“कॉलेज नहीं, दोस्त सिखाते हैं पंगे और दंगे”

Seth Munshi Ram

गर्मी होने के कारण मैं एक पेड़ के नीचे खड़ा था…दसवीं कक्षा के दो विद्यार्थी भी वहां आ गए…एक ने दूसरे से कहा, “शाम को खेलने चलेंगे”…दूसरा बुरझाए चेहरे से बोला, “नहीं यार, मैने टयूशन जाना है… ।”…“थोड़ा लेट चले जाना, यारी के लिए इतना भी नहीं कर सकता”। …“चल ठीक है, आ जाऊंगा”।

तब मुझे वो पंजाबी गीत याद आ गया…जो अकसर ही बोला करते थे…गीत…बड़े चेते आऊंदे ने यार अनमुले…गुनगुनाते हुए मैं कॉलेज के दिनों को याद करने लगा…वो पंगे और दंगे…दोनों…10-12 दोस्त एक साथ रहते थे न…कोई सही काम करने को कहता तो पंगे के बारे में बताता…मगर पढ़ाई से कोई सौदा नहीं…पंगों और दंगों के साथ पढ़ाई भी बराबर…सोच से जब उभरा तो देखा…दोनों विद्यार्थी जा चुके थे…मैं वहां खडा अपने कॉलेज के दिनों को याद कर रहा था…वो कालेज…जिसकी वैल्यू आज पता चल रही है।

    दरअसल यहां उच्चशिक्षा के लिए यहां कोई कॉलेज नहीं था…जिस कारण इलाका शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ गया… फाजिल्का के निकट कोई कॉलेज नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को उच्चशिक्षा के लिए लाहौर तक का सफर तय करना पड़ता था, क्योंकि इलाके के इंसान परोपकारी थे और हैं…इस कारण वह फाजिल्का का भविष्य पहले सोचते हैं…लाला मुशी राम अग्रवाल ने भी यही सोचा था कि इलाके के विद्यार्थियों को उच्चशिक्षा के लिए डिग्री कॉलेज की जरूरत है…इस सोच के आधार पर ही उन्होंने एम.आर.कॉलेज की स्थापना की…मगर दुख इस बात का है कि अभी कॉलेज का निर्माण चल ही रहा था कि कॉलेज के निर्माणकर्ता लाला मुंशी राम अग्रवाल इस दुनिया से सदा के लिए अलविदा हो गए…भले ही वह इस संसार को छोड़ गए, लेकिन आज भी देश भर में उनका नाम जिंदा है…वह परोपकारी थे, लेकिन उनकी जिंदगी की दास्तान बड़ी दर्दभरी रही।

             लाला सुंदर मल बांसल के तीन बेटे थे। लाला राम चंद बांसल और लाला किशन चंद बांसल से छोटे लाला मुंशी राम बांसल (जन्म 1875) का पूरा परिवार ही परोपकारी था…लाला राम चंद बांसल के घर औलाद नहीं थी। जबकि लाला मुंशी राम के घर दो बेटियां मुन्नी देवी और शिव दित्ती के अलावा एक बेटा लेख राज था…मुन्नी देवी की शादी राम नरायन (कोटकपूरा) और शिव दित्ती की शादी इन्द्र सेन (भीखी, जिला बठिंडा) से की गई…जबकि लेख राज अभी 15 साल के ही थे कि वह गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए और उनका निधन हो गया…इस दौरान वह बुरी तरह से टूट गए…

      वह अमीर और परोपकारी थे…इन सेवाओं के चलते उन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से लक्खपति अवॉर्ड से नवाजा गया…इसके बाद उन्होंने मुंशी राम ने लोगों की सेवार्थ के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की…जिसे मुंशी राम चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम दिया गया और उसकी रजिस्ट्रेशन 20 फरवरी 1937 को करवाई गई…इसके संस्थापक मुंशी राम अग्रवाल, प्रधान रायजादा लाला मुकंद लाल आहूजा, लाला नानक चंद अग्रवाल और सचिव एडवोकेट सदा लाल को बनाया गया…1938 में एम.आर.कॉलेज का निर्माण शुरू करवाया गया…इस दौरान 1938 में शहर की सबसे अहम मार्किट ओलिवर गंज के निकट सुंदर आश्रम का निर्माण लाला मुंशी राम अग्रवाल ने अपने पिता सुंदर मल की स्मृति में करवाया…जिसमें एक मंदिर, लाइब्रेरी और रीडिंग रूम बनाया गया…घास मंडी में व्यपारिक फर्म (मै. सुंदर मल राम चंद लक्खपति) करने वाले लाला मुंशी राम की इलाके में कई एकड़ भूमि थी। जो दान की गई…इसमें कॉलेज और गोशाला को दान की गई भूमि भी शामिल है।

अभी कॉलेज का निर्माण ही हो रहा था कि लाल मुंशी राम अग्रवाल का निधन हो गया…इसके बाद फिरोजपुर जिले के डीसी एम.आर.सचदेव ने 4 जुलाई 1940 को कॉलेज की नींव रखी…इस मौके पर फाजिल्का के एसडीओ राय साहेब लाला विद्याधर ने भी शिरकत की…जबकि 27 जनवरी 1941 के दिन जालंधर डवीजन के कमिश्नर ए.एल. रूद्गष्द्ध क्च.क्च. ने किया…इस दौरान बी.एल. कपूर को प्रथम प्रिंसिपल बनने का सम्मान प्राप्त हुआ…कॉलेज पंजाब के मालवा क्षेत्र के पिछड़े विद्यार्थियों को शिक्षा देने में कामयाब रहा…कॉलेज में 1949 में को-एजूकेशन शुरू की गई…1951 में नॉन मेडिकल शुरू किया गया…1957 में कॉलेज को पंजाब यूनिवर्सिटी से मान्यता दी गई…1963 में हिन्दी ऑनर्स, 1966 मेडिकल और प्री मेडिकल, 1968 में बीएससी (बॉटनी और जूलॉजी), 1969-70 में अंग्रेजी ऑनर्स व इतिहास ऑनर्स की शुरूआत की गई…इस दौरान कॉलेज पूरे चरम पर था…उसके बाद वित्तीय संकट पैदा हो गया…जिस कारण कॉलेज 30 जून 1983 को सरकार ने टेकओवर कर लिया…इसके बाद 1987-88 में संख्या बढ़ी तो छह कमरों का निर्माण किया गया…1992 में स्टाफ क्वार्टर बनाए…1993 में कामर्स की कक्षाएं शुरू की गई। करीब तीस एकड़ के विशाल प्रांगण में फैले इस कॉलेज ने देश को राजनेता, शिक्षक और अनेक अधिकारी दिये हैं… इसलिए अच्छे दोस्त बनाओ…जो पंगे और दंगे से दूर रहेगा…वही अच्छा इंसान बनेगा…वरना लोग तो दुनिया में बहुत हैं…

शहजादी के छल से खफा पीरों ने नष्ट कर दी Aabu Nagri Abohar

जिला फाजिल्का के शहर अबोहर में आभा नगरी है…काफी मशहूर है…वहां पांच पीरों की मजार है…जहां सावन की 15 तारीख (30 जुलाई) को मेला है…काफी मान्यता है…लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं…शीश निवाते हैं…मजार काफी प्राचीन है…जितनी प्राचीन है…उतनी ही दिलचस्प…बहुत दिलचस्प…

    एक समय थाजब यहां बहुत बड़ा टीला हुआ करता थाआजकल थेह के नाम से पुकारते हैंबताते हंै कि यहां राजा आबू चंदानी का महल था।(जिसके नाम पर आबू नगरी पुकारते हैं) सूर्यवंशी राजा आबा चंदनी के बाद राजा हरीचंद ने राजपाठ संभालाराजा हरीचंद की एक ही बेटी ही थीबताते हैं कि अंत समय में राजा को कुष्ठ रोग हो गयाशाही इलाज करवाया गयामगर इलाज से कोई फर्क नहीं पड़ा।

        उधर मुलतान (अब पाकिस्तान में) पांच पीरों दाता बख्श, शेख बाबा फरीद शकरगंज, बाहा उद्दीन जकारिया, लाल शहबाज कलंदर, सैय्यद जलालुद्दीन भूखड़ी की काफी मान्यता थी और उनके पास घोड़े थे…शहजादी को पता चला कि पीरों के घोड़ों के खून से राजा की बीमारी का इलाज हो सकता है…शहजादी सूरतगढ़ के ठाकुर की मदद से पांच पीरों के पास पहुंच गई…बात बताई…पीरों को घोड़े बहुत प्यारे थे…..तब उसने कोई छल किया और उनके घोड़े यहां ले आई…राजा की बीमारी ठीक हो गई…समय बीतता गया…राजा की मौत हो गई…ठाकुर शहजादी से विवाह करके आबू नगरी में रहने लगा।

        पांच पीरों को घोड़ों से प्यार था और उन्होंने संदेश भिजवाया कि घोड़े लौटा दोमगर शाहजादी ठाकुर नहीं मानेतब पांच पीरों ने वहां से चलने की तैयारी कर लीपांच पीरों ने अपनी पत्नियों को नसीहत दी कि वह उनके पीछे आएंपीर आबु नगरी पहुंच गए और टीले पर डेरा डाल लियासमय बीतता गयापीर वापिस मुलतान नहीं लौटेतब उनकी पत्नियों को चिंता हुईवह उन्हें ढूंढने के लिए निकल पड़ीनसीहत को भूल गईमुलतान से चलती हुई आबु नगरी पहुंच गईपांच पीरों ने जब अपनी पत्नियों को देखा तो वह गुस्से में गएउन्होंने श्राप दिया और उन्हें वहीं भस्म कर दिया।

वहीं शहजादी की जिद थी कि वह घोड़े नहीं लौटाएगी…पीरों को गुस्सा आ गया और उन्होंने आबू नगरी को नष्ट होने का श्राप दे दिया…मगर उस श्राप का कोई असर न हुआ…फिर पांच पीरों को अपनी दिव्य दृष्टि से पता चला कि उनका मामा अलीबख्श अपनी अदृश्य शक्ति से आबू नगरी को बचा रहा है…इस पर पीरों ने अपने मामा को धिक्कारा तो वह नगर छोडक़र चला गया…उसके जाते ही आबू नगरी राख हो गई…महल व घर खंडहर बन गए(ब्यौरा विभिन्न समाचार पत्रों व् अन्य स्थानों से लिया गया है )

North India के अनुपम शहर के नाम पर Steam Ship Fazilka

भले ही आज यह शहर देश की अंतिम छोर पर बसा हुआ है…मगर इसका नाम पहले भी दुनिया में शुमार रहा है…चाहे आज की बात हो या भारत विभाजन से पहले ही…आपने गोल्डन ट्रैक का नाम तो सुना होगा…जो ऐशिया में प्रसिद्ध था और फाजिल्का की आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी था…अगर गोल्डन ट्रैक प्रसिद्ध था तो यहां फाजिल्का के नाम पर एक स्टीम शिप भी मशहूर रही है…ऐसी स्टीम शिप, जो फाजिल्का से फिजी तक चलती थी…रिकॉर्ड यह भी है…कि इसे सागर में ही ठीक किया गया था…आज इस बारे में बात करते हैं।

बात बीसवीं सदी के आगाज की है, जब बोयर युद्ध शुरू हो चुका था…इस भयंकर युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की जरूरत थी…साऊथ अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की कमीं थी…ब्रिटिश साम्राज्य के सिखलाई प्राप्त सैनिक भारत में थे…उन्होंने भारत से सैनिक मंगवाये…जिन्हें एक विशाल और मजबूत स्टीम शिप में सवारकर साऊथ अफ्रीका पहुंचाया गया…उस शिप का नाम नार्थ इंडिया के अनुपम शहर फाजिल्का के नाम पर रखा गया था…स्टीम शिप का नाम था स्टीम शिप फाजिल्का…उस शिप में ब्रिटिश सैनिकों की टोलियों को साऊथ अफ्रीका पहुंचाया गया था…शिप में सवार सैनिकों को 30 जनवरी 1900 के दिन पोर्ट नेटल नामक जगह पर छोड़ दिया गया…शिप को भारत वापस लेकर आने की तैयारी की जा रही थी कि चार दिन बाद मॉजेम्बिक सागर पार करते समय शिप की दो स्थानों पर पिछली शॉफ्ट टूट गई…

