स्लयूट…भारत-पाक युद्ध के गैलेंट हीरो को स्लयूट

Asafwala Shaheed Smark

कश्मीर मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने युद्ध तक की धमकी दी थीशायद वह सर्जिकल स्ट्राइक को भूल गए हैंअगर चंद रोज पहले की सर्जिकल स्ट्राइक भूल गए तो फिर 1965 के युद्ध दौरान पाकिस्तान को नाकोचने चबाने वाले जवान हवालदार जस्सा सिंह तो उन्हें याद भी नहीं होगाइसलिए उन्हें हवालदार जस्सा सिंह की दास्तान बताना जरूरी है।

       भले ही उनका जिक्र बहुत कम हुआ है…मगर युद्ध में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उस कारण ही उन्हें युद्ध गैलेंट हीरो कहा जाता है… भारतीय सेना की 14 पंजाब नाभा अकाल के लंबे कदम के इस वीर जवान हवलदार जस्सा सिंह को बहादुरी के बदले वीर चक्र सम्मान से नवाजा गया…उनके यूनिट को फाजिल्का सैक्टर के गांव चाननवाला के निकट तैनात किया गया…इस तरफ से ही दुश्मनों ने भारत पर हमला किया…सुलेमानकी बॉर्डर दुश्मनों के निशाने पर था…दुश्मन साबूना ड्रेन पार न कर सकें…इस उद्देश्य से इस यूनिट को ड्रेन के दूसरी ओर तैनात किया गया…ड्रेन और बॉर्डर के बीच सिर्फ सात किलोमीटर की दूरी थी…दुश्मन धीरे-धीरे भारतीय सीमा में घुसने लगा तो लैफ्टीनेट कर्नल सी. एस. भुल्लर ने एक योजना बनाई…उस योजना मुताबिक दो कंपनियों के साथ सुरक्षा तैनात की गई…योजना अनुसार मध्य से निकलती सडक़ को दो हिस्सों ए और बी में बांटा गया…हवलदार जस्सा सिंह को बी कंपनी में तैनात किया गया…दुश्मन ने अपनी योजना मुताबिक सात सितंबर की रात हमला किया…उस जबरदस्त हमले में एक जवान शहीद हो गया…मगर सेना के वीर जवानों ने दुश्मन को अपनी धरती पर कदम नहीं रखने दिया…पाक ने हमले की दिशा बदलकर 9 सितंबर को दोबारा हमला किया…पाक ने बी कंपनी पर सुनयोजित हमला किया…हमले के जवाब में हवलदार जस्सा सिंह ने दुश्मन पर गोलियों की बौछार कर दी…जस्सा सिंह की गोलियों की आवाज बंद हुई तो दुश्मन आगे बढऩे लगा…जस्सा सिंह भी आगे बढ़ा और एक बंकर में पहुंच गया…हवलदार जस्सा सिंह को दुश्मनों को मार गिराने का इतना हौसला था कि उसे पता भी नहीं चला कि वह दुश्मन की धरती पर बने पाकिस्तानी बंकर में पहुंच चुका है…यह पता चलते ही दुश्मन जस्सा सिंह पर टूट पड़े…दुश्मन ने धड़ाधड़ गोलीबारी की…जवाब में जस्सा सिंह ने गोलियां दागी, लेकिन बाद में उसकी बंदूक की गोलियां खत्म हो गई…फिर भी जस्सा सिंह ने हौसला नहीं छोड़ा और दोनाली के बट से दुश्मन की भूमि पर दुश्मन चौकी रक्षक को ढ़ेर कर दिया…दुश्मनों को इस बात का पता चला तो वे जस्सा सिंह की तरफ बढ़े…दुश्मनों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए जस्सा सिंह के शरीर के तीन हिस्से चोट से ग्रसित हो गए…शरीर से खून की बूंदे गिरती देख जस्सा सिंह घायल शेर की तरह दुश्मनों पर टूट पड़ा…दोनाली के बट और गोलियों का जबरदस्त मुकाबला बन गया…घायल शेर के आगे दुश्मन टिक नहीं पाया…जस्सा सिंह ने तीन दुश्मनों को मौत की नींद सुला दिया, खून से रंगे हाथ आगे बढ़ते गए…दोनाली के बट से हमला जारी रहा जो दुश्मन जस्सा सिंह की तरफ बढ़ा, वह उसकी दोनाली के बट का शिकार बन गया…दो दुश्मनों को ढ़ेर करने के बाद दोनाली जस्सा सिंह के खून से रंग गई…जस्सा सिंह की आंखों में से दुश्मनी का खून टपकता देख दुश्मन के आगे बढऩे की हिम्मत टूट गई…जस्सा सिंह आगे बढ़ा और दुश्मन के हथियारों वाले बक्से तक पहुंच गया…जस्सा सिंह ने उस बकसे को इस तरह बेकार कर डाला कि वे कभी भारत के खिलाफ प्रयोग ही न हो पाएं…इतने में भारतीय सेना के अन्य जवान भी जस्सा सिंह के साथ आगे बढ़ते हुये मौके पर पहुंच गए…वहां दुश्मनों के कुछ हथियार बेकार होने से बचे पड़े थे…जवानों ने उन्हें कब्जे में ले लिया…कुछ दिन बाद युद्ध समाप्ति की घोषणा हो गई…इस गैलेंट हीरो को बहादुरी के लिये वीर चक्र सम्मान से नवाजा गया।

         बताना जरूरी है कि भारत पाक के बीच छह सितम्बर को यह युद्ध हुआ था…पाक ने गोलाबारी की और साबूना बांध पर हमला कर दिया…तब 14 पंजाब रेजीमेंट के जवानों ने दुश्मन को करारा जवाब दिया…जब दुश्मन गांव चाननवाला के रेलवे लाइन के साथ-साथ फाजिल्का की तरफ बढ़ा तो फिरोजपुर से आई 3/9 गोरखा राइफल की दो कंपनियों के जवानों ने दुश्मन को रोक लिया…दुश्मन ने उन पर तीन हमले किए, लेकिन सेना डटी रही और दुश्मन आगे नहीं बढ़ पाया…आखिर 23 सितंबर को युद्ध समाप्ति की घोषणा हो गई।   

Hav. Jassa Singh

अग्रवाल सभा का फाजिल्का में योगदान

Aggarwal Sabha’s contribution to Fazilka

Munshi Ram Aggarwal

History of the Shri Aggarwal Sabha is as old as the history of Fazilka, In short we can say that we can’t describe the contribution of Shri Aggarwal Sabha . Some of the main contribution of the sabha are describing below:-

For The Establishment Of Fazilka

In 1880 Seth Munshi Ram Aggarwal gave One Lakh Silver Coin to the british officer named Mr.L.Burton for developing the Fazilka

Makes A Trust

Baba Khetu Ram Aggarwal gives his whole cash for the study of the childrens nd gives 50000 silver coin to the british officer then makes a trust.The first president of the trust is Seth Amarnath Bansal.

Medical Hospital

in 1926-27 a medical hospital is established for the people by a Aggarwal Family and after partition of India & Pakistan this hospital is completly dedicated to the poor people Seth Om Parkash Kansal, Om Parkash Bansal & Seth Raja Ram Gokul Chand are running this hospital Now this hospital is known with the name of “Shri Krishan Dharmarth Oshdhalya” and the president of this Mr.Ashok Kansal

M.R.Govt.College & Sunder Ashram

In 1945 Munshi Ram Ji makes a trust and give his whole cash for the development of fazilka.With the help of their contribution, in Fazilka many buildings were established like M.R.Govt.College & Suder Ashram

M.R. Govt College Fazilka

Sidh Shri Hanuman Mandir

Mr. Kheta Ram Bishambar Das Aggarwal gave land for “Sidh Shri Hanuman Mandir”.The land is near about 9 acers.

Shri Hanuman Mandir Fazilka

Garib Chand Dharmshala

Seth Chiranji Lal and Garib Chand Surjnvasi’s wife Kalawati makes “Garib Chand Dharmshala” in 1954 with a school “Garib Chand Kanya Maha Vidhyalya” which is today known with the name of Lotus Kid Care.

एक परिवार माटी का गणेश बनाकर दे रहा है प्रकृति का संदेश

गणपति बप्पा मोरिया…इन जयकारों के साथ घर-घर में श्री गणेश जी की स्थापना कर दी गई है…मगर इस बार अधिकांश घरों में उस गणेश जी को प्राथमिकता दी जा रही है जो पर्यावरण के लिए भी शुभ है और हमारे लिए भी…बात जारी रहेगी, लेकिन इससे पहले इससे जुड़ी कुछ तथ्यों के बारे में बात कर लें। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार : श्री वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार दस दिन तक सुनाई थी…जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि दस दिन के कठिन परिश्रम उपरांत गणेश जी का तापमान अधिक हो गया था…तब वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में जाकर ठंडा कर दिया गया था…यही कारण है कि श्री गणेश जी की स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है…

अब बात करें ईको फ्रैंडली गणपति कीवैसे भी अब पर्यवरण बचाना जरूरी हो गया हैइसलिए पी..पी. के गणपति की जगह अब माटी से गणपति बनाने को टैं्रड चल पड़ा हैयहां भी हैं एक हरफनमौला परिवारपंजाब स्टेट पावरकॉम में कर्मचारी हैं सुभाष पंचालफाजिल्का की जैन गली में रहते हैउनकी धर्मपत्नी का नाम है दीपमालाऔरउनके बेटे दिवांशू पंचालमाटी के गणेश बनाते हैंइस महोत्सव के शुरू होने से पहले ही वह कई दिनों तक काम करते हैंअगर बात पुरानी करें तो वह इस काम में बरसों से जुटे हैंशौंक हैंइसलिए उन्होंने पहली बार जो गणेश की प्रतिमा बनाई थीवो छोटी थीउसे घर में ही विसर्जन कियावह बताते हैं कि अधिकांश लोग प्लास्टर ऑफ पैरिस (पी..पी.) से गणपति की मूर्ति तैयार करवाते हैं और उसे स्थापित करके दस दिन बाद नहर या दरिया वगैरा में विसर्जित कर देते हैंवह बताते हैं कि उस गणपति की मूर्ति पर कैमिकल वाले खतरनाक कलर होते हैं जो जलजीवों की जान के लिए खतरा होता हैंवही पानी जब खेतों में पहुंचता है तो फसल हमारे लिए हानिकारक बन जाती हैनहरी पानी पीना भी जानलेवा बन जाता हैअगर केन्द्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के नियमों की बात करें तो उसमें पी..पी. से तैयार गणेश जी की मूर्ति को पानी में विसर्जन करने की मनाही हैइसलिए इस परिवार ने माटी से गणेश बनाना बेहतर समझाबस फिर क्या थाजुट गए श्री गणेश बनाने में

इन दिनो गणेश महोत्सव मनाया जा रहा हैफाजिल्का की गली चौधरियां में रिद्धि सिद्धि गणेश महोत्सव पर गणेश जी की जो मर्ति स्थापित की गई हैवह इस परिवार ने बनाई हैमूर्ति बनाने में 14-15 दिन लग गएवह बताते हैं कि उन्होंने यह मिट्टी मध्यप्रदेश से मंगवाई थीसाथ ही औजार भीमूर्ति पर करीब 15 किलो माटी लगी हैयह मूर्ति भी गली चौधरियांं में ही विसर्जन की जाएगीजिसमें पानी में मूर्ति विसर्जन की जाएगी वो पानी शहर के विभिन्न पार्कों में लगे पौधों को लगाया जाएगा।

अब बात करते हैं दीपमाला के हाथों की सफाई की…उसने आर्ट एंड क्राफ्ट का कोर्स किया हुआ है…माहिर है…तभी तो मौहल्ले के अलावा कई अन्य मौहल्लों की लड़कियां व महिलाएं भी उनसे यह कला सीखने आती हैं…उनका कहना है कि अगर प्रदूषण रहित जीवन जीना है तो भविष्य में माटी के ही गणपति बनाएं…ताकि उसे पर्यवरण को स्वच्छ रखा जा सके…पानी भी प्रदूषित न हो…(Krishan Taneja 92556-12340)

बेश्क गुम हो जाए लंडे भाषा, पंडित लछमण दास का ज्ञान अमर रहेगा!

