
बात हो रही थी कि उस समय फाजिल्का इलाका सुरक्षित नहीं था…घने जंगल थे…डाकू, तस्कर और जंगली जानवरों का खौफ था…जब यहां बोदला, वट्टू, चिश्ती पहुंचे और उन्होंने इलाके को आबाद कर दिया…इनसे पहले जहां से सुलतान गुजरे…कबीले गुजरे… वहां लंबी चौड़ी सडक़ बन गई…भारत के गजट अनुसार दिल्ली के निकट नरेल से एक लंबी चौड़ी सडक़ फाजिल्का तक आती थी…जो फाजिल्का के गांव मौजम तक पहुंचती थी…जो नरेल से हिसाब, फतेहबाद, सिरसा, डबवाली, मलोट, अरनीवाला से होते हुए गांव पैंचांवाली के निकट से फ्रीडम फाईटर रोड से होती हुई गांव मौजम तक पहुंचती थी…इसके आगे सतलुज दरिया था और वहां किश्ती पार करके जाना पड़ता था…उसके बाद वही सडक़ जिला औकाड़ा तक जाती थी…जिसकी संख्या विशाल भारत की सब से चौड़ी और लंबी सडक़ों में की जाती थी…।
फाजिल्का और सिरसा के निकट पक्की सडक़ें एक या दो मील तक ही लंबी थी…जो कच्ची सडक़ हजारों मील लंबी थी, वो फाजिल्का से गुजरती थी…इसके साथ ही एक अन्य चौड़ी सडक़ पिछली सडक़ के पश्चिम से शुरू होती थी और जिले सिरसा की पूरी लंबाई को तय करती हुई सिरसा से फाजिल्का वाया अबोहर से आती थी…यह सडक़ भी लंबी और चौड़ी थी…इस सडक़ को व्यापारी अधिक प्रयोग करते थे…सडक़ को प्रयोग करने वाले पाविन्दा नामक व्यापारी काबुल कंधार से चलते और व्यापार के लिए दिल्ली पहुंचते…पाविन्दा व्यापारी सर्दी के दिनों में जिला सिरसा से होकर फाजिल्का पहुंचते थे और यहां से आगे अपना कारोबार के लिए चले जाते थे…व्यापारी अपने ऊटों पर व्यापारिक वस्तुओं काजू बादाम वगैरा भरकर लाते थे… ऊटों की संख्यां दो-चार नहीं, सैंकड़ों होती…जब वह चलते तो ऊंटों की एक बड़ी कतार होती थी…यह काजू बादाम लेकर आते थे…फाजिल्का में इनकी मंडी भी लगती थी…तभी तो यहां के लोग ताकतवर थे।
माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट व मेरे अजीज दोस्त इंकलाब नागपाल से आज मेरी बात हुई तो उनकी बात सुनकर मुझे काफी हैरानी हुई कि आजकल तो काजू बादाम के पौधे लगाने कम हो गए हैं। जबकि पहले यह खेती अफगानिस्तान में बहुत थी…आजकल काजू बादाम की खेती से मुनाफा नहीं रहा, शायद इसलिए…खेती कम हो गई…नईं खेती तैयार नहीं की जा रही…अगर यही हाल रहा तो 5-7 साल बाद काजू बादाम मिलेंगे ही नहीं? जाहिर है कि अफगानिस्तान में काजू बादाम पर अफीम की खेती भारी पड़ रही है…और उनकी खेती का मुनाफा पंजाब के साथ साथ देश के कई अन्य प्रदेशों में भी भारी पड़ रहा है…सोचने वाली बात है…कभी तो यह भी सोचता हूं कि मुझे कौन सा मां ने काजू बादाम खिलाए हैं …केे मुहावरे की जगह भविष्य में यह न सुनना पड़े कि…मुझे कौन सा मां ने अफीम खिलाई है…!!!!(समाप्त)
The Rewari-Firozpur Railway, opened
in 1885, runs across the north-east of the District, passing through Sirsa town. There are no masonry roads in the District, except for a mile or two in and near Sirsa and Fazilka towns. A good wide unmetalled road enters the District at Narel from Hissar, and runs by Sirsa, Dabwali, and Fazilka to Muazzam on the Sutlej, where there is a ferry, and so on to Okara, a station on the Sind, Punjab, and Delhi Railway in Montgomery District. Another broad road runs to the west of this, nearly the whole length of the District from Sirsa via Abohar to F’azilka, and is much used by Povindah traders from the frontier, who annually pass through the District in the cold weather, with their long strings of camels laden with merchandise from Kabul and Kandahar, on their way to Delhi and the North-Western Provinces. Other roads run from Sirsa north-east to Rori, south-east to Darba, south to Jamal, and west to Ellenabad ; from Malaut south-west to Abohar and Usman Khera, and north to Muktsar ; from Fazilka north- east towards Firozpur, and south-west towards Bahawalpur. Except during the rainy season, there are no serious obstacles to traffic, though in the dry hot weather great difficulty is sometimes experienced from want of water. Total length of District roads (1884-85), 500 miles; railways, 35 miles; navigable rivers, 20 miles.
“The imperial gazetteer of India”

Jabardast
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Thanks Sir
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