फाजिल्का स्टीम शिप में ऐसी खराबी आई कि उसके प्रथम भाग ने भी कार्य करना बंद कर दिया…शिप में सवार कारीगरों ने इसे रस्सी से बांधकर चलाया…उन्हें आशा थी कि शिप चलकर भारत पहुंच जाएगी…मगर रस्सी से बांधनेे के बाद शिप की गति धीमी हो गई…शिप को ठीक करने के लिए सूझवान इंजीनियरों को बुलाया गया…उन्होंने मिस्टर ब्राऊन के नेतृत्व में फाजिल्का स्टीम शिप शाफ्ट को रिपेयर करने का कार्य युद्ध स्तर पर आरंभ कर दिया…मगर उसे ठीक करने में कामयाबी नहीं मिली…इंजीनियरों ने फिर फैसला लिया कि शिप में हाई प्रैशर इंजन डाला जाये और इसे कलम्प से अच्छी तरह से जोड़ दिया जाए…शिप की शॉफ्ट को काबू करने में हाई प्रैशर इंजन असरदार रहा। फिर शिप के पिछले भाग को थामसन कप्लिंग से जोडऩे का कार्य शुरू हुआ…उसमें कोलम्बो में तैयार किया गया लो-प्रैशर इंजन लगाया गया…इस इंजन में खासियत थी कि लो-प्रैशर इंजन की स्पीड 9 कनॉटस की थी…फाजिल्का स्टीम शिप संसार की पहली ऐसी शिप थी…जिसे सागर में ही रिपेयर किया गया…शिप को ठीक करने वाला इंजीनियर जॉहन मैक्डोनॉल्ड संसार का चौथा ऐसा इंजीनियर बन गया, जिसने बर्बाद हुए जहाज को दोबारा जीवित किया…शिप को ठीक करने वाले इस इंजीनीयर की चर्चा हुई और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया। उसे 31 अक्तूबर 1919 को नीकोबार आईलैंड पर सम्मान से नवाजा गया।

फाजिल्का स्टीम शिप को पेनांग से कलकत्ता की समुद्री यात्रा के लिये यात्रियों को भी प्रयोग किया गया…फाजिल्का स्टीम शिप को 31 अक्तूबर 1904 के दिन लंदन से ब्रिसबेन ले जाने के लिये भी प्रयोग किया गया…फाजिल्का के नाम से बनी इस शिप को विलियम डॉक्स फोर्ड एंड सन्ज द्वारा 1890 में ब्रिटिस इंडिया नेवीगेशन कम्पनी (बी.आई.एस.एन.) के लिये इजाज किया था…जिसका भार 4152 टन था…शिप की चौड़ाई 48.2 फुट, लंबाई 366 फुट और ऊंचाई 26.5 फुट थी…ट्रिपल एक्सपेंशन वाली फाजिल्का स्टीम शिप की स्पीड 12.5 कनोटस थी…फाजिल्का स्टीम शिप से यत्रियों को फिजी तक लेजाया गया…शिप ने छह बार 4972 यात्रियों को फिजी देश तक पहुंचाया…पहली बार शिप 28 मार्च 1901 को शिप 804 यात्रि लेकर आई…दूसरी बार 18 जून 1901 को 776, तीसरी बार 20 जून 1902 को 840, चौथी बार 17 अप्रैल 1906 को 881, पांचवी बार 28 जनवरी 1907 को शिप में 875 यात्रि सवार हुउ तो अंतिम बार 25 अप्रैल 1907 को शिप भारत पहुंची…जिसमें कुल 796 यात्री सवार थे…इस शिप से फाजिल्का का नाम दुनिया में प्रसिद्ध हुआ।

न समेटते तो आज कस्बा होता, टूटा हुआ…बिखरा हुआ

फाजिल्का को जिला बनाने के लिए एकदम आवाज नहीं उठीजो हजूम खड़ा हुआ था वो उसी समय नहीं हुआकई कारण थेलोगों ने फाजिल्का को कटते हुए देखा थाटुकड़ों को देखा थाउन्हें समेटना जरूरी हो गया थाअच्छा कियासमेटा गयावरणा आज यह एक कस्बा होताबिखरा हुआटूटा हुआ

         बात वर्ष 1885 की है, जब फाजिल्का की उत्तर की तरफ ममदोट, दक्षिण की तरफ बीकानेर, पूर्व की तरफ सिरसा और पश्चिम की तरफ बहावलपुर की सरहद थीफाजिल्का को पहली बार 10 दिसंबर 1885 में सिरसा से काट कर फिरोजपुर जिले से मिलाया गया और इसकी सीमा कम होनी शुरू हो गईभारत विभाजन हुआ तो कुछ हिस्सा पाकिस्तान में चला गयाफिर कुछ हिस्सा राजस्थान और हरियाणा में मिला दिया गयापंजाब में जब जिला बनने का सिलसिला शुरू हुआ तो 7 अगस्त 1972 में मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने फरीदकोट को पंजाब का जिला घोषित कर दिया और फाजिल्का के कई गांव फरीदकोट से जोड़ दिए गए…1986 में अबोहर सब डवीजन बनी तो फाजिल्का के कुछ गांव उसके साथ जुड़ गए। जलालाबाद और अरनीवाला फाजिल्का तहसील से तोड़ दिए गएफिर बन गया त्रिभुज आकार का फाजिल्कायानि फाजिल्का बिखरता गया

      फिर शुरू हुआ इसे समेटने का सिलसिलासबसे पहले 1992 में 45 दिन के आंदोलन के जरिए इसे समेटने का प्रयास असफल रहाएक जुलाई 2004 से 31 दिसंबर 2004 तक जिला बनाओ संघर्ष समिति का आंदोलन चलानाकाम रहेएक जुलाई 2006 को शहीदों की समाधि आसफवाला से फिर जिले की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआकरीब 35 हजार लोगों के हस्ताक्षर भी हुए, लेकिन असफलता के अलावा कुछ नहीं मिलाइसके पीछे एक कारण यह था कि आंदोलन वकीलों की ओर से शुरू किया जाता थाजिसमें समाजसेवी संस्थाओं के अलावा आमजन का सहयोग कम था। आमजन का सहयोग हासिल करने के लिए फिर अगस्त 2010 में सांझा मोर्चा बनाया गयाजिसकी अगुवाई के लिए पार्षद कंचन शर्मा, फाजिल्का के प्रथम विधायक चौ. वधावा राम के सुपुत्र कामरेड शक्ति, शिक्षाविद् राज किशोर कालड़ा, बलजिन्द्र सिंह बराड़, व्यापार मंडल के महा सचिव सतीश धींगड़ा, एडवोकेट यशवंत पुरी, एडवोकेट सुखजीत सिंह राए को शामिल किया गयाइसका प्रधान एडवोकेट सुशील गुंबर को बनाया गया

   पहले बार एसोसिएशन की ओर से काले बिल्ले लगाकर आंदोलन की शुरूआत की गईबाद में 14 अगस्त को शहर में एक रैली निकालकर जिला बनाने की मांग की गईइसके बाद रैलियों का सिलसिला शुरू हो गयाजिसमें हरेक सियासी पार्टियों ने सहयोग दियाफिर शुरू हुआ धरने और भूख हड़ताल का दौरघंटा घर चौक में भूख हड़ताल शुरू हो गईरोजाना लोग धरने पर बैठतेइससे सरकार में कुछ हिलजुल हुई, लेकिन सरकार कांपी नहीं

    जब फाजिल्का के विधायक सुरजीत कुमार ज्याणी ने घोषणा की कि अगर फाजिल्का जिला घोषित नहीं किया गया तो वह मरणव्रत पर बैठ जाएंगेतब सियासत में एक भूचाल सा गयासरकार में हिलजुल हुईक्योंकि सुरजीत कुमार ज्याणी ने जिला बनाने की मांग को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ मरणव्रत की घोषणा की थीपहले सरकार ने भी इसे हलके से लिया, लेकिन 5 जनवरी 2011 के दिन जब सुरजीत ज्याणी लाव लश्कर के साथ मरणव्रत पर बैठने के लिए चौक घंटा घर पर पहुंचे तो इलाके के लोगों को हजूम उनके साथ खड़ा हो गयाउनके साथ अकाली दल बादल के सर्कल अध्यक्ष जत्थेदार चरण सिंह भी मरणव्रत पर बैठ गएइससे पहले हवन यज्ञ किया गयाइसके बाद 6 जनवरी को नगर सुधार ट्रस्ट के चेयरमैन महिन्द्र प्रताप धींगड़ा भी मरणव्रत पर बैठ गएव्यापार मंडल के प्रधान अशोक गुलब्द्धर के आह्वान पर फाजिल्का बंद कर दिया गयाबाजारों में सन्नाटाअगर कोई आवाज थी तो वह सिर्फ फाजिल्का को जिला बनाने की मांग थी

    सरकार थर्रथरा गई और सरकार की ओर से सुरजीत ज्याणी को मनाने के लिए दूत के रूप में वनमंत्री तीक्षण सूद को 7 जनवरी की सांय भेजा गया…8 जनवरी को वनमंत्री ने वादा किया कि फाजिल्का को जिला बना दिया जाएगाजिस पर आंदोलन शांत कर दिया गया

 फिर दिन आया 27 जुलाई का …जब फाजिल्का को पंजाब का 22वां जिला घोषित कर दिया गया…आज ही के दिन यानि 27 जुलाई 2011 को पंजाब सरकार ने गज़ट नोटिफिकेशन नंबर 1/1/2011-आरई- ढ्ढढ्ढ(ढ्ढ) /14554 के तहत फाजिल्का को घोषित होने के बाद सडक़ों पर खुशी का माहौल रहा… फाजिल्का जिले में सब डवीजन फाजिल्का, जलालाबाद और अबोहर व सब तहसील अरनीवाला शेख सुभाण, सीतो गुनो और खुईयां सरवर के अलावा गांव 314 (रेवन्यू) को मिलाकर एक सुंदर जिला बना दिया गया…

देश का भला नहीं कर सकता वो…?

बचपन में कहानी पढ़ी थीकिसान और उसके चार पुत्रजो आपस में लड़ते झगड़ते रहते थेजिस कारण उन्हें नुकसान हो रहा थाउनके किसान पिता ने बुलायाएक लडक़ी तोडऩे को दीजो उन्होंने बारी बारी आसानी से तोड़ दीलकडिय़ों का गठ्ठा दिया तो उनसे टूट नहीं पायायही शिक्षा थीजो फाजिल्का को जिला बनवाने की मांग को लेकर फाजिल्का वासियों ने प्रयोग की। गौर करें

         कल यानि 27 जुलाई को Distt. Fazilka की सालगिरह है…आप यह भी जानते हैं कि Fazilka को जिला बनाने के लिए कितना लंबा संघर्ष चला…जिले की मांग पहले भी पूरी हो सकती थी, लेकिन नहीं हुई…उसके पीछे फाजिल्का वासियों की आपसी फूट थी…सियासी श्रेय…या फिर यूं समझ लें कि सियासत की Fazilka के प्रति फूट…कुछ भी हो फूट तो फूट है…

           भारत विभाजन से पहले भी कई बार कई मुद्दों को लेकर आंदोलन हो चुके हैंमगर उनमें अधिकांश आंदोलन नाकाम रहे हैंएक आंदोलन यहां बुचडख़ाने को लेकर भी हुआ थामगर नाकाम रहाकारण वही आपसी फूटक्योंकि यहां मुसलमानों की संख्या अधिक थीइनमें अनेक मुसलमानों ने बूचडख़ाने खोल रखे थेमगर हिन्दु और सिख भाईचारा इसके खिलाफ थाबात 1928 की है, जब हिन्दुसिक्ख समुदाय ने मिलकर इसकी खिलाफत करते हुए आंदोलन शुरू कर दियायह आंदोलन 21 दिन तक चला।

          आंदोलन नाकाम न हो, इसलिए सभी का सहयोग जरूरी था…इसके लिए हिन्दु परिवारों का फाजिल्का में अधिवेशन बुलाया गया…यह अधिवेशन Fazilka की बड़ी धर्मशाला में हुआ था…बड़ी धर्मशाल…जानते हैं आप…यह धर्मशाला Clock Tower के निकट जहां गीता भवन मंदिर है…वहां थी…उस अधिवेशन में प्रस्ताव दिया गया कि अगर मुसलमान बूचडख़ाने बंद नहीं करते तो उनका असहयोग कर दिया जाए…यानी हुक्का पानी सब बंद…इस प्रस्ताव पर काफी देर तक बहस होती रही, लेकिन प्रस्ताव पास नहीं हुआ तो 22वें दिन आंदोलन बंद कर दिया गया…आंदोलन नाकाम रहा…सिर्फ आपसी फूट के कारण…

एक्ट की खिलाफत

            एक आंदोलन तब शुरू हुआ, जब व्यापारियों से पैसा वसूलने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य में मार्किटिंग बिल एवं बिक्री टैक्स एक्ट शुरू शुरू किया था…व्यापारी वर्ग को यह मंजूर नहीं था…जिस कारण पंजाब में आंदोलन शुरू हो गया…इसके तहत फाजिल्का में भी आंदोलन हुआ…जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख जातियों के व्यापारी सम्मलित थे…इस आंदोलन की अगुवाई सेठ चानन लाल कर रहे थे…इस दौरान Fazilka बंद रखा गया…(जैसे फाजिल्का जिला बनाने की मांग को लेकर किया गया) जो ऐतिहासिक रहा…फिर क्या हुआ…वही फूट…व्यापारियों की आपसी फूट शुरू हो गई…कुछ दिन बाद ही कुछ लोग अंग्रेजो के साथ हो लिए…जिससे खफा सेठ चानन लाल आहूजा ने प्रधान पद से इस्तीफा दे दिया…जो 5 जुलाई 1941 को फाजिल्का से प्रकाशित समाचार पत्र निशात में प्रकाशित किया गया था…

            आज की पीढ़ी कुछ समझदार हो चुकी है…वह जानती है…किसान और उसके बेटे की कहानी…वो इस कहानी को रिपीट करना नहीं चाहती…करनी भी नहीं चाहिए…जो इस कहानी से शिक्षा नहीं ले रहे…वह न तो अपने घर का भला कर सकते हैं…न शहर…प्रदेश और देश का।