कंप्यूटर युग से पहले तकरीबन हरेक आढ़ती का मुनीम और हर दुकानदार एक ही भाषा का प्रयोग करते थे…वो भाषा थी लंडे…भले ही आज लंडे भाषा का प्रयोग चंद लोग ही करते हैं, लेकिन फाजिल्का के पंडित लछमण दास द्वारा दूरदराज के क्षेत्र तक पहुंचाया ज्ञान आज भी जिंदा है…इधर Ferozepur to Ganganagar तक तो उधर Haveli To Pakpatan तक के लोग, जो इस समय लंडे भाषा का ज्ञान रखते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने Teacher Pandit Lachhman Dass जी से ज्ञान न लिया हो।

इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि आज भी फाजिल्का में एक कहावत प्रसिद्ध है कि जिसने पंडित लछमण दास की मार खाई है…वह हिसाब में मार नहीं खा सकता…पंडित लछमण दास जी लंडे भाषा के एक ऐसे अध्यापक थे…जिनसें Bangla (Fazilka) के आधे लोगों ने (उस समय) लंडे भाषा का ज्ञान हासिल किया था…इसके अलावा फिरोजपुर, हवेली, पाकपटन तक के विद्यार्थियों ने उनसे शिक्षा हासिल की…उनसे लंडे सीखने वालों में सेठ परमांनंद…लाला मुंशी राम और कशमीरी लाल जी जैसी शख्सियतें भी शामिल थी।

            ब्रिटिश साम्राज्य में गुडगांव जिला से फाजिल्का में आकर बसे Pandit Layak Ram Fazilka थाने में दरोगा थे…उनके सुपुत्र जगदीश प्रसाद भी दरोगा थे और दूसरे सुपुत्र थे पंडित लछमण दास…उनके तीसरे सुपुत्र का नाम है मदन लाल…पंडित लछमण दास जी के तीन सुपुत्र पंडित राम कुमार त्रिपाठी हिन्दी के अध्यापक थे और उन्होंने कई साल तक सरकारी हाई स्कूल (लडक़े) में शिक्षा दी… उनके अलावा महावीर प्रसाद त्रिपाठी रिटायर्ड पटवारी हैं और मुरलीधर त्रिपाठी भोपाल में उद्योगपति हैं…ब्रिटिश साम्राज्य दौरान इलाके में उर्दू भाषा अधिक प्रचलित थी… इसका कारण यह है कि यहां अधिकांश मुस्लमान जाति के लोग बसे हुए थे… बाद में व्यापारियों को ओलिवर ने यहां व्यापार का न्योता दिया…इस दौरान हिन्दी और पंजाबी भाषा प्रचलित हो गई…उर्दू की शिक्षा देने के लिए डेड हाउस रोड पर मसीत थी… क्योंकि यहां व्यापारी अधिक थे और मुनीमी का कार्य करने के लिए लंडे भाषा का ज्ञान जरूरी था…इसलिए पंडित लछमण दास ने एक पाठशाला खोली…वह अरोड़वंशी, बागड़ी, बानियां और गुजराती आदि भाषा का भी अधिक ज्ञान रखते थे…उनकी पाठशाला एक छप्पर (जहां मौजूदा एस.डी. सीनीयर सैकेंडरी स्कूल है) के नीचे थी…इसके साथ ही पंडित ऊमा दत्त…पंडित परमांनंद…पंडित चेत राम…आचार्य लीलाधर हिन्दी और संस्कृत पाठशाला में शिक्षा देते थे…महावीर प्रसाद ने बताया था कि पंडित जी काफी तेज चलते थे और शिक्षा देते समय वह विद्यार्थियों पर पूरी सख्ती बरतते थे…इसके बाद उन्होंने घास मंडी में एक चौबारे पर पाठशाला खोली। तीन जनवरी 1984 के दिन वह इस फानी जहान को अलविदा कह गए। आज अध्यापक दिवस पर नमन: Lachhman Dost Whats App 99140-63937

Pandit Lachhman Dass ji

वो जल गए, पर जलने नहीं दिया

Lala Sunam Rai M.A. Fazilka

देश की आजादी में फाजिल्का जिले के लोगों का भी अहम योगदान रहा है…फाजिल्का निवासी एडवोकेट नंद लाल सोनी, चौधरी वधावा राम, लाला सुनाम राए एम.ए., हर किशन, डोगर दास पुत्र शाम दास, मुरारी लाल पुत्र तुलसा राम, जोगिन्द्र सिंह पुत्र मेहताब सिंह, देस राज पुत्र कांशी राम मिस्त्री, चांदी राम वर्मा अबोहर, गांव नुकेरिया निवासी हरनाम सिंह पुत्र मघर सिंह, पंजावा के बिशन सिंह पुत्र भाग सिंह, जंडवाला भीमे शाह के तारा सिंह पुत्र अत्तर सिंह, पाकां के ज्ञान चंद पुत्र ज्योति राम, सुुरेश वाला के चेता सिंह पुत्र सूरता राम, घट्टियां वाली के झांगा राम पुत्र वधावा राम, खुईखेड़ा के अर्जुन सिंह पुत्र तलोक सिंह,

चक्क पालीवाला के बचित्र सिंह पुत्र इंद्र सिंह, झोक डिपोलाना के अजीत सिंह पुत्र चंदा सिंह, चिराग ढ़ाणी के गुलजारा सिंह पुत्र उजागर ङ्क्षसह, कच्चा कालेवाला के लछमण दास, टाहलीवाला जट्टां के नंद सिंह पुत्र फुम्मन ङ्क्षसह, राजपुरा के पूरन सिंह पुत्र चतर सिंह, सुलखन सिंह पुत्र माहला सिंह वासी रत्ता थेहड़, गुरमुख सिंह पुत्र सुंदर सिंह गांव मिनिया वाला, बघेल सिंह पुत्र इशर सिंह कमालवाला, ज्ञान सिंह पुत्र हजूरा सिंह कमालवाला, बहल सिंह पुत्र सुरैण सिंह जंडवाला भीमे शाह, दयाल सिंह पुत्र कथा सिंह पाकां, महल सिंह पुत्र संता सिंह कंधवाला हाजर खां आदि ने देश की आजादी में अपना अहम योगदान दिया है…सरकार की ओर से इन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया है।

कवीश्वरों का राजे की इन 2 गांवों में हुई थी शादियां

गांव ढिप्पांवाली के निकट अरनीवाला माइनर पर बाबू रजब अली की कोठी है…1939 में जब माइनर बनी थीतब पंजाब के मशहूर कवीश्वर था बाबू रजब अलीजिन्हें कवीश्वरों को राजा भी कहा जाता थानहरी विभाग में कर्मचारी थेबुजुर्गों की माने तो तब फाजिल्का खुश्क इलाका थाबाबू रजब अली ने किसानों को नहरी पानी देने के लिए माइनर में कई मोघे रखे थेबताते थे कि बाबू रजब अली की दूसरी शादी गांव गंधड़ की बीबी फातिमा से हुई थीमगर उसकी मौत हो गईतीसरी शादी अबोहर के निकट गांव है काला टिब्बावहां की बीबी रहमत  से हुई थी…25 साल की नौकरी के बाद वह काला टिब्बा में ही बस गएदेश का विभाजन हुआ तो वह पाकिस्तान चले गए।

इसके अलावा बाबू रजब अली की कई यादें गंग कैनाल के आसपास भी बसती हैं…उसने गंग कैनाल के पास एक कच्ची कोठड़ी भी बनाई हुई थी…ताकि वह नहरों के चक्कर लगाता हुआ, जब वहां पहुंचे तो वहां कुछ देर के लिए आराम कर सके…उनका एक चेला हजूर सिंह रोमाना गांव आजमवाला में रहता था…उसके पास कई भेड बकरी थी…जिन्हें वह अकसर ही गंग कै नाल पर लेकर जाता…धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गई…बाबू रजब अली जब गंग कैनाल पर जाता तो वहां हजूर सिंह रोमाणा भी आ जाता…खूब बातें होी…बाबू शेयर बोलता और रोमाणा सुनता रहता…रोमाणा को भी शेयर बोलने का शौंक पड़ गया…उसने बाबू रजब अली को गुरू बना लिया…

Kothi- Babu Rajab Ali in Village Dhippan wali

On the Arniwala Minor near village Dhippanwali is Babu Rajab Ali’s Kothi … When the Minor was built in 1939 … Babu Rajab Ali, the famous Kavishwar of Punjab, who was also known as the King of the Kavishwaras … Canal Department I used to have staff… If the elders believed, then Fazilka was a dry area… Babu Rajab Ali had kept many moghs in the Minor to give canal water to the farmers… It was said that Babu Rajab Ali’s second marriage to the village Gandhar Bibi Fatima…but she died… Third marriage is village near Abohar, Kala Tibba… There she was married to Bibi Rahmat… After 25 years job he settled in Kala Tibba. … when the country was partitioned, he moved to Pakistan.

