नवाबों सा आनंद देती है बान की चारपाई और मूढ़ा

एक युग थाजब लोग खुले आसमान के नीचे धरती पर सोते थे, लेकिन समय के साथसाथ मनुष्य का दिमाग विकसित हुआ और अपनी जरूरत मुताबिक वस्तुएं बनाने लगापहले मनुष्य जंगल से घासफूस लेकर आता और उसे नीचे डालकर उस पर सो जाताघास पर सोने से आराम मिलाफिर उसकी सोच बदली और जंगल से ऐसी लकड़ी मिली, जिसकी उसने चुगाठ बना लीघास की रस्सी बनाई और तैयार कर ली चारपाईसमय बदला और वाण से चारपाई बननी शुरू हो गईशीशम की लकड़ी के पावे और चुगाठ को शकल देकर जब वान से चारपाई तैयार की जाती तो उस पर आराम करने का भरपूर आनंद प्राप्त होता थाचारपाई की खासियत बताते हुए किसी कवि ने लिखा है।

वे थानेदारा ! ऊच्ची हवेली पा !

वे थानेदारा ! दो मंजीयां दी था !

असीं वी सों गए, तुसीं वी सों गए,

भूंजे सोऊगी तेरी मां

आप वान से बनी चारपाई पर बैठो या फिर मूढ़े पर…इन पर आराम फरमाने से शरीर तो तंदरूस्त रहेगा ही और जो आनंद आएगा वो अलग…भले ही कारीगरों का यह एक रोजगार है, लेकिन आजकल इनका प्रयोग कम होने के कारण उनका रोजगार भी धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है…जबकि हमारा यह अमीर और पुराना विरसा है…जबसे फाजिल्का आस्तित्व में आया है…तब से ही दस्तकारी यहां के लोगों का रोजगार बना हुआ है…मगर आधुनिक विज्ञानिक व पदार्थवादी युग के बहाव में आए परिवर्तन और आज के फैशन के कारण दस्तकारी अलोप होने लगी है…बैठने के लिए मूढ़े की जगह कुर्सी और सोफे ने ले ली है…वान से बनी चारपाई के प्रयोग की जगह मार्किट में प्लास्टिक की चारपाई को प्राथमिकता दी जाने लगी है…जिन वस्तुओं को कड़े परिश्रम से कारीगर ने तैयार किया था…वह तो मार्किट में सस्ती और आसानी से मिल जाती है…जिस कारण दस्तकारी की कदर-ओ-कीमत कम होने लगी है।

Mooda

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