OMG ! यह इंसान हैं या अजूबे

भारत के अंतिम शहर फाजिल्का में कई अजीबो-गरीब मामले सामने आए हैं…जिन्हें सुनकर हैरानी होती है…जमीन पर कूआं मिलना तो हैरानी भरा है ही (जिसे आप ने 29 जून को पढ़ा)…इससे भी अधिक कई अजूबे सामने आए हैं…जिन्हें सुनकर मुंह से निकल ही जाता है ओ माय गॉड…यह मामले ऐसे हैं जिन्हें देखकर डॉक्टर भी हैरान हैं…दरअसल मामले यह हैं कि यहां किसी के पेट से सिक्के व लोहे की कीलें निकली तो किसी के पेट से बालों का गुच्छा…यह दोनों मामले फाजिल्का के हैं।

First case

मामला अप्रैल 2015 का है…जब पेट की तकलीफ बढऩे के कारण फाजिल्का निवासी राजपाल को उसके परिजनों ने कई शहरों में चैकअप करवाया, लेकिन उसे कोई फायदा नहीं हुआ। फिर वह जिला बठिंडा के एक आर गगन गेस्ट्रो केयर में गए, जहां डॉक्टर गगनदीप गोयल ने राजपाल के पेट से इंडोस्कॉपी करके तकरीबन 40 विभिन्न तरह के सिक्के और लोहे की 10 कीलें निकाली। वह करीब तीन साल से सिक्के व कीलें निगल रहा था। जिन्हें डॉ. गगनदीप गोयल, डॉ. जॉन पाल, डॉ. गुरसेवक सिंह व दिल्ली हार्ट के डॉ. अजेश ने बाहर निकाला।

2nd case

यह मामला इस साल अप्रैल माह का है…जब डॉक्टर 13 साल की एक बच्ची के पेट से 2 किलो के बालों का गुच्छा निकाला…बच्ची किरण रानी यहां के एक सरहदी गांव की है…जिसके पेट में तकरीबन तीन साल से दर्द था…उसके परिजनों ने कई नामवर डॉक्टरों को दिखाया…चैकअप करवाया…इलाज करवाया…मगर कोई फायदा नहीं हुआ…आखिल फाजिल्का के अमृत अस्पताल के सर्जन डा. एम.एम. सिंह ने एक घंटे के ऑपरेशन के बाद उस बच्ची के पेट से बालों का गुच्छा निकाला।

दरिया…उम्र या धरती ने निगल लिए कच्चे किले !!!

दरिया अगर उफान पर हो तो तबाही मचा देता हैअगर शांत हो तो जीवन बना देता हैइन दिनों जैसे घग्गर दरिया ने तबाही मचाई हुई हैबंगले का इलाका भी दरिया किनारे बसा हुआ हैसतलुज दरियाजिसने इस इलाके को जीवनदान दिया हैसाथ ही तबाही का मंजर भी बिखेरा…1908 में सतलुज में बाढ़ आई तो शहर पानी में घिर गयाडाक बंगला, रेलवे स्टेशन, पुलिस थाना सहित कई इमारतें इसकी चपेट में आईइसके अलावा ब्रिटिश मुगलकालीन कलाकृति से बनी भव्य इमारतें और किले भी मिट्टी का ढर्रा बन गएवो ढर्रा जो आज तक कच्चे किले का दोबारा रूप धारन नहीं कर सका।

          उस समय यहां किलों की कोई कम पहचान नही थी…किले पर चित्रकारी…ऊंचे गुंबद…खुला आंगन…बीच में पानी का कुआं और किले की शोभा को चार चांद लगाती फुलवाड़ी…मदमस्त मौसम सावन में जब राष्ट्रीय पक्षी मोर अपना मनमोहक नाच दिखाता तो किला धरती पर जन्नत का अनुठा नजारा बन जाता…किले के मुख्य द्वार पर उर्दू या हिन्दी में लिखे हर्फ अपनत्व दिखाते थे…ऐसा प्रतीत होता था शायद यही BANGLA हैं…Train जब फजिल्का जंक्शन पर रुकती तो दोनों ओर किले देखकर अनपढ़ भी अंदाजा लगा लेता था कि वह बंगला के रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया है यानि कच्चे किले खुद ही बता देते थे कि इस पवित्र धरती का नाम बंगला है…ग्रामीण इलाके में तो आज भी कई किले मौजूद हैं, लेकिन फाजिल्का शहर के किले को तो भारत विभाजन ने निगल लिया या फिर बूढ़े हो चुके किले खंडहर बनने के बाद अपना नामोनिशान तक खो बैठे…

Satluj River

       अगर उनकी संभाल होती तो शायद आज वे पर्यटन स्थल होते, लेकिन सरकार के साथसाथ किसी ने भी उन्हें संभालने का प्रयास नही कियासंभाले भी तो कैसे? अगर कोई कोशिश करता तो सतलुज दरिया की बाढ़ उन्हें अपनी चपेट में ले लेतीअगर कुछ बचा तो आयु किसी को नही बख्शतीबंगले की इमारत ही इनकी भेंट नही चढ़ी, बल्कि रेलवे स्टेशन के सामने (जहां बी.डी.पी. कार्यालय है)अंग्रेजों की ओर से बनाया गया कच्चा किला भी बिखर गयाइसके साथ ही बिखर गये पर्यटन स्थल बनाने के सपनेआई.आई.टी रूडक़ी के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. भूपेन्द्र ङ्क्षसह ने अपनी पुस्तक फाजिल्का दा टाऊन ऑफ लन्र्ड पीपल ने इस बात का खुलासा किया है कि रेलवे स्टेशन के पास कच्चा किला थाजहां अंग्रेजों के सैनिक ठहरते थे

      बड़े सुन्दर और प्यारे ढंग से बनाये गए इस किले की इमारत तो कच्ची थी, लेकिन चीनी मिट्टी से बनी मोटी दीवारों पर प्लस्टर किया गया थाजो गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्मी का अहसास करातीगर्मी के दिनों में खुले रोशनदानों से आने वाली हवा इंसान को ठंडाठंडा होने का अहसास कराती थीजब अंग्रेजों के सैनिक रेल गाड़ी से उतरते तो किले में रात बिताते, लेकिन अफसोस है कि फाजिल्का की शान रहे किले याद तक नही रह गई, जो यहां कभी कच्चे किला होने का अहसास कराएसमय के साथसाथ सब कुछ बदल गयायहां कुछ रहा है तो वे हैं भूली बिसरी यादें….सिर्फ यादें।

       वहीं Satluj River के पार 13 गांव व ढ़ाणियां हैं…सरकार ने दरिया के इस तरफ तो मजबूत बांध बना दिया, लेकिन दूसरी तरफ मजबूत बांध नहीं है…दरिया का जलस्तर बढ़ता है तो वह गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं…भले ही आज वो दरिया नहीं रहा…मगर दरिया की बाढ़ से मची तबाही तो तबाही है…वो न तो इंसान और फसल देखती है और न ही किला…

कटती रही सोने की चिडिय़ा…फडफ़ड़ाती हुई उड़ गई

Indo Pak Border

सोने की चिडिय़ा…अगर पिंजरे में कैद होती तो आज आजाद हो जाती…मगर मुझे काटा गया…कभी कहीं से तो कभी कहीं से…टुकड़े टुकड़े हो गए…कोई टुकड़ा कहीं तो कोई टुकड़ा कहीं जोड़ा गया…सियासत की कैंची से कटती रही…वर्ना…एक समय था, जब मैं सिरसा जिला की तहसील थी…मेरे एक तरफ बीकानेर तो दूसरी तरफ ममदोट की सीमा थी…तीसरी तरफ पाकपटन और देपालपुर की सीमा थी…अब सिर्फ फाजिल्का रह गया हूं।

           वो फाजिल्का, जो 1800 के आसपास बहावलपुर में था…ममदोट और बोदला परगना मुझ में समाया हुआ था…1884 में जिला सिरसा था…तोडक़र फिरोजपुर के साथ जोड़ा गया…विधान सभा सीट (फाजिल्का मुहम्मदन) भी काफी लंबी चौड़ी थी…अबोहर भी इसी का हिस्सा था…ममदोट भी…

            कहर…कहर तो तब टूटा…जब देश का बटवारा हो गया…बटवारा क्या हुआ…फाजिल्का का काफी हिस्सा पाकिस्तान में चला गया…सीमा पाकिस्तान के साथ लग गई…विवाद…तनाव…हमेशा रहता है सरहद पर…उधर सिरसा हरियाणा में चला गया तो इधर राजस्थान भी बन गया…एक सीमा जलालाबाद तक रह गई…दूसरी सीमा अबोहर तक…बीच में रह गया एक टुकड़ा…फाजिल्का…वो टुकड़ा…जहां कभी गोल्डन ट्रैक था…अब कहां से आए कराची तक का ट्रैक…यहां का माल कराची की बंदरगाह तक कैसे जाए…असंभव…हां…सियासत चाहे तो शायद कुछ हो सकता है…वो भी दोनों देशों की सियासत।

           सोचते थे…विभाजन के बाद शायद विशाल फाजिल्का बन जाए…मगर हुआ क्या ? वो टुकड़ा भी बिखरने लगा…किसी ने नहीं समेटा…लोकसभा सीट थी फाजिल्का…वो भी गई…(पूरा ब्योरा लिखा जाएगा अन्य ब्लॉग में) विधान सभा सीट भी सीमट गई…फरीदकोट जिला बना तो फाजिल्का का एक हिस्सा काटकर फरीदकोट के साथ जोड़ दिया गया।

          शुक्र है कि लोग जागे…जागे और इसके टुकड़े न करने की मांग होती शुरू हो गई…फिर शुरू हुई मांग…वो मांग जो असंभव सी लगती थी…मगर यहां के लोग…जो रंगले बंगले फाजिल्का को प्यार करते हैं…बीड़ा उठाया…मांग उठी…जिला बनाओ…मांग तेज हुई…धरना, प्रदर्शन, रैलियां, रेल रोको, अधिकारियों व सियासत पर पूरा दवाब…बंद…मरणव्रत…फिर एक दिन हो गई घोषणा…कि…फाजिल्का पंजाब का 22वां जिला घोषित…इस खुशी के माहौल में यह जरूर हो गया कि अब इसके टुकड़े नहीं होंगे…सोने की चिडिय़ा न बन पाए तो गम नहीं…मगर जो है वो तो यहां रहेगा…कहीं और तो नहीं जाएगा।

खतरनाक बीमारी से सैंकड़ों लोगों की मौत !!!

पंजाब में 40 साल तक शासन करने वाले महाराजा रणजीत सिंह की बचपन में चेचक की बीमारी के कारण एक आंख की रोशनी चली गई थी…19वीं सदी में इस बीमारी का काफी प्रकोप रहा है…क्योंकि यह रोग अत्यंत संक्रामक है…जब तब रोग की महामारी फैला करती थी…कोई भी जाति और आयु इससे नहीं बची थी…टीके के आविष्कार से पूर्व इस रोग से बहुत अधिक मृत्यु होती रही है…फाजिल्का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा…गांवों में इस बीमारी का काफ ी प्रकोप रहा है…गांव कबूल शाह हिठाड़, आसफवाला, चूहड़ी वाला, खानपुर, जोडक़ी, चिमने वाला आदि गांव इससे प्रभावित थे…सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई…तब भटियाणा (Sirsa) के D.C. थे J.H. Oliver…उन्होंने इस बीमारी पर काबू पाने के लिए दस रूपये सैलरी के हिसाब से व्यक्ति तैनात किए थे…जो इलाज करते थे…गांव में आलिवर की देखरेख में कैंप लगाए गए…पीडि़तों को टीके लगाए गए…उस समय कैंपों में फाजिल्का के लोगों ने काफी सहयोग दिया था…

         बात हो रही है ब्रिटिश अधिकारी जे.एच.ओलिवर के बारे में …जिन द्वारा फाजिल्का के विकास में योगदान को भुलाया नहीं जा सकता…उन्होंने फाजिल्का के बीचोबीच ओलिवर गंज मार्केट (मेहरीयां बाजार) का निर्माण करवाया था…जब वह जिला सिरसा में कस्टम विभाग के अधिकारी थे तो उस समय वह पहली बार फाजिल्का आए थे…1844 में …जब बंगले का निर्माण हो रहा था…हिस्टरी ऑफ सिरसा टाऊन में लेखक जुगल किशोर गुप्ता ने ओलिवर के अनुसार लिखा है कि उस वक्त फाजिल्का इलाका सुरक्षित नहीं था…यहां से गुजरना खतरे से खाली नहीं था…चोर, डाकू, शेर, सांप जैसे जंगली जानवरों का खौफ था…मलोट रोड और फिरोजपुर रोड पर लोग टोलियां बनाकर गुजरते थे…फिर वह जिला भटियाणा (अब सिरसा) के सहायक अधिक्षक बने तो उन्हें मुलतान में तैनात किया गया। इसके बाद उन्हें 1846 में फाजिल्का में तैनात कर दिया गया…तब Fazilka, Arniwala, Abohar में पुलिस पोस्ट खाली थी…अरनीवाला-जोधका में ही एक कस्टम पोस्ट थी।

