
Indo-Pak Culture
लोकी पहनदे वलायती टोटे, मैं फुलकारी नूं…पंजाबी कवि की यह पंक्ति फुलकारी का महत्व बताती है…भले ही पुराना पहनावा और आभूषण एग्रीकल्चर युनिवॢसटी लुधियाना के अजायब घर की शान बनकर रह गई है, लेकिन भारत पाक सरहद पर बसे गांवों के तकरीबन प्रत्येक घर में लड़कियों की ओर से की गई हाथ की कढ़ाई और सिलाई से बना पहनावा आम मिल जाता है…

दशकों पहले लड़कियों की शिक्षा की तरफ कम ध्यान दिया जाता था।…वह सिर्फ घरेलू कार्य करती थी…घर में बैठे कढ़ाई…सिलाई और कताई की कला को उन्होंने ऐसे चार चंाद लगाए कि यह पंजाबी संस्कृति की अनमोल कला बन गई…बेटी जन्म लेती तो मां को केवल बेटी के दहेज की चिंता होती…उस दहेज ने कढ़ाई, सिलाई और कताई को जन्म दिया…उस समय की उपज है फुलकारी। आज से करीब आठ दशक पहले फुलकारी कला अपने यौवन पर थी…तब युवतियों को उनकी माताएं फुलकारी कला में निपुण कर देती थी…युवतियां पीपलों की छाया में चरखे पर सूत कातती…फिर जुलाहे से खद्दर बुनवाती और उसे रंग करके उसकी फुलकारी निकालती थी…फुलकारी निकालने वाला खद्दर लाल, काला या पीले रंग में रंगा जाता था… कपड़े पर धागों की गिणती करके उस पर डिजाइन तैयार किया जाता था…कढ़ाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले मौटिफ मेंं मोर, तोते, चिडिय़ा, शेर, हाथी और बेल–बूटे होते थे।

समय ने रंग बदला और कढ़ाई की सामग्री भी बदल गई, लेकिन कढ़ाई का तरीका आज भी वही है। फुलकारी कला के कई रूप हैं, जैसे बाग…वास्तव में यह हस्तकला का सर्वोत्तम नमूना हंैं।…वस्त्र पर इनकी कढ़ाई के नीचे से तो कपड़ा नजर ही नही आता…इस पर फूल जैसे प्राकृतिक मौटिफ भी निकाले जाते हैं…यह कपड़ा जब महिलाए सिर पर ओढती हैं तो विवाह का नजारा ही बदल जाता हैं…विवाह पर बाग फुलकारी तोहफे के रूप में भी दिया जाता हैं…महिलाएं इस तोहफे को बहुत संभाल कर रखती हैं…

दूसरी फुलकारी चोप हैं, जो सिर्फ किनारे पर कढ़ाई के रूप मेंं होती हैं…सोभ्भर फुलकारी का तो कहना ही क्या! थोड़ी-थोड़ी जगह छोडक़र की गई कढ़ाई बड़ी प्यारी लगती हैं…शगुन मुताबिक सोभ्भर फुलकारी नानी आपनी दोहती को शादी मेें देती हैं…जिस पर नथली जैसा डिजाइन बुना होता हैं…इसके अलावा भी कई फुलकारियां हैं…जो महिलाओं के दिमाग की खोज हैं…तकरीबन हर दूसरी लडक़ी के सिर पर फुलकारी कला का नमूना देखने को मिलता हैं…गांव के पीपल की छाया में युवतियां फुलकारी निकालती हैं तो शगुनों के गीत उनके हाथों की सफाई को चार चांद लगा देते हैं…अगर पंजाबी लोकगीत सुने तो उनमें फुलकारी का भी जिक्र आता हैं…पंजाबी गायक बलकार सिद्वू ने भी आपने गीत- तू फुलकारी कढ़दी, कढ़े तेरी फुलकारी साडी जान- में फुलकारी की प्रशंसा का खुलकर जिक्र किया हैं…लडक़ी शादी के बाद जब ससुराल जाती है तो वहां उसकी नंनद भी अपनी भाभी के हाथ से कढ़ाई की गई फुलकारी को संभाल कर रखती हैं और तारीफ के साथ भाभी को श्ुाभाशीष देती हुई कहती हैं- वीर मेरे ने कुड़ती दित्ती, भाभो ने फुलकारी, लेकिन अफसोस है कि आज फुलकारी का तोपा हाथ से कम और मशीनों से ज्यादा निकाला जाता हैं…इसलिए ही तो पंजाबी गायक गुरदास मान ने अलोप हो रही फुलकारी कला पर एक गीत बनाया हैं, जो आज भी कानों में गंूजता हैं- घघरे वी गए, फुलकारियां वी गईयां, फिर भी ग्रामीण युवतियां ने अलोप हो रही इस विरासत को कायम रखा हुआ है। (Lachhman Dost Whats App No. 99140-63937)
