जीरकपुर के वेडिंग रिसोर्ट में सभा के कार्यकर्ता एकजुट हुए। इस अवसर पर शहीद मदन लाल धींगड़ा की जीवन पर प्रकाश डाला गया और उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर हरिंदर हरजीत और एकम द्वारा देश भक्ति के गीत पेश किये गए। मोहाली जिला के नव नियुक्त अध्यक्ष परमजीत पम्मी ने इस अवसर पर कहा कि सभा के विस्तार का मकसद जरूरतमंद लोगो की मदद के लिए आगे आना है और ये मदद सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि जुल्म के खिलाफ और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष करेगी। उन्होंने कहा कि सभा ने उन्हें जो भी जिम्मेवारी सौंपी है, उसे वे बाखूबी से निभाएंगे।
इस कार्यक्रम में गुलशन अरोड़ा, मैडम कैलाश, रमन जुनेजा, संजय गिल व अन्यों ने विचार रखे और राष्ट्रीय स्तर के इस संगठन के लिए हेल्प-लाईन शुरू करने की मांग की।
मुख्यतिथि के रूप में आये प्रांतीय अध्यक्ष अतुल नागपाल ने कहा कि इसी स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें कई स्वतंत्रता सेनानी परिवार मिले थे और उन्होंने बताया था कि सरकारें उनकी कैसे उपेक्षा कर रही है, जो कि दुखदायी है। अगर देश उन्हें भूलता है तो ये बुरी बात है और वे इस बात को दिल्ली तक भी ले के जाएंगे।
इस अवसर पर उन्होंने जिला और जिले के अन्य ब्लाकों में पदाधिकारियों को भी नियुक्ति पत्र दिए , जिनमे परमजीत पम्मी, जिला अध्यक्ष मोहाली, गुलशन अरोड़ा प्रेसिडेंट डेराबस्सी, बलविंदर कवातड़ा वाइस प्रेसिडेंट मोहाली, राकेश खुराना जनरल सेक्टरी डेराबस्सी, संजय गिल मीडिया प्रभारी मोहाली, संजय बेरी वाइस प्रेसिडेंट डेराबस्सी, गुरनाम सिंह प्रेसिडेंट मोहाली क्षेत्र, सर्बजीत कौर प्रेसिडेंट हल्का डेराबस्सी वूमेन सेल, रेनू रानी वाइस प्रेसिडेंट हल्का डेराबस्सी वूमेन सैल, कुलवंत कौर जनरल सेक्टरी डेरा बस्सी वूमेन सैल, बिंदु सीनियर वाइस प्रेसिडेंट डेराबस्सी वूमेन सैल, रंजीत सिंह वाइस प्रेसिडेंट डेराबस्सी हलका, साहिल अरोड़ा वाइस प्रेसिडेंट मोहाली, अरविंद राणा जनरल सेक्टरी मोहाली और विपन शर्मा प्रेसिडेंट हलका खरड़ शमिल थे।
अभिषेक बच्चन और करीना कपूर की Film थी…Refugee…इसमें शारणार्थियों के दिल का दर्द ब्यां करने वाला गीत था…पंछी, नदिया, पवन के झौंके… कोई सरहद न इन्हें रोके… सरहद इंसानों के लिए है, सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसान होके… बहुत बढिय़ा गाना था…शरणार्थी, रिफ्यूजी, मुहाजिर कोई भी नाम पुकार लो …किन लोगों को कहते हैं यह सब…दूसरों के रहमो करम पर जीने वालों को…उन ल ोगों को…जो किसी न किसी कारण अपना घर…सबकुछ…किसी मजबूरी के कारण छोडक़र आएं हों…वो अभागे लोग…आज बात Film की नहीं होगी…उन अभागे लोगों की होगी…जिन्होंने दर्द सहा है…उनका दर्द सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं…फिर फिल्म तो क्या चीज है…बात उनकी है…जो भारत विभाजन के दौरान उजड़ कर आए हैं और आकर Fazilka या फिर किसी अन्य शहरों में आकर बसे हैं।
