
गर्मी होने के कारण मैं एक पेड़ के नीचे खड़ा था…दसवीं कक्षा के दो विद्यार्थी भी वहां आ गए…एक ने दूसरे से कहा, “शाम को खेलने चलेंगे”…दूसरा बुरझाए चेहरे से बोला, “नहीं यार, मैने टयूशन जाना है… ।”…“थोड़ा लेट चले जाना, यारी के लिए इतना भी नहीं कर सकता”। …“चल ठीक है, आ जाऊंगा”।
तब मुझे वो पंजाबी गीत याद आ गया…जो अकसर ही बोला करते थे…गीत…बड़े चेते आऊंदे ने यार अनमुले…गुनगुनाते हुए मैं कॉलेज के दिनों को याद करने लगा…वो पंगे और दंगे…दोनों…10-12 दोस्त एक साथ रहते थे न…कोई सही काम करने को कहता तो पंगे के बारे में बताता…मगर पढ़ाई से कोई सौदा नहीं…पंगों और दंगों के साथ पढ़ाई भी बराबर…सोच से जब उभरा तो देखा…दोनों विद्यार्थी जा चुके थे…मैं वहां खडा अपने कॉलेज के दिनों को याद कर रहा था…वो कालेज…जिसकी वैल्यू आज पता चल रही है।
दरअसल यहां उच्चशिक्षा के लिए यहां कोई कॉलेज नहीं था…जिस कारण इलाका शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ गया… फाजिल्का के निकट कोई कॉलेज नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को उच्चशिक्षा के लिए लाहौर तक का सफर तय करना पड़ता था, क्योंकि इलाके के इंसान परोपकारी थे और हैं…इस कारण वह फाजिल्का का भविष्य पहले सोचते हैं…लाला मुशी राम अग्रवाल ने भी यही सोचा था कि इलाके के विद्यार्थियों को उच्चशिक्षा के लिए डिग्री कॉलेज की जरूरत है…इस सोच के आधार पर ही उन्होंने एम.आर.कॉलेज की स्थापना की…मगर दुख इस बात का है कि अभी कॉलेज का निर्माण चल ही रहा था कि कॉलेज के निर्माणकर्ता लाला मुंशी राम अग्रवाल इस दुनिया से सदा के लिए अलविदा हो गए…भले ही वह इस संसार को छोड़ गए, लेकिन आज भी देश भर में उनका नाम जिंदा है…वह परोपकारी थे, लेकिन उनकी जिंदगी की दास्तान बड़ी दर्दभरी रही।

लाला सुंदर मल बांसल के तीन बेटे थे। लाला राम चंद बांसल और लाला किशन चंद बांसल से छोटे लाला मुंशी राम बांसल (जन्म 1875) का पूरा परिवार ही परोपकारी था…लाला राम चंद बांसल के घर औलाद नहीं थी। जबकि लाला मुंशी राम के घर दो बेटियां मुन्नी देवी और शिव दित्ती के अलावा एक बेटा लेख राज था…मुन्नी देवी की शादी राम नरायन (कोटकपूरा) और शिव दित्ती की शादी इन्द्र सेन (भीखी, जिला बठिंडा) से की गई…जबकि लेख राज अभी 15 साल के ही थे कि वह गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए और उनका निधन हो गया…इस दौरान वह बुरी तरह से टूट गए…
वह अमीर और परोपकारी थे…इन सेवाओं के चलते उन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से लक्खपति अवॉर्ड से नवाजा गया…इसके बाद उन्होंने मुंशी राम ने लोगों की सेवार्थ के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की…जिसे मुंशी राम चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम दिया गया और उसकी रजिस्ट्रेशन 20 फरवरी 1937 को करवाई गई…इसके संस्थापक मुंशी राम अग्रवाल, प्रधान रायजादा लाला मुकंद लाल आहूजा, लाला नानक चंद अग्रवाल और सचिव एडवोकेट सदा लाल को बनाया गया…1938 में एम.आर.कॉलेज का निर्माण शुरू करवाया गया…इस दौरान 1938 में शहर की सबसे अहम मार्किट ओलिवर गंज के निकट सुंदर आश्रम का निर्माण लाला मुंशी राम अग्रवाल ने अपने पिता सुंदर मल की स्मृति में करवाया…जिसमें एक मंदिर, लाइब्रेरी और रीडिंग रूम बनाया गया…घास मंडी में व्यपारिक फर्म (मै. सुंदर मल राम चंद लक्खपति) करने वाले लाला मुंशी राम की इलाके में कई एकड़ भूमि थी। जो दान की गई…इसमें कॉलेज और गोशाला को दान की गई भूमि भी शामिल है।
अभी कॉलेज का निर्माण ही हो रहा था कि लाल मुंशी राम अग्रवाल का निधन हो गया…इसके बाद फिरोजपुर जिले के डीसी एम.आर.सचदेव ने 4 जुलाई 1940 को कॉलेज की नींव रखी…इस मौके पर फाजिल्का के एसडीओ राय साहेब लाला विद्याधर ने भी शिरकत की…जबकि 27 जनवरी 1941 के दिन जालंधर डवीजन के कमिश्नर ए.एल. रूद्गष्द्ध क्च.क्च. ने किया…इस दौरान बी.एल. कपूर को प्रथम प्रिंसिपल बनने का सम्मान प्राप्त हुआ…कॉलेज पंजाब के मालवा क्षेत्र के पिछड़े विद्यार्थियों को शिक्षा देने में कामयाब रहा…कॉलेज में 1949 में को-एजूकेशन शुरू की गई…1951 में नॉन मेडिकल शुरू किया गया…1957 में कॉलेज को पंजाब यूनिवर्सिटी से मान्यता दी गई…1963 में हिन्दी ऑनर्स, 1966 मेडिकल और प्री मेडिकल, 1968 में बीएससी (बॉटनी और जूलॉजी), 1969-70 में अंग्रेजी ऑनर्स व इतिहास ऑनर्स की शुरूआत की गई…इस दौरान कॉलेज पूरे चरम पर था…उसके बाद वित्तीय संकट पैदा हो गया…जिस कारण कॉलेज 30 जून 1983 को सरकार ने टेकओवर कर लिया…इसके बाद 1987-88 में संख्या बढ़ी तो छह कमरों का निर्माण किया गया…1992 में स्टाफ क्वार्टर बनाए…1993 में कामर्स की कक्षाएं शुरू की गई। करीब तीस एकड़ के विशाल प्रांगण में फैले इस कॉलेज ने देश को राजनेता, शिक्षक और अनेक अधिकारी दिये हैं… इसलिए अच्छे दोस्त बनाओ…जो पंगे और दंगे से दूर रहेगा…वही अच्छा इंसान बनेगा…वरना लोग तो दुनिया में बहुत हैं…



































































