
12 अगस्त 1947 … पाकिस्तान के गांव चक्क के एक हिन्दू चौधरी परिवार के घर बच्चे की किलकारी गूंजी…बधाई हो चौधरी साहिब, पोता हुआ है …मरियम दाई (नर्स) ने चौधरी को खबर दी तो लड्डूओं का मर्तबान देकर व कुछ पैसे देकर चौधरी परिवार ने मरियम को जल्दी जल्दी विदा कर दिया … परिवार के हाव भाव व आधी अधूरी खुशी ने मरियम को बता दिया था कि परिवार किसी अनजानी सी जल्दी में है। बैलगाडी से लिफ्ट लेकर अपने गांव पीर धानी को लौटते हुए सहयात्रियों से मरियम को पता चला कि देश के रहनुमाओं ने जिस स्वतंत्रता पत्र पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया है, वास्तव में वह विभाजन का पत्र है…देश के दो टुकड़े होने जा रहे हैं…हवेली और पाकपट्टन के बीच के इन गांवों का इलाका पाकिस्तान में रहेगा…देश में दंगे छिड़ चुके हैं व हिन्दू सिख परिवार इधर से उधर वाले हिंदुस्तान की ओर जा रहे हैं…ग्रामीणों को लंबी चौड़ी जानकारी तो नहीं थी, लेकिन हिन्दू परिवारों को इतना पता था कि किसी भी हालत में सतलुज दरिया के उस क्षेत्र में पहुंचना है…हिन्दू परिवारों को लूटा जा रहा था व क़त्ले आम हो रहा था।

मरियम नाम की यह महिला दाई का काम करती थी व उसका गांव हवेली व पाकपट्टन के मध्य में पीर धानी के नाम से था…कुंवारी थी व अब तक शादी नही की थी…मरियम मैथोडिस्ट मतावंलबी थी, जिनकी आबादी उस क्षेत्र में कम थी…जिस कारण अभी तक उसकी शादी नहीं हुई थी…आसपास के गांव कुम्हारीवाला, चक्क, बेला व कई अन्य गांवों में वह इकलौती दाई …गर्भवती महिलाओं के जापे करवाने के बाद जो भी बधाई व दाना पानी उसे मिल जाता था उसी से उसका अच्छा गुजारा हो जाता था…बाकी वक्त प्रभु यीशू का गुणगान व लोगों से मेल मिलाप रखने में बीतता…मरियम का काम ऐसा था कि आसपास के आठ दस गांवों में हिन्दु मुस्लिम परिवारों का बच्चा बच्चा उसे जानता था…जानते भी क्यों नहीं, सबने उसके हाथों अथवा उसकी दिवंगत मां के हाथों जन्म लिया था…मरियम के दिल में हिन्दू मुस्लिम धर्म को लेकर कोई मतभेद नहीं थे, लेकिन ज्यादातर काम उसको हिन्दू सिख परिवारों की तरफ से मिलता था…कह सकते हैं कि उसकी आजीविका हिन्दू चौधरी परिवारों व सिख परिवारों पर निर्भर थी। अगले दिन 13 अगस्त के सूर्योदय ने खबरों के विकराल होने की सूचना दी…खबरें सही थी या मात्र अफवाहें, लेकिन खतरनाक थी…दंगे हिन्दू सिख बनाम मुसलमान के बीच थे व ईसाईयों को टारगेट नहीं बनाया जा रहा था जो इसाई प्रस्तावित पाकिस्तान में रूकना चाहे तो रूक सकते थे, जाना चाहे तो जा सकते थे, लेकिन उन्हें लूटा पीटा या मारा नहीं जा रहा था…इसलिए क्षेत्र के इक्का दुक्का के ईसाई परिवार जिसमें उसके भाई भाभिया भी शामिल थे, सब शांत थे, लेकिन हिन्दू सिख परिवारों में हड़बड़ी मची हुई थी…देखते ही देखते 3-4 घंटो में आसपास के सारे गांव हिन्दू सिख परिवारों से खाली हो गये …कुछेक परिवारों में सिर्फ इक्का दुक्का पुरूष कुछ जरूरी कामों के लिए रूके थे, लेकिन उनके परिवार जा चुके थे…मरियम के अपने रिश्तेदारों को इतनी फिक्र नहीं थी, लेकिन मरियम की आजीविका वाले सारे परिवार तो जा चुके थे …आखिरकार मरियम ने भी अपने समान को ट्रंक व पोटली में बांधा और अकेले सतलुज के उस पार जाने का निर्णय लिया…लुट जाने को मरियम के पास ज्यादा संपत्ति कुछ नहीं थी तो भी गले में क्रॉस उसकी सुरक्षा के लिए काफी था…ज्यादा से ज्यादा कोई उसे गौमांस खाने को मजबूर कर देता …इससे ज़्यादा कुछ नही क्योंकि ईसाईयों को तो निशाना बनाया ही नहीं जा रहा था…मरियम पैदल ही चल दी हवेली के रास्ते फाजिल्का की ओर … कोई साधन न भी मिले तो भी सफर के हिसाब से मरियम को अंदाजा था कि वह 14 अगस्त की सुबह तक सतलुज के उस पार पहुंच जायेगी … शाम तक वो हवेली पहुंच जायेगी और उसके बाद तो उसे अकेलापन महसूस नहीं होगा, क्योंकि जाने वालों के झुंड मिलेंगे … हवेली तक का सफर उसे दिन के उजाले में अकेले ही तय करना था क्योंकि इस ओर का क्षेत्र पहले ही खाली हो चुका था।

