
Indo-Pak Culture
जूती कसूरी, पैरी न पूरी, हाय रब्बा वे सानू तुरना पिया…भारत विभाजन से पहले गायिका सूरिन्द्र कौर केलोकगीत की इन मशहूर पंक्तियों ने कसूर की जूती को अमर कर दिया है…यह गीत विभाजन से पूर्व संयुक्त भारत की याद दिलाता है और दशकों बाद भी यह लोकगीत कानों में गूंजता है…बेशक कसूर पकिस्तान के हिस्से आ गया, लेकिन फाजिल्का में भी कसूर की जूती उपलब्ध है…जूती का तला प्लेन था, मगर उत्तरी भारत में सीधे तले की बनी जूती को कसूरी जूती कहा जाता है…कसूर में जूती के कारोबार से जुड़े कारीगर विभाजन के बाद यहां आकर बस गए और आज वे इस कलाकृति को संजीव रखे हुए हैं…उन्होंने हाथ से बनी जूती की कारीगरी को जिन्दा रखकर फाजिल्का को पंजाब का ऐसा क्षेत्र बनाया है, जहां की जूती सब से अधिक मशहूर है। माना जाता है कि रस्सी को बाटकर और घास फूस से पैर ढककर चलने से ही जूती की शुरूआत हुई है…साधु-संत उस समय चरण पादुकाएं पहनते थे…चमड़े की जूती बनाने की शुरूआत मुगलकाल से हुई… जूती की खासियत यह है कि जूती में पैर को आराम मिलता है और पैर का आकार भी कम बढ़ता है…चमड़े से बनी जूती पसीना सोख लेती है…फैशन के दौर में फाजिल्का की जूती ने एक अलग पहचान बनाई है…

जूती पंजाब के लोगों की शान है…आजादी से पहले जूतीयों के कारीगरों का केन्द्र बिन्दु रहे फाजिल्का की पंजाबी जूतीयां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। देंश विदेश में इनकी धूम है…तिल्लेदार, मोतीयों, कढ़ाई वाली जूतीयां, लक्कमारवी, बेलबूटे वाली, जालबूटा, प्लेन, घोड़ी, खोसा, पुठ्ठी घोड़ी वाली, साठ बूटा, स्पॉट, स्पेशल स्पाट, दिल्ली फैशन, मैटरो जूती, लक्की जूती, कन्ने वाली जूती, फैंसी, तिल्लेदार, सिप्पीमोती, दबका वर्क, फुलकारी वर्क, धागा वर्क और जरी वाली कढ़ाई आदि जूती काफी मशहूर हैं…जूती कई कारीगरों के हाथों से निकलकर तैयार होती है…जालंधर व अन्य महानगरों से चमड़ा मगवाया जाता है…इस कारोबार में महारत पाने वालों का कहना है कि …चमड़ा की धूलाई के बाद उसे जूती का माप दिया जाता है…उसके बाद जूती पर कढ़ाई के लिए भेजा जाता है…कढ़ाई करने वाली युवती सोनिया, रजनी व पुष्पा रानी और राधे श्याम ने बताया कि फाजिल्का ऐसा क्षेत्र है जहां हाथ से बारीक कढ़ाई की जाती है…कढ़ाई करते समय उन्हें काफी परिश्रम करना पड़ता है, ध्यान से कढ़ाई करनी पड़ती है…जिस पर काफी समय व्यय होता है…इसके बावजूद उन्हें पूरी मेहनत नहीं मिलती, लेकिन परिवार का पेट भरने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता है… इसके बाद जूती अन्य हाथों में जाती है, जहां तली तैयार की जाती …तली के बाद पन्ना और फिर सिलाई करने के बाद जूती तैयार हो जाती है…इसके बाद जूती शोरूम में पहँुचती है…फाजिल्का की जूती पंजाब में प्रसिद्ध है…

भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, प्रताप सिंह कैरो, सरदार दरबारा सिंह, सरदार बेअंत सिह, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल जब भी फाजिल्का आये हैं, वे जूती खरीदना नहीं भूले…बादल परिवार तो खासकर फाजिल्का की जूतियों पर नाज करता है…फाजिल्का के करीब 2000 लोग इस काम से अपना पेट पाल रहे हैं…होटल बाजार मेंं जूतीयों की कई दुकानें हैं…दीपालपुरिया की हट्टी के संचालक रोशन लाल खत्री ने बताया कि जूती बनाने के साथ-साथ वह जूतीयां बनाने के लिए फे्रम भी खुद ही तैयार करते थे। नईं दिल्ली, पटियाला, अमृतसर, जालंधर, चण्डीगढ़, सिरसा और बठिंडा जैसे बड़े शहरों के व्यापारी यहां से जूतीयां बनवा कर ले जाते हैं और अमेरिका, कनाडा, जापान जैसे देशों में सप्लाई करते हैं।

इन्दिरा मार्केट में स्थित न्यू फुलकारी जूती पैलेस के संचालक सुभाष चंद्र सांखला और संजय साखला बताते हैं कि जूतीयों के बाजार ने एक लंबा दौर देखा है…फाजिल्का में आज हालात यह हैं कि जूतीयों के कारोबारी आर्थिक तंगी झेल रहे हैं…जूती बनाने के लिए चमड़े के दाम आसमान को छू रहे हैं…कई कारीगरों के हाथों से तैयार हुई जूती दूकान पर पहुंचती है तो ग्राहक पूराने दाम पर ही जूती मांगते हैं…जबकि जूती बनाने के पदार्थ महंगा होने के कारण उन्हें मुनाफा कम होता …यही कारण है कि अब तक कई परिवार इस काम को छोड़ चुके हैं, मगर यह कहना मुनासिब होगा कि फैशन के इस दौर में फाजिल्का की जूतीयां न सिर्फ नयां स्टाइल स्टेटमेंट गढ़ती है, बल्कि सैंकड़ों लोगों को रोजगार भी मुहैया करवा रही है…कभी लाखों रूपए का व्यापार करने वाले कारीगरों को सुविधाएं देने की काफी जरूरत है ताकि वह लोग इस उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकें। क्योंकि इस खूबसूरत जूती के कारण ही कहते हैं कि जुत्ती करे मुटियार दी चीकू-चीकू—-जद तुरदी मडक़ दे नाल ओए जुत्ती चूँ-चूँ करदी आ।

मेरे फाजिल्का का इतना सुंदर इतिहास कहां छुपा था। श्री लछमण दोस्त जी आप जिस लग्न और मेहनत से इस इतिहास को नई रोशनीदेने का प्रयास कर रहे हैं वह बहुत सराहनीय है।
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