लाधूका – न्याय हो तो Wali Muhammad Wattu जैसा

 उसकी आँखों ने जिंदगी भर किसी का चेहरा नहीं देखा, लेकिन फिर भी आँखे न्याय को पहचाननें में कभी धोखा नहीं खा सकती थी। अंधा था, मगर न्याय करते समय अगर बेटे की बात भी झूठ साबित हो गई तो वह उसे भी सजा देने से नहीं घबराता। ऐसा न्यायप्रिय था, मुहम्मद लाधु खान का बेटा वली मुहम्मद खान। वली मुहम्मद खान तीन भाईयों में सबसे बड़ा था। उसका छोटा भाई कुत्तुबदीन ऑनरेरी मजिस्ट्रेट था और सबसे छोटा नजामदीन तो इज्जत का रखवाला के नाम से आसपास के इलाके में प्रसिद्ध था। वली मुहम्मद खान की आँखों की रोशनी बचपन से ही नहीं थी। मगर उसकी काबलियत का लोहा पूरा इलाका माानता था। जमींदार मुस्लमान लाधु खान के परिवार के न्याय के किस्से तो दूर तक के लोग मानते थे। जमींदार लाधु खान की मौत हुई तो गांव का नाम ही लाधुका पड़ गया। सतलुज दरिया से तीन किलोमीटर दूर बसा गांव लाधुका की गलियों जैसी साफसफाई तो निकट के किसी गांव में नहीं थी। खुली गलियां, गांव के बीच चौपाल, कुआं और बड़ीबड़ी हवेलियां गांव की शान थी। मुहम्मद लाधु खान की भूमि का रक्बा बहुत बड़ा था। गांव किडिय़ांवाली तक उनकी सरहद थी। लाधु खान के भाई लक्खा खान की भूमि का रक्बा भी कम नहीं था। गांव लक्खा मुसाहिब, लक्खा कड़ाईयां, लक्खेके हिठाड, लक्खे के उत्ताड़, लक्खा असली मुहम्मद लक्खा खान के गांव थे। मगर इनका अधिकतर ध्यान अपनी भूमि की संभल की तरफ था और लाधु खान के बेटे मुहम्मद वली खान अपना ध्यान लोगों को न्याय दिलाने की तरफ जयादा देता था।

      बात 1850 के आसपास की है। वली मुहम्मद का बेटा सादिक पशुओं का व्यापार करता था। सादिक का एक व्यापारी साथी सतलुज दरिया के पार से पशु खरीदकर दरिया के इस ओर सरकंडे के साथ बांध देता था। सरकंडे की निशानी पर सादिक पहुंचता और पशु लेकर बेच देता। पशु बेचने के बाद सादिक दूसरे व्यापारी को उसका हिस्सा अदा कर देता। एक बार सादिक के साथी व्यापारी ने दरिया के इस ओर सटे किनारे तक भंैस भेज दी। भैंस के नैंन नक्श सुंदर थे। दूध तो इतना था कि देखने वाला भी दंग रह जाता। दूसरे दिन सादिक ने व्यापारी के पास संदेश भेजा कि वह रात को भैंस लेने गया था। मगर वहां भैंस नहीं मिली। व्यापारी हैरान हो गया कि जब वह भैंस ठिकाने पर खुद बांधकर आया है तो सादिक कैसे कह रहा है कि वहां भैंस नहीं है ? व्यापारी चोर की तलाश में दरिया के इस ओर आ गया। चोर की तलाश करते-करते तीन दिन बीत गए। मगर चोर का पता नहीं चला। बात वली मुहम्मद तक पहुंची। सादिक को चौपाल में बुलाया गया। मगर सादिक ने वहां से भैंस नहीं लेकर आने की बात कही। इस बारे में दोनों ने सौगंध उठाई। अब झूठ से पर्दा उठाकर हकीकत को सामने लेकर आने के लिए वली मुहम्मद ने एक योजना बनाई। योजना मुताबिक उस सरकंडे को गवाह बनाया गया, जहां भैंस बांधी गई थी। वली मुहम्मद ने दोनों को उस सरकंडे से एक टहनी तोडक़र लाने को कहा, जहां व्यापारी भैंस बाधता था। सादिक और व्यापारी सरकंडे की टहनी के लिए चल पड़े। सादिक तो टहनी लेकर आ गया, लेकिन व्यापारी देरी से पहुंचा। उसके बाद वली मुहम्मद की ओर से सादिक और व्यापारी के पीछे हकीकत जानने के लिए भेजे गए व्यक्ति भी आ गए। उन्होंने बताया कि सादिक ने तो गांव के बाहर खड़े सरकंडे से टहनी तोड़ी है। जबकि व्यापारी ने उस स्थान पर मौजूद सरकंडे की टहनी तोड़ी है, जहां भैंस के पैरों के निशान आज भी हैं। सच्चाई कुछ हद तक सामने आ चुकी थी। इस दौरान वह व्यक्ति भी आ पहुंचा, जिसने भैंस खरीदी थी। उसने बताया कि भैंस बेचने वाला सादिक था। अब हकीकत सामने आ गई। वली मुहम्मद ने अपने फैसला सुनाया कि सादिक सजा के तौर पर भैंस का मूल्य व्यापारी को तीन दिन में अदा करेगा। साथ ही लाधुका और आसपास के गांवों में एक माह के बीच जितनी भी लड़कियों की शादी होगी। उसका खर्च सादिक उठाएगा। ऐसे न्याय की दास्तां सुनते हुए गांव लाधुका में बरसों गुजारने के बाद फाजिल्का की मास्टर कालोनी में बसे बाऊ राम कहते हैं कि कुत्तुबदीन और नजामदीन भी नयाय करते समय धर्म और परिवार को एक तरफ रखकर ही फैसला सुनाते थे।

Ladhuka Haveli- mian Ladhu khan Wattu

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