जलालाबाद के विधायक रहे) कंवर लाजिन्द्र सिंह बेदी की देखरेख में मेला होता रहा…इसके बाद उनके सुपुत्र ब्रिगेडियर अमरजीत सिंह बेदी ने मेले की कमान संभाली… कैप्टन एम.एस. बेदी बताते हैं कि उनकी योजना है कि गांव के ही स्कूल में कुश्ती और कबड्डी आदि के मुकाबले करवाए जाएं ताकि युवा वर्ग का ध्यान नशे की बजाए खेलों की ओर अधिक हो जाए।

श्री गुरू नानक देव जी के 13वें वंशज के सर बाबा खेम सिंह बेदी सिंह सभा आंदोलन के संस्थापकों में एक थे…उनका जन्म 21 फरवरी 1832 को ऊना में हुआ…ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से उन्हें जहां सर की उपाधि से नवाजा गया था, वहीं 1877 में एक मजिस्ट्रेट और 1878 में मानद मुंसिफ नियुक्त किया गया… 1879 में वह भारतीय साम्राज्य (सीआईई) का साथी बनाया गया और 1893 में वायसराय की विधान परिषद के लिए नामित किया गया…1998 में उन्हें (के.सी.आई.ई.) नाइट की उपाधि से नवाजा गया…फाजिल्का के कैप्टन एम.एस. बेदी बताते हैं कि उस समय लोग शिक्षा की तरफ कम ध्यान देते थे…जिसके चलते सर बाबा खेम सिंह ने करीब 50 स्कूलों में अपना अहम योगदान दिया है…1893 में जब उनकी बेटी की शादी थी तो उन्होंने धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्य के लिए तीन लाख रूपये दान में दिया…इस राशि से रवालपिंडी में एक कॉलेज की स्थापना की गई… इलाके में राय सिक्ख बिरादरी के अनेक लोग बसे हुए थे… वह शिकार करने के शौकीन थे…मगर सर बाबा खेम सिंह ने उन्हें कृषि कार्य के साथ जोड़ दिया…बाबा खेम सिंह राजसी शैली में रहते थे…
