Indo-Pak Partition-8

भाईयों की तरह रहते थे…हिन्दु, मुस्लिम और सिख…मगर अचानक जब देश के विभाजन की घोषणा हुई तो एक तरफ हिन्दु सिख और दूसरी तरफ मुसलमान…दुश्मन बन गए एक दूसरे के…एक दूसरे को मारने काटने लगे…मुकाबले भी डटकर हुए…मुकाबले क्या…दंगे थे…धन…जमीन…जायदाद…चाहे सबकुछ लुट जाए…कोई खास चिंता नहीं थी…चिंता थी…महिलाओं की आबरू बचाने की…उन दरिंदों से…जिन्हें किसी की मां, बहन और बेटी से कोई मतलब नहीं था…धन लूटना…मार काटना…महिलाओं की आबरू लूटा…बस…विभाजन का वो यही फायदा उठाना चाहते थे…मगर कईयों ने या तो महिलाओं को दरिंदों से बचाने के लिए मार दिया…या फिर…महिलाओं ने कुंए…या…हैड में छलांग मारकर आत्महत्या कर ली…क्या करती बेचारी…वो सोचती थी…इज्जत है तो सबकुछ है…इज्जत ही नहीं तो…जीने का क्या फायदा…बस यही हुआ था गैहरा राम के साथ भी…जिनकी आज हम बात कर रहे हैं।
देश के विभाजन से पहले जिला मिन्टगुमरी की तहसील ओकाड़ा के गांव गैंबर में रहते थे गैहरा राम…देश का विभाजन हुआ तो दुश्मनों का काफिला उन पर टूट पड़ा…वह लुटेरे थे…हैवान भीे…धन लूटने के अलावा उनकी मंशा महिलाओं की आबरू से खिलवाड़ करने की थी…मगर गैहरा राम को यह सहन नहीं था…दरिंदे उनके परिवार पर टूट पड़े…इससे पहले ही उसने अपने परिवार की 14 युवतियों व महिलाओं की हत्या कर दी…फिर वह टूट पड़े…दरिंदों के काफिले पर…डटकर मुकाबला किया…तीन दरिंदों को मौत के घाट उतार दिया।

परिवार में कुल 20 सदस्य रह गए…वह सभी वहां से चल पड़े…एक काफिले के रूप में…सबकुछ वहीं छोडक़र…तेजी से दौड़े…परिवार में दो तीन दूधमूंही बच्चियां भी थी…याद आया…एक मुस्लिम दोस्त…जिसे तीनों को सौंप दिया…वायदा किया कि वह उन्हें कुछ माह बाद ले जाएंगे…जब हालात सुधर जाएंगे तो…बस…फिर चल पड़े भारत की ओर…गांव के निकट ही रेलवे स्टेशन था…ट्रेन पर चढ़ गए…ट्रेन जब गांव रायविंड पहुंची तो मुस्लिमों के एक काफिले ने ट्रेन घेर ली…बोले…ट्रेन का इंजन हमारा है…ट्रेन डिब्बे तुम्हारे हैं…विवाद छिड़ गया…साथ आर्मी थी…विवाद तो निपट गया…मगर…भारत से इंजन आ जाने के बाद…समय लगना था…आर्मी ने संदेश भेजा हुआ था…और…भारतीय इंजन की इंतजार थी…इंजन आया और…फिर वहां से चले…भारत की तरफ…ट्रेन पर…दूसरे दिन शाम छह बजे पहुंचे फिरोजपुर।
गैहरा राम के पोता पहलवान चंद पुत्र कर्म चंद (गांधी नगर फाजिल्का) बताते हैं कि उस समय उसकी आयु करीब 14 साल थी…और उन्हें याद है…वो दिल दहलाने वाली घटना…जब रायविंड से ट्रेन पर कासू बेगू पहुंचे तो पता चला कि इससे पहले पाकिस्तान से जो दो ट्रेन आई थी…उनमें सिर्फ शव थे…हिन्दु और सिखों के…वह ट्रेन से उतरे और शरणार्थी कैंप में चले गए…यहां भी मौत मुंह फैलाए हुए खड़ी थी…अगर पता न होता तो उन्हें मरने से कोई रोक नहीं सकता था…क ारण…कारण यह था कि विभाजन दौरान मुसलमानों ने वहां के कुंओं पर जल स्त्रोतों में जहर मिला दिया था…ताकि…हिन्दु और सिख पानी पीकर मर जाएं…मगर किसी को पता चल गया था…इसलिए वह प्यासे रहे…
वहां घोषणा हुई…जो मिन्टगुमरी से आए हैं वो परिवार सहित अंबाला चले जाएं…उन्हें वहां जगह मिलेगी…अंबाला पहुंचे…दो दिन इंतजार किया…फिर सोनीपत में जगह अलॉट होने की बात कही गई…वहां से भी खाली हाथ लौटना पड़ा…फिर फिरोजपुर लौट आए…वहां 6 माह काटे…वहां से फिर चले रंगले बंगले फाजिल्का की तरफ…जहां वह 12 साल तक किराए के मकान में रहे…बाद में बजाजी बाजार में कपड़े का कारोबार शुरू किया…आज परिवार के साथ खुशी से जीवन यापन कर रहे हैं।(Writer- Krishan Taneja 92566-12340)