Mr. Basant Garg

           इलाके में ओलिवर एक प्रभावशाली अधिकारी के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे…उन्होंने इस शहर को बुलंदियों तक पहुंचाया और लोग उन्हें इलाके का शेर के नाम से पुकारने लगे(ब्योरा आगे लिखे जाने वाले ब्लॉगस में दिया जाएगा) …फाजिल्का तहसील का पहली बार स्थायी बंदोबस्त करने का श्रेय भी ओलिवर को जाता है…उन्होंने सिरसा जिला के लिए फाजिल्का तहसील को चार परगनों में बांटा सेटलमेंट आफिसर ओलिवर की ओर से स्थायी बंदोबस्त 1857-63 में किया गया, जो 1883 तक चलता रहा। इस बीच ओलिवर डीसी बन गए और साथ ही उन्हें मैरिज रजिस्ट्रार का चार्ज भी दिया गया।…ओलिवर के पास जिले का चार्ज 1858-68 तक रहा। उन्हें 1500 रूपये प्रति माह वेतन दिया जाता था।

Mr. Manpreet Singh

          जब दोबारा जिलाबंदी हुई तो ओलिवर ने अपना पहला आदेश जारी किया कि 16 नवंबर 1859 से 30 जनवरी 1860 तक जिला भर में अपने हथियार जमा करवा दें, ताकि 1857(देश की आजादी की पहली लड़ाई)जैसे हालात पुन: उत्पन न हों…इसके बाद यहां कर्नल डायर की तैनाती की गई, जो 1870 तक रहे…जिससे ओलिवर काफी खफा थे और वह लंबी छुट्टी लेकर इंग्लेंड चले गए… हालांकि इस बीच मेलविल, कैप्टन एच. लारेन्स, टरॉफोर्ड, मेजर वुड भी रहे, लेकिन वह अपना नाम स्थापित करने में नाकाम रहे। अब फाजिल्का जिला बन चुका है और यहां डॉ. बसंत गर्ग को पहले डी.सी. तैनात होने का गर्व प्राप्त है…मौजूदा समय यहां मनप्रीत सिंह छत्तवाल डी.सी. हैं।

J.H. Oliver and Cdr. F. Hughes

किलो घी से भी सस्ता बना है मेरा शहर -Rangla Bangla Fazilka

BANGLA

हाय रब्बाइतनी महंगाई बढ़ गईहैरानी हो रही हैआजकल तो उतने रूपये का एक किलो देसी घी नहीं मिलताजितने रूपये में मेरा प्यारा शहर बस गयाहैरानी आपको भी होगीक्योंकि जिस धरती पर यह शहर बसा हुआ है, उस धरती की कीमत सिर्फऔर सिर्फ 144 रूपये आठ आन्ने थीक्यों यकीन नहीं रहामगर यह हकीकत हैहकीकत और मेजदार दास्तानरंगले, बंगले फाजिल्का तक के सफर की रंगीली दास्तान। यही एक शहर है – जो कभी गांव नहीं थी – शहर था –

      बात 1846 की है जब बंगला पूरे योवन पर थावंस एगन्यू का तबादला हो गया तो यह इलाका  जे.एच.ओलीवर के अंडर गयाउन्होंने फतेहबाद और बीकानेर में मुनादी करवा दी कि आओ, बंगले में आकर बस जाओअगर अपने साथ कारपेंटर, नाई, मिस्त्री, मजदूर लेकर आओ तो जगह मुफ्त मिलेगीओलीवर भी चाहते थे कि बंगला शहर पूरी तरह से आबाद हो जाए……बात फैलती गई और लोग यहां आकर बसते गएशहर के लिए जगह कम पड़ गईतब ओलीवर ने मियां फजल खां वट्टू को बुलाया

Fazilka Clock Tower

     फजल खां वट्टू !!! …वो कौन थावो था सतलुज दरिया के किनारे बसने वाले मुस्लिम कबीले का एक जमींदारजिसे ब्रिटिश सरकार की तरफ से नंबरदार बनाया हुआ थावह कृषको से कृषि और नहरी पानी का टैक्स इक्_ करता और ब्रिटिश कोष में जमां करवा देताब्रिटिश साम्राज्य के राजस्व में इजाफा होते देखकर ओलिवर ने नंबरदार वट्टू को बुलाकर यहां नगर का दायरा विशाल करने के लिए जमीन बेचने की बात कहीनंबरदार वट्टू के पास जमीन की कमीं नहीं थीवह जमीन बेचने को तैयार थामगर उसकी शर्त थी कि इस शहर का नाम उसके नाम (फज़ल खां) पर रखा जाएगहन विचार के बाद ब्रिटिश अधिकारी ओलिवर ने नंबरदार वट्टू की शर्त मान ली और उससेे साढ़े बत्तीस ऐकड़ जमीन 144 रूपए आठ आन्ने में खरीद लीउसके बाद नगर का नाम फजिल्की रखा गयाजो धीरेधीरे फाजिल्का पड़ गया

Peer Goraya

           शहर का मुख्य बाजार है मेहरियां बाजारयहां एक दुकान पर कुछ बरस पहले ही मैने ओलीवर द्वारा बनाई गई मार्केट का बोर्ड देखा थामैं देखना तो चाहता था कि कहीं बंगला लिखा मिल जाए, मगर बंगला लिखा कहीं नहीं मिलाहां बंगला जरूर मिल गयाजहां आजकल डिप्टी कमिशनर का निवास हैबाधा झील के पासआज भी वही बंगलाखुला हवादारमोटी दिवारेंमोटे शहतीरवही अदालतजहां वंस एगन्यू की कचहरी लगती थीएक बात और जहन में थी कि फजल खां वट्टू कहां रहता थाखोज की तो पता चला कि वह गांव सलेमशाह में रहता थाजिसे कभी फजलकी बोलते थेवह वहां से मौजम रेलवे फाटक के पास आकर बस गएसाथ ही मौहल्ला है पीर गोरायाजहां वट्टू पीर की सेवा भी करते थे तो मेला भी लगवाते थे। (यह अन्य ब्लाग में ब्योरे सहित लिखा जाएगा), क्योंकि बात सिर्फ बंगले की हो रही है तो बात को जारी रखते हैं।

Village Salem Shah kaa ek purana makaan

       फाजिल्का का दायरा विशाल करना थाइसलिए 1862 में सुलतानपुरा, पैंचांवाली, बनवाला, ख्योवाली और केरूवाला रकबे की 2165 बीघा जमीन खरीद कर ली गईजिसका मूल्य 1301 रूपए तय किया गया थाउसके बाद सात अगस्त 1867 के दिन पंजाब सरकार के नोटीफिकेशन नंबर 1034 के तहत फाजिल्का की सीमा निर्धारित कर दी गईब्रिटिश साम्राज्य की ओर से खरीद की गई जमीन का निर्धारित मुल्य 1877 में नंबरदार वट्टू को पंचायती फंड से अदा किया गया।

       समय ने करवट ली और फाजिल्का में ऊन का व्यापार गति पकडऩे लगा…व्यापार में इजाफे के लिए ब्रिटिश अधिकारी ने पेड़ीवाल, मारवाड़ी, अग्रवाल और अरोड़वंश जाति के लोगों को न्योता दिया…वह लोग व्यापारी थे और उन्होंने यहां ऊन व अन्य कई तरह के व्यापार शुरू कर दिए…जिससे फाजिल्का व्यापारिक केन्द्र बन गया…उधर 1852 में ब्रिटिश अधिकारी थोमसन को तैनात किया गया, वह 1857 तक रहे और उन्होंने अधिकतर अबोहर व उसके आसपास के गांवों में विकास करवाया।

Fazilka City

मुलतान में क्यों मारा गया बंगले का निर्माणकर्ता

उम्र सिर्फ 22 साल की थीजब ब्रिटिश अधिकारी पैट्रिक एलैगजेंडर वंस एगन्यू बंगले के निर्माणकर्ता बन गएयह उनकी सोच थी कि बंगला अगर बाधा झील किनारे फूलों की खुश्बू के बीच निर्मित किया जाए तो इसकी महिमा दूर दूर तक होगीयुवा थेजोश थापंजाबी भी जानते थे और उनकी खासियत यह भी थी कि वह शहर बसाने में काफी माहिर थेलोगों से मिलना जुलना उनकी फितरत थीमगर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य में सिर्फ सात साल ही सेवा कीसिरसा, फाजिल्का, फिरोजपुर, लाहौर के बाद मुलतान उनकी जिंदगी का आखरी सफर था।

फाजिल्का के इतिहास में बंगले की दास्तान के जिक्र दौरान मुस्लमान फजल खां वट्टू के नाम के साथ वंस एगन्यू का जिक्र जरूर होगापिता के नक्शे कदमों पर चलकर ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने वाले वंस एगन्यू बंगाल सिविल सर्विस में तैनात हुएइसके बाद उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भटियाणा में सहायक सुपरिटेडेंट के पद पर तैनात किया गयावह एक सियासी अधिकारी की कला में माहिर हो गए। हालांकि उनकी आयु कम थी, मगर ब्रिटिश अफसरों में उनका प्रदर्शन अच्छा रहाउनका मनपसंद काम था शहरों को आबाद करनावह जहां भी गए, शहरों के विकास में उनका अह्म योगदन रहा। बात चाहे फाजिल्का की हो या लाहौर की। वह तीन बातों में इतफाक रखते थे, पहली बात किसी चीज को आरंभ करने के लिए सही जगह क्या है? दूसरा किन लोगों को मिलना या सुनना चाहिए? उनके जहन में तीसरी बात यह थी कि सब से महत्वपूर्ण कार्य क्या है, जिसे प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। इस सोच को आधार मानकर ही उन्होंने फाजिल्का शहर बसाने में प्राथमिकता से काम किया।                      

     फाजिल्का में बंगले के निर्माणकर्ता ब्रिटिश अधिकारी पैट्रिक एलेगजेंडर वन्स एगन्यू ने भले ही ब्रिटिश साम्राज्य में सिर्फ 7 साल तक सेवा की, लेकिन इस सेवा दौरान उन्होंने ऐसी कई भूली बिसरी यादें छोड़ी जो अमिट यादें बनकर रह गईकलकत्ता में उन्होंने 3 साल गुजारे तो फाजिल्का में वह 2 साल रहे। फाजिल्का में उन्होंने एक ऐसे बंगले का निर्माण करवाया। जिसके नाम पर क्षेत्र का नाम बंगला ही पड़ गया। हॉर्श शू लेक किनारे निर्मित इस बंगले की धूम दूरदूर तक रही है। बंगला नामक इस कस्बे को खुशहाली देने के पश्चात उन्हें लाहौर में तैनात कर दिया गया। वहां से मुलतान तक के सफर में उन्हें कई खट्टेमीठे अनुभव हुए। मुलतान में दूसरा सिक्ख एंग्लो युद्ध शुरू हुआ तो उनकी जिंदगी का अंतिम सफर भी समाप्त हो गया।

    वन्स एगन्यू का जन्म 21 अप्रैल 1822 को नागपुर में पैट्रिक वन्स एगन्यू के घर हुआ। उसकी माता का नाम कैथराइन फरेसर था। उनके पिता मद्रास आर्मी में लेफ्टीनेंट कर्नल थेजिन्होंने सिक्ख ब्रिटिश साम्राज्य के निणार्यक युद्ध पहले एंगलो सिख युद्ध सन् 1845-1846 में भी भाग लिया। मार्च 1841 में बंगाल सिविल सर्विस में ज्वाइंन करने वाला युवा वंस एगन्यू 1844 में फाजिल्का में बंगले का निर्माणकर्ता बन गयाउन्होंने बहावलपुर के नवाब मुहम्मद बहावल खान।।। से जगह ली और बाधा झील यानि हार्श शू लेक के किनारे एक विशाल बंगले का निर्माण करवायाबंगले में हर सरकारी गैर सरकारी काम होने लगेदूरदराज से लोग यहां न्याय पाने के लिए आने लगेबंगला नाम प्रत्येक व्यक्तिकी जुबान पर चढ़ गया। सब लोग बंगला का नाम पुकारने लगे। यही कारण है कि फाजिल्का नाम से पहले नगर का नाम बंगला हुआ करता थाबुजुर्ग आज भी शहर को फाजिल्का कम और बंगला ज्यादा पुकारते हैं।

       वंस एगन्यू सियासी ब्रिटिश अफसर थे, इस कारण हर सियासी नेता का यहां आनाजाना था। सियासी नेता ही नहीं, प्रत्येक ब्रिटिश अफसर भी यहां पहुंचते। सिरसा के अलावा मालवा, सतलुज राज्य की बैठकें यहां होने लगी। एक युवा अफसर के नेतृत्व में बंगला का नाम चंद ही महीनों में मशहूर हो गया। यहीं से शुरू हुआ बंगला नगर के निर्माण का कार्य। इधर वंस एगन्यू ने 1844 में बंगले का निर्माण करवाया, उधर दीवान मूल चंद को मुल्तान का गर्वनर बनाया गया।