Apart from this, many memories of Babu Rajab Ali also reside around Gang Canal… He also built a Jhugi(Home) near Ganga Canal… so that he was circling the canals, when he reached there for a while. He could rest … One of his disciples Hazur Singh lived in Romana village Azamwala … He had many sheep goats … which he often used to take to the Gang Canal … slowly the two became friends. … Babu Rajab Ali Jab Gang Canal Hazur Singh Romana would have come there too… a lot of talk happened… Babu used to speak and Romana would listen… Romana too was fond of speaking… he made Babu Rajab Ali a Guru …(Lachhman Dost Whats App 99140-63937)

बेटी जन्नत कंबोज ने फिर जीता गोल्ड मैडल

Jannat Kamboj D/O Lachhman Dost Fazilka

कन्या स्कूल की छात्राओं ने जीते 6 गोल्ड, 4 सिल्वर मैडल

पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की ओर से जिला स्तर के ताइक्वांडो के टूर्नामैंट का आयोजन किया गया। इस टूर्नामेंट में फाजिल्का जिले के 14 स्कूलों के खिलाडिय़ों ने भाग लिया। गांव माहूआना के रेडियंट स्कूल में आयोजित इस टूर्नामेंट में सरकारी सीनियर सैकेंडरी स्कूल (कन्या) की अंडर – 14, अंडर – 17 व अंडर – 19 की छात्राओं ने अपने जौहर दिखाए। इस बारे में जानकारी देते हुए स्कूल के पी.टी. सुरिन्द्र कुमार ने बताया कि इस टूर्नामैंट में स्कूल की 11 छात्राओं ने हिस्सा लिया। जिनमें 6 छात्राओं ने गोल्ड, 4 ने सिल्वर व एक छात्रा ने ब्राउज मैडल हासिल करके स्कूल का नाम रोशन किया है। उन्होंने बताया कि छात्राओं ने अपने बल का बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने प्रतिद्वंदियों को पछाड़ते हुए अंडर -14 में कोमल, अंडर -17 में जन्नत कंबोज, वैभी, सर्बजीत कौर, एकमजोत और अंडर -19 में शैफी ने गोल्ड मैडल हासिल किया है। जबकि अंडर – 17 में निशा, अंडर -19 में किरण और पिंकी ने रनरअप रहकर सिल्डर मैडल व सुमन रानी ने अंडर – 17 में ब्राउज मैडल हासिल करके स्कूल, जिले व अपने परिजनों का नाम रोशन किया है। स्कूल प्रिंसिपल संदीप धूडिय़ा ने विजेता छात्राओं, उनके अध्यापकों व परिजनों के अलावा कोच रमन कुमार व हरजिन्द्र सिंह विक्की को बधाई दी है।

बुलंद इमारतें – कुछ धराशायी, कुछ खंडहर हो गई

Lofty Buildings – Some Dashed, Some Ruins

जनाना अस्पताल फाजिल्का – धराशायी 2011

Ladies Hospital Fazilka

कभी बुलंद थी गुलाम नबी बोदला की हवेली (गाँव गंजू हस्ता )

Once upon a time there was Ghulam Nabi Bodla’s Haveli (Village Ganju Hasta)

Ye Zindagi Ke Mele Duniya Mein Kam Na Honge Afsos Ham Na Honge शायद यही कह रही है पुरानी कचहरी की यह इमारत

Old court building

अपनी शान को तरसी Mohammad Sarver Bodla’s Haveli Fazilka

Mohammad Sarver Bodla

1938 में बना था यह गेट

This gate was built in 1938

खंडहर होता रघुवर भवन फाजिल्का

Historical Building Raghuwer Bhawan Fazilka

आज नहीं तो कभी नहीं – सादकी पोस्ट के दूसरी तरफ पाकिस्तान की यह इमारत

Today if not ever – This building of Pakistan on the other side of Sadqi Post Fazilka

सियासत के महारथियों की एक कहानी … तस्वीरों की जुबानी

फाजिल्का सरहदी क्षेत्र जरूर है, लेकिन सियासत में पीछे नहीं है…इस क्षेत्र की मिट्टी ने देश को कई सियासतदान दिए हैं…उनमें ch.Wadhawa Ram का रिकॉर्ड है कि वह देश के विभाजन के बाद प्रथम विधायक तो बने ही, साथ में उन्होंने जेल में ही विधानसभा चुनाव जीतकर रिकॉर्ड भी बनाया…इसके अलावा फाजिल्का विधानसभा हलके ने पंजाब सरकार को कई मंत्री भी दिए…इनके बारे में ब्लाग में लिखा जाएगा…फाजिल्का की धरती पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्रीमति इन्दिरा गांधी ने भी कदम रखा…मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब आर.एस.एस. के प्रचारक थे तो वह कई बार इस इलाके में आए…प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अबोहर आए… सियासत के इन महारथियों की एक कहानी…तस्वीरों की जुबानी।

देश की प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी जब फाजिल्का (1972) में आई, उनकी यह तस्वीर

Ex PM Smt Indra Gandhi in Fazilka

देश के प्रधानमंत्री रहे श्री अटल बिहारी वाजपेयी की (1977) फाजिल्का में यह यादगार तस्वीरें।

Ex PM Sh. Atal Bihari Vajpai in Fazilka 1977

फाजिल्का में टी.वी. टावर लगाने के लिए देश के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी से मिले पत्रकार लीलाधर शर्मा, धर्म लूना व अन्य।

Mr. Leela Dhar Sharma and Mr Dharm Loona with Ex PM Mr Rajiv Gandhi

लोकसभा स्पीकर चौधरी बलराम जाखड़ फाजिल्का में एक यादगार तस्वीर

A memorable photo- Lok Sabha Speaker Chaudhary Balram Jakhar in Fazilka
Congress Leader जगमीत सिंह बराड़ के पिता स. गुरमीत सिंह बराड़ फाजिल्का में, शर्मा व अन्य। Ms. Uma Sharma (RETIRED AS DEPUTY DIRECTOR PUBLIC RELATIONS PUNJAB) साथ हैं के पिता व स्वतंत्रता सैनानी डा. गोबिन्द राम

This Historical Photo Is Of Abohar. (Distt FAZILKA)
Pandit Jawahar Lal Nehru Visited Abohar Before Independence, On The back Side Of ‘State Bank Of India’ Abohar. Late Sh. Chandi Ram Verma Freedom Fighter from Abohar Sitting On The Stage.
with Thx- https://www.facebook.com/AboharCity/

फिल्म शूटिंग करनी है तो आइये बॉस, अनुकूल जगह भी है-परिस्थितियां भी

यह देश का अंतिम छौर नहीं…देश यहां से शुरू होता है…सिर्फ भारत ही नहीं…दूसरी तरफ देखें तो पाकिस्तान भी यहां से शुरू होता…भारत पाक की सरहद है न बॉस…इसलिए दोनों देश यहां से शुरू होते हैं…कई फिल्में हैं सरहद पर बनी हैं…वो फिल्में चाहे देश भक्ति की हों या दोनों देशों की लव स्टोरी या जसूसी वगैरा की…मगर वो फिल्में तो आर्टिफिशियल सैट लगाकर बनी हैं…यहां तो असली है…सरहद भी…बड़ी बड़ी हवेलियां भी…हरे भरे खेत…सतलुज दरिया…शहीदों की स्मारक…आसफवाला…खासकर ऐसा गांव…जो तीन तरफ से पाकिस्तान में घिरा हुआ है और चौथी तरफ दरिया है…फिर क्या कमीं है…

Shiju Kataria

यहां पहले फिल्में बन चुकी हैं .. वो फिल्म चढ़दा सूरज हो या फिर चौधरी हरफूल सिंह जाट…अगर देश भक्ति पर फिल्म बनाएं तो सबसे बेहतर फिल्म यहां बन सकती है…फाजिल्का देश का एक ऐसा क्षेत्र है जहां अनेक राज्यों के जवानों ने शहादत दी है…उनकी याद में बना है शहीद स्मारक…आसफवाला…तीन तरफ से पाक में घिरा गांव भी देश का एक मात्र गांव मुहार जमशेर है…यह भी बता दूं कि अभिनेत्री शिजू कटारिया तो यहां फिल्म बनाने की बात कह भी चुकी हैं…फिर दूसरे निर्माताओं की देरी क्यों ?

Choudhary Harphool Singh Jaat- The First Colour Movie in Fazilka

Producer/Director/Actor Ch. Atma Ram Kamboj with actress Malti

Fazilka- which was known for its Asia’s biggest cotton industry before partition had nothing to do with tinsel world ever. It is far from Tinsel City, Mumbai. None can think even in dream that the gorgeous actresses with the heroes of glittering world would visit this tiny, outdated city and shoot the movie. Even after the 72 years of independence, only one movie has been shot here in the year of 1973 which was based on the martyr of adjoining state Haryana “Harphool Singh Jaat”. Actor Anand Kumar had played a role of protagonist in the movie with female co-partner gorgeous Malti, niece of Tinsel world’s dream girl Hema Malini with the second lead actress Jai Shree Tee. Aatma Ram Kamboj who was both the producer & director of the movie too had played a significant role in the movie. The role of the British Officer was played by Kamal Kapoor. In 1973, it was shot in Sajrana & Salem Shah villages apart from some shooting in Mumbai & Kurkshetra. The movie was released in the year of 1974.

Punjabi Film – Charda Suraj

अगर फिल्म चढ़दा सूरज की बात करें तो उसकी शूटिंग फाजिल्का में भी हुई थी…हरकृष्ण लाल कंबोज द्वारा बनवाई इस फिल्म में guest app Mr. Pal patrian wala or Shivani , Surinder shinda, Shivendar mahal, Ajay Deol ,Suman datta ect artist.

One of the biggest Hindi film hits in its decade “Anarkali”, a 1953 Hindi historical drama based on the historical legend of the Mughal emperor Jahangir was the first movie released in “Raja Cinema, Fazilka” on 24th July 1953.

“Amar Akbar Anthony” was the first hindi movie screened in Sanjeev Cinema, Fazilka on 23rd December 1977

Bollywood Actress ‘Chandni’
Chandni is the grand daughter of Late Pandit Het Ram Sharma (Former Administrator Of G.D School Abohar). Chandni has appeared in Bollywood movies like ‘Sanam Bewafa’, (1991), Henna (1991), Umar 55 Ki Dil Bachpan Ka (1992) …. , Jaan Se Pyaara (1992), 1942: A Love Story (1993) …., Ikke Pe Ikka (1994), Aaja Sanam (1994), Jai Kishen (1994) …., Mr. Azaad (1994) (as Chandini) …. , Hahakaar (1996) (as Chaandni) ….
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बालीवुड के बादशाह अमिताभ बच्चन के पिता स्व. श्री हरिवंश राय बच्चन ‘अबोहर’ शहर के ‘साहित्य-सदन’ में 29 दिसंबर सन् 1941 में हुये ‘अखिल भारतवर्षीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के तीसवें अधिवेशन के लिए आमंत्रित किये गए थे I यही पर उनकी और तेजी सूरी(बच्चन) की पहली मुलाकात ‘अबोहर सर्किट हाउस’ में हुई थी I पहली ही बार में हरिवंश राय बच्चन जी तेजी की ख़ूबसूरती के दीवाने हो गए थे I बाद में दोनों ने 1941 में अल्लाहाबाद में शादी रचा ली थी I ‘अबोहर सर्किट हाउस’ हरिवंश राय श्रीवास्तव (बच्चन) एंव तेजी सूरी (बच्चन) के प्यार का मुख्य गवाह बना I  इस सम्मलेन का एक कारण था I हिंदी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों की अध्यक्षता भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध साहित्यिकों, प्रमुख राजनीतिज्ञों एवं विचारकों ने की। महात्मा गांधी इसके दो बार सभापति हुए।1935 में महात्मा गांधी जी नें एक सभा में नीति बनाई जिसके अनुसार हिंदी एक ऐसी भाषा थी जिसको देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखा जा सकता था I गांधी जी की इस नीति ने सभा में पुरुषोत्तम दास एंव अन्य वरिष्ठ पद धारकों को सख्त नाराज़ कर दिया था I इसके लिए एक योजना बनाई गयी जिसके अनुसार अबोहर में गांधी जी की इस नीति को अस्वीकार करना और हिंदी भाषा को एक ऐसी भाषा के तौर पर निर्धारित करना था जो कि सिर्फ देवनागरी में ही लिखी जा सकती थी I राष्ट्र-भाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार की इन गतिविधियों का सुपरिणाम यह हुआ कि सन् 1947 में देश-विभाजन के समय फाजिल्का तहसील, जिसमें अबोहर भी शामिल था, बड़े-बड़े प्रभावशाली मुसलमान जागीरदारों, काश्तकारों और व्यापारियों की पर्याप्त आबादी होते हुए भी, हिन्दी-भाषी और हिन्दू-सिख बहुल मानी जाकर पाकिस्तान में जाने से बच सकी और उसके साथ लगती छोटी-छोटी मुस्लिम रिसायतें जलालाबाद और ममदोट भी भारतवर्ष के हिस्से में आ गईं।
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फाजिल्का की 8 यादगार तस्वीरें Eight memorable photos of Fazilka

