Mosque at Sukhera Basti (Patel Nagar Abohar) bulit by Bagh Ali Sukhera in the memory of his mother. (Photo Courtesy :- Abohar Digital Museum: History and Memory )
देश भर में दिवाली मनाई जाती है, मगर भारत-पाक सरहद से सटे पंजाब के सरहदी जिलों के 153 गांव ऐसे हैं जो जिनमें दिवाली पर्व नहीं मनाया जाएगा।जबकि रैवेन्यू रिकॉर्ड में इन गांवों की भूमि की हदबंदी भी है, लेकिन आज इन गांवों में कोई बसासत नहीं है। ये गांव फिरोजपुर में 39, अमृतसर 39 और 75 गुरदासपुर जिले से संबंधित हैं। इन बेचिराग गांवों की दास्तान अजीब है। जब भारत विभाजन हुआ तो रेड क्लिफ आयोग ने एक लाइन खींचकर देश का बटवारा कर दिया। जिस कारण कई गांव दोनों देशों में बंट गए। इनमें 153 गांव ऐसे हैं जिनकी आबादी वाला हिस्सा पाकिस्तान में चला गया और कृषि योज्य भूमि वाला हिस्सा भारत में रह गया। इस कृषि वाली भूमि पर कुछ लोग बसे, लेकिन 1965 व 1971 के भारत पाक युद्ध और हदबंदी के कारण वह लोग भी मकान छोडक़र अन्य गांवों में बस गए। अब वहां सिर्फ कृषि योज्य भूमि है। इस संबंध में रेवन्यू विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से बनाया गया हदबस्त नंबर आज भी लागू होने के कारण पटवारी और कानूनगो के बसतों में 1880 व 1912 वाला हदबस्त नंबर चला आ रहा है।
Villages of Fazilka subdivision Khokhar, Gulshah, Jhangad, Jeevanpura, Kandarke, Ganjbakhsh Saini, Mohammad Usman and Mohammad Asman, villages of Jalalabad, Bahk Hasta Hithad, Lakkhevali Hasli, Lakkhe Hithad, Chakk sarkari 1 or 2, Chakk sarkari Mahi, Gatti Haasal, Lamochadkal Hithad, Guru har sahai ke Dona Ghugi and Dona gudar Panjgariya, Dona Bahadur K of Mamdot, Dona Raja Dina Nath, Fattewala Utad, Jaimal Wala, Gatti Teluwala Mai , Gatti Gasta number 1, Ferozepur ke Theth, Sodiwala, Ali Alakh, Lamochad, Gandu Kilcha Hithad, Bala Megha, Jama Megha, Chakk Pahar Singhwala of Jeera and Bodal Baga of Makhu, Bhurian, Bhedawala, Tibbi Bandra, Dhangarh, Hidiyat, Ullashah villages are Bechirag. (Lachhman Dost- whats app 99140-63937)
Bechirag Village Jhangar (photo- mr. Pardeep Kumar)
Indo Pak borderके निकट एक गांव है Alam Shah …काफी प्रसिद्ध है…सुंदर भी…हालांकि सरहद पर बसा होने के कारण इस गांव के बाशिंदों को कई बार उजडऩा पड़ा…इसके बावजूद ग्रामीण बुलंद हौंसले वाले हंै…खेती के अलावा पशु पालन इन का धंधा है…यह गांव पशु पालन के लिए आज नहीं…देश के विभाजन से पहले भी प्रसिद्ध था। अगर बात भारत विभाजन से पहले की करें तो फाजिल्का व आसपास के गांवों में अधिकांश संख्या मुस्लिम परिवारों की थी…इनमें गांव आलमशाह भी था…जिसमें मुस्लिम परिवार ही रहते थे…इस गांव का मुखिया Mian Alam Shah Bodla था…जिसने यह गांव बसाया था…अपने नाम पर…काफी मशहूर व्यक्ति था…पशुओं को वह काफी प्यार करते थे…परिवार की तरह…धंधा भी था पशु पालन और शौंक भी…शायद ही कोई पशु मेला हो…जहां उनका पशु विजेता न होता…हरेक मेले में मियां आलम शाह के पशु की धूम…वैसे पशुओं के शौकीन तो फरीदकोट के