BANGLA

          इस पद के बदले वह लाहौर सरकार को 20 लाख रूपए वार्षिक अदा करता था। जबकि कई इतिहासकारों ने इस की अदायगी की रकम 12 लाख रूपए बताई है। सभराओं की लड़ार्ई में विजयी होने के बाद अंग्रेजों ने लाहौर की तरफ कूच किया तो किसी ने उन की खिलाफत नहीं कीआखिर 20 फरवरी 1846 को अंग्रेज सेना लाहौर पहुंच गईइस बीच बंगला नगर की प्रसिद्धी पंख फैला रही थीएक खुशहाल और एगन्यू के सपनों का नगर बसने की योजना तैयार हो रही थी कि वंस एगन्यू का यहां से 13-12-1845 को फिरोजपुर का अतिरिक्त चार्ज दे दिया गयाजहां वह से 23-02-1846 तक रहेउसके बाद एगन्यू का तबादला लाहौर कर दिया गयालाहौर सिक्खों की राजधानी थीवहां भी वंस एगन्यू ने शहर के विकास को ओर आगे बढ़ाया। उधर ब्रिटिश साम्राज्य ने काहन सिंह को मुलतान का सूबेदार घोषित कर दिया। उनकी सहायता के लिए बंगला (फाजिल्का ) के निर्माणकर्ता वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन को भेजा गया। 19 अप्रैल 1848 को दीवान मूल राज ने खुशीपूर्वक नए सूबेदार को चार्ज दे दिया। अंग्रेजों की ओर से नया सूबेदार बनाने से मुल्तानी सैनिक खुश नहीं थे। उन्होंने विद्रोह शुरू कर दिया। जब वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना विद्रोह दबाने के लिए मुलतान की ओर बढ़ी तो मुलतानी सैनिक और भडक़ उठे। सिक्खोंं को पता चला कि ब्रिटिश सैनिक वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन के नेतृत्व  मेेंं आगे बढ़ रहे हंै तो उन्होंने बृज पार करते समय दोनों अंग्रेज अफसरों को घोड़े से नीचे उतार लिया और उन्हें बुरी तरह से मारपीट करके घायल कर दिया गया। युद्ध शुरू हो गया। सिक्ख ब्रिटिश सैनिकों के तेजधार हथियार एक दूसरे पर धड़ाधड बरसने लगे। मैदान लहूलुहान हो गया।

    वहां से घायल वंस एगन्यू व विलियम ऐंडरसन को ब्रिटिश सैनिक पनाह यानि ईदगाह में ले गए। मुलतानी सैनिकों में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति नफरत की ज्वाला पूरी तरह भडक़ चुकी थी। 20 अप्रैल 1848 की सांय सिक्खों का झुंड वंस एगन्यू और विलियम एंडरसन की पनाहगाह में घुस गया और दोनों ब्रिटिश अफसरों को मार दिया। यहीं से बंगला के निर्माणकर्ता वंस एगन्यू की जिंदगी के सफर की आखरी राह बंद हो गई।

SIRSA OR MULTAN के बीच खड़ा एक बुलंद इमारत वाला शहर BANGLA

Bangla

झील का मनमोहक नजारा…कोयल की मीठी आवाज…झूमते मोर…फलों व फूलों की खुश्बू…मदमस्त हवा…यह सब बंगले के आसपास हो तो हर कोई चाहेगा कि इस बंगले में ही रहा जाए…ब्रिटिश कलाकृति से सजा-संवरा बंगला खुद ही इंसान को आकषित कर रहा था…उस बंगले का निर्माणकर्ता भी युवा था…पैट्रिक एलैगजैंडर वन्स एगन्यू…सिर्फ 22 साल का था…ब्रिटिश सरकार ने उसे बंगले (फाजिल्का) का चार्ज दिया हुआ था।

Bangla

        उसकी सोच ही ऐसी थी…कहां बसना है…किन लोगों से मिलना है…सियासी अफसर भी था वो…पंजाबी भी जानता था…भटियाना (अब सिरसा) में बतौर सहायक सुपरीटेडैंट था…डयूटी बंगले में थी…शहर बसाना…शहरों को आबाद करना उनका मनपसंद काम था…उसने बहावलपुर के नवाब मुहम्मद बहावल खान तृतीय से जगह ली और बाधा झील किनारे बंगले का निर्माण करवाया…न्याय पसंद अधिकारी था…बंगले में ही न्याय करता…बिलकुल सही न्याय…आजकल क तरह देर से नही…तुरंत फैसला…दूर दराज तक का क्षेत्र था…इसलिए दूर दूर तक बंगले की धूम थी…बंगला नाम प्रसिद्ध हो गया…कस्बा बन गया…हरेक व्यक्ति की जुबान पर बंगला…तकरीबन एक साल में ही युवा वंस एगन्यू का बंगला हरेक का प्यारा बन गया।

        सिरसा से लेकर मुलतान के बीच बंगला सैंटर प्लेस था…जो भी ब्रिटिश अधिकारी इस रास्ते से गुजरता…वो इस बंगले में जरूर पहुंचता… सिरसा के अलावा मालवा, सतलुज राज्य की बैठकें यहां होने लगी…इस बंगले में तैनात वंस एगन्यू को 13 दिसम्बर 1845 को फिरोजपुर का चार्ज भी दे दिया गया…इसके बाद 23 फरवरी 1846 को उनका तबादला लाहौर कर दिया गया…उनके स्थान पर बंगले में J.H.Oliver की तैनाती की गई…उन्होंने बंगले को और निखारा…बंगले के साथ गार्डन बनाया…जिसका नाम ओलिवर गार्डन रखा गया।

Mehndi Hassan

      यह वही बंगला है…जहां पाकिस्तान में सुप्रसिद्ध रहे गजल गायक मेहंदी हसन जब सिर्फ आठ साल के थे…उस समय वह अपने परिवार के साथ राजस्थान में रहते थे…वह यहां अपने पिता अजीम खान के साथ आए थे…बात 1935 की है…उसके पंजाब के राज गायक के लिए मुकाबला था…उस मुकाबले में हिस्सा लेने के लिए अजीम खान भी आए थे…मेहंदी हसन साथा थे…ध्रुप्द एवं ख्याल ताल में जब मेहंदी हसन ने पहली प्रोफार्मेंस दी तो तालियों की गंूज ने बता दिया था कि मेहंदी हसन किसी समय में दुनिया का प्रसिद्ध गजल गायक बनेगा…वही हुआ।

मार्किट बंद की एक तस्वीर

         यहां आर.एस.तिलोक चन्द 1913, एल.एस.बल्ल 1922, के.के.फैजाहमद 1927, एच.डी.बी.टेलर 1938, ए.एल.फलैचर 1938, जी.अमीनूदीन 1938, फज्जल इलाही 1939, अब्दुल एम. खान 1940, मुलक राज मेहरा 1940, के.एस.एस.एम. मुस्तफा शाह जीलानी 1941, आर.एस. विद्या सागर 1946 और के.सी.माथुर 1949 में एस.डी.एम. रहे हैं।

आंदोलन की एक तस्वीर

       1844 में यह इमारत सुंदर है…फिर इसे हैरीटेज का दर्जा भी मिलना चाहिए…इसलिए इसे हैरीटेज का दर्जा दिलाने के लिए मैने (लछमण दोस्त) मौहल्ला नईं आबादी इस्लामाबाद, टीचर कालोनी, धींगड़ा कालोनी और बस्ती चंदौरा के लोगों के साथ मिलकर आंदोलन शुरू कर दिया…लोगों का भरपूर सहयोग मिला…बाइक रैली, धरना…प्रदर्शन और रैलियां की गई…मौहल्ला व मार्केट भी बंद रही…लगातार एक माह आंदोलन चला…अखिारकार पंजाब हैरीटेज व टूरिजम बोर्ड द्वारा नोटीफिकेशन नंबर 10/72/14-4यस/333165/तिथि चंडीगढ़ 29/10/14 को प्रथम, एस.ओ. 20/पी.ए. 20/1964/एस.4/2016 तिथि 4 मार्च 2016 को दूसरा और एस.ओ. 59/पी.ए. 20/1964/एस.4/2016 तिथि 2 अगस्त 2016 तीसरा नोटीफिकेशन करके विरासती दर्जा दिया गया…मगर अफसोस है कि इसे हैरीटेज का दर्जा मिलने के बाद भी किसी सरकार ने इसकी सुध नहीं ली…विभाग द्वारा इसकी देखभाल करना तो दूर की बात है…यहां *विरासती इमारत* का बोर्ड तक नहीं लगाया गया।

BANGLA.. A Beautiful City

Spectacular view of the lake … Sweet voice of cuckoo … The roaring peacock … The fragrance of fruits and flowers … Mad Wind … all around this bungalow, then everyone would want to stay in this bungalow. Decorating with British Artwork- Svaru Bangla was expressing itself to the person … the builder of that bungalow was also young … Patrick Alexander Vans Agnew… was only 22 years old … the British government bungalow him (Fazilka) was charged.

        His thinking was such that … where to live … what people are to meet … even a political officer was there … Punjabi also knew … Bhatiana (now Sirsa) was a superintendent as a superintendent … The duty was in the bungalow … settling the city … populating the cities was his favorite work … He took the place from Bahawalpur’s Nawab Mohammad Bahawal Khan III and constructed the dam beside the lake bank … Justice was the official. … justice in the bungalow … just right justice … nowadays As late as not … instant decision … far away was the area of ​​the drawer … so the bungalow was far away … the name of bangla became famous … the town became … every person’s Bangla on juba … In just about a year, young Van Agnu’s bungalow became the sweetest of everyone.

        There was a bungalow center place from Sirsa to Multan … whatever British officials passed through this route … he would definitely reach this bungalow … Apart from Sirsa, meetings of the Satluj state began to be here … this bungalow Van Agnew posted in Charge was given a charge of Ferozepur on December 13, 1845. After this, his transfer was transferred to Lahore on 23 February 1846. In his place, J.H. Oliver was deployed … He made the bungalow a garden with more … Bungalow … named Oliver Garden.

       This is the same bungalow … where Gazal singer Mehdi Hassan, who was well-known in Pakistan when he was only eight years old … at that time he lived with his family in Rajasthan … he had come here with his father Azim Khan. ..Boot is from 1935 … it was a fight for Raj singer of Punjab … Azim Khan had also come to take part in that fight … Mehdi Hassan was together … when Mehndi in Dhrupad and Khayal Tal Hassan gave first impression Gunjuj had told that Mehdi Hassan would be the world’s famous ghazal singer at some time … that happened.

          R.S. Tilok Chand 1913, L. S. Balla 1922, K. K. Fajahmad 1927, HDB Retailer 1938, A.L. Flatrock 1938, G. Ameindin 1938, Fazlal Elahi 1939, Abdul M. Khan 1940, Mulak Raj Mehra 1940, K.S.M. Mustafa Shah Jhelani 1941, R.S. Vidya Sagar 1946 and K. C. Mathur in 1949 AD Are there(SDM).

       This building is beautiful in 1844 … and it should also get the status of heritage … so to give it status of heritage, mine (Lachhman dost) with the people of mohalla new Abadi Islamabad, Teacher Colony, Dhingra Colony and Basti Chandaura Together the movement started … people got a lot of support … bike rallies, dharna … demonstrations and rallies made … mohalla and market closed too … continuously for one month movement … then Punjab Haritage and Tourism Board Notification No. 10/72 / L4-4ys / 333165 / Date first Chandigarh 10.29.14, SO 20 / P.A. 20/1964 / S.4 / 2016 On March 4, 2016, second and S.O. 59 / P.A. 20/1964 / S.4 / 2016 dated August 2, 2016, was given the legacy status by third notification … but regret that even after getting the status of heritage, no government has taken any care of it … the department is looking after it So far it is a matter of … here the * heritage building * was not set up to the board.