वो लोग भारत बटवारे के दौरान हुए कत्ल-ए-आम को आज तक नहीं भूल पाए हैं और फाजिल्का के एक बड़े हिस्से के छिन जाने का दर्द भी उन्होंने अपने जहन में समेटा हुआ है…अगर महफिल में भारत विभाजन की बात होती है तो उसकी टीस से एक बारगी तो शरीर मुर्दा सा प्रतीत होने लगता है…फिर भी उस टीस की दर्द भरी नब्ज पकडक़र दिल को दिलासा दिया जाता है…यहां के लोग हिम्मत वाले है, जिन्होंने यहां पुनर्वास कर फाजिल्का के आस्तित्व को कायम रखा…आखिर कैसे हुआ फाजिल्का के लोगों का पुनर्वास? यह दास्तान बड़ी दर्दनाक है…विभिन्न स्थानों से उजडक़र आए लोगों के तन पर न कपड़ा था और न ही पेट में रोटी…पेट की भूखी आंतडिय़ों की झलक साफ दिख रही थी…कई महिलाओं की आबरू छिन गई…जो पाकिस्तान से आए, उनके गहने…खेत…मकान…पशुधन व अन्य समान तो वहां रहा गया…जिनका बसेरा यहां पर था…वे भी बर्बाद हो चुके थे…परिवार बिछुड़ गए…कई मर गए और कई घायल हो गए…अगर पास कुछ बचा तो रोते बिलखते चेहरे, आँखों में अश्क…दर्द भरी आंहें…और बिखरी यादों के पन्ने।
फिर फाजिल्का को खुशहाल बनाने का दौर शुरू किया गया…लोगों ने कड़ा परिश्रम किया और फाजिल्का उन्नति की ओर अग्रसर होने लगा…इसके बावजूद विभाजन का दर्द नही भूला…जब-जब सरहद की तरफ नजरें जाती हैं या ख्याल आता है तो अश्क पानी की तरह बहने लगते हैं…अश्क भले ही सूख गए हों, लेकिन विभाजन की टीस और बीते लम्हों की दर्द भरी दास्तान आज भी दर्द उकेरती है, लेकिन फाजिल्का शहर में बसे बड़े दिल वाले लोगों का हौंसला बुलंद है और वे उस विशाल क्षेत्र को बनाने में जुटे हैं जो विभाजन से पहले था।
भारत पाक सरहद की सादकी चौकी पर अगर कोई कार्यक्रम हो या फिर सरहदी गांवों में एकल विद्यालय का, विश्व हिन्दु परिषद के तो वह जिलाध्यक्ष हैं…शहर में कोई समाजसेवी संस्था का कार्यक्रम हो तो एक नाम उभर कर सामने जरूर आता है…वह नाम है लीलाधर शर्मा का…
समाजसेवा का एक ये कदम
जो समाजसेवा के साथ साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब 50 वर्ष से कार्य कर रहे हैं…वह इसे शौंक तो मानते ही हैं…साथ ही कहते हैं कि समाजसेवा…अगर समाज की सेवा करेंगे तो समाज आगे बढ़ेगा…अगर समाज आगे बढ़ेगा तो देश तरक्की करेगा…बस…देश की तरक्की होती रहे…यही सेवा एक लक्ष्य है…
धार्मिकता की ओर
इस सेवा के चलते ही उन्हें देश के स्वतंत्रता दिवस दौरान फाजिल्का के सरकारी एम.आर. कालेज के स्टेडियम में हुए जिला स्तरीय समारोह में सम्मानित किया गया…यह सम्मान उन्हें जिला फाजिल्का के जिलाधीश स. मनप्रीत सिंह छत्तवाल व एस.एस.पी. स. भूपिन्द्र सिंह सिद्धू ने दिया है।
धार्मिकता की ओर
वास्तव में ही यह सम्मान प्रशासन की तरफ से श्री लीलाधर शर्मा जी को प्रदान करना एक सराहनीय कदम है…श्री लीलाधर शर्मा जी इस सम्मान के हकदार भी हैं…
Ekal Vidyalya Shiver
यह फोटो भी यादगार है बॉस-जब लीलाधर शर्मा को उनके बुजुर्गों के पैतृक गांव झगड़ोली जिला महेन्द्रगढ़ हरियाणा में आयोजित बाबा केसरी सिंह (बाबा भैय्या) के वार्षिक मेले में सम्मानित किया गया।
