
गणपति बप्पा मोरिया…इन जयकारों के साथ घर-घर में श्री गणेश जी की स्थापना कर दी गई है…मगर इस बार अधिकांश घरों में उस गणेश जी को प्राथमिकता दी जा रही है जो पर्यावरण के लिए भी शुभ है और हमारे लिए भी…बात जारी रहेगी, लेकिन इससे पहले इससे जुड़ी कुछ तथ्यों के बारे में बात कर लें। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार : श्री वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार दस दिन तक सुनाई थी…जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि दस दिन के कठिन परिश्रम उपरांत गणेश जी का तापमान अधिक हो गया था…तब वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में जाकर ठंडा कर दिया गया था…यही कारण है कि श्री गणेश जी की स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है…

अब बात करें ईको फ्रैंडली गणपति की…वैसे भी अब पर्यवरण बचाना जरूरी हो गया है…इसलिए पी.ओ.पी. के गणपति की जगह अब माटी से गणपति बनाने को टैं्रड चल पड़ा है…यहां भी हैं एक हरफनमौला परिवार…पंजाब स्टेट पावरकॉम में कर्मचारी हैं सुभाष पंचाल…फाजिल्का की जैन गली में रहते है…उनकी धर्मपत्नी का नाम है दीपमाला…और…उनके बेटे दिवांशू पंचाल…माटी के गणेश बनाते हैं…इस महोत्सव के शुरू होने से पहले ही वह कई दिनों तक काम करते हैं…अगर बात पुरानी करें तो वह इस काम में बरसों से जुटे हैं…शौंक हैं…इसलिए उन्होंने पहली बार जो गणेश की प्रतिमा बनाई थी…वो छोटी थी…उसे घर में ही विसर्जन किया…वह बताते हैं कि अधिकांश लोग प्लास्टर ऑफ पैरिस (पी.ओ.पी.) से गणपति की मूर्ति तैयार करवाते हैं और उसे स्थापित करके दस दिन बाद नहर या दरिया वगैरा में विसर्जित कर देते हैं…वह बताते हैं कि उस गणपति की मूर्ति पर कैमिकल वाले खतरनाक कलर होते हैं जो जलजीवों की जान के लिए खतरा होता हैं…वही पानी जब खेतों में पहुंचता है तो फसल हमारे लिए हानिकारक बन जाती है…नहरी पानी पीना भी जानलेवा बन जाता है…अगर केन्द्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के नियमों की बात करें तो उसमें पी.ओ.पी. से तैयार गणेश जी की मूर्ति को पानी में विसर्जन करने की मनाही है…इसलिए इस परिवार ने माटी से गणेश बनाना बेहतर समझा…बस फिर क्या था…जुट गए श्री गणेश बनाने में…

इन दिनो गणेश महोत्सव मनाया जा रहा है…फाजिल्का की गली चौधरियां में रिद्धि सिद्धि गणेश महोत्सव पर गणेश जी की जो मर्ति स्थापित की गई है…वह इस परिवार ने बनाई है…मूर्ति बनाने में 14-15 दिन लग गए…वह बताते हैं कि उन्होंने यह मिट्टी मध्यप्रदेश से मंगवाई थी…साथ ही औजार भी…मूर्ति पर करीब 15 किलो माटी लगी है…यह मूर्ति भी गली चौधरियांं में ही विसर्जन की जाएगी…जिसमें पानी में मूर्ति विसर्जन की जाएगी वो पानी शहर के विभिन्न पार्कों में लगे पौधों को लगाया जाएगा।

अब बात करते हैं दीपमाला के हाथों की सफाई की…उसने आर्ट एंड क्राफ्ट का कोर्स किया हुआ है…माहिर है…तभी तो मौहल्ले के अलावा कई अन्य मौहल्लों की लड़कियां व महिलाएं भी उनसे यह कला सीखने आती हैं…उनका कहना है कि अगर प्रदूषण रहित जीवन जीना है तो भविष्य में माटी के ही गणपति बनाएं…ताकि उसे पर्यवरण को स्वच्छ रखा जा सके…पानी भी प्रदूषित न हो…(Krishan Taneja 92556-12340)