Maharaja भी थे…उनके पास भी कई पशु थे…दोनों दोस्त भी थे…एक बार जब पशुओं के दूध दोहन का मुकाबला हुआ तो मुकाबला मियां आलम शाह व नवाब की भैंस में था…दोनों ने अपने अपने पशुओं पर मान था…मुकाबला शुरू हुआ…दोनों की भैंसों का दूध दोहन किया गया…हुआ क्या…विजय मिली…मियां आलम शाह की भैंस को…वो भैंस Maharajaको भी पसंद आई…उसने भैंस खरीदने की ठान ली…व्यापारी भेजे…बात न बनी तो दोस्तों को भेजा…फिर भी मियां Bodla ने इंकार किया तो Maharajaखुद आलम शाह पहुंच गए…भैंस की मांग की…वैसे मियां साहिब भैंस देना नहीं चाहते थे…मगर जब Maharaja खुद आ गया तो इंकार नहीं कर सका…बदले में Maharaja ने मियां आलम शाह को दिया गांव सम्मेवाली, जो जिला श्री मुक्तसर साहिब का गांव है।
Alam Shah Minor
Village Alam Shah
Mian Alam Shah Bodla owner of village Alam Shah near Fazilka have very buffalos on his time Maharajaof Faridkot also very famous for buffalos On mela buffalo of Mian Alam Shah Bodla won the competition of milk, buffalo was so beautiful whom won competition in mela Maharaja was a friend of Mian Alam Ahah, he asked to get money as he wish@of this buffalo but he refused to give him at any cost Maharajasent some matual friend to Mian alam shah bodla for sake of buffalo but he again refused At last Maharajahimself came in village alam shah to Mian alam shah bodla for Buffalo On his owner Mian give him buffalo to MaharajaSahb and Maharaja Sahb give Mian alam shah bodla whole village of sammay wali due buffalo For one famouse buffalo he gave whole village to Mian Bodla
फाजिल्का की अंतिम छोर पर बसे गांव गुलाबा भैणी में स्थित एक मजार भी भारत पाक के रिश्तों को मजबूत कर रही है। यह मजार भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सरहद की जीरो लाइन पर स्थित है। जहां हर साल 17 या 18 जून को मेला लगाया गया। जिसमें भारतीय श्रद्धालुओं के अलावा पाक श्रद्धालु भी पहुंचते हैं और उन्होंने पीर बाबा की मजार पर माथा टेकते हैं। यह मेला दोनों देशों के लोगों को निकट लाता है। भारत-पाक की पुरानी संस्कृतिक विरासत का प्रतीक दोनों देशों में शांति का संदेश देता है। बात 1965 की है जब भारत-पाक के बीच युद्ध हुआ तो युद्ध के बाद अन्य गांवों से अपनी जगह छोडक़र आए ग्रामीणों ने गांव गुलाबा भैणी बसा लिया। गुलाबा भैणी के एक ओर (सरहद की तरफ) भारतीय सेना की ओर से तारबंदी की गई है। तारबंदी के पार बाबा रहमत अली की मजार है। मजार के सेवादार बलबीर सिंह बताते हैं कि 90 के दशक से पहले इस मजार पर पाक की ओर से हजारों की तादाद में श्रद्धालु माथा टेकने के लिए आते थे और दोनों देशों के पहलवानों के बीच कुश्ती और कबड्डी के अलावा अन्य खेल मुकाबले भी होते थे, लेकिन जब 90 के दशक में तारबंदी की गई तो यह मुकाबले बंद करवा दिए गए। यह भी बताते हैं कि एक बार सतलुज दरिया में काफी बाढ़ आई थी और पानी अन्य गांवों तक पहुंच गया, लेकिन मजार नहीं डूब सकी। चलो खैर, मान्यता जो भी हो, मेला तो मेला है जो दोनों देशों में प्यार का संदेश देता है।