उन्हें इस सम्मान से नवाजे जाने पर आल इंडिया पत्रकार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रम शाह, प्रैस क्लब फाजिल्का के अध्यक्ष दविन्द्र पाल सिंह, प्रैस क्लब फाजिल्का के पदाधिकारियों व सदस्यों, नगर की अन्य धार्मिक व समाजसेवी संस्थाओं ने उन्हें बधाई दी है।
Fazilka में समाजसेवक Mr. Leela Dhar Sharma ji को सम्मानित करते हुए D.C. Mr. Manpreet Singh ji or S.S.P. Mr. Bhupinder Singh ji
बंगला (Fazilka) और हवेली …नाम में कोई फर्क नही … देखनेे में भी एक जैसे…बंगला में वन्स एगन्यु की कचहरी लगती थी तो Haveli में Lakha Wattu का न्याय होता था…लारी भी चली तो Bangla (Fazilka) to हवेली तक…मौजम रेलवे फाटक से जब लारी (bus) चलती तो लहलहराते खेतों का हरियाली का नजारा…सडक़ की उड़ती धूल का दृश्य् दिन में तीन-चार बार देखने को मिलता, लेकिन कहां गया वो नजारा? जबकि बंगला भी है और हवेली भी है…फर्क क्या है? सिर्फ यह है कि Indo-pak की अंतर्राष्ट्रीय सरहद पर लगी तारबंदी ने भारत को दो हिस्सों में बांट दिया…एक लकीर…वो लकीर जो दोनों शहरों के बीच एक लंबी दूरी बन गई…एक देश था…एक जैसे शहर थे, लेकिन आज जमीन-आसमान का अंतर है…दो अलग-अलग देश…दो अलग-अलग शहर…अगर यहां बंगले की शान नहीं है तो हवेली में भी वो जान नहीं रही, जो विशाल भारत में थी…जबकि पहला बस स्टॉप सलेमशाह और दूसरा बस स्टॉप मौजम वहीं है…उधर लौकिया, शरींहवाला और शाहसवार भी है…
मगर एक लकीर ने यह दूरियां बढ़ा दी…जिस कारण अब ये बस स्टैंड बंगला टू हवेली और बंगला टू मुलतान की बस की इंतजार कर रहे हैं… दूसरा बस स्टैंड था कॉलेज रोड़ पर…जहां से लारी मुल्तान तक जाती थी…वह भी इस लकीर की भेंट चढ़ गई…अबोहरी रोड के रास्ते से बस चला करती थी तो बीकानेर रियासत तक सैंकड़ो गांवों से होकर गुजरती थी…फिर कहां गई मेरे शहर की लारियां? अबोहरी बस अड्डा भी है, लेकिन वहां से सीधे अबोहर को लारियां नहीं चलती…लारियों की जगह अगर बस का नाम मिला तो बस स्टैंड का स्थान बदल गया…बसें कचहरी के सामने से चलने लगी…फिर यहां बन गया भीड़भाड़ वाला इलाका…थाना सिटी बनी तो माॢकट बन गई…यातायात प्रभावित होने लगा, तब बस स्टैंड का स्थान बदलना जरूरी हो गया… बस स्टैंड मौजूदा जगह यानि मलोट रोड़ पर चला गया…जहां से अब फिरोजपुर, मलोट, अबोहर और लंबी दूरी के अन्य शहरों तक बसें चलती हैं…अब बस स्टैंड डी.सी. कार्यालय के समक्ष बनाया जा रहा है…
विभाजन ने हवेली, मुलतान और बीकानेरी रोड के रास्ते से चलने वाली सारी लारियां निगल ली…आज यहां खुश्हाली का दौर है…बसें हैं, लेकिन नईं पीढ़ी के एक सवाल का जवाब नहीें…वह सवाल है – कहां गया बंगला टू हवेली-बंगला टू मुल्तान तक का सफर? जब हमारा जवाब होता है – विभाजन की एक लकीर ने निगल लिया…तब उनकी आंखों में एक सवाल और झलकता है…लकीर खींचने के हालातों का जिम्मेदार कौन है? उन्हें क्यों नहीं रोका गया? शायद इनका जवाब किसी के पास नहीं होगा…अब उन हलातों की बात उन्हें कैसे समझायें? उन्हें कैसे समझाएं कि दो भाईयों में बटवारा हो गया। हमें फूट डालो और