Indo-Pak Partition-10

1947 का गदर…खौफनाक मंजर…अगर कोई भूलना भी चाहे तो मुमकिन नहीं…विभाजन के दौरान इधर अबोहर, मलोट तक…उधर पाकपटन तक…रक्त ही रक्त…चाहे वह समासाटा से फाजिल्का आने वाली ट्रेन हो…या फिर जरनैली सडक़ यानि बॉर्डर रोड … दोनों रक्त से भरे…क्या नहर…सूए…नाले… सब रक्त से लाल … लाशें … लाशें … और लाशें … कोई बुजुर्ग की…कोई लडक़ी या महिला की…कोई दूधमुंहें बच्चे की तो कोई किसी अन्य उम्र के व्यक्ति की…मौत किसी का मजहब देखकर उनके सिर पर नहीं मंडराई…सिर्फ और सिर्फ मजहब ही मौत को खींचकर लाया…कोई मजहब के नाम पर हत्यारा बना तो कोई मजहब के नाम पर लुटेरा…मगर दोनों के खून का रंग एक जैसा … Fazilka To Haveli … Pakpatten तक … Karachi… Ferozepur… Lahor … Amritsar …Hoshiyarpur … दिल्ली … यह कहा तो क्या कहा… पूरा देश था… सिर्फ एक था …मगर दो टुकड़े हो गए… लाखों लोग इधर से उधर … उधर से इधर … फाजिल्का की सरहद से चार लाख लोग आए और गए …काफिलों के काफिले … एक ही रास्ता था …बॉर्डर रोड … कोई और रास्ता नहीं था … दूसरी तरफ दरिया था न … इसलिए …बॉर्डर रोड ही एक मात्र रास्ता था … सुलेमानकी हैड पार करके आए थे लोग … बॉर्डर रोड के रास्ते से … इस रास्ते पर लाशें ही लाशें … आर्मी एक काफिले को रोक लेती …

फिर दूसरा काफिला आगे जाता … इसके बावजूद जहां आमने सामने हुए … वहीं टकराव … फाजिल्का के गांधी नगर में भी टकराव … राजा सिनेमा के निकट खूनी टकराव हुआ … आखिरकार यहां प्रशासन को हवाई फायर करने पड़े … अगर शमशेर सिंह की माने तो उन्होंने अपने 6 माह के बच्चे को जब पानी पिलाना चाहा तो वह मौजम माइनर पर पहुंचे … पानी का रंग लाल था … उसने पत्नी का दुपट्टा लिया … पानी में भिगोया … और बच्चे के बुल गीले कर दिए … काफी थक चुके थे वो राम नगर (पाकिस्तान) से परिवार सहित पैदल आए थे न इसलिए … जब वह अबोहर रोड पर गांव रामपुरा पहुंचे तो उन्हें शवों के उपर से गुजरना पड़ा … उधर रेलवे स्टेशन पर पाकिस्तान से आई ट्रेन जब रूकी तो रक्त से सने डिब्बे … शवों के ढेर … पास स्टेशन के सामने एक कूंआ था … वो भी लाशों से भरा हुआ …

मैं मलोट था … वहां मुझे एक बस स्टैंड पर एक बजुर्ग मिला …उसने भी फाजिल्का आना था … एक बस में बैठ गए हम … बातें चली तो बोला … विभाजन के बारे में न पूछें … खैर उससे रहा भी न गया … आंखों में अश्क भरकर बोला … मैने दुख झेला है … परिवार सहित ट्रेन पर फाजिल्का तक आ तो गया … मगर जब साधू आश्रम रोड पर पहुंचा तो मुझ पर काफिर टूट पड़े … देखा तो मैं और मेरा परिवार भागने लगा … जिधर किसी को जगह मिली … तीन साल का बच्चा मेरे पास था … काफिर मेरे पीछे तो उन्होंने मुझे पकड़ लिया … मेरी जेब में 70 रूपये थे निकाल लिए… मारपीट करने लगे … मैने रोका तो एक ने एकदम से बच्चे के पेट में नेजा मार दिया … मैं चिल्लाया … मगर चल न सका … दूसरे काफिले की आवाज सुनकर वो भाग गए … बहते अश्कों से बोला … फाजिल्का के गांव गंजू हस्ता जाता हूं…रिश्तेदारों के पास … मगर रेलवे स्टेशन के निकट उस रोड पर नहीं जाता … रोड तो क्या … रेलवे स्टेशन पर भी नहीं जाता … विभाजन के बाद कभी ट्रेन पर नहीं चढ़ा … देखता हूं तो दर्द होता है … वो दर्द … जो विभाजन ने दिया था … आज तक नहीं भूला … न मुझे … न किसी अन्य को … जिसने इस दंश को झेला है।