Fazilka Photo-9 May1944 Sub Judge Mr. Ram Singh Bindra with Shri Guru Singh Sabha Fazilka’s Members
Govt High School Fazilka Session 1947-48
Swami Kushal Dass ji
Fazilka Steam Ship
2nd MLA Fazilka Mr. Bagh Ali Sukhera with other
-photo 1930- right side Hagi bahawal khan Kuria zaildar-
Photo 6 June 1939- 1st. Lala Dolat Ram Gupta, peer zada inamudin, Chiman Lal, Rameshwer diyal, Rai Sahib lala Vidya Dhar, DC Ferozwpur M.R. Sachdev, Seth Shopat Rai Periwal, Dr. Kartar Singh, Lala Kulwant Singh- 2nd. Seth Ganga Parsad, Lala Bihari Lal, Lala Manohar Lal, Lala Karam Chand, ch, Mohri lal, Abdul Kareem, Seth Jas Raj or 3rd Megh Raj and Hans Raj

बराबर चलते थे Hindi or Urdu News Paper

भारत विभाजन से पहले और कुुछ साल बाद तक फाजिल्का शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था…फिर भी समाचार जानने या सुनने की जिज्ञासा मन में विद्यामान थी…समाचारों की प्रगति ने समस्त क्षेत्र को एक परिवार सा बना दिया…इन समाचार पत्रो ने हमें दैनिक कार्य से निवृत होकर संसार की प्रत्येक समस्याओं, समाचारो से अवगत कराया और समस्त सूचनाएं हम तक पहुँचाई…हम वास्तविकता से सरल और सहज ही में परिचित होते रहे…विज्ञापनों के जरिए हमारा बाजार भी विकसित हुआ…सूर्योदय होने से पहले समाचार-पत्र हाथ में आया, तो सारा काम छोड़ कर समाचार-पत्र की महत्वपूर्ण खबरें पढ़ीं…पता चला कि बीते दिन क्षेत्र में क्या गतिविधियां रहीं, घटना-दुर्घटना की जानकारी मिली…राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं और व्यापारिक संस्थाओं की गतिविधियों की जानकारी मिली…तब मन को संतुष्टि मिली कि फाजिल्का के इतिहास में यहां के समाचार-पत्र अपना अहम् योगदान अदा कर रहे हैं…समाचार-पत्र जिन्दगी का एक हिस्सा बन गए हैं…घर बैठे महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं, रोजगार के लिए रिक्त स्थानों का पता चला तो नया रिश्ता ढूंढने में भी सहायता मिली…चुटकुले व कहानियों ने मनोरंजन किया तो मन खुशी से झूम उठा…ज्ञान में और वृद्धि हुई। समाचार-पत्रों ने ज्ञान के साथ-साथ फाजिल्का के इतिहास की जानकारी दी।       आश्चर्यजनक बात तो यह है कि यहां हिन्दी व उर्दू समाचार-पत्र बराबर चलते रहे हैं…आजतक फाजिल्का से कई समाचार-पत्र प्रकाशित हुए, जिनमें हिन्दी और उर्दू भाषा के अधिक समाचार पत्र हैं…क्योंकि पहले उर्दू भाषा अधिक प्रसिद्ध थी…दरअसल, फाजिल्का क्षेत्र के लोग पहले उर्दू काफी जानते थे…मगर अब न उर्दू की शिक्षा देने वाले शिक्षक रहे और न ही शिक्षा लेने वाले विद्यार्थी। शिक्षा कम हुई तो उर्दू के समाचार-पत्र भी बंद हो गए…एक ज़माना था जब उर्दू के समाचार-पत्रों ने खासी ख्याति हासिल की…यहां से समाचार-पत्र का प्रकाशन तो भारत-पाक विभाजन से पूर्व ही हो चुका था…फिरोजपुर से फाजिल्का में समाचार-पत्र प्रकाशित करने के लिए समाचार-पत्र फाऊंटेन ने 1941 में रजिस्ट्रेशन ली…मासिक समाचार-पत्र जो चारों भाषाओं यानि हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी व उर्दू में प्रकाशित होता था, लेकिन विभाजन के बाद ये समाचार-पत्र बंद हो गया…इसके अलावा बिजली और निशात समाचार पत्र भी निकाले गए, जो लाला हरि कृष्ण दास प्रकाशित करते थे…उसके बाद ओम प्रकाश बांसल ने उर्दू का मोती समाचार-पत्र सन् 1960 में प्रकाशित किया गया, जो साप्ताहिक था… 1972 का वर्ष तो अखबारों के नाम …तब यहां तीन समाचार-पत्र प्रकाशित हुए… एक था, रफीक-ए-खालिक तो दूसरा था खादम…उर्दू भाषा में प्रकाशित हुए…गोविंद राम का रफीक-ए-खालिक साप्ताहिक था…खादम की शुरुआत पत्रकार हरशरण सिंह बेदी ने की… वे स्वयं इसके चीफ एडिटर थे और सलाहकार-कम-सह संपादक एडवोकेट नरिन्द्र मोहन भैय्या थे… इसका उद्घाटन किया था कँवर लजिन्द्र सिंह बेदी… इस वर्ष ही मजदूर हितकारी का आगाज हुआ…15 मई 1978 को धर्म लूना ने बहुभाषी पाक्षिक समाचार पत्र फाजिल्का पोस्ट प्रकाशित की…इसके अलावा अमरजीत सिंह ने लोक रिपोर्टर मासिक पंजाबी और जसवंत सिंह बेदी ने पखंड साप्ताहिक प्रकाशित की…इसके बाद 21 मार्च 2004 के दिन फाजिल्का में दैनिक सरहद केसरी समाचार पत्र शुरू किया गया…इस समय फाजिल्का शहर से एक मात्र रंगदार दैनिक समचार पत्र सरहद केसरी प्रकाशित हो रहा है।

महलनुमा धरोहर, हैरीटेज का दर्जा, खर्च जीरो

Gol Kothi Fazilka

बंगले की रौनक बढ़ चुकी थी…ब्रिटिश अधिकारियों को आना जाना तेज था…मगर उनके मनोरंजन…खेल आदि के लिए कोई कक्ष नहीं था…1913 में बंगले के निकट और सिरसा से मुलतान तक जाने वाली लंबी सडक़ के किनारे एक सुंदर कक्ष का निर्माण किया गया…जिसका नाम रखा गया …The Bosworth Smith Recreation Club..फाजिल्का में बंगला और रघुवर भवन के अलावा यह तीसरी धरोहर है, जिसे Govt of Punjab के department of tourism and cultural affairs की तरफ हैरीटेज का दर्जा दिया जा चुका है।

Gol Kothi Fazilka

           इमारत छहभुज नीव आधार पर बनाई गई…जो खुद में एक ऊंचे मंच पर बनाई होने की झलक देती है…इसकी नींव प्रत्येक कोने से उठने वाली आर्चद्वार और दीवारें इमारत को पर्याप्त संतूलन देती हैं…इस गोलाकार इमारत को मोटी दीवारों से बनाया गया है…जिन पर पक्की ईंटे लगाकर चूना व सुरखी से चिना गया है…कल्ब की इमारत महलनुमा और गोलाकार होने के कारण इसे गोल कोठी के रूप में अधिक जाना जाता है…इमारत के उत्तर से दक्षिण दिशाओं तक आर्च कन्ट्रक्शन शैली में प्रवेशद्वार बनाए गए हैं…जिनकी संख्या 18 है…विजय और हर्ष का प्रतीक स्तम्भों को गुलाबी रंग दिया गया है…प्रत्येक फलक में आर्च कंट्रक्शन से निर्मित द्वारों के आगे तीन सीढिय़ां बनाई गई हैं…जहां से कल्ब के गलियारे में प्रवेश होता है…मुख्यद्वार के साथ लगते द्वारों में समानता है..

Notification Copy

. इनमें फर्क सिर्फ यह है कि बाकी द्वार मुख्यद्वार से छोटे हैं…किसी भी द्वार से इमारत के गलियारे में पहुंचा जा सकता है…गलियारे में पैदल पथ बनाया गया है… जहां से इमारत के उत्तर से दक्षिण तक घूमा जा सकता है…गलियारे की खास विशेषता यह है कि गलियारे में सर्दी के मौसम दौरान धूप और गर्मी के मौसम में ठंडी छांव का लुत्फ उठाया जाता है…केन्द्र में छहभुज कक्ष का निर्माण किया गया है…जसके उत्तर और पूर्व दिशा की ओर दो द्वार बनाए गए हैं… केन्द्र कक्ष में हवा और रोशनी का तालमेल बिठाने के लिए रोशनदान और जालीदार खिड़कियां सजित हैं…केन्द्र कक्ष में पश्चिम की ओर एक जालीदार द्वार है… जहां से साथ लगते दो छोटे कक्षों में प्रवेश होता है…एक छोटे कक्ष में प्रवेश करने के लिए गलियारे के उत्तर दिशा की ओर भी द्वार बनाया गया और दूसरे छोटे कक्ष के प्रवेश के लिए केन्द्र कक्ष का जालीदार द्वार और दक्षिण दिशा में द्वार हैं…इनका एक-एक द्वार पश्चिम की ओर भी खुलता है…इनके साथ 16 घुमावदार सीढिय़ां है…जिनके जरिए इमारत की छत्त पर पहुंचा जा सकता है…गलियारे की छत्त पर आठ गुम्बद सजित हैं और केन्द्र कक्ष की छत्त पर छह गुम्बद हैं…जिन्हें कमल के फूल में सजाया गया है…जो मुगलकालीन, हिन्दु और ब्रिटिशशैली के घटकों का एकीकृत संयोजन है…