राज करो की ट्रेन तले कुचल दिया गया…ब्रिटिश साम्राज्य ने दो भाईयों को धर्म के नाम पर बांटकर खूब फायदा उठाया…हम उनकी चंगुल में आकर दो हिस्सों में बंट गए…ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो गया…मगर दो भाईयों के बीच खींची गई लकीर बरसों बाद भी संग-संग चलने नहीं दे रही…लकीर ने न तो बंगला को हवेली से मिलने दिया और न ही मुल्तान से…लारी की यादें बाकी रह गई, जो आज भी बंगला टू हवेली और बंगला टू मुलतान की राह ताक रही हैं…मिलने की चाहत इधर भी है और उधर भी।
भारत विभाजन ने Fazilka को आर्थिक रूप से इस कदर कमजोर कर दिया कि आज तक उभर नहीं पाया…मगर जब से fazilka के Golden Track का सम्पर्क टूटा है…तब से यूं समझ लें कि फाजिल्का में व्यापार गोल्डन जैसा तो क्या…लोहे के बराबर भी नहीं रहा…हां, अगर दोनों देशो…भारत और पाकिस्तान हुकमरान नजर-ए-इनायत करें तो सिर्फ फाजिल्का ही नहीं… Pakistan के शहर Havely to Samasata और Krachi तक को आर्थिक रूप से काफी लाभ पहुंचेगा…खैर, यह बात किसी अन्य ब्लॉग में करेंगे…आज बात करते हैं इस ट्रैक की।
साल 1898 में फाजिल्का से Golden Track से शुरू किया गया था…जो फाजिल्का कराची रेल मार्ग व्यापार की दृष्टिï से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ…Golden Track ने भारत विभाजन तक फाजिल्का को एक समृद्ध क्षेत्र की ताकत बख्शी… मगर विभाजन के दर्द ने दोनों देशों में ऐसी खटास भर दी कि गोल्डन टै्रक पर सन्नाटा छा गया…हालांकि फाजिल्का के बुद्धिजीवियों ने गोल्डन ट्रैक पर रेल गाड़ी पुन: दौड़ाने के लिये देश के हुक्मरानों के सामने आवाज बुलंद की, मगर हमेशा उनकी आवाज को नजरअंदाज किया गया…अगर गोल्डन टै्रक दोबारा शुरू किया जाता है तो फाजिल्का पुन: समृद्ध क्षेत्र के रूप में उभरकर सामने आने की क्षमता रखता है…
रेलगाड़ी Ludhiana to Karachi तक वायाFirozpur. . . Fazilka. . . Amr uka.. maclodgung road – minchindabad … Bahawal Nager … Samasata. .. Khanyaar .. Rahimyaar khan … Rohri … Nawabshah.. जाती थी … भारत का माल युरोप मिडल ईस्ट और खाड़ी के अन्य देशों में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा भेजा जाता था जोकि एक सस्ता व बेहतर रास्ता साबित हुआ… मगर विभाजन के बाद गोल्डन टै्रक इतिहास में दफन हो गई…अगर हुकमरान नजर-ए-इनायत करें तो आज भी गोल्डन टै्रक गोल्डन बैंक बनकर फाजिल्का की तकदीर बदल सकती है…इस पर अधिक खर्च भी नहीं होगा…
End of Track Fazilka
लुधियाना से फाजिल्का तक और पाकिस्तान के अमरूका से समासाटा तक पहले ही ब्रॉडगेज लाइन बिछाई गई है…समासाटा से कराची तक डबल टै्रक सिर्फ व्यापारिक कार्यों के लिये प्रयोग किया जाता है… फाजिल्का से अमरूका तक सिर्फ 10 किलोमीटर रेल लाइन जल्दी बन सकती है…जब भी भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान जाने वाले चर्चित रास्ते खोले जाने की कवायद शुरू हुई है तो फाजिल्का के लोगों ने गोल्डन टै्रक खोलने की मांग दोहराई है…हालांकि फाजिल्का के दौरे के दौरान 