चलते चलते मरियम गांव चक्क पहुंची तो पूरे गांव में सन्नाटा था …हिन्दू सिख परिवारों का यह गांव पूरा खाली हो चुका था … इस गांव का एक एक परिवार मरियम को जानता था तो सूना गांव देखकर मरियम की आंखें भर आई … गुरुद्वारे के नजदीक से गुजरते वक्त पता नहीं उसे क्यूं ऐसा लगा कि गुरुद्वारे के अंदर से उसे आवाज दी गई है…गांव के इस ग्रंथी परिवार व गुरुद्वारे में भी उसका आना जाना था तो सर पर दुप्पटा रखकर गुरुद्वारे के अंदर चली गई … ग्रंथी परिवार अपना सामान समेट कर क्वार्टर खाली करके जा चुका था, लेकिन मुख्य कमरे में गुरू साहिब का प्रकाश हो रहा था … सिख परिवारों में आना जाना रहने की वजह से उसे सिख मर्यादा का बहुत ज्ञान था … उसने गुरू ग्रंथ साहिब को रूमाले में लपेटा और उसे अपना तीसरा लगेज मानते हुए लेकर चल दी … इस बात से वह अंजान थी कि वह आवाज सचमुच गुरुद्वारे के अंदर से आई थी या उसके अंतरमन से … खैर तीसरे लगेज का भार को महसूस किये बिना वह हवेली पहुंच गई।

खैर मरियम मौसी के मुंह से बचपन में सुनी इस कहानी को फाजिल्का पहुंचने तक के पूरे वृतांत को सुनाकर मैं ब्लॉग को लंबा नहीं करता, लेकिन सतलुज दरिया पार करने के बाद उसके आगे यह सवाल था कि फिलहाल वो कहां जाये जो अपने आजीविका वाले परिवारें को ढूंढना तो अगले एक दो माह का काम था तो तब तक शरण कहां ली जाये … स्वभाविक रूप से उसने अपने धर्म के परिवारों के बारे में पूछा तो उसे मालूम पड़ा कि फाजिल्का (बंगला) शहर के समीप इस्लामाबाद बस्तीनुमा गांव में कुछ ईसाई परिवार रहते हैं … खैर मरियम उन परिवारों के मध्य पहुंच गई व उसे शरण भी मिल गई, लेकिन उसके तीसरे लगेज में गुरू ग्रंथ साहिब थे, जिसे प्रकाश मान करना जरूरी था, इसाई परिवार के घर में तो हो नही सकता था … पता करने पर मालूम हुआ कि आसपास कोई गुरूद्वारा तो नहीं है, लेकिन पास की मस्जिद को खाली करके मौलवी परिवार पाकिस्तान जा चुका है व मस्जिद खाली है … मरियम ने उस मस्जिद की सफाई की, उसे अच्छी तरह धोकर पवित्र किया और अपने से जो बन पड़ी व्यवस्था के मुताबिक गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर दिया … आसपास सिख परिवार तो नहीं थे, लेकिन 1950 के दशक में बहुत से हिन्दू परिवार भी गुरुद्वारे में आते जाते थे तो हिन्दू चौधरी परिवारों ने मस्जिद को गुरुद्वारे में बदल दिया … इस सत्य घटना पर सोशल इंजीनियरिंग के ज्ञाता, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील व मशहूर ब्लॉगर इंकलाब नागपाल ने कहा कि मरियम जैसी रूहों का कोई धर्म नही होता … ईसाई परिवार में जन्म लेने के कारण दुनिया उसे ईसाई के तौर पर जानती होगी लेकिन ऐसी रूहों को किसी धर्म या समुदाय से जोडक़र देखना उनका अपमान करना है … नागपाल ने कहा कि छोटी उम्र होने के कारण वो अपनी रूह को उस वक्त पहचान न पाई जब उसे गुरुद्वारे के अंदर से आवाज आई … वो आवाज़ दरअसल उसके अंतस से उठी होगी लेकिन उसे मालूम न पड़ा , बाद के वर्षों उसे मालूम हो गया होगा लेकिन बच्चों को कहानी सुनाते वक्त शायद इसका जिक्र नही किया … ऐसी रूहों को किसी धर्म संप्रदाय से जोडक़र हमें नही देखना चाहिए … श्री नागपाल ने कहा कि यह सत्य घटना प्रेरणा दायक है व इस पर फिल्म भी बननी चाहिए … उन्होंने इतिहास से जुड़े इस गुरूद्वारे के एसजीपीसी या स्थानीय गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा सुध न लेने पर हैरानी जताई …
पाठकों को बता दूं कि बाद में मरियम की शादी चर्च के फादर ने फाजिल्का के ही एक ईसाई समुदाय के लडक़े से करवा दी थी, इसलिए उसे आजीविका के लिए फाजिल्का छोडऩे की जरूरत नही पड़ी … मैं व मेरे दोस्तों ने बचपन में मरियम के मुंह से यह कहानी सुनी है, लेकिन यह कहानी न होकर सच्च है जो फाजिल्का के मौहल्ला नई आबादी इस्लामाबाद के गुरूद्वारा साहिब की दीवारों में दर्ज है जो अभी भी मस्जिद नुमा है, लेकिन एसजीपीसी ने इसे कभी नहीं संभाला