विरासत भवन में पुस्तक पर दस्तखत करते हुए जिलाधीश श्रीमती ईशा कालिया

इस इमारत में Virast Bhawan भी बनाया गया…जिसमें स्कूल से मिली और लोगों की तरफ से दी गई ऐतिहासिक चीजें सजाई गई हैं…वहीं इस सुंदर इमारत सहित दो अन्य इमारतों को हैरीटेज का दर्जा दिलाने के लिए मौहल्ला Nai Abadi Islamabad, Teacher Calony, Basti Chandoran or Dhingra Calony के लोगों की तरफ से लगातार एक माह तक आंदोलन किया गया…इसके बाद इसे पंजाब सरकार की तरफ से हैरीटेज का दर्जा मिला…पांच कनाल जगह हैं…और यह धरोहर लडक़ों के सीनियर सैकेंडरी स्कूल फाजिल्का में है…मगर हैरानी की बात यह है कि हैरीटेज प्राप्त इस धरोहर की संभाल के लिए पंजाब सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया।

Clock Tower के पीछे छिपी है दर्दभरी दास्ताँ

View From Periwal HAVELI

एक वक्त था, जब शहर का समय क्लॉक टावर तय करते थे…शहर और आसपास के ग्रामीण (जहां तक क्लॉक की आवाज जाती थी) अपनी दिनचर्या निर्धारित करते थे…घडिय़ाल की घनघनाहट जब होती तो हर व्यक्ति सतर्क हो जाता…घडिय़ाल एक एक घंटे बाद समय दोहराता है…समय जितना होता, घडिय़ाल उतनी बार बजता…यानि दस बजे तो घडिय़ाल …10 बार बजता है…अपनी वास्तुकला के सौंदर्य के लिए भी क्लॉक टावर मशहूर हैं…भले ही आज मोबाइल का युग है…मोबाइल ने घडिय़ों का कारोबार लगभग बंद कर दिया…घड़ी तो कम लोग ही देखते हैं…इसके बावजूद क्लॉक टावर के घडिय़ाल की आवाज कईयों को सुबह जगाती है…

Inaugaration Board

    फाजिल्का के घंटा घर पर जो घडिय़ाल लगाया गया हैवो इंगलैड के शहर बिर्मिघम से मंगवाया गया था। यह भी बता दूं कि घंटा घर को बनाने के लिए करीब तीन साल का समय लगा था और इस पर करीब 22000 रूपये खर्च हुआ था।

Painting

  फाजिल्का का घंटा घर क्यों बनाया गयाइसके पीछे एक दर्दनाक दास्तान छुपी हुई है। बताते चलें कि फाजिल्का के सेठ किशोर चंद पैड़वाल देश के अमीरों में एक थे उनके पोते और सेठ किशन चंद के सुपुत्र राम नारायण पैड़ीवाल की याद में यह घंटा घर बनाया गया हैइसके पीछे दर्दनाक दास्तां यह है किजिनके नाम पर घंटा घर बनाया गया है यानि सेठ राम नारायण पैड़ीवाल के घर लडक़ा नहीं थाएक बेटीनर्मदा थीजवानी में ही राम नारायण का निधन हो गया

Edward Memorial Ladies Hospital Fazilka

   इस दर्द से पैड़ीवाल परिवार के साथ साथ इलाके लोगों को भी काफी सदमा पहुंचाक्योंकि पैड़ीवाल परिवार काफी दानवीर थालोगों का भला करता थाबताते हैं कि एक बार यहां से अंग्रेज कुछ मजदूरों को पकड़ कर ले जा रहे थे तो इसकी सूचना जब सेठ मदन गोपाल को लगी तो वह कचहरी पहुंचे और बोलेयह मजदूर मेरे इलाके के हैंइन्हें छोड़ दोजो मजदूरी का पैसा होगा...वह मैं अदा करूंगाउन्होंने पैसा अदा भी कियाएक और भी दास्तान बताते हैं कि सेठ मदन गोपाल सुबह सुबह जब जाते थे तो उनकी जेब में सिक्के होते थेमगर जब घर लौटते तो जेब खालीकहां जाते थे वो सिक्केवो सिक्के गरीबों में बांट दिए जाते थेदयालु थे सेठ मदन गोपाल जीरास्ते में गरीबों में सिक्के बांट देते थे।

Narmda

   इस तरह राम नारायण पैड़ीवाल भी काफी दयालु थेमगरयुवावस्था में उनका निधन हो गयाउनकी याद में पैड़ीवाल परिवार की ओर से फाजिल्का के सिविल अस्पताल में जनाना अस्पताल बनाया गया थायह बात 1914 की हैजनाना अस्पताल का नाम थाएडवर्ड मेमोरियल जनाना अस्पतालजिस पर करीब 10,500 रूपये खर्च किए गए थेमगर 2011 में यह इमारत गिरा दी गई।    

       बात को जारी रखते हुए बता दूं कि ब्रिटिश साम्राज्य में कानून था किबेटी को पिता पुरखी जायदाद का वारिस नहीं माना जाएगा…जब सेठ किशोर चंद की जायदाद का बटवारा हुआ तो अंग्रेजों ने एक फैसला किया…जिसके तहत जायदाद का वारिस राम नारायण की बेटी नर्मदा की बजाए सेठ मदन गोपाल और सेठ श्योपत राय को बनाया गया…ब्रिटिश साम्राज्य में यही कानून था…मगर एक शर्त जरूर रखी गई … वो शर्त यह थी …कि …सेठ राम नारायण की याद में कोई ऐसी धरोहर बनाई जाए…जिसे इलाका निवासी हमेशा याद रखें…कई दिन तक ऐसी धरोहर बनाने के लिए विचार चलते रहे…वहीं अंग्रेज समय के भी पाबंद थे…उन्होंने कहा कि शहर के बीचो बीच क्लॉक टावर बनाया जाए ताकि हर व्यक्ति को समय का पता चल सके…

Clock Machine

फैसला हुआ…सेठ राम नारायण की याद में राम नारायण घंटा घर बनाया जाए…इसका नक्शा तैयार हुआ और सेठ मदन गोपाल पैड़ीवाल व सेठ श्योपत राय पेड़ीवाल ने इसका निर्माण शुरू करवा दिया…निर्माण जारी था…अचानक एक और सदमा…एक गहरा दर्द…पहले सेठ राम नारायण का निधन तो अब…क्लॉक टावर के निर्माण दौरान… सेठ मदन गोपाल का निधन हो गया। खैर…क्लॉक टावर का काम मुकम्मल हो गया…फिर आया 6 जून 1939 को दिन…उस दिन घंटा घर का उद्घाटन किया गया…इस दौरान शहर के सभी लोगों को न्यौता दिया गया…उधर नर्मदा की शादी की गई तो उसे 400 एकड़ भूमि गांव कबूलशाह खुब्बन में दी गई।(Lachhman Dost, Whats app No. 99140-63937)

India में Fazilka, Pakistan में Faisalabad की एक जैसी है यह धरोहर

Photo- opening cereony (Clock Tower Fazilka)

मुगलकालीनब्रिटिश भारतीय भवन निर्माण कला और वास्तुशैली के घटकों का अनूठा संगमघंटाघरशहर की सुंदरता की एक खूबसूरत पेशकशशहर के मध्य में स्थित होने के कारण यहां से रोजाना हजारों लोगों का आवागमन होता है तो वह घंटाघर को देखकर देश की एक अनूठी धरोहर या अजूबा मानते हैंआवागमन के चलते ही सियासी सामाजिक अन्य संस्थाओं ने इसे धरने, प्रदर्शन का स्थान बना दिया हैइसकी चर्चा दूरदूर तक हैयही  कारण है कि इसकी तस्वीर पंजाब विधान सभा की आर्ट गैलरी में सजाई गई हैइस कड़ी में ही फाजिल्का को जिला बनाने की मांग को लेेकर यहां धरना, रैली और अनशन किया गया।

Seth Shopat Rai Periwal

        बात 1936 की हैजब इसका निर्माण शुरू हुआ और यह 6 जून 1939 के दिन बनकर तैयार हो गयाराम नारायण पैड़ीवाल की स्मृति में स्थापित घंटा घर का असली नाम राम नारायण क्लॉक टावर हैजिसे राय साहेब मदन गोपाल पेड़ीवाल और सेठ श्योपत राय पेड़ीवाल ने शहर की जनता को समर्पित कियाजिला फिरोजपुर के डीसी एम.आर.सचदेव ने इसका उद्घाटन कियाजबकि इस मौके पर आयोजित समारोह की प्रधानगी शीपशैंक्स एस्कवायर आईसीएस कमिश्नर जालंधर डिवीजन, एमए पीसीएस एसडीओ फाजिल्का राय साहिब लाला विद्याधर और नगर कौंसिल के प्रधान सेठ श्योपत राय ने कीइसके निरीक्षणकर्ता मो. अब्दुल करीम और मैंमरान पब्लिक वर्कस सब कमेटी फाजिल्का लाला करम चंद सेठ जेस राज थेसेकेट्री मनोहर लाल धौन और ठेकेदार . नारायण सिंह थेमिस्टर एस.डी. वासन भवनकला निुपण थेउनकी कला ने ईंटो की चिनाई से अनूठी इमारत 95 फीट (करीब 29 मीटर) यानि घंटा घर का निर्माण कर दियाउस समय क्षेत्र में हिन्दी, पंजाबी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा मशहूर थीइसका पता इससे चलता है कि घंटा घर के चारों ओर चारों भाषाओं में घंटा घर का उद्घाटन बोर्ड लगाया गया हैयानि जिसको जिस भाषा का ज्ञान है, वह इस बारे में जानकारी हासिल कर सकता हैगोल चक्कर के बीच निर्मित घंटा घर में स्वच्छ हवाओं का प्रवेश हो, इसके लिए चारों दिशाओं में दरवाजे हैंऊपर तीन कमरों के बीच से घूमावदार 82 सीढिय़ां हैंजिस पर चढक़र करीब 88 फीट तक ऊपर जाया जा सकता हैऊपर चढक़र शहर को कोनाकोना देखा जा सकता हैयहां भी एक बरामदा बनाया गयासीढिय़ा चढ़ते वक्त घंटा घर के चारों दिशाओं में लगे घंटे की मशीन कमरों के बीच सजाई गई है।

