इमरजेंसी दौरान अत्याचार :- -जिन्हें 44 साल बाद भी याद करके कांप उठती है रूह

फाजिल्का: उम्र जवानी की, तेवर बहादुरों जैसे और देश पर मर मिटने का जज्बा। यह गाथा है फाजिल्का के उन 6 नौजवानों की जिनकी आयु उस समय 17 से 20 के करीब थी। वह नौजवान थे प्रेम फुटेला, जनक झांब, राजकुमार जैन, सुभाष फुटेला, आद लाल जाखड़ व महेश गुप्ता। जो उस समय आरएसएस और जनसंघ के सरगर्म कार्यकर्ता थे। जिन्होंने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के आदर्शो पर चलते हुए जवानी की उम्र में अपने घर परिवार की चिंता छोडक़र मानव अधिकारों के हो रहे हनन के विरुद्ध आवाज उठाने का फैसला किया, लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि भगत सिंह व उसके साथियों ने विदेशी सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी और इन नौजवानों ने अपने ही देश में अपनी ही सरकार द्वारा अपने ही लोगों के विरुद्ध किए जा रहे मानव अधिकारों के हनन के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जिसके परिणाम स्वरूप उक्त युवकों से बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया था जिसका विशेष उल्लेख आपातकाल के बाद प्रकाशित हुई लगभग 2000 पृष्ठों पर आधारित पुस्तक (आपातकालीन संघर्ष गाथा) में भी किया गया है।
सरकार खिलाफ सत्याग्रह
सरकार के बर्बरतापूर्ण रवैये के चलते देश भर में सरकार के विरुद्ध उठी चिंगारी फाजिल्का में भी आ पहुंची। और एक बड़े आंदोलन का रूप धारण कर गई। जिसे कुचलने हेतु तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दमनकारी नीति अपनाई थी, जिसका फाजिल्का के इन युवकों ने डटकर का विरोध किया था और अपने प्राणों की परवाह न करते हुए 26 जून 1975 को शुरू हुए आपातकाल के तहत 14 नवंबर 1975 को फाजिल्का के 5 नौजवानों ने सत्याग्रह करने का फैसला किया। गांधी चौंक से निकले यह युवक घास मंडी, बजाजी बाजार और चौंक घंटाघर से होते हुए जब प्रताप बाग पहुंचे, जहां पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया और थाने में बंद कर दिया।
ऐसे देते थे यातनाएं
आपातकाल पर लिखी पुस्तक में इस बात का वर्णन किया गया है कि पुलिस ने इन युवकों को पकडक़र पहले जमीन पर उल्टा लिटाकर एक पुलिस वाला गर्दन पकड़ लेता था, दूसरा पांव तीसरा कमर और एक पुलिस वाला उस समय के थानेदार विचित्र सिंह और डीएसपी की हाजिरी में जोर से हंटर लगाता था। फिर पुलिस की दूसरी यातना शुरू होती थी। घोटना जिसके नाम से आदमी मौत मांगता है। घोटने से व्यक्ति जीवन भर नकारा हो जाता है, घुटने काम करना बंद कर देते हैं। इसमें उल्टा लिटाकर पांवों के बीच से घोटना रखा जाता था और पांवों को 2 पुलिस वाले उपर की ओर खींचते हैं। एक पुलिस वाला बाली को उपर से खींचता था। दूसरा पुलिस वाला पांवों के उपर मुक्का मारता था। जिसके उपरांत दर्द से आदमी कराह उठता था। इस प्रकार जब दूसरी यातना समाप्त होने के बाद तीसरी यातना कुर्सी नाम से शुरू होती थी। कुर्सी यातना से व्यक्ति की हथेलियां कुर्सी के नीचे रख दी जाती थी और एक मोटा पुलिस वाला कुर्सी के उपर बैठ जाता थी। एक पुलिस वाला बाएं पांव को तो दूसरा पुलिस वाला दाएं पांव को अपनी तरफ खींचता था और दो पुलिस वाले जांघों पर मुक्के लगाते थे। जब न्यायालय में पेश किया गया और 5 दिन का पुलिस रिमांड मांगा गया। 3 दिन का और पुलिस रिमांड मिल जाने पर पुलिस वालों ने न्यायालय में बयान दिया कि पांचों के पास बम व बारूद बनाने की फैक्ट्री बरामद करने के लिए पुलिस रिमांड बढाया जाए ताकि इन आतंकवादियोंं को सख्त सजा दी जा सके।
इन लोगों ने भी काटी जेल
एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार फाजिल्का के हरबंस लाल घीक, हंस राज सपड़ा, वैद अमरनाथ, तारा चंद भूडी, वैद्य गुलाब राय जुनेजा, जगसेवक अरोड़ा, अमरनाथ चावला, ओंकार नाथ शर्मा, हंस राज तिन्ना, प्रेम धूडिय़ा, वेद प्रकाश पाहवा, अशोक डोडा, अशोक वाटस, प्रोफेसर राम प्रकाश कांसल ने भी सरकार का विरोध किया था और उन्हें भी जेल की सजा काटनी पड़ी थी।

फोटो: इमरजैंसी दौरान फाजिल्का के प्रताप बाग में रैली निकालते हुए फाजिल्का के लोग।

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