BANGLA

इब्बन बत्तूता ने कहा था, यहां जो शहर बसेगा, रमणीक होगा…इमारत के नाम पर बसा दिया शहर-BANGLA

किसी ने देवी देवताओं के नाम पर अपने शहर का नाम रखा तो किसी ने पीर पैगंबर के नाम पर…किसी ने राजा के नाम पर तो किसी ने खुद अपने नाम पर…मगर यहां एक ऐसा शहर भी है जो इमारत के नाम पर बसाया गया है…वह भी दरिया के निकट …एक सुंदर शहर, प्यारा और रमणीक शहर…बंगला…जिस का नाम आज भी बुजुर्ग बंगला ही पुकारते हैं…हैरानी इस बात की भी है कि यह शहर पहले कोई गांव नहीं था…न ही किसी राजा महाराजा और देवी देवता या पीर फकीर के नाम पर बसा है…सीधे ही शहर आस्तित्व में आया है।

      आज से करीब 645 साल पहले इब्बन बत्तूता यह बात बता चुके हैं कि अगर सतलुज दरिया के किनारे कोई शहर बसाया जाता है तो वह शहर बड़ा रमणीक होगा…आज यह शहर रमणीक है…जिसकी महिमा दूर दराज तक है…समय की सरकारें व सियासत अगर इस शहर पर कुल्हाड़ी न चलाती तो आज इस शहर को देखने के लिए दूरदराज से लोग आते…

       यह एक ऐसा शहर है, जहां से भारत शुरू होता है…एक समय था, जब यह मौजूदा राज्य हरियाणा के जिला सिरसा की तसहील थी और इसकी एक सीमा राजस्थान के शहर बीकानेर व एक सीमा पाकिस्तान के शहर हवेली तक लगती थी, फिर यह जिला फिरोजपुर की तहसील बनी…अब यह खुद जिला है।

        इमारत के नाम पर बसा यह शहर बंगला (फाजिल्का)ब्रिटिश अधिकारियों ने बड़ी सूझबूझ से बनाया था। पहली बात, यह बंगला सुंदर और मनमोहक बाधा झील के किनारे बनाया गया, ब्रिटिश अधिकारी जानते थे कि बंगला शहर के बीचोबीच नहीं है और शहर बंगले के दूसरी तरफ नहीं बढ़ेगा…इसलिए यहां शहर के बीचोबीच क्लॉक टावर बनवाया गया…जिस तरफ भी जाना हो…जिस शहर में भी जाना हो तो वहां से हर तरफ सडक़ निकलती हैं…(शेष अगले ब्लॉग में)

the name of the building is settled in the city

Someone named the name of the city after the name of Goddesses, and someone named it in the name of Pir …. Someone named himself in the name of the king … but there is also a city which is named after the name of the building But it has been settled … that is also near the Satlej River … a beautiful city, lovely and romantic city … Bungalow … whose name still calls the elderly bungalow … Surprisingly, This city was not the first village … nor any King Maharaja and Devi Devta Settle on the name of Pir Mystic … directly come into town existence.
      About 645 years ago today, Ibn Battuta has said that if a city is built on the banks of the Sutlej River, then the city will be a big romantic … Today this city is a romantic … whose glory is far away … Governments and political leaders of the time, if the city did not have any ax, then people would come from far away to see this city today …
       This is a city from where India starts … There was a time when the present state was the scene of the district Sirsa of Haryana and its border was to the city of Bikaner in Rajasthan and one border to the city Haveli of Pakistan. This district became a tehsil of Ferozepur … now it is a district itself.
        The city was built on the name of the building, Bangla (Fazilka), British officials, with great care. First thing, this beautiful bungalow was built on the banks of the lake beautiful and beautiful, the British officials knew that Bangla is not in the heart of the city and the city will not grow on the other side of the bungalow … so here the clock tower was built in the center of the city … Also go to the side … in the city where you are going, the streets come out from everywhere … (in the rest of the next blog)

विदेश से आए…अपने नाम पर गांव बसाए…फिर क्यों चले गए दूसरे देश ?

अरब देश में रहते थेवहां से काफिला चला और पच्छिम की तरफ में प्रवेश कर गयावह यहां बरसों तक रहेउन्होंने अपने घर बनाएगांव बसाएगांवों को अपना नाम दियाभाईयो की तरह रहने लगेखेती अन्य धंधे करने लगेमगरमगर सतरंज की एक चाल ने उन्हें बेघर कर दियावो फिर चलेसब कुछ यहां छोडक़रखेतघर बारसब कुछबैलगाडिय़ों का फिर काफिला चला और दूसरे देश में जाकर बस गएजहां से लौटकर वह फिर कभी अपने डेरे में नहीं आएबस घर बार एक सपनाएक याद बनकर रह गईइन यादों के साथ कई दुनियां से रूखसत हो गए और कईइतने बुजुर्ग हो चुके हैं कि चाहते हुए भी अपने घरों में लौट नहीं सकतेक्योंकि उनके पुराने नए डेरे के बीच खींची गई लकीर ही ऐसी हैअगर उसे चोरी छिपे पार किया जाता है तो फिर ताउम्र जेल ही उनका घर बन जाएगाआखिर वह कौन थेकहां से आए थे और कहां चले गएआज सिर्फ इनकी बात होगी।

       जैसे शेख, सैय्यद, पठान, मुगल और बलोच आदि विदेशी थे, वैसे ही चिश्ती जाति के मुस्लिम भी अरब देश से आए थेइस क्षेत्र में उनका पहला आगमन पश्चिम की तरफ से हुआ थाचिश्तियों का कबीला पवित्र माना जाता थाधार्मिक स्वभाव था उनकाउनका दावा भी था कि वह पवित्र व्यक्ति हैंखुद को उमर की पीढ़ी मानते थे, जो बलख, शाम और काबुल के सुलतानों के साथ पैगम्बर मुहम्मद के साथी थे

       चिश्ती खुद को शेख फरूखी कहलाना पसंद करते थेइनके नवीनतम बुजुर्ग जनाब खवाजा फरीदउददीन थेजो बाबा फरीद शकरगंज के नाम से मशहूर थेबाबा फरीद ने पंजाब के विभिन्न हिस्सों में प्रचार कियामुलतान से सिरसा पहुंचे और वहां उन्होंने 40 दिन का उपवास रखासिरसा से बाबा फरीद दिल्ली पहुंचेजहां वह कुत्तुबदीन (दिल्ली) के अनुयायी बन गएकुत्तुबद्दीन से धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने स्थाई तौर पर चवाधन में डेरा डाल लियायहां उनकी मान्यता के बढऩे का क्रम जोरशोर से शुरू हुआयह इलाका आजकल पाकपटन (पाकिस्तान) के नाम से जाना जाता हैउनकी मजार और परिवार आज भी पाकपटन में हैजहां बाबा फरीद की दरगाह पर भारी मेला लगाया जाता हैचिश्तियों के बुजुर्गों ने पाकपटन से सतलुज दरिया उन्नीसवीं सदी में चार पीढियां पहले पार किया और दरिया के इस ओर के इलाके में आकर बस गएजो उस समय आबाद नहीं थायहां से चिश्ती जिला सिरसा में फैल गए

        अगर फाजिल्का की बात करें तो यहां पक्का चिश्ती, चूहड़ी वाला चिश्ती आदि कुछ गांव थेयहां से पाकिस्तान के गांव लोकिया तक चिश्ती जाति के मुस्लिम परिवार रहते थे। जिनका हिन्दु सिख परिवारों के साथ ही काफी भाईचारा थामगर अब तो वह अपने उस भाईचारे से मिल सकते हैं और अपने गांवों को निहार सकते हैंहां, अगर भारत की जनता और पाकिस्तान की आवाम चाहे तो असंभव भी संभव हो सकता हैमगर इसके लिए सियासत का सहयोग बहुत जरूरी हैशर्त यह है कि वो सियासत होजिसने भारत का विभाजन किया थाजरूरत है एक स्वच्छ सियासत की…!!!

(नोट: ब्रिटिश साम्राज्य के भटियाणा (जिला सिरसा) के सेटलमेंट अधिकारी जे.विल्सन ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में इन जातियों से विस्तृत बातचीत की थी। जिस पर यह लेख आधारित है।)

Chishti used to call Sheikh Farukhi

   The ancestors of the Muslims who settled in Fazilka were foreigners. In the last years of the nineteenth century, the settlement officer J. Wilson of Bhatiya (District Sirsa) of the British Empire, had detailed talks with these castes, the Muslim caste himself admitted that he was foreign like Sheikh Sayyed, Pathan, Mughal and Baloch. There were also some castes of Muslims who claimed that their castes came from Arab countries. Among them, Chishti caste Muslims were also included. His first arrival in this area was from the west side. His many generations have lived in this part of the country. The tribe of Chishti was considered sacred. He was of a religious nature and claimed that he was a holy person. Chishti considers himself a generation of Omar, who was a companion of prophet Muhammad along with the sultans of Balakh, Sham and Kabul. Chishti used to like himself as Sheikh Farukhi. His latest elderly sage Khawaja Fareed-ud-Din was. Who was famous as Baba Farid Shakarganj. Baba Farid preached in various parts of Punjab. He reached Sirhna from Multan and there he kept 40 days fast. Baba Farid from Sirsa reached Delhi. Where he became a follower of Kutubdin (Delhi). After receiving religious education from Kutubuddin, he permanently camped in Chawadhan. Here, the order of the increase of their recognition began with loud noise. This area is now known as Paktan (Pakistan). His mazar and family are still in Pakapatna. Where a huge fair is organized at the dargah of Baba Farid. The elderly of the Chishti crossed the Satluj Darya from Paktan in the nineteenth century before four generations and settled in this area of ​​the river. Which was not populated at the time. From here the Chishti district spread to Sirsa. At that time there were nine villages in the Chishti caste’s Muslim district. Apart from this, there were 50 villages of Chistians and 25 villages in Mantunguri (Pakistan) in Bahawalpur (Pakistan). About 500 castes of Chishti were recognized from 6 to 9 April 1881. While attaining recognition from the law of the British Empire, there were 6 representatives present. The tribe of Muslims of the Vatu and Bodla tribes lived near the Chishts settling along the Sutlej Darya. With the tribe of the Vatu caste, he used to be close to him. But he believed that he did not have any kind of relationship with the Bodolal clan. The Chishti of Chishti clan of Chishti clan in the district of Fazilka was spread from chuhri wala Chishti to village Lokiya (Pakistan), but after the partition of India, they settled in Pakistan leaving this region.

22 का 22 से गहरा रिश्ता है 22 G

22 का 22 से गहरा रिश्ता है 22 …लाइन कुछ अटपटी से लगती हैमगर यह हकीकत है बाईफाजिल्का का 22 से गहरा रिश्ता हैवैसे भी पजाब के कई इलाकों में भाई या दोस्त को बाई जी कहते हैंजान पहचान भी हो तो भी कई लोग दूसरों को बाई जी कहकर पुकारते हैंफजिल्का में भी ऐसे ही बुलाकर एकदूसरे को अपनी मिठास भरी आवाज और प्यार का संदेश देना 22 का ही नाम है।

         बात करते हैं 22 परबंगले को आप सब जानते हैंबंगले के निर्माणकर्ता यानि जिसने बंगले का निर्माण करवाया थापैट्रिक एलैगजैंडर वंस एगन्यू शॉटकट में वंस एगन्यू बोलते थेपैट्रिक एलैगजैंडर तो उसका सर नेम थाउसका जन्म 1822 का थाफाजिल्का में वह 1844 में आया, यानि उस समय उसकी आयु 22 साल की थीयहां से उसका तबादला फिरोजपुर हो गया और वहां से कई शहरों से होते हुए दूसरे सिख एगलो युद्ध (मुलतान) में उसकी मौत हो गई। समझ गए , शुरूआत 22 से हुई थी।

Vans Agnew’s tomb in Multan (Photo by – Mr. Rocky khan Sahil)

       फाजिल्का शहर के बीचोबीच है क्लॉक टावरजिसकी तस्वीर पंजाब विधान सभा की आर्ट गैलरी में लगाई गई है और इसका नाम देश विदेश में प्रसिद्ध हैफाजिल्का में कोई आए और क्लॉक टावर को देखे बिना नहीं रहताखासियत यह भी है कि आप क्लॉक टावर पर चले जाओवहां खड़े होकर देखो, आपने किस शहर जाना हैआपको वहां से सडक़ मिल ही जाएगी। जब यह खासियत हैं तो खासियत यह भी हैं कि जिस क्लॉक टावर की हम बात कर रहे हैं, उस क्लॉक टावर के निर्माण पर 2200 रूपये खर्च आया था।

         फाजिल्का जिले का नोटीफिकेट 26 जुलाई 2011 को हुआ थावो जिला जिसे जिले का दर्जा दिलाने के लिए बरसों लगेकई बार आंदोलन हुएमगर जो आंदोलन 2010-11 में हुआ, वो तो ऐतिहासिक थाधरना, प्रदर्शन, रैली और बंद के बाद मरणव्रत तक रखा गयाआखिरकार फाजिल्का को मिला जिले का दर्जापंजाब में फाजिल्का को 22वां जिला घोषित किया गया था बाई जी।

           जिले का दर्जा मिलने के बाद फाजिल्का से जिसने वाहन खरीदकर उसका नंबर लगवाया और उसे जो नंबर मिला वो पी.बी. 22 मिला है…तभी तो कहते हैं कि फाजिल्का का 22 से गहरा रिश्ता रहा है।

Clock Tower Photo (6 June 1939)

हर इंसान क्यों बनना चाहता है नायक फिल्म का हीरो

Nawab Mamdot

राजनीति घर से ही शुरू हो जाती है…दो बच्चों को एक खिलौने के लिए ही राजी करना घर की राजनीति है…वैसे राजनीति को कोई समझ नहीं पाया…अमीर, गरीब, शरीफ और बाहुबली…हर तरह का व्यक्ति राजनीति में है…राजनीति घर से शुरू होकर देश के सवोच्च पद तक पहुंच चुकी है…हर कोई नायक फिल्म का हीरो बनना चाहता है…अनिल कपूर की तरह…जो एक दिन का सी.एम. होता है…कई लोगों के फायदे के लिए राजनीति करता है तो कई खुद अपने फायदे के लिए…अपने राजनीतिक प्रभाव के चलते पहले भी सियासी नेता टैक्स के लिए परेशान करते थे…

          ऐसा ही फाजिल्का में भी होता रहा हैजिसमें वो परिवार भी पिसते रहे, जिनकी उस समय दूर दूर तक धूम थीवो परिवर थे बोदला परगना केजिनका इलाके में 48 गांवों पर कब्जा थाजिनमें से अधिकांश परगना बहक के आसपास थे जो कि सतलुज दरिया के किनारे पर थाइसके अलावा उनके पास 20 गांव मिन्टगुमरी, 14 गांव फिरोजपुर, 6 गांव बहावलपुर, 4 गांव बीकानेर और 4 गांव लाहौर में थेघग्गर और डब्बवाली तहसील में भी इनके कुछ गांव थेफाजिल्का इलाके में उनका ठिकाना गांव अरनीवाला शेख सुुभाण, वल्लेशाहके, नूरशाहके, टाहलीवाला बोदला, आहल बोदला, बहक बोदला और बहक खास आदि गांवों में था।