Seth Madan Gopal Periwal

        ऐसा ही क्लॉक टावर पाकिस्तान के लायलपुर शहर में है…फाजिल्का और पाकिस्तान के जिला लायलपुर (अब फैसलाबाद) में निर्मित Clock Tower मुगलकालीन, ब्रिटिश और भारतीय भवन निर्माण कला व वास्तुशैली के घटकों का अनोखा समिम्मलन होने के अलावा और भी कई समानताएं है…दोनों घंटा घर शहर के मध्य में निर्मित हैं…लायलपुर ब्रिटिश सरकार के समय पंजाब के गवर्नर सर जेम्स लायल ने सन् 1880 में शहर आबाद किया और इसका नाम अपने नाम पर लायलपुर रखा…उनकी जिंदगी का सफर भी लायलपुर में ही पूरा हुआ…उनकी समाधि लायलपुर के कम्पनी बाग में ही है… दोनों शहरों ने बीसवीं सदी की शुरूआत में उन्नती की है… घंटा घरों में फर्क सिर्फ यह है कि लायलपुर घंटाघर के आसपास आठ बाजार हैं…जबकि फाजिल्का के घंटाघर के आसपास चार बाजार हैं…फाजिल्का के घंटाघर के उत्तर की तरफ सर्राफा बाजार है। जो अन्य मौहल्लों के अलावा मौजम रेलवे फाटक से जोड़ता है। वहां से मार्ग सरहदी गावों को जोड़ता है। जबकि दक्षिण की ओर सडक़ 50 मीटर की दूरी के बाद दो टुकड़ों में बंट जाती है। वहां से एक सडक़ पूर्व की ओर गली गीता भवन को जाती है और दूसरी सडक़ पश्चिम की तरफ नामधारी मार्किट की तरफ जाती है…विभाजन से पूर्व यहां मुस्लमानों की बड़ी सरां थी…उधर घंटाघर के पूर्व में होटल बाजार है…जो गौशाला रोड़ से होकर अबोहर-फिरोजपुर मार्ग को जोड़ता है…होटल बाजार रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मलोट रोड और फिरोजपुर रोड को जोडता है…होटल बाजार का एक रास्ता साइकिल बाजार से जुडता है…जहां से मौजम रेलवे फाटक तक पहुंचा जा सकता है… यही मार्ग सिविल अस्पताल और रेलवे स्टेशन को जोडता है…इस मार्ग से साधु आश्रम रोड पर भी पहुंचा जा सकता है… उधर घंटाघर के पश्चिम की तरफ जण्ड बाजार है, जो मेहरियां बाजार से अबोहर रोड से जुड़ता है…जण्ड बाजार कॉलेज रोड़ से होकर सुलेमानकी बॉर्डर को जोड़ता है…चारों दिशाओं में किसी भी दिशा में खड़ा व्यक्ति घंटाघर चौंक में पहुंच सकता है।

        इस तरह लायलपुर (Faisalabad) के हर बाजार का अपना नाम है…शहर के आठ बाजारों के आठ नाम हैं। Kachehri Bazar… Rail Bazar..Karkhana Bazar…Mintgumri bazar …Jhung Bazar …Bhawna Bazar…Ameenpur Bazar or Chniot Bazar हैं…Layalpur का नक्शा ब्रिटिश सरकार के कब्जे अधीन क्षेत्र के कलोनिल अधिकारी कैप्टन पोहम यंग ने बनाया था। विश्वास किया जाता है कि यह क्लॉक टावर क्वीन विकटोरिया की याद में बनाया गया है…यह नक्शा ब्रिटेन के राष्ट्रीय झंडे यूनियन जैक को मद्देनजर रखकर (यूनियन जैक जैसा) बनाया गया है…जो आर्कीटेक देसमंड यंग ने डिजाइन किया था…मगर हकीकत में यह माना जाता है कि इसका डिजाइन उस समय के मशहूर टाऊन प्लानर सर गंगा राम ने बनाया था। ब्रिटेन के राष्ट्रीय झंडे जैक में आठ लाइनें हैं…इन आठ लाइनों का केन्द्र एक है और यह आठ तरफ बिखरे हुए हैं… ऐसे ही लायलपुर का घंटाघर है…यदि यह विमान या हैलीकाप्टर में बैठकर फिजा से नीचे लायलपुर का घंटाघर और आठ बाजारों का दृश्य देखें तो यह ब्रिटेन का यूनियन जैक जैसा ही प्रतीत होता है…लायलपुर का घंटाघर सिक्ख जमींदारों और जगीरदारों से फंड एकत्रित करके बनाया गया था…यह फंड 18 रूपए एक मुरब्बे के हिसाब से वार्षिक एकत्रित हरके टाऊन कमेटी को दिया जाता था और टाऊन कमेटी ने घंटाघर बनाया था…इस घंटा घर का नींव 14 नवंबर 1903 में सर जेम्स लायल ने रखी…जहां यह घंटा घर बनाया गया है, वहां पहले कुँआ था जबकि फाजिल्का में भी घंटा घर के निकट कुँआ था…लायलपुर का घंटा घर 1906 में आगरा के ताज महल बनाने वाले कारीगर से तालुक रखने वाले गुलाब खान की देखरेख में बनकर तैयार हुआ, जिस पर 40000 रूपये की लागत आई…इसकी घड़ी बम्बई से खरीदी गई। उदघाटन के समय पंजाब के वित्त कमीश्नर मिस्टर लुइस गेस्ट ऑफ ऑनर थे। (जारी) (Lachhman Dost Whats app 99140-63937)

174 साल पुरानी, एक हवेली की कहानी !

आप किसी भी साईड से आएं…Train से आएं या Bus से…Abohar से आएं या Ferozepur से…Malot से आएं या फिर सरहदी गांवों से…आप शहर के बीच स्थित Clock Tower तो पहुंच ही जाएंगे…वहां से आप Jand Bazar जाएंगे तो कुछ ही दूरी पर जाकर आप Left Side को मुड़ जाएं…वो Mehrian Bazar को जाएगी…आगे अबोहर रोड से मिल जाएगी…आप ने आगे नहीं जाना है…बस, कुछ ही दूरी तक जाकर जब आप Right Side की तरफ जाएंगे तो आगे एक हवेली नजर आएगी…जिस पर लिखा है… HAVELI Rai Sahab Seth Sheopat Rai Periwal (हवेली राय साहिब सेठ शोपत राए पैड़ीवाल)…जब आप हवेली के अंदर जाएंगे तो देखते ही रह जाएंगे…वही Old Look …जो 1845 में था…

Gate

    यह वही हवेली है, जहां बीकानेर रियासत के राजा गंगा सिंह सहित फाजिल्का में आने वाले हर ब्रिटिश अधिकारी और नेताओं का आना जाना रहा हैइस हवेली में ही इलाके के विकास के लिए योजनाएं तैयार की जाती थीअब किसी मूलभूत ढांचे में परिवर्तन किए बगैर इस हवेली को वही ओल्ड लुक से संवारा गया है जो 174 साल पहले था

     नगर कौंसिल में 11 साल तक प्रधान रहे सेठ शौपत राय पेड़ीवाल और 34 साल तक पार्षद व कई साल उपप्रधान रहे सेठ मदन गोपाल पेड़ीवाल की ओर से निर्मित इस हवेली की हर कलाकृति को भी बरकरार रखकर सजाया गया है…फाजिल्का रत्न अवार्डी सुशील पेड़ीवाल ने इसे इलाके की सबसे पुरानी और सुंदर बनाया है..

Old Lamp

फाजिल्का में बंगले का निर्माण 1844 में ब्रिटिश अधिकारी वंस एगन्यू ने करवाया तो इसके एक साल बाद ही इस हवेली का निर्माण सेठ आईदान ने 1845 में शुरू करवाया था…उन्होंने पोली के अलावा दो कमरे, बाहर के चौंक और मुख्य द्वार का निर्माण करवाया…शेष भाग 1918-20 में सेठ शौपत राय ने करवाया…हवेली के कमरों की दिवारों पर पोर्शलीन टाइल्स और छत्तों पर सिलवर पेंट व काल्स सिलिंग छत्तों का निर्माण 1935 में करवाया गया…

Old Clock

भारत विभाजन से पूर्व कौंसिल अध्यक्ष रहे शौपत राय, उपाध्यक्ष रहे मदन गोपाल और विभाजन के बाद दो बार अध्यक्ष रहे सेठ लक्ष्मी नारायण पेड़ीवाल का जन्म इस हवेली में ही हुआ है…शौपत राय और उसके तीन बेटों का संयुक्त परिवार एक अप्रैल 1968 तक इस हवेली में रहा…मगर शौपत राय के निधन के बाद हुए बटवारे अनुसार यह हवेली राम प्रसाद के पास रही…जबकि गंगा प्रसाद को बंगले के निकट बगीचा दिया गया…सेठ लक्ष्मी नारायण को हवेली के सामने कोठी दी गई…

राम प्रसाद की दो लड़कियां थी। माता पिता के स्वर्गवास हो जाने के बाद उन्होंने यह हवेली अपने चचेरे भाई सुशील पेड़ीवाल को बेच दी…अब सुशील पेड़ीवाल व उनके पुत्र शैलेष व सिदार्थ ने बगैर किसी मूलभूत ढांचे में परिवतन करते हुए इस हवेली को ओल्ड लुक दिया है…जिसे देखने के लिए भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं…

हवेली में विभाजन से पहले प्रयोग किए जाने वाले दीये…लालटेन…बैल आदि मौजूद हैं…हवेली के दरवाजे पुराने हैं और उन्हें ताला भी पुराना लगाया है…इसके अलावा ऐतिहासिक फोटो से हवेली लबरेज है…हवेली के अंदर खुला हॉल बनाया गया है…चार मंजिला इस हवेली की छत्त पर चढऩे से शहर के हर कोने को निहारा जा सकता है…

1841 में सूरतगढ़ से फाजिल्का में आकर बसने वाले इस परिवार ने फाजिल्का को क्लॉक टावर…जनाना अस्पताल…पेेड़ीवाल धर्मशाला…बठिंडा…सूरतगढ़ और बनारस में धर्मशालाएं…श्री मुक्तसर साहिब के गुरूद्वारा में तालाब दिया है… इस परिवार को ब्रिटिश सरकार की ओर से राय साहिब के खिताब से नवाजा गया था…इसके अलावा भामा शाह अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है…

सुशील पेड़ीवाल का कहना है कि पेड़ीवाल परिवार की ओर से पंजाब… हरियाणा और राजस्थान में जो धरोहरें बनाई गई हैं…उनकी देखभाल लगातार की जा रही है…अगर कहीं कोई कमीं है तो उसे दूर करने का प्रयास करेंगे…वह बताते हैं कि फाजिल्का की धरोहरों को भी संवारा जाएगा…(Lachhman Dost -Whatsapp no. 99140-63937)

पानी का आफतकाल

Fazilka- Flood Photo 2011

इन दिनों कुदरती प्रकोप के कारण पंजाब को अरब से अधिक रूपये का आर्थिक नुकसान हो चुका हैकई लोग बेघर हो गएकई पशु मर गएकईयों के सपने बिखर गएबर्बाद का यह सिलसिला काफी लंबे समय से जारी हैजब तक सरकारें इसका स्थायी समाधान नहीं निकालेंगीतब तक बर्बाद का यह सिलसिला जारी रहेगाचलो खैर, हम अपने इलाके की बात करते हैं।