1977 में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अंतर्राष्टï्रीय सीमा व्यापार के लिये खोलने का वादा किया था…बुद्धिजीवियों ने पत्रों के जरिये उन्हें वादा भी याद करवाया था…सिर्फ यह ही नहीं फाजिल्का के डबवाली गांव के निवासी और पंजाब विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर स. चरणजीत सिंह अटवाल के समक्ष लोगों ने गोल्डन टै्रक खोलने के लिये आवाज उठाई…मगर गोल्डन टै्रक सपना बनकर रह गया…आज भी सुनसान पड़ी गोल्डन ट्रैक भारत-पाक के हुकमरानों की नजर-ए-इनायत में पलकें बिछाए हुए है।
जिला बहावल नगर के मुहम्मल सुलतान…पाकिस्तानी रेंजर की आवाज थी…वो आगे आया तो भारत की तरफ से महिला बोली —– भाई…मैं कमला, याद करो, भारत पाक विभाजन के समय की दास्तान…जब माता को कुछ लोगों ने तेजधार हथियारों से काट डाला था…तुम जान बचाने के लिए पाकिस्तान की ओर भाग गए और मुझे पिता उठाकर भारत में ले आए…मैने आपको वाहगा बार्डर पर देखा…हुसैनीवाला बार्डर पर भी देखा, लेकिन आप नहीं मिले…आज आपकी झलक पाई है…भाई, मैं राजस्थान के श्री गंगानगर में रहती हूं।
उनकी तरह पाकिस्तान के मिनचंदाबाद रेलवे स्टेशन पर रहने वाले परनानी पैड़ो की झलक नन्ही खुशीयां बानो और सकीना ने भी पाई…चौथी पीढ़ी को देखकर पैड़ो ने आशीर्वाद दिया…पिता मुहम्मद रफीक के साथ आया नन्हा आरिफ भले ही कुछ बोल नहीं पाया, लेकिन उसकी आंखें बता रही थी कि वह अपने परदादा की झलक पाकर खुश है… अगर पंजाब के वाहगा, हुसैनीवाला और सादकी बॉर्डर पर दोनों देशों के हुकमरान बिछुड़ों के दर्द को समझते हुए आज्ञा देते हैं तो हजारों लोग अपनों से कम से कम बात तो कर पाऐं…अपनो की एक झलक उन्हें जो सकून देगी…वह हर व्यक्ति समझ सकता है…मगर यह सब हुकमरानों के बस की बात है।
Part-2 बात 1911-12 की है, जब इलाके में ऊन और रूईं का व्यापार यौवन पर था…उस समय यहां ओम प्रैस कंपनी के नाम से कारखाना खुला…जिसमें ऊन की गांठे बांधने का कार्य होता था…इसके बाद 1913 में राम प्रैस की स्थापना की गई…यहां का हिसाब किताब देवनागरी में किया जाता था…फाजिल्का की ऊन मंडी ऐशिया में प्रसिद्ध हो चुकी थी, लेकिन 1920 में प्रतिकूल स्थिति के कारण व्यापारियों को लाखों से अधिक नुकसान हो गया…क्योंकि लीवरपूल में जो ऊन दिसंबर 1916 के नीलाम में 35 पैनी प्रति रतल के भाव से बिकी थी… वह 1920 के विक्रय में उसका भाव 16 पैनी रह गया…इसके साथ ही विलायत की हुंडी का भाव भी बदल गया…13 फरवरी 1920 को उसका भाव 2 शिलिंग 10/1 पैनी था, जो 28 दिसंबर 1920 को 1 शिलिंग 6/18 पैनी हो गया…जिस कारण व्यापारियों को 50 लाख रूपये से अधिक नुकसान हुआ। इस बारे में 16 जनवरी 1921 को लाहौर के दैनिक समाचार पत्र देश में लेख भी प्रकाशित हुआ …इसके बाद 1931 में एक बार पुन: इस व्यापार में हानि हुई।