         दरअसल इन्हें नवाब ममदोट टैक्स के लिए काफी परेशान करता थाक्योंकि नवाब ममदोट की सियासी तौर पर स्थिति काफी मजबूत थी और जमीन जायदाद का एक बड़ा हिस्सा उनके पास थावह दरिया के आसपास बसे लोगों से कर (टैक्स) वसूलता थामगर कुछ देर तक कर देने के बाद बोदला कबीला ने कर देना बंद कर दियाजिस कारण बोदला कबीला का नवाब ममदोट से झगड़ा शुरू हो गयाधीरेधीरे बोदला आर्थिक तौर पर मजबूत हो गए और नवाब ममदोट का मुकाबला करने की स्थिति में गयावर्षों तक संघर्ष के बाद यह इलाका ममदोट के अधिकार से छीन लिया गया। नवाब ममदोट के कब्जे से मुक्त हुआ बहक परगने को 1858 मे फिरोजपुर से काटकर जिला सिरसा से जोड़ दिया गयायह ब्रिटिश सम्राज्य के बंदोबस्त अफसर ब्रेंडब्रैथ ने सन् 1857-58 में निर्धारित किया थाइसके बाद मिस्टर ब्रेंडब्रैथ का तबादला हो गया।

      10 दिसंबर 1885 को जब फाजिल्का तहसील को जिला सिरसा से काटकर जिला फिरोजपुर से जोड़ा गया तो यह परगना भी जिला फिरोजपुर से जुड़ गया…इसके बाद तो परगना बहक फाजिल्का में काफी मजबूत होता गया और क्षेत्र के निकट के कई इलाकों में फैल गया…नवाब ममदोट का मुखी इफ्तिखार हुसैन खान था…जिस फिरोजपुर हलका मुहम्मदन में काफी सियासी रूसूख था…हालांकि बोदला सियासत में कोई रूचि नहीं रखते थे, लेकिन नवाब की सियासत से परेशान होकर फाजिल्का के गांव बहक बोदला के जमींदार मुहम्मद सरवर बोदला सियासत में कूद पड़े…चुनाव मार्च 21, 1946 को होने थे… फिरोजपुर जनरल मुहम्मदन रूरल सीट पर all India Muslim league की तरफ से इफ्तिखार हुसैन खान उम्मीदवा थे तो unenest party की तरफ से मुहम्मद सरवर बोदला…इलके में बोदला का प्रभाव कम नहीं था…जीत की पूरी उम्मीद थी, लेकिन जब मुहम्मद अली जिनाह ने फिरोजपुर में नवाब के पक्ष में विशाल रैली की तो वोटरों का रूझान बदल गया और बोदला चुनाव हार गए…इसके बावजूद मुहम्मद सरवर बोदला ने लोगों से प्यार से प्यार कायम रखा…लोगों के हकों की लड़ाई लड़ते रहे…मगर देश के विभाजन के बाद उन्हें यह इलाका छोडऩा पड़ा और वह पाकिस्तान चले गए…जहां 1952 में वह विधायक चुने गए।

THE BODLAS. 

The Bodlas claim descent from Aba Bakr Sadik Khalifa, and call themselves Shaikh Sadiki. According to their tradition, their ancestor, Shaikh Shahab-ud-din, known as Shahab-ul-mulk, came from Arabia to India three or four centuries ago, and became a disciple of Khwaja Muhammad Irak Ajami at Multan. One day that saint told Shahab-ul-mulk that he was to him Bo-e-dil (heart’s fragrance),explained to mean that he knew intuitively his preceptor’severy thought; hence the descendants of Shahab-ul-mulk are known as “Bodlas.” Shahah-ul-mulk afterwards settled at Khai near the Satlaj, in Bhawalpur territory, some 70 miles south-west of Fazilka. All Bodlas derive their descent from Shahab-ul-mulk and their origin from Khai. Two small families of Bodlas seem to have come directly from Khai to this district within the last 60 years. One of these holds Ranga on the Ghaggar, in the Dabwali tahsil, and the other owns Sarawan and four other villages in the Fazilka Rohi. But the chief immigration of Bodlas is said to have taken place some four generations ago under Muhkamdin, who came from Khai through Sangraur in Faridkot and settled at Ahal, where the remains of his town are still to be seen, not far from Bahak. The country was then uninhabited, and the Bodlas kept large herds of cattle and drove them hither and thither for. pasture over the tract of country afterwards known as Pargana Bahak, from Bahak, their chief village after the destruction of Ahal. The Bodlas had many contests with the Nawab of Mamdot, who claimed jurisdiction over their country, and it was not till about 1855 A.D. that they were removed from his control and the pargana was attached to the Firozpur District and settled. It was transferred to the Sirsa District in 1858. The greater part of Pargana Bahak was declared to belong to the Bodias in proprietary right, and one-sixteenth of the revenue of the whole pargana was conferred on them in jagir, as it seemed that, on account of their saintly character, they had been allowed this grant by the native rulers.Those Bodlas who belong to this pargana still enjoy the allowance, which is divided into complicated shares, founded chiefly on ancestral descent. When the country to the south and east was being settled 35 years ago, some of the Bahak Bodlas acquired villages or shares in villages outside the pargana, and a few of them obtained further grants for good service in the mutiny. 
Their claim to a saintly character and to some sort of precedence has always been allowed by their neighbours, and has, by fostering a spirit of exclusiveness, probably had some effect upon their tribal custom. They are supposed to be able to curse with efficacy, and instances are given in which the evils called down by them on their enemies were fulfilled; but their special gift is the cure of the bite of mad dogs or jackals, which is performed by a species ofincantation; and large numbers of all classes, Hindu as well as Musalman, apply to them in cases of bite, and are said to be cured by their miraculous power. They were until about 25 years ago essentially a pastoral tribe, and even now a large part of their wealth consists in horses and cattle. They do not cultivate much themselves and are bad managers, unthrifty, and extravagant, and the proprietary rights conferred on them at the settlement in 1858 are fast passing out of their hands into those of Sikh Jats. Their tenants are almost all Musalmans, paying rent in kind, and to an unusual extent under the power of their landlords. The Bodlas are generally large, stout men, with broad flabby faces, large, broad, prominent noses, and thick but not projecting lips, which give their wide mouths a weak appearance. Their language and customs are those of the Wattus and other Panjabi Musalmans among whom they live and with whom they are closely connected by marriage. They have no connection with other Shaikhs, and, notwithstanding their proud traditions, are probably, as surmised by Mr. Oliver, really of Wattu descent, or at all events of indigenous origin, and distinguished from their neighbours only by the assumption of superior sanctity and the spirit of exclusiveness it has bred. In this district they own, in whole or in part, 42 villages, most of which are in or near Pargana Bahak, and not far from the Satlaj. They are said to hold, besides, some twenty villages in Montgomery, fourteen in Firozpur, six in Bhawalpur, four in Bikaner, and four in Lahore; but these figures are probably exaggerated. They are a small but comparatively important clan, found, it seems, only in the neighbourhood of the Satlaj. They own to no leader, either political or religious, among living men

कहां दफन हो गई देश की सबसे लंबी व चौड़ी सडक़

बात हो रही थी कि उस समय फाजिल्का इलाका सुरक्षित नहीं था…घने जंगल थे…डाकू, तस्कर और जंगली जानवरों का खौफ था…जब यहां बोदला, वट्टू, चिश्ती पहुंचे और उन्होंने इलाके को आबाद कर दिया…इनसे पहले जहां से सुलतान गुजरे…कबीले गुजरे… वहां लंबी चौड़ी सडक़ बन गई…भारत के गजट अनुसार दिल्ली के निकट नरेल से एक लंबी चौड़ी सडक़ फाजिल्का तक आती थी…जो फाजिल्का के गांव मौजम तक पहुंचती थी…जो नरेल से हिसाब, फतेहबाद, सिरसा, डबवाली, मलोट, अरनीवाला से होते हुए गांव पैंचांवाली के निकट से फ्रीडम फाईटर रोड से होती हुई गांव मौजम तक पहुंचती थी…इसके आगे सतलुज दरिया था और वहां किश्ती पार करके जाना पड़ता था…उसके बाद वही सडक़ जिला औकाड़ा तक जाती थी…जिसकी संख्या विशाल भारत की सब से चौड़ी और लंबी सडक़ों में की जाती थी…।

          फाजिल्का और सिरसा के निकट पक्की सडक़ें एक या दो मील तक ही लंबी थी…जो कच्ची सडक़ हजारों मील लंबी थी, वो फाजिल्का से गुजरती थी…इसके साथ ही एक अन्य चौड़ी सडक़ पिछली सडक़ के पश्चिम से शुरू होती थी और जिले सिरसा की पूरी लंबाई को तय करती हुई सिरसा से फाजिल्का वाया अबोहर से आती थी…यह सडक़ भी लंबी और चौड़ी थी…इस सडक़ को व्यापारी अधिक प्रयोग करते थे…सडक़ को प्रयोग करने वाले पाविन्दा नामक व्यापारी काबुल कंधार से चलते और व्यापार के लिए दिल्ली पहुंचते…पाविन्दा व्यापारी सर्दी के दिनों में जिला सिरसा से होकर फाजिल्का पहुंचते थे और यहां से आगे अपना कारोबार के लिए चले जाते थे…व्यापारी अपने ऊटों पर व्यापारिक वस्तुओं काजू बादाम वगैरा भरकर लाते थे… ऊटों की संख्यां दो-चार नहीं, सैंकड़ों होती…जब वह चलते तो ऊंटों की एक बड़ी कतार होती थी…यह काजू बादाम लेकर आते थे…फाजिल्का में इनकी मंडी भी लगती थी…तभी तो यहां के लोग ताकतवर थे।

         माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट व मेरे अजीज दोस्त इंकलाब नागपाल से आज मेरी बात हुई तो उनकी बात सुनकर मुझे काफी हैरानी हुई कि आजकल तो काजू बादाम के पौधे लगाने कम हो गए हैं। जबकि पहले यह खेती अफगानिस्तान में बहुत थी…आजकल काजू बादाम की खेती से मुनाफा नहीं रहा, शायद इसलिए…खेती कम हो गई…नईं खेती तैयार नहीं की जा रही…अगर यही हाल रहा तो 5-7 साल बाद काजू बादाम मिलेंगे ही नहीं? जाहिर है कि अफगानिस्तान में काजू बादाम पर अफीम की खेती भारी पड़ रही है…और उनकी खेती का मुनाफा पंजाब के साथ साथ देश के कई अन्य प्रदेशों में भी भारी पड़ रहा है…सोचने वाली बात है…कभी तो यह भी सोचता हूं कि मुझे कौन सा मां ने काजू बादाम खिलाए हैं …केे मुहावरे की जगह भविष्य में यह न सुनना पड़े कि…मुझे कौन सा मां ने अफीम खिलाई है…!!!!(समाप्त)

The Rewari-Firozpur Railway, opened 
in 1885, runs across the north-east of the District, passing through Sirsa town. There are no masonry roads in the District, except for a mile or two in and near Sirsa and Fazilka towns. A good wide unmetalled road enters the District at Narel from Hissar, and runs by Sirsa, Dabwali, and Fazilka to Muazzam on the Sutlej, where there is a ferry, and so on to Okara, a station on the Sind, Punjab, and Delhi Railway in Montgomery District. Another broad road runs to the west of this, nearly the whole length of the District from Sirsa via Abohar to F’azilka, and is much used by Povindah traders from the frontier, who annually pass through the District in the cold weather, with their long strings of camels laden with merchandise from Kabul and Kandahar, on their way to Delhi and the North-Western Provinces. Other roads run from Sirsa north-east to Rori, south-east to Darba, south to Jamal, and west to Ellenabad ; from Malaut south-west to Abohar and Usman Khera, and north to Muktsar ; from Fazilka north- east towards Firozpur, and south-west towards Bahawalpur. Except during the rainy season, there are no serious obstacles to traffic, though in the dry hot weather great difficulty is sometimes experienced from want of water. Total length of District roads (1884-85), 500 miles; railways, 35 miles; navigable rivers, 20 miles. 
“The imperial gazetteer of India”