Flood Photo

      बात अगर 18वीं सदी से शुरू करें तो उस समय फाजिल्का के वाण बाजार तक सतलुज दरिया बहता था…जिसका पहला प्रकोप 1881 में हुआ…इसके बाद 1882-1883 में 13.1 इंच बारिश हुई…इसके बाद 1903 में 25 इंच बारिश हुई…उस समय सतलुज दरिया में रिकार्ड से 3 फीट ऊंचा पानी चढ़ गया और पानी फाजिल्का में फैल गया…

Fazilka – Flood Photo

इसके बाद 1908 में भी कहर बरपा…31 अगस्त 1908 के दिन फाजिल्का में 182.9 मिलीमीटर की रिकॉर्ड बारिश हुई थी…दरिया में जलस्तर बढ़ा और एक सितंबर के दिन दरिया ने फाजिल्का को अपनी चपेट में ले लिया…जिससे डेन अस्पताल (सिविल अस्पताल) …डाक बंगला (पोस्ट आफिस) …अंग्रेजों का बंगला (मौजूदा डीसी निवास) …मुनसिफ कोर्ट (तहसील परिसर) … स्टेशन और पुलिस स्टेशन जैसी मजबूत इमारतें धाराशायी हो गई…उस समय लाखों रूपये का नुकसान हुआ…

Satluj River Brize

देश का विभाजन हुआ तेा एक साल बाद ही दरिया ने फिर कहर बरपाया…पानी फाजिल्का में तबाही मचा गया…1955 की बाढ़ हो या 1988 की…फाजिल्का में काफी नुकसान हुआ…वैसे इस समय फाजिल्का में बाढ़ की स्थिति नहीं है…हां…जहां बाढ़ है…वहां पीडि़तों की मदद की जरूरत है। (Lachhman Dost- W. 99140-63937)

Fazilka – Flood Photo-2011

कस्बे से शुरूआत, मंडी से खुशहाली, विभाजन से बर्बादी -अब बुलंदियों की उड़ान पर है रंगला, बंगला, फाजिल्का

Fazilka Clock Tower

फाजिल्का की भूमि गुरुओं, पीरों पैगम्बरों, अवतारों और शहीदों के आशीर्वाद से ओत-प्रोत है तथा उनकी रहमत से यहां नेकदिल इन्सान बसते हैं, जो हर क्षण दूसरों की सेवा करने को तत्पर रहते हैं। यहां श्री गुरू नानक देव जी और शहीद-ए-आजम स. भगत सिंह ने कदम रखकर इस धरती को पवित्र बनाया। भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा से मात्र 11 किलोमीटर की दूरी पर बसा फाजिल्का, पंजाब की सबसे पुरानी तहसील है, जो अब जिला बन चुका है। यह शहर 1844 में बसाया गया। दरिया के एक किनारे मुस्लिम समुदाय के 12 गाँव थे, जिनमें वट्टू, चिश्ती और बोदला जाति के मुस्लिम परिवारों की संख्या अधिक थी। इन गांवों पर बहावलपुर और ममदोट के नवाबों का नियंत्रण था।

Guruduara Haripura

 ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कम्पनी ने सबसे पहले यहां एक अंग्रेज अफसर पैट्रिक एलेग्जेंडर वन्स एगन्यू को आर्गेनाइजेशन एजेंसी की देखरेख के लिए नियुक्त किया। वन्स एगेन्यू ने हार्श शू लेक यानि बाधा झील किनारे एक बंगले का निर्माण करवाया। जिस कारण शहर का नाम बंगला पड़ गया। क्षेत्र की सीमा ममदोट, सिरसा, बीकानेर और बहावलपुर तक थी। फिर जिला सिरसा के कैप्टन जे. एच. ऑलिवर को नियुक्त किया गया। यहां नगर को बसाने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 32 एकड़ भूमि केवल 144 रुपए 8 आने में भूमि खरीदी थी। यह भूमि वट्टू जाति के मुखिया फज़ल खां वट्टू से खरीद की गई थी, लेकिन वट्टू की एक शर्त थी कि इस स्थान पर जो नगर बसाएगा, उसका नाम फज़ल खां के नाम से रखा जाए। उसके बाद शहर को फाजिल्का के पुकारा जाने लगा। सन् 1862 में अंग्रजों ने सुल्तानपुरा, पैंचांवाली, खियोवाली, केरूवाला और बनवाला रकबे की 2165 बिघा भूमि ओर खरीद ली। यह भूमि 1301 रुपए में खरीद की गई। 

बाद में, 7 अगस्त 1867 में पंजाब सरकार के नोटिफिकेशन 1034 के तहत फाजिल्का की सीमा तय की गई। फाजिल्का को कभी बाढ़ ने उजाड़ा, तो कभी प्लेग, भूख व गरीबी ने, लेकिन ऊन के व्यापार ने इस नगर को बहुत संभाला। व्यापार की दृष्टि से अंग्रजों के न्योते पर यहां पेड़ीवाल, अरोड़वंश, अग्रवाल और मारवाड़ी समुदाय के लोगों ने यहां व्यापार कार्य आरंभ कर दिया। फाजिल्का एशिया की प्रसिद्ध ऊन मंडी बन गया। ऊन की गांठें यहां तैयार होती और रेलगाड़ी के जरिये, दिल्ली, लाहौर और सिन्ध व कराची तक पहुंचाई जाती। वहां कराची की बन्दरगाहों से यह ऊन यूरोप की मंडियों तक पहुंचाई जाती थी। ऐतिहासिक धरोहर घंटाघर जहां पंजाब विधानसभा की आर्ट गैलरी की शान है, वहीं हिन्दोस्तान का गौरव है। घंटाघर 6 जून 1939 में बनाया गया। गाँव आसफवाला में 80 फुट लंबी और 18 फुट चौड़ी शहीदी स्मारक बनाई गई है। सबसे पुरानी ऐतिहासिक इमारत रघुवर भवन है।

Asafwala Saheed Smark

 इसके अतिरिक्त यहां डेन अस्पताल, ऑलिवर गार्डन, सतलुज दरिया, एशिया के द्वितीय नंबर का टी.वी. टावर, हॉर्स शू लेक, गोल कोठी, प्रताप बाग, सेठ चानण लाल आहूजा पुस्तकालय, बेरीवाला पुल, सरकारी एम. आर. कॉलेज, संस्कृत कॉलेज व अनेक धार्मिक स्थान दर्शनीय हैं। यहां की बनने वाली जूती, मिठाई तोशा, वंगा सुप्रसिद्ध हैं।  27 जुलाई 2011 को फाजिल्का जिला घोषित किया गया।  आज फाजिल्का जिला कहलाता है और लगातार तरक्की की राह पर चल रहा है। (Lachhman Dost -Whats App No. 99140-63937)

                                              History

Starting from the town, prosperity from the market, ruin from division

Now on the flight of the mountains, Rangla, Bangla, Fazilka

The land of Fazilka is blessed with the blessings of the Gurus, the prophets, the Avatars and the martyrs and by their mercy, righteous people live there, who are willing to serve others every moment. Here Shri Guru Nanak Dev Ji and Shaheed-e-Azam S. Bhagat Singh made this earth holy by stepping up. Fazilka, the oldest tehsil of Punjab, which is now just 11 kms from the Indo-Pak International Border, is now the district. This city was settled in 1844. There were 12 villages of the Muslim community on one side of the river, in which there were more Muslim families of Wattu, Chishti and Bodlas. The villages of Bahawalpur and Mammadot were under control of these villages. The East India Company first appointed an English officer Patrick Alexander on Agnew to oversee the organization agency. Once Agnew built a bungalow on the shore of Lake Horse Shoe Lake. Because of which the name of the city fell into a bungalow. The area ranges from Mamdot, Sirsa, Bikaner and Bahawalpur. Then Captain of Sirsa district. J. H. Oliver was appointed. In order to settle down the city, East India Company purchased land for 32 acres of land only 144 rupees 8. This land was purchased from Fazal Khan Wattu, the leader of the Wattu caste, but Wattu had a condition that the town that will be built at this place, it is named after the name of Fazal Khan. After that the city started to be called Fazilka. In 1862, the British bought 2165 Bigha land and purchased Sultanpura, Pancanwali, Khiyawali, Keruvala and Banwala Rakabe. This land was purchased for Rs. 1301. Later, on August 7, 1867, the Punjab government’s notification under the notification 1034 had set a limit of Fazilka. Fazilka was never destroyed by floods, then plague, hunger and poverty, but trade of wool took great care of this city. On the invitation of the British from the point of view of trade, people of Periwal, Aroravansh, Agarwal and Marwari started the business here. Fazilka became Asia’s famous wool market. The bales of wool were prepared here and through trains, Delhi, Lahore and Sindh and Karachi were provided. The wool was transported to Europe’s markets from Karachi’s ports. Historical Heritage Bellpur, where the art gallery of the Punjab Assembly is the pride of India, the pride of India is the same. The bell tower was built on June 6, 1939. An 80-foot-long and 18-foot wide martyrdom monument has been built in village Asafwala. The oldest historical building is the Raghuvar Bhawan. Apart from this, Dane Hospital, Oliver Garden, Sutlej River, Asia’s Second Number TV Tower, Horse Shoe Lake, Gol Kothi, Pratap Bagh, Seth Chanan Lal Ahuja Library, Beriwala Bridge, Government M. R. College, Sanskrit College and many religious places are visible. Here’s the shoe, sweet Toshha, Wanga is well-known. District of Fazilka was declared as 27 July 2011. Today the district is called Fazilka and it is continuing on the road to progress. (Lachhman Dost)

BANGLA

चक्क बेदी के बाद लालोवाली का मेला-कुश्ती में गामा पहलवान-झूमर में बाबा पोखर सिंह की बल्ले बल्ले

Sir Baba Khem Singh ji Bedi

भारत विभाजन से पूर्व चक्क बेदी (अब पाकिस्तान में) भारी मेला हुआ करता था…लोग दूर-दूर से मेले में शामिल होते थे…भारत विभाजन के बाद बेदी परिवार फाजिल्का में आकर बस गया…उन्होंने मेले की मान्यता कम नहीं होने दी…विभाजन के बाद गांव लालोवाली में मेला शुरू हो गया…उन दिनों मेले में कबड्डी और कुश्ती होती थी…बेदी परिवार के कंवर महिन्द्र सिंह बेदी खुद कुश्ती में माहिर थे…

Gama Pehalwan

बात विभाजन के बाद की है, जब इस मेले में सुप्रसिद्ध पहलवान गामा कुश्ती लडऩे के लिए आए…एक तरफ गामा पहलवान तो दूसरी तरफ उनका मुकाबला करने वाले थे गुंगा पहलवान…दोनो की कुश्ती देश-विदेश में प्रसिद्ध थी…साफ है कि उनकी कुश्ती देखने के लिए भारी तादाद में दर्शक पहुंचे थे…कंवर लाजिन्द्र सिंह बेदी मेले की देखरेख कर रहे थे… दोनों में कुश्ती शुरू हो गई…भारी जमावड़े के बीच गामा पहलवान गुंगा पहलवान पर भारी पड़े और उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया…