There was a time. … when there was a Golden Track from Fazilka to Karachi. … Fazilka was also Golden at the time. … The track stopped, even gold went to iron……!!!!!11
भूल गए या याद है गब्बर सिंह, जिसकी दहशत कई गांवों में फैली हुई थी। डायलॉग मशहूर था-‘जब कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है सो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा’…याद है न सभी को गब्बर सिंह की दहशत…यह फिल्म शोले में था जो 1975 में बनी थी…ऐसा ही माड़े खां था, लेकिन वो डकैत नहीं, सिर्फ चोर था…वो भी अकेला…सतलुज दरिया किनारे उसका गांव था दोना सिकंदरी…पुलिस में उसकी पूरी दहशत थी…उसका एक दोस्त जहान खां फाजिल्का मुहम्मदन थाने में दरोगा था और ब्रिटिश अधिकारियों ने उसके दोस्त की डयूटी लगा दी कि वह माड़े खां को पकड़े…बचपन के दोस्त थे…जहान खां ने दोस्त को पकडऩे की बजाए दरोगा की नौकरी से इस्तीफा दे दिया…माड़े खां जब दो चार दरोगों के हाथ न आया तो उसे पकडऩे के लिए 12 दरोगों की डयूटी लगा दी गई…कुछ दिन बाद माड़े खां पकड़ा गया…उसे थाने लाया गया…पीटा गया…माड़े खां बोला…पीट लो…लेकिन मुझे कोई अपशब्द न बोलना…वो पिटता रहा, चोरी की बात न कबूली… दरोगा बोला, उल्टा लटका दो साले चोर को…बस फिर क्या था…दरोगे पर टूट पड़ा…पुलिस ने उसे पीटने के बाद घोड़े के पीछे बांधा और घसीटना शुरू कर दिया…मगर रास्ते में रस्सी टूट गई और वह भाग निकला…पुलिस ने उस पर गोलियां चलाई…पीठ पर गोली लगी…इससे पहले कि दूसरी गोली लगती, माड़े खां ने सतलुज दरिया में छलांग लगा दी…पुलिस दो दिन तक उसे ढूंढ़ती रही…तीसरे दिन उसका शव दरिया के पास झाडिय़ों में मिला…फिर भी पुलिस ने उस पर कई गोलियां चलाई…जब कोई हरकत न हुई तो उसकी लाश को उठाया गया…अगर हाकम सिंह (जिसने यह बताया) की बात माने तो भारत विभाजन तक किसी दरोगे ने चोर डाकू को गाली नहीं निकाली थी…लेकिन आज कई ऐसे भी पुलिस वाले हैं जो अपशब्द के बिना बात ही नहीं करते…शायद यही कारण है कि पुलिस और आम लोगों के बीच कुछ दूरियां हैं… जिन्हें खत्म करने की जरूरत है।
फाजिल्का के करीब चार किलोमीटर दूर है गांव गंजूआणा हस्ता। जहां भारत विभाजन से पहले यहां बोदला जाति के समुदाय का बोलबाला था। इनमें एक जमींदार की दास्तान बड़ी अनोखी है। उस जमींदार में खासियत थी कि वह अवैध प्रेम से नफरत करता था। वह जमींदार था गुलाम नबी बोदला। जो घोड़े रखने का काफी शौकीन था, मगर शराब से उसे नफरत थी। सुबह घोड़े पर चढक़र घूमना और दिनभर खेत में गुजार देना उनकी दिनचर्या में शामिल था। गांव मेें उनकी एक बड़ी सुंदर हवेली थी जिसकी धूम आसपास के गांवों के अलावा अन्य शहरों में भी थी। एक बेटी तथा एक बेटे का पिता गुलाम नबी का सारा दिन हवेली के बाहर गुजरता था। हां, सुबह एक घंटा वह हवेली में जरूर रहता और लोगों की मुश्किलें सुनकर उनका समाधान करता। रोजाना कई लोग उसके पास फरियाद लेकर आते। जिनका निपटारा वह मौके पर ही कर देता। इस कारण उसकी चर्चा दूर-दूर के गांवों तक फैली हुई थी। लोग उसे सम्मान सहित अदब करते थे।उस ने गांव में सूंदर मसीत भी बनवाई हुई थी –