खौफजदा इलाका…बसना तो दूर, गुजरने से भी डरते थे लोग

  दक्षिण भारत के कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन का नाम तो आप ने सुना ही होगा…चंदन की तस्करी के अलावा वह हाथीदांत की तस्करी, हाथियो का अवैध शिकार, पुलिस व वन्य अधिकारियों की हत्या व अपहरण के कई मामलों में अभियुक्त था…इसलिए सरकार ने उसे पकडऩे के लिए करीब 20 करोड़ रूपये खर्च किए थे…ऐसे ही डाकू यहां भी रहे हैं…यहां मतलब, कौन सा इलाका…न फाजिल्का नाम था और न ही बंगला…हां, सतलुज दरिया था…उसके आसपास घने जंगल थे…जंगलों में अन्य डाकूओं के साथ साथ हस्स हस्स के पौधों के तस्कर भी थे…हस्स हस्स के पौधे से सैंट बनाया जाता है और तस्कर यहां से इस पौधे की तस्करी करते थे…(बंगला बनने के बाद जब ऑलिवर गार्डन बना तो उसमें भी हस्स हस्स का पौधा था), इसलिए डाकू व तस्कर यहां से गुजरने वालों पर हमला करते थे… तभी तो यहां से लोग टोलियां बनाकर गुजरते थे…इलाके में जंगल था, हर व्यक्ति यहां आने से डरता था…तेजधार हथियारों के साथ लंबे काफिले संग चलते यहां से गुजरते थे…दी पंजाब नॉर्थ-वैस्ट फ्रंटियर प्रीविंस एंड कश्मीर बुक अनुसार 1803 में यहां से दौलत राव सिंधीया भी काफिला लेकर गुजरे थे। इलाके में बहावलपुर के नवाब व ममदोट के नवाब ने कब्जा कर लिया…उन्होंने अपनी सरहदें निर्धारित की…यहां छोटे छोटे किले बनवाए…यहां महाराजा रणजीत सिंह के अंडर भी कुछ इलाका रहा है…

        नरेल से वाया हिसार, सिरसा, मलोट से होती हुई एक लंबी चौड़ी सडक़ फाजिल्का तक पहुंचती थी…जो गांव मौजम तक जाती थी…हजारों मील लंबी थी यह सडक़ …इसके बाद लोग दरिया पार करके दूसरी तरफ पहुंचते थे और वहां से यह सडक़ जिला औकाड़ा तक पहुंचती थी…यह इलाका दरिया किनारे था और रमणीक था…दूसरी बात दरिया के पार महाराजा रणजीत सिंह का इलाका था…तभी तो ब्रिटिश अधिकारियों ने इस इलाके में कब्जे की हिम्मत नहीं की…महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद यहां ब्रिटिश अधिकारी पहुंचे…बाधा झील के किनारे बंगला बनवाया…जो निर्माणाधीन था और उसे देखने के लिए पहली बार उस बंगले में जिला सिरसा के कस्टम अधिकारी ऑलिवर आए थे…इसके बाद जब वह जिला भटियाणा (अब सिरसा) के सहायक अधिक्षक बने तो उन्हें मुलतान में तैनात किया गया…यह बात लेखक जुगल किशोर गुप्ता ने अपनी पुस्तक हिस्टरी ऑफ सिरसा टाऊन मे लिखी है …खैर, यह बात फिर लिखेंगे…मगर यह बताना जरूरी है कि इससे पहले यहां परगना बहक, वट्टू, चिश्ती का यहां आगमन हो चुका था…जिन्होंने इस इलाके को आबाद किया…(बाकी अगले ब्लॉग में)

क्यों नहीं मिट सकती बंगला और हवेली के बीच खींची लकीर?

बंगला और हवेली में क्या अंतर है ? बंगला…मतलब कोई ऊंची लंबी इमारत नहीं…एक कस्बे का नाम है…और हवेली भी कोई जमींदार की हवेली नहीं …वह भी एक कस्बा है…बीच की दूरी भी आम शहरों की तरह…यानि 31 किलोमीटर…यह कोई एक दिन का सफर नहीं… कई दिनों का है…वह सफर भी पक्का होगा या नहीं …इस बारे में कहना संभव नहीं … कारण…एक शहर भारत की अंतिम छोर पर बसा है तो दूसरा शहर पाकिस्तान की शुरूआत में…बीच है एक लकीर…जिसे दोनों देशों की सहमति के बिना (यानि पासपोर्ट वगैरा के बिना) पार नहीं किया जा सकता। 
   इस बारे में बात फिर करेंगे, पहले कुछ बता दूं…वट्टू समुदाय चंद्रवंशी राजपूत कबीला था, जो 1882 से 16 पीढ़ी पहले राजा खीवा के समय मुसलमान बन गए थे। खीवा हवेली (पाकिस्तान) का राजा था… जहां एक मशहूर लक्खा वट्टू नामक मुसलमान रहता था… वट्टू वहां से सतलुज दरिया पार करके जिला मिंटगुमरी में आकर बस गया। यह भी बताता चलूं कि उस समय दरिया का एक किनारा वान बाजार तक था, जहां जंड का बड़ा वृक्ष था और मलाह उसी वृक्ष के साथ आकर अपनी किश्ती बांधता था … खैर यह बात फिर कभी करेंगे…वट्टू की बात को जारी रखते हैं…वट्टू का ही एक परिवार मिंटगुमरी से फाजिल्का के उत्तर की तरफ 16 मील दूर गांव बग्घेकी (जलालाबाद के निकट) आकर बस गया जो उस समय दक्षिण की तरफ फुलाही से 70 मील की दूरी पर था। गांव बग्घेकी के उत्तर की तरफ डोगर जाति और दक्षिण की तरफ जोईऑस जाति के लोगों का कबीला बसता था…जबकि वट्टू जाति के कई अन्य लोग हवेली के गांव राणा झंग के निकट भी बसे हुए थे… यह गांव राणा वट्टू के नाम पर बसा हुआ था… वट्टू वहां से चार पांच पीढ़ी पहले मिया फज़ल खां वट्टू, राणा और दलेल के नेतृत्व में सतलुज दरिया के इस इलाके में आकर बस गए और यहां बोदला जाति के मुसलमानों के पड़ोसी बन गए… उस समय यह इलाका आबाद नहीं था…घने जंगल थे…
          वैसे उस समय वट्टू धार्मिक गुरू थे…उनका कद छोटा और पतला था… उनके नैन नक्ष तीखे थे…होंठ पतले व नाक छोटे थे… उनकी भाषा मुस्लिम पंजाबी थी…जिनमें नाक से बोले जाने वाले व्यंजन ज्यादा थे… मगर देखने में अपने पड़ोसी बोदला परिवारों से सुंदर थे। वह किफायती नहीं थे… जंगल किनारे बसे हुए थे तो जाहिर है उनमें साहस की भावना की कमी नहीं थी…परिश्रमी होने के कारण ही उन्होंने जंगली इलाके को आबाद कर लिया। उनके परिश्रम से यहां धरती सोना उगलने लगी और वह कृषि क्षेत्र से जुड गए। 
      यहां बसने के बाद उनके बोदला जाति के मुसलमानों से संबध गहरे हो गए…वट्टू सतलुज दरिया के दोनों हिस्सों से जिला फिरोजपुर से जुड़े हुए थे…इनके आसपास चिश्ती, नाईपाल, भट्टी और गुज्जर भी बसे हुए थे…वट्टूओं की अधिकतर जाति आगे और शाखाओंं में बंटी हुई थी… वट्टू एक पूर्वज की ओर से थे…पूर्व समय में यहां उनकी 10-12 पीढिय़ां निवास करती थी… मगर कुछ समय बाद उनकी कुछ पीढ़ीयां वापस चली गई… यहां 1882 तक उनकी सिर्फ तीन-चार पीढ़ीयां ही रह गई, जो पीढिय़ां बाकी रह गई… उनमें ज्यादातर गांव लाधुका, मुहम्मदके और सैदोके में बसे हुए थे…जिन्हें इन्होंने अपना नाम दिया…ये गांव ही उनके हैड क्वार्टर बन गए…इसके अलावा सुक्खा के नाम पर गांव सुखेरा और कालो के नाम पर गांव कालोके बस गया…1911 की जनगणना अनुसार जिला फिरोजपुर में इनकी संख्या 9732 थी।

Why can not cross the boundary between the Bangla and Havely ?

What is the difference between bungla and Havely? …Bungla … does not mean that there is no tall building … the name of a town … and the Havely is not a landlord Havely… that is also a town … the distance between the middle is also like the common cities .. 31 km … this is not a one-day journey … it’s many days … whether that journey will be confirmed or not … It is not possible to say about this … because … a city India Is at the last end of the second city in the beginning of Pakistan … the middle is a streak … without the consent of both the countries ( I.e. without passport etc.) can not be crossed.

   Talk about this, first let me know … Wattu community Chandravanshi was a Rajput tribe, who became a Muslim during the time of King Khiva, 1882 to 16th generation. King of the Khiwa Haveli (Pakistan) … where a famous Muslim named Lakha wattu lived …Wattu crossed the Satluj River from there and settled in the district Mintgumari. It should also be noted that at that time there was a border of the river on the Jand Bazar, where there was a big tree of Jand and Malah had come up with that tree to build its own rook … Well, this thing will happen again … the talk of Wattu continues Keeping … a family of Wattu settled on the north side of Fazilka, north of Fazilka, 16 miles away, near village Baggeki (near Jalalabad), which was 70 miles away from Phulahi on the south side. Dogar caste on the north side of village Baghkeki and the tribe of Joeas caste towards the south used to be inhabited … while many other people of the Vatu caste were also living near the village of Rana Jhang of Haveli … This village was named after Rana Watu It was settled on … Vatu four to five generations ago from there, settled in this area of Sutlej River under the leadership of Mian Fazal Khan Wattu, Rana and Dalel and became a neighbor of Muslims of Bodla caste here … at that time Laka was not manned … the forest …

          Though at that time, Wattu was a religious teacher … his stature was small and thin … his nan naks were sharp … lips were thin and noses were small … his language was Muslim Punjabi … those who were nose-spoken The dishes were more … but in the neighborhood, their neighbors were beautiful with the Bodla families. He was not economical … If the forest had settled on the banks then obviously he had no lack of sense of courage … due to his hard work, he settled the forest area. From his hard work, the earth began to swell and he joined the agriculture sector.

      After settling down here, his relationship with the Bodlas of the Muslims became deeper … Wattu was associated with the district Firozpur from both parts of Satluj Dariya … Chishti, Naipal, Bhatti and Gujjar were also inhabited …Wattu Most of the castes were further divided into branches …Wattu was from an ancestor … in the past, his 10-12 generations lived here … but after some time some of his generations went back. Here until 1882 their Only three-four generations remained, which remained for generations … Most of them were settled in Ladkuka, Mohammed ke and Sedoke … whom they gave their name … this village became their head quarters. In addition to this, the village kaloke was settled in the name of village Sukhhera and Kalo in the name of Sukkha … According to the 1911 census, the number of them in district Firozpur was 9732.

गोल गोल गप्पा, गप्पे विच …

भीषण गर्मी है …इस गर्मी व चिलचिलाती धूप में हर कोई हैरान परेशान तो हो ही जाता है…गर्मी से बचना भी है…फिर पानी पीने की इच्छा तो होगी…चलो…पानी ही पीना है तो गोलगप्पे खाकर पानी पीएं…टेस्ट भी आएगा और तरोताजा भी हो जाएंगे…वैसे भी हर मार्केट व मौहल्ले में गोलगप्पे के ठेले वाला तो मिल ही जाता है…अगर मिल जाए तो मौका न जाने देना…हां, अगर भीड़ को देखकर गोलगप्पा खाएं तो मजा ही कुछ और आता है…यह एक ऐसी डिश है, जिसे देखते ही मुंह में पानी भर आता है…यह सिर्फ मुंह का टेस्ट ही नहीं बदलता, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है…खासकर इसके साथ मिलने वाला पानी।

             अगर आप पंजाब में हैं तो गोलगप्पा…हरियाणा में हैं तो पानी के पताशे…महारष्ट्र में हों तो पानी पुरी… उत्तर प्रदेश में पानी के बताशे या पताशी या फुल्की भी बोल सकते हैं…वेस्ट बंगाल में पुचके…उड़ीसा में गुपचुप और गुजरात में पकाड़ी के नाम से पुकारते हैं…

               बच्चे को कोई और कविता आए या न आए, लेकिन

गोल गोल गप्पा…

गप्पे विच पानी…

मेरी मम्मी रानी…

मेरा पापा राजा…

फल खाओ ताजा…

जरूर आती है…अगर नन्हें कदम चलते चलते यह कविता बोलें तो फिर गोल गप्पों का टेस्ट तो बचपन से ही शुरू हो जाता है…आप ने अगर बचपन में इसका टेस्ट नहीं लिया तो जवानी में चौंक चौराहों में खड़े होकर जरूर खाया होगा…अगर फिर भी नहीं खाया तो यह नहीं हो सकता कि आपकी नईं नईं शादी हुई हो और पत्नी के साथ घूमने निकलो तो …गोलगप्पा न खाओ…यह तो संभाव नहीं होगा!!!

           मेरे गली में ही हरी चंद गोल गप्पे बनाता है…उसके घर के आगे से रोजना गुजरना हूं…सुबह फ्री होता हूं, इसलिए गली में तीन चार चक्कर तो लग ही जाते हैं…हरी चंद भी गोल गप्पे बनाने के काम में जुटा होता है…उसकी पत्नी पूरा सहयोग करती है…वो आटे या सूजी के बाउल बनाने के बाद लोइयां बना रही होती है तो हरी चंद उन्हें तेल में तल रहे होते हैं…दोनों मिलकर सबकुछ तैयार कर लेते हैं और हरी चंद चौंक चौहारों पर ठेले पर लेकर इन्हें बेचने के लिए चला जाता है…कई बार खाये…गोल गप्पे के बाद जब पुदीने, हरे धनिया, इमली, हरी मिच, काली मिच, काला नमक, भूना हुआ जीरा आदि में मिला पानी मिलता है तो मुंह से निकल ही जाता है…नजारा आ गया !!!