
आप किसी भी साईड से आएं…Train से आएं या Bus से…Abohar से आएं या Ferozepur से…Malot से आएं या फिर सरहदी गांवों से…आप शहर के बीच स्थित Clock Tower तो पहुंच ही जाएंगे…वहां से आप Jand Bazar जाएंगे तो कुछ ही दूरी पर जाकर आप Left Side को मुड़ जाएं…वो Mehrian Bazar को जाएगी…आगे अबोहर रोड से मिल जाएगी…आप ने आगे नहीं जाना है…बस, कुछ ही दूरी तक जाकर जब आप Right Side की तरफ जाएंगे तो आगे एक हवेली नजर आएगी…जिस पर लिखा है… HAVELI Rai Sahab Seth Sheopat Rai Periwal (हवेली राय साहिब सेठ शोपत राए पैड़ीवाल)…जब आप हवेली के अंदर जाएंगे तो देखते ही रह जाएंगे…वही Old Look …जो 1845 में था…

यह वही हवेली है, जहां बीकानेर रियासत के राजा गंगा सिंह सहित फाजिल्का में आने वाले हर ब्रिटिश अधिकारी और नेताओं का आना जाना रहा है…इस हवेली में ही इलाके के विकास के लिए योजनाएं तैयार की जाती थी…अब किसी मूलभूत ढांचे में परिवर्तन किए बगैर इस हवेली को वही ओल्ड लुक से संवारा गया है जो 174 साल पहले था…

नगर कौंसिल में 11 साल तक प्रधान रहे सेठ शौपत राय पेड़ीवाल और 34 साल तक पार्षद व कई साल उपप्रधान रहे सेठ मदन गोपाल पेड़ीवाल की ओर से निर्मित इस हवेली की हर कलाकृति को भी बरकरार रखकर सजाया गया है…फाजिल्का रत्न अवार्डी सुशील पेड़ीवाल ने इसे इलाके की सबसे पुरानी और सुंदर बनाया है..

फाजिल्का में बंगले का निर्माण 1844 में ब्रिटिश अधिकारी वंस एगन्यू ने करवाया तो इसके एक साल बाद ही इस हवेली का निर्माण सेठ आईदान ने 1845 में शुरू करवाया था…उन्होंने पोली के अलावा दो कमरे, बाहर के चौंक और मुख्य द्वार का निर्माण करवाया…शेष भाग 1918-20 में सेठ शौपत राय ने करवाया…हवेली के कमरों की दिवारों पर पोर्शलीन टाइल्स और छत्तों पर सिलवर पेंट व काल्स सिलिंग छत्तों का निर्माण 1935 में करवाया गया…

भारत विभाजन से पूर्व कौंसिल अध्यक्ष रहे शौपत राय, उपाध्यक्ष रहे मदन गोपाल और विभाजन के बाद दो बार अध्यक्ष रहे सेठ लक्ष्मी नारायण पेड़ीवाल का जन्म इस हवेली में ही हुआ है…शौपत राय और उसके तीन बेटों का संयुक्त परिवार एक अप्रैल 1968 तक इस हवेली में रहा…मगर शौपत राय के निधन के बाद हुए बटवारे अनुसार यह हवेली राम प्रसाद के पास रही…जबकि गंगा प्रसाद को बंगले के निकट बगीचा दिया गया…सेठ लक्ष्मी नारायण को हवेली के सामने कोठी दी गई…

राम प्रसाद की दो लड़कियां थी। माता पिता के स्वर्गवास हो जाने के बाद उन्होंने यह हवेली अपने चचेरे भाई सुशील पेड़ीवाल को बेच दी…अब सुशील पेड़ीवाल व उनके पुत्र शैलेष व सिदार्थ ने बगैर किसी मूलभूत ढांचे में परिवतन करते हुए इस हवेली को ओल्ड लुक दिया है…जिसे देखने के लिए भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं…

हवेली में विभाजन से पहले प्रयोग किए जाने वाले दीये…लालटेन…बैल आदि मौजूद हैं…हवेली के दरवाजे पुराने हैं और उन्हें ताला भी पुराना लगाया है…इसके अलावा ऐतिहासिक फोटो से हवेली लबरेज है…हवेली के अंदर खुला हॉल बनाया गया है…चार मंजिला इस हवेली की छत्त पर चढऩे से शहर के हर कोने को निहारा जा सकता है…

1841 में सूरतगढ़ से फाजिल्का में आकर बसने वाले इस परिवार ने फाजिल्का को क्लॉक टावर…जनाना अस्पताल…पेेड़ीवाल धर्मशाला…बठिंडा…सूरतगढ़ और बनारस में धर्मशालाएं…श्री मुक्तसर साहिब के गुरूद्वारा में तालाब दिया है… इस परिवार को ब्रिटिश सरकार की ओर से राय साहिब के खिताब से नवाजा गया था…इसके अलावा भामा शाह अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है…

सुशील पेड़ीवाल का कहना है कि पेड़ीवाल परिवार की ओर से पंजाब… हरियाणा और राजस्थान में जो धरोहरें बनाई गई हैं…उनकी देखभाल लगातार की जा रही है…अगर कहीं कोई कमीं है तो उसे दूर करने का प्रयास करेंगे…वह बताते हैं कि फाजिल्का की धरोहरों को भी संवारा जाएगा…(Lachhman Dost -Whatsapp no. 99140-63937)