सूर्य उदय हो चुका था। किसी तरह ब्रिटिश पुलिस को हत्या की खबर मिल गई। पुलिस हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए गांव में पहुंच गई। जहां से उन्हें हत्या का सुराग मिला और उन्होंने जमींदार गुलाम नबी को गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया। इसके बावजूद जमींदार के माथे पर कभी अफसोस नही आया। जेल में ही उसे फांसी की सजा की सूचना मिली। समय की घड़ी चलती गई। फांसी की तैयारियां शुरू हो गई। चेहरे पर काला कपड़ा लपेटकर गुलाम नबी को फांसी के रस्से के नजदीक लाया गया और उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई, तब भी उसकी जुबान से एक शब्द निकला। वह शब्द था – अवैध संबंध बनाना पाप है। अल्हा उसे कभी पनाह नहीं देता जो स्त्री पति के होते हुए अन्य व्यक्ति से संबंध बनाती है। रस्सी को उसके गले में डाल दिया गया। पलक झपकते ही गुलाम नबी की लाश रस्सी से लटकती हुई नजर आई। बरसों तक गुलाम नबी के इस किस्से की कहानी माताएं अपनी बेटियों को सुनाती रही। इस कहानी के बाद कभी गांव में इश्क की चर्चा तक नही हुई। भारत विभाजन हुआ तो गुलाम नबी का बेटा-बेटी पाकिस्तान चले गए। पीछे से खाली रह गई एक बड़ी हवेली और गुलाम नबी की दर्द-भरी दास्तान।
बात 1850 के आसपास की है। वली मुहम्मद का बेटा सादिक पशुओं का व्यापार करता था। सादिक का एक व्यापारी साथी सतलुज दरिया के पार से पशु खरीदकर दरिया के इस ओर सरकंडे के साथ बांध देता था। सरकंडे की निशानी पर सादिक पहुंचता और पशु लेकर बेच देता। पशु बेचने के बाद सादिक दूसरे व्यापारी को उसका हिस्सा अदा कर देता। एक बार सादिक के साथी व्यापारी ने दरिया के इस ओर सटे किनारे तक भंैस भेज दी। भैंस के नैंन नक्श सुंदर थे। दूध तो इतना था कि देखने वाला भी दंग रह जाता। दूसरे दिन सादिक ने व्यापारी के पास संदेश भेजा कि वह रात को भैंस लेने गया था। मगर वहां भैंस नहीं मिली। व्यापारी हैरान हो गया कि जब वह भैंस ठिकाने पर खुद बांधकर आया है तो सादिक कैसे कह रहा है कि वहां भैंस नहीं है ? व्यापारी चोर की तलाश में दरिया के इस ओर आ गया। चोर की तलाश करते-करते तीन दिन बीत गए। मगर चोर का पता नहीं चला। बात वली मुहम्मद तक पहुंची। सादिक को चौपाल में बुलाया गया। मगर सादिक ने वहां से भैंस नहीं लेकर आने की बात कही। इस बारे में दोनों ने सौगंध उठाई। अब झूठ से पर्दा उठाकर हकीकत को सामने लेकर आने के लिए वली मुहम्मद ने एक योजना बनाई। योजना मुताबिक उस सरकंडे को गवाह बनाया गया, जहां भैंस बांधी गई थी। वली मुहम्मद ने दोनों को उस सरकंडे से एक टहनी तोडक़र लाने को कहा, जहां व्यापारी भैंस बाधता था। सादिक और व्यापारी सरकंडे की टहनी के लिए चल पड़े। सादिक तो टहनी लेकर आ गया, लेकिन व्यापारी देरी से पहुंचा। उसके बाद वली मुहम्मद की ओर से सादिक और व्यापारी के पीछे हकीकत जानने के लिए भेजे गए व्यक्ति भी आ गए। उन्होंने बताया कि सादिक ने तो गांव के बाहर खड़े सरकंडे से टहनी तोड़ी है। जबकि व्यापारी ने उस स्थान पर मौजूद सरकंडे की टहनी तोड़ी है, जहां भैंस के पैरों के निशान आज भी हैं। सच्चाई कुछ हद तक सामने आ चुकी थी। इस दौरान वह व्यक्ति भी आ पहुंचा, जिसने भैंस खरीदी