Baba Pokhar Singh

खेल मुकाबलों के अलावा मेले में झूमर और भंगड़े के मुकाबलों की ख्याति भी दूर तक थी…बात 1967-68 की है…उस समय बाबा पोखर सिंह और जम्मू राम की झूमर की धूम थी…दोनों की टीमों में झूमर का कड़ा मुकाबला हुआ…एक-एक कदम और हाथों की हरकत तक नजर रखी गई…इस बीच यह मुकाबला बाबा पोखर सिंह की टीम ने मुकाबला जीत लिया और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया…

Amarjeet Singh Bedi Brg

      अब बात करते हैं कि यह मेला क्यों लगाया जाता है…इसके पीछे भी एक दमदार तथ्य है…कैप्टन एम.एस.बेदी बताते हैं उनके पड़दादा के पिता बाबा खेम सिंह बेदी ने तीन शादियां की थी…पहली पत्नी की कोख से चार बेटों ने जन्म लिया…मगर उनका निधन हो गया…उसके बाद दूसरी शादी की तो उसमें से कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ। तीसरी शादी की तो दो लडक़े पैदा हुए…इस पर बाबा खेम सिंह जी की दूसरी पत्नी ने कहा कि उनकी कोख से बच्चा नहीं होने के कारण उनका नाम कोई नहीं लेगा…इस पर कैप्टन बेदी के पड़दादा बाबा हरदित्त सिंह ने उन्हें वादा किया कि जब तक वह जिन्दा रहेंगे, उनके नाम को याद रखने के लिए मेला आयोजित किया जाएगा…बाबा हरदित्त सिंह जी का स्वर्गवास हो गया तो उनके सुपुत्र (जलालाबाद के विधायक रहे) कंवर लाजिन्द्र सिंह बेदी की देखरेख में मेला होता रहा…इसके बाद उनके सुपुत्र ब्रिगेडियर अमरजीत सिंह बेदी ने मेले की कमान संभाली… कैप्टन एम.एस. बेदी बताते हैं कि उनकी योजना है कि गांव के ही स्कूल में कुश्ती और कबड्डी आदि के मुकाबले करवाए जाएं ताकि युवा वर्ग का ध्यान नशे की बजाए खेलों की ओर अधिक हो जाए।

Cap. M.S.Bedi

श्री गुरू नानक देव जी के 13वें वंशज के सर बाबा खेम सिंह बेदी सिंह सभा आंदोलन के संस्थापकों में एक थे…उनका जन्म 21 फरवरी 1832 को ऊना में हुआ…ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से उन्हें जहां सर की उपाधि से नवाजा गया था, वहीं 1877 में एक मजिस्ट्रेट और 1878 में मानद मुंसिफ नियुक्त किया गया… 1879 में वह भारतीय साम्राज्य (सीआईई) का साथी बनाया गया और 1893 में वायसराय की विधान परिषद के लिए नामित किया गया…1998 में उन्हें (के.सी.आई.ई.) नाइट की उपाधि से नवाजा गया…फाजिल्का के कैप्टन एम.एस. बेदी बताते हैं कि उस समय लोग शिक्षा की तरफ कम ध्यान देते थे…जिसके चलते सर बाबा खेम सिंह ने करीब 50 स्कूलों में अपना अहम योगदान दिया है…1893 में जब उनकी बेटी की शादी थी तो उन्होंने धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्य के लिए तीन लाख रूपये दान में दिया…इस राशि से रवालपिंडी में एक कॉलेज की स्थापना की गई… इलाके में राय सिक्ख बिरादरी के अनेक लोग बसे हुए थे… वह शिकार करने के शौकीन थे…मगर सर बाबा खेम सिंह ने उन्हें कृषि कार्य के साथ जोड़ दिया…बाबा खेम सिंह राजसी शैली में रहते थे…

Nawab ने कैद कर ली थी Fazilka की यह Singer

बचपन था … मां बाप अल्लाह को प्यारे हो गए … अनाथ हो गई … आवाज मीठी थी … दर्द भरे गीत गाए … युवावस्था में आई … शादी हुई … पति की मौत हो गई … उसके वियोग में गीत … मशहूरी दूर दराज तक … रंग सावला … मगर नवाब बेईमान हो गया … लोगों ने बचाया … फिर विभाजन हो गया … पाकिस्तान चली गई … उसके बाद वो कभी फाजिल्का नहीं लौटी … मगर उसके दर्दभरे गीत … आज भी बुजुर्ग सुनते हैं … नहीं भूल पाए उस कलाकाल को … जो बंगला (फाजिल्का) की रहने वाली थी … आज भी गांवों में चलता है उसका गीत … रोंदी दे नैन चो गए … वो कलाकार … दुक्की (Dukki urf Nisha Kanjri) … जिसे निशा कंजरी के नाम से भी जाना जाता था …

      फाजिल्का के उत्तर की तरफ 16 मील दूर गांव है Bagheki… उसके उत्तर की तरफ Doger Cast और दक्षिण की तरफ गांव प्रभात सिंह वाला उर्फ सुभाज के में Joeus Cast के लोगों का कबीला बसता था… इसके साथ ही गांव है प्रभात सिंह वाला (सुभाजके) … जहां गरीब परिवार के घर 1922 में एक बेटी ने जन्म लिया…जिसका नाम निशा रखा गया … मगर जल्द ही उसके मां-बाप की मौत हो गई … अनाथ बच्ची घरों से रोटी मांग कर अपना गुजारा करने लगी … भगवान ने उसे सुरीली आवाज दी … उसकी शैली … नखरा और अंदाज के साथ-साथ सुंदर नैन-नक्श भी दिए … जब वह घरों से मांगने के लिए जाती तो साथ ही कुछ गुणगुनाने लग जाती … बड़ी हुई तो उसकी आवाज और सुरीली होती गई… लोगों ने उसे दुक्की का नाम दिया … वह इस कदर गायिका बनी कि लोग उसकी आवाज के जादू से कायल हो जाते…उसने आसपास के क्षेत्र में प्रसिद्धी हासिल की, लेकिन एक तो गरीब और दूसरा जंगल जैसे गांव में रहने वाली बिन मां-बाप की बेटी दूर तक नहीं जा पाई… वह नाच-गाकर गुजारा करती … मगर गांव वाले उसे बहुत प्यार करते थे … ग्रामीणों को अपना मां-बाप ही समझती थी … छोटा कद और सांवले रंग की दुक्की के बारे में ग्रामीणों का कहना है कि उसकी शादी उसके चाचा के लडक़े के साथ की गई… अभी शादी को कुछ ही महीने हुए थे कि उसके पति की भी मौत हो गई।

              पहले वह मांबाप के दुख में गाया करती थी तो अब पति के वियोग ने उसे दर्द भरे गीत गाने को मजबूर कर दियाजब उसने गीत गाना तो गीत के साथ उसके नाच को देखकर भी लोग हैरान रह जातेलोग उसे दुक्की या निशा कंजरी के नाम से पुकारते थेउसकी आवाज इस कदर तेज थी कि जब उसका अखाड़ा लगता तो दूर तक जा रहे राहगीर भी रूक जातेबग्घेकी गांव के गुरदित्त सिंह बताते हैं कि वह अधिकतर पीपल या बोहड़ के नीचे गाती थीउनके गांव की चौपाल में पीपल का पेड़ था, जहां वह अक्सर गाया करती थी। उस का कोई गुरू पीर नहीं था, बस भगवान को आंखों में बसाकर गाती थीउसके गीतों की रिकार्डिंग होती थीजो घरघर सुने जाते थे और परिवार में मिल बैठकर सुनने के योग्य थेविवाहशादी पर गांवों में आज भी जब स्पीकर वाले बुक किए जाते हैं तो लोग कहते है कि दुक्की के रिकॉर्ड (तवे) हों तो ले आना, नहीं तो आनावह अपने साथ एक सारंगी वाला और तबले वाला रखती थीकान पर हाथ रखकर जब आवाज बुलन्द करती थी तो लोग मस्त हो जाते … 1945 के आसपास उसके 25 से 30 तक गीत रिकॉर्ड हुए थे। मगर अब तो रिकॉर्ड इतने खराब हो चुके हैं कि उसके गीतों की समझ भी नहीं आती, मगर ग्रामीण समझ लेते हैंरोंदी दे नैन चो गए, यह उसका प्रथम रिकॉर्ड हैदुक्की के रिकॉर्ड दोबारा नए छोटे तवों में 1970 में पाकिस्तान ने आज़ाज किएएक रिकॉर्ड में ही आठ गाने थे जिसका नम्बर है।

              गांव के बुजुर्ग सरदार काला सिंह का कहना है कि मेरा जन्म हुआ तो रीतों पर दुक्की को बुलाया गया थाउस समय दुक्की ने जो गीत सुनाया उसके बोल थेरूता ने फिरीयां, कई वन्जाने ने घुम्मे, घूक  चरखडिय़ां तेरे सांवे ने मुन्नेवह बताते हैं कि  जब गांव में किसी लडक़ी की शादी होती तो वह अखाड़े में मिला पैसा उसकी शादी पर खर्च करती थीएक बार नवाब ने अखाड़ा लगवाया तो इनाम के तौर पर दुक्की ने नवाब से कहा कि वह बग्घेकी उताड़ से हिठाड़ तक सडक़ बनवा देंतब वह सडक़ बनाई गई

          ग्रामीण बताते हैं कि इस गांव से 15 किलोमीटर दूर गांव अटारी के साथ मंडी हीरा है … वहा नवाब ने दुक्की का अखाड़ा लगवाया…जब अखाड़ा खत्म हुआ तो नवाब दुक्की पर बेईमान हो गया और उसे कैद कर लिया … किसी तरह दुक्की ने गांव में संदेश भेजा …जिसमें लिखा था कि मेरे गांव के लोगों, मैं भी तुम्हारी बेटी-बहन हूं… मुझे ले जाओ… गांव में पचांयत हुई और दुक्की को वापस लाने का फैसला लिया गया … गुरदित्त सिंह वड़वाल और सरदार इशर सिंह ने सतलुज दरिया पार किया और जोगी का भेष बनाकर नवाब की हवेली में पहुंच गए… वहां जोगियों की भाषा में उन्होंने दुक्की को बताया कि वह रात के वक्त आएंगे और चौबारे में रस्सा फैंक देंगे…आप नीचे आ जाना। रात हुई और वह इसमें कामयाब हो गए। मगर नवाब को इसका पता चल गया। उसने पीछे बदमाश भेजे मगर तब तक वह दरिया पार करने में कामयाब हो गए… तब दुक्की ने गीत गाया कि जंगली चीज़ा छुट्टिया, फे र कदी नहीं हत्थी आईया, नवांबा तेरी जेल चो, घुड़ के मेरीयां ले चले ने बाहयां। फिर भारत विभाजन हो गया और दुक्की के कहने पर ग्रामीण उसे दरिया पार तक छोड़ आए… विभाजन के बाद दुक्की का कुछ पता नहीं चला…मगर गांवों में उसके गीत आज भी विवाह शादियों में गंूजते हैं। (Thanks- Dr. Vijay Parveen)