अंगना में फिर आजा रे

शहर के बीच सेठ की विशाल कोठी के साथ बरगद का विशाल पेड़ . . . जिस पर चिडिय़ा का घोंसला था . . . चिडिय़ा और सेठ की नन्हीं बच्ची परी के बीच शायद सात जन्म का रिश्ता था . . . तभी तो दोनों में गहरा प्यार था . . . जब तक दोनों एक-दूसरे को देख न लें, उन्हें खाना हजम नहीं होता . . . परी सुबह उठती और दाना पानी चिडिय़ा को खिलाती . . . चिडिय़ा भी चीं-चीं करती हुई उससे हठखेलियां करती . . . बंगला नुमा विशाल कोठी में एक ही तो पेड़ था, जिस पर कई पक्षी रहते थे। परी के पिता की कारोबार काफी लंबा चौड़ा था . . . अच्छी जमीन जायदाद थी. . . भाई बहन नहीं होने के बावजूद परी ने खुद को कभी अकेला नहीं समझा . . .चिडिय़ा थी न. . जिसे वह अपनी दोस्त मानती थी।

          एक दिन परी पेड़ के नीचे गहरी नींद सो रही थी . . . काला नाग  उसकी चारपाई के पास आ गया . . . चौकीदार व माली भी उस समय नहीं थे. . . नाग परी की चारपाई पर चढऩे का प्रयास करने लगा . . . इससे पहले कि वह परी की चारपाई पर चढक़र उसे डसता. . . चिडिय़ा ने सांप को चोंच मार दी. . . सांप रेंगकर भाग गया . . . जब परी की नींद खुली तो उसकी चारपाई पर चिडिय़ा बैठी थी. . . दोनों फिर से खेलने लगी।

       परी का पिता कोठी का दायरा विशाल करना चाहता था. . . मगर अकेला पेड़ ही उसमें रूकवट बन रहा था . . . उसने नौकर से कहा कि पेड़ को काटवा दिया जाए ताकि कोठी का दायरा विशाल व सुंदर किया जा सके . . . दो तीन घंटे में ही पेड़ काट दिया गया. . . चिडिय़ा उड़ गई, उसका घोंसला गिर गया . . . अंडे भी टूट गए . . . काफी देर तक चिडिय़ा दिवार पर उदास बैठी रही . . . क्या करती, उसके पास कोई चारा नहीं था. . .स्कूल से परी लौटी तो वहां न पेड़ था और न ही चिडिय़ा . . . हाय . . . कहां गया पेड़. . . कहां गई मेरी दोस्त . . . माली आया और बोला, बेटा . . . पेड़ कुछ रूकावट बन रहा था, जिस कारण बाबू जी ने पेड़ कटवा दिया . . . मतलब अब पेड़ की छाया नहीं मिलेगी, मेरी दोस्त चिडिय़ा नहीं आयेगी . . . कभी नहीं आएगी . . . बोलते हुए परी एकदम नीचे गिर गई . . . माली, चौकीदार दोनों भागे और परी को उठाया. . . एक ने मालिक को फोन पर सूचना दी . . . पिता आते ही चिल्लाने लगा, परी . . परी . . . मेरी लाडली परी . . . क्या हुआ है तुझे  . . . आंखें खोल परी . . . मुख से बोल. . . बोल परी, मैं तेरा पापा हूं . . उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई . . .चौकीदार व माली भी घबराए हुए थे . . . परी बोली, अब वो नहीं आयेगी . . . कौन नहीं आयेगी . .. उसके बिना मैं जिन्दा नहीं रह सकती, अगर जिन्दा रह भी गई तो दोस्त के बिना जिन्दा रहने का क्या फायदा. . . पापा बोले, परी, कौन नहीं आयेगी, बोलो परी, मैं तेरा पापा हूं, तेरे लिए मैं दुनिया की हर चीज पैदा कर दूंगा . . . इतने में डाक्टर भी आ गया. . . नब्ज चैक की . . .बोला . .. सॉरी. . . यह सुनते ही चीख पुकार . . . रोने की आवाजें . . . आसपास काफी लोग आ गए. . . कोई धांधस बंधा रहा था तो कोई रो रहा था . . .

         कई दिन बीत गए . .. परी के पिता को परी व चिडिय़ा खेलते हुए नजर आते . . . आवाज आई . . .पापा. . . यहां पेड़ लगा दो. .. पेड़ बड़े हो जाएंगे तो मैं आऊंगी .. . मेरी दोस्त चिडिय़ा भी आयेगी . . . हम दोनों यहां खेलेंगी . . . रौणक फिर से शुरू हो जाएगी . . . उसने पेड़ उगाए. . . पेड़ बड़े हो गये और उस पर चिडिय़ों की चीं चीं शुरू हो गई।

                अचानक चिडिय़ों की चहचहाहट से मेरी आंख खुल गई . . . देखा तो सुबह के 9 बज चुके थे . . .गली में देखा तो एक समाजसेवी संस्था के सदस्य घर घर पौधे बांट रहे थे. . . मेरे पास आये और बोले . . . पौधे लगाओ और चिडिय़ों चहचहाहट सुनो . . . मन और दिमाग दोनों को शांति मिलेगी . . . मैने भी पौधा लिया और अपने घर के सामने लगा दिया . . . आज वही पौधा वटवृक्ष बन चुका है . . .

             अगर आप सहमत हैं तो पौधे रोपित करो ताकि किसी की परी और चिड़ी की सुरीली आवाज हर घर में गूंजती रहे . . . . 

ओ री चिरैया – नन्ही सी चिड़िया

अंगना में फिर आजा रे

अंधियारा है घना और लहू से सना

किरणों के तिनके अम्बर से चुन्न के

अंगना में फिर आजा रे

हमने तुझपे हज़ारों सितम हैं किये

हमने तुझपे जहां भर के ज़ुल्म किये

हमने सोचा नहीं -तू जो उड़ जायेगी

ये ज़मीन तेरे बिन सूनी रह जायेगी

किसके दम पे सजेगा अंगना मेरा

(नोट: आनंद उत्सव दौरान उक्त पर आधारित एक कोरियोग्राफी करवाई गई थी।)

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