थी। उसने बताया कि भैंस बेचने वाला सादिक था। अब हकीकत सामने आ गई। वली मुहम्मद ने अपने फैसला सुनाया कि सादिक सजा के तौर पर भैंस का मूल्य व्यापारी को तीन दिन में अदा करेगा। साथ ही लाधुका और आसपास के गांवों में एक माह के बीच जितनी भी लड़कियों की शादी होगी। उसका खर्च सादिक उठाएगा। ऐसे न्याय की दास्तां सुनते हुए गांव लाधुका में बरसों गुजारने के बाद फाजिल्का की मास्टर कालोनी में बसे बाऊ राम कहते हैं कि कुत्तुबदीन और नजामदीन भी नयाय करते समय धर्म और परिवार को एक तरफ रखकर ही फैसला सुनाते थे।
पिछले कुछ बरसों में कई अनूठे नाम बदल दिये गए, लेकिन लोग नएं नामों का इस्तेमाल नहीं करते। वह स्थानों को पुराने नामों से ही पुकारते हैं और व्यवहार में लाते हैं। आज भी लोगों के बीच वही नाम प्रचलित है, जो कभी हकीकत में हुआ करता था। यह अनोखे नाम सिर्फ दुकानों के बोर्ड पर ही नहीं, बल्कि विजीटिंग कार्डों, बैनरों और विभिन्न वैबसाइटों पर भी आसानी से देखे जा सकते हैं। डाक पते पर यही नाम लिखे जाते हैं, क्योंकि लोग इन्हीं नामों से अभ्यस्त हो चुके हैं। हालांकि अजब गजब नामों वाले कई गली-कूचों के नाम बदल चुके हैं। इसके बावजूद फाजिल्कावासी पुराने नामों को प्रचलन में बनाये रखे हुए हैं। भले ही लोग पुरातन पंथी क्यों न कहें, लेकिन फाजिल्कावासी इन नामों से जुड़ी अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को जिंदा रखे हुए हैं और ओल्ड इज गोल्ड की तर्ज पर इन पुराने नामों को सहजे हुए हैं।
फाजिल्का में जिन्होंने घंटा घर बनवाया…जनाना अस्पताल बनवाया…1928 से 1931 तक और 1931 से 39 तक म्यूनिसिप्ल कमेटी के चुने हुए प्रधान रहे… वह पांच साल तक अबोहर में ऑनरेरी मैजिस्टे्रट थे…वह थे सेठ श्योपत राय पैड़ीवाल…जिनका जन्म मार्च 1881 में हुआ…
Photo 1939
फाजिल्का में सबसे बड़े जमींदार और जायदाद के मालिक श्योपत राय के पास दस हजार से ज्यादा घुमाव से अधिक जमीन थी…बीकानेर स्टेट और बहावलपुर रियासत में भी बहुत जायदाद के मालिक सेठ श्योपत राए अनुभवी शिक्षित और सार्वजनिक सेवा प्रेमी सज्जन थे।
Fazilka Clock Tower 1st Photo
ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से इन्हें राय साहेब के खिताब से नवाजा गया था। वह सेठ श्योपत राय के तीन सुपुत्र हुए…जिनमें सबसे बड़े सेठ गंगा प्रसाद, सेठ लक्ष्मी नारायण और सेठ राम प्रसाद…इनमें सेठ लक्ष्मी नारायण पेड़ीवाल 1960 व 1985 में नगर कौंसिल के प्रधान रहे हैं।
Fazilka Clock Tower
जिन्होंने राज्य के पूर्व कृषि मंत्री स्व. कांशी राम के कार्यकाल में शहर के ऐतिहासिक प्रताप बाग का जीर्णोद्धार करवाया और प्रताप बाग का नाम संजय गांधी पार्क रखा…स्व. सेठ राम प्रसाद पेड़ीवाल की धर्मपत्नी की याद में श्री सनातन धर्म कन्या हाई स्कूल में एक विशाल भवन का निर्माण करवाया गया है…सेठ श्योपत राय पेड़ीवाल का निधन एक अप्रैल 1968 को हुआ था…सेठ लक्ष्मी नारायण पेड़ीवाल के सुपुत्र सुशील पेड़ीवाल बताते हैं कि गेरूवाला में सेठ श्योपत राय पेड़ीवाल की याद में ट्रस्ट बनाई गई है…
Seth Shopat Rai Periwal
