बेश्क गुम हो जाए लंडे भाषा, पंडित लछमण दास का ज्ञान अमर रहेगा!

कंप्यूटर युग से पहले तकरीबन हरेक आढ़ती का मुनीम और हर दुकानदार एक ही भाषा का प्रयोग करते थे…वो भाषा थी लंडे…भले ही आज लंडे भाषा का प्रयोग चंद लोग ही करते हैं, लेकिन फाजिल्का के पंडित लछमण दास द्वारा दूरदराज के क्षेत्र तक पहुंचाया ज्ञान आज भी जिंदा है…इधर Ferozepur to Ganganagar तक तो उधर Haveli To Pakpatan तक के लोग, जो इस समय लंडे भाषा का ज्ञान रखते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने Teacher Pandit Lachhman Dass जी से ज्ञान न लिया हो।

इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि आज भी फाजिल्का में एक कहावत प्रसिद्ध है कि जिसने पंडित लछमण दास की मार खाई है…वह हिसाब में मार नहीं खा सकता…पंडित लछमण दास जी लंडे भाषा के एक ऐसे अध्यापक थे…जिनसें Bangla (Fazilka) के आधे लोगों ने (उस समय) लंडे भाषा का ज्ञान हासिल किया था…इसके अलावा फिरोजपुर, हवेली, पाकपटन तक के विद्यार्थियों ने उनसे शिक्षा हासिल की…उनसे लंडे सीखने वालों में सेठ परमांनंद…लाला मुंशी राम और कशमीरी लाल जी जैसी शख्सियतें भी शामिल थी।

            ब्रिटिश साम्राज्य में गुडगांव जिला से फाजिल्का में आकर बसे Pandit Layak Ram Fazilka थाने में दरोगा थे…उनके सुपुत्र जगदीश प्रसाद भी दरोगा थे और दूसरे सुपुत्र थे पंडित लछमण दास…उनके तीसरे सुपुत्र का नाम है मदन लाल…पंडित लछमण दास जी के तीन सुपुत्र पंडित राम कुमार त्रिपाठी हिन्दी के अध्यापक थे और उन्होंने कई साल तक सरकारी हाई स्कूल (लडक़े) में शिक्षा दी… उनके अलावा महावीर प्रसाद त्रिपाठी रिटायर्ड पटवारी हैं और मुरलीधर त्रिपाठी भोपाल में उद्योगपति हैं…ब्रिटिश साम्राज्य दौरान इलाके में उर्दू भाषा अधिक प्रचलित थी… इसका कारण यह है कि यहां अधिकांश मुस्लमान जाति के लोग बसे हुए थे… बाद में व्यापारियों को ओलिवर ने यहां व्यापार का न्योता दिया…इस दौरान हिन्दी और पंजाबी भाषा प्रचलित हो गई…उर्दू की शिक्षा देने के लिए डेड हाउस रोड पर मसीत थी… क्योंकि यहां व्यापारी अधिक थे और मुनीमी का कार्य करने के लिए लंडे भाषा का ज्ञान जरूरी था…इसलिए पंडित लछमण दास ने एक पाठशाला खोली…वह अरोड़वंशी, बागड़ी, बानियां और गुजराती आदि भाषा का भी अधिक ज्ञान रखते थे…उनकी पाठशाला एक छप्पर (जहां मौजूदा एस.डी. सीनीयर सैकेंडरी स्कूल है) के नीचे थी…इसके साथ ही पंडित ऊमा दत्त…पंडित परमांनंद…पंडित चेत राम…आचार्य लीलाधर हिन्दी और संस्कृत पाठशाला में शिक्षा देते थे…महावीर प्रसाद ने बताया था कि पंडित जी काफी तेज चलते थे और शिक्षा देते समय वह विद्यार्थियों पर पूरी सख्ती बरतते थे…इसके बाद उन्होंने घास मंडी में एक चौबारे पर पाठशाला खोली। तीन जनवरी 1984 के दिन वह इस फानी जहान को अलविदा कह गए। आज अध्यापक दिवस पर नमन: Lachhman Dost Whats App 99140-63937

Pandit Lachhman Dass ji

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