अगर पिछड़ी जाति को पांच-पांच एकड़ भूमि दी गई है तो वह भी पेड़ीवाल परिवार ही है… इस परिवार की ओर से हरीजन, नाई और कुम्हार को भूमि दान की गई है। यहां तक कि भूमि की रजिस्टरी का खर्च भी इस परिवार की ओर से किया गया था…इसके अलावा सेठ श्योपत राय पेड़ीवाल का इलाके में काफी रसूख था।
एक दयालु इंसान…जब सुबह सैर को निकलते थे तो उनकी जेब सिक्कों (पैसे) से भरी होती थी…उन्हें रास्ते में जो निर्धन व्यक्ति मिलता, उसके हाथ में वह सिक्के रख देते…बात भारत विभाजन से पहले की है, जब वह सर्दी के दिनों में सैर को जाते थे…एक दिन अधिक सर्दी का मौसम था…एक गरीब ठंड में कांप रहा था…अचानक उनकी नजर उस पर पड़ी तो उन्होंने अपना गर्म कोट उस गरीब को दे दिया और खुद ठंड में कांपते हुए घर पहुंचे…
Ladies Hospital Fazilka
यह शख्स सेठ मदन गोपाल पैड़ीवाल थे…जिस परिवार ने फाजिल्का को घंटा घर दिया…लेडीज अस्पताल दिया…इसके अलावा फाजिल्का, बठिंडा, सूरतगढ़ सहित कई अन्य शहरों में काफी कुछ दिया है। उनका जन्म 1874 में हुआ था…फाजिल्का के निकट सतलुज दरिया होने के कारण इलाका बाढ़ के प्रकोप में आ जाता था। अन्यों के अलावा यह परिवार ही था जो बाढ़ पीडि़तों की हर संभव सहायता करता था। आर्थिक तौर पर संपन्न परिवार और परोपकारी होने के कारण ही ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से सेठ मदन गोपाल पेड़ीवाल को राय साहेब का खिताब दिया गया। बताते हैं कि जब गंग केनाल का निर्माण हो रहा था तो उसे देखने के लिए अक्सर ही महाराजा गंगा सिंह फाजिल्का तहसील में आया करते थे। जब वह फाजिल्का आते तो वह यहां अपने एक मात्र दोस्त राय साहेब मदन गोपाल पेड़ीवाल के पास ही ठहरते थे।
Maharaja Ganga Singh
वह 1903 में नगर कौंसिल के सदस्य चुने गए और इसी साल सीनीयर उपप्रधान रहे। परोपकारी होने के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने राय साहेब का खिताब दिया और बहुत से सर्टिफिकेट भी दिए। वह श्री सनातन धर्म स्कूल के संस्थापक और व्यवस्थापकों में एक रहे। इसके लिए उन्होंने एक विशाल मैदान बनाकर भी दिया। हिन्दू सभा फाजिल्का के प्रधान और गोशाला के उपप्रधान रहे सेठ मदन गोपाल 20 साल तक ऑनरेरी मजिस्टेट व 34 साल तक पार्षद रहे। उनके चार पुत्र सूरज मल, चांदनमल, गोरी शंकर और जस राज थे। इनमें सूरज मल और चंदनमल का स्वर्गवास 1936 में हो गया। इस साल ही आपका भी स्वर्गवास हो गया। बाबू सूरज मल धार्मिक व्यक्ति थे और उन्हें साहित्य का बहुत शौंक था।
Seth Madan Gopal Perival- Fazilka
अच्छे वक्ता, लेखक और कवि सेठ मदन गोपाल ने गीता, भजनावली, व्यापार ब्यूरो, बीजगति भी लिखी। बाबू चंदनमल 9 साल तक पार्षद, सतानम धर्म स्कूल के 20 साल तक प्रधान रहे। उनका मशीनरी ज्ञान तीव्र था। बाबू गोरी शंकर सनातन धर्म स्कूल के प्रधान, संस्कृत विद्यालय के उपप्रधान, साधू आश्रम पुस्कालय के उपप्रधान के अलावा अन्य कई संस्थाओं से जुड़े रहे। बाबू जस राज 1934 में पार्षद चुने गए। सन् 1936 में वह असेसर और अटेंडन्स ऑफिसर ऑफ स्कूल रहे और सनातन धर्म गल्र्स स्कूल और गोशाला के उपप्रधान रहे । सेठ आई दान व्यापार को कुशलता पूर्वक करते रहे। उनके नाम पर आज भी एक गली का नाम आईदान है। (Lachhman Dost- WhatsApp No- 99140-63937)