फाजिल्का में ऊन के कई कारखाने चल रहे थे…जिन में कुछ ईस्ट इंडिया कंपनी के थे और कुछ स्थानीय लोगों के…इस बीच बनाई गई अशोक कॉटन फैक्ट्री…हालांकि इस फैक्ट्री के संचालकों ने इससे भारी मुनाफा कमाया, लेकिन इसकी दास्तां बड़ी दर्दनाक है…यह फैक्ट्री करीब डेढ़ साल के बच्चे अशोक की याद को ताजा रखने के लिए निर्मित की गई थी…उस समय इलाके में प्रसिद्ध सेठ चानन लाल आहूजा की ओर से यह फैक्ट्री बनाई गई थी…उन्हें 27 अप्रैल 1931 के दिन पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई…जिसका नाम अशोक रखा गया, लेकिन वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गए। जिस कारण 6 सितंबर 1932 को अशोक का निधन हो गया…जिस कारण यह परिवार एकदम टूट गया…फैक्ट्री के लिए 26 जनवरी 1934 को भूमि खरीद की गई… उन दिनों वहां 500 से 700 गांठों की कपास एक सीजन में आती थी…कांशी राम चावला ने अपनी पुस्तक अशोक रहस्य में लिखा है कि उस समय प्रदेश में करीब एक हजार गांठों तक कपास की फसल उत्पन्न होती थी…फाजिल्का में जो पैदावार होती थी वह देसी किस्म की थी…जिस कारण कपास अन्य शहरों या राज्यों से आती थी।
Harish Chander Khunger
जहां देसी कपास की जगह अमेरिकन कपास और एल.एस.एस. कपास की उपज होती थी… सेठ चानन लाल व अन्यों के समझाने पर फाजिल्का में भी अमेरिकन कपास और एल.एस.एस. कपास की पैदावार की गई…जिस कारण रूईं का काम करीब 17 हजार गांठों तक पहुंच गया। यह क्वालिटी लायलपुर जैसी प्रसिद्ध मंडी से भी उत्तम थी। जिस कारण पल्लेदारों, गाड़ी चलाने वाले, दलालों, तोलों के रोजगार में इजाफा हुआ… इलाके में रूईं, बिनौला की आढ़त में लाखों की कमाई की…मगर1939 में फैक्ट्री को काफी हानि हुई।
Sai Ram Parkash Khunger
साईं राम प्रकाश खुंगर के पिता हरीश चंद्र खुंगर की फर्म हरीश खुंगर दी हट्टी के नाम से प्रसिद्ध रही है…साईं राम प्रकाश बताते हैं कि उस समय इलाके में खजान चंद मुंशी राम, किशोरी लाल परमानंद, तारा चंद मक्खन लाल, गोबिन्द राम गंगा राम की फर्म ऊन बाजार में थी और काफी मशहूर थी…उस समय मै. खजान चंद मुंशी राम और गोबिन्द राम गंगा राम को स्टार मिला था…जिसका जिक्र England से प्रकाशित पुस्तक इंडिया एंड पाकिस्तान वूल हौजरी एंड फैब्रिक में किया गया था…
उस समय मरी हुई भेड की जो खाल उतारी जाती थी…उसे खोसा कहा जाता था…इस कार्य के लिए पूरन राम खटीक, संत लाल, प्रकाश और माम राज प्रसिद्ध रहे हैं।By- Krishan Taneja 92566-12340
ऊन के विकास ने समाज को आधुनिक समाज में बदला और फाजिल्का खुशहाल नगर बन गया…इसके बाद फाजिल्का के लोगों में जागृति आ गई और 1930 में फाजिल्का के कई लोग अमरीका और आस्ट्रेलियां से आर्ट एंड क्रॉफ्ट की शिक्षा लेकर यहां पहुंचे…बहावलपुर, शिकारपुर, बीकानेर, मुल्तान आदि शहरों से फर्मे यहां पहुंची और उन्होंंने अपनी ब्रांचे खोली। तब तक यहां ऊन की फैक्ट्रियां फायर बिग्रेड कार्यालय के सामने खुल चुकी थी… आर्ट एंड क्राफ्ट की कला से माहिर फाजिल्का के लोगों ने भी यहां कई फैक्ट्रीयां लगाई, जिनमें सलेम शाह रोड़ पर राम प्रैस, बीकानेरी रोड पर महावीर कॉटन फैक्ट्री, मलकाना मुहल्ला के निकट अशोका वूल फैक्ट्री, दि अशोका कॉटन फैक्ट्री, भूसरी प्रैस और ब्रह्मा प्रैस मुख्य थी…जिनसे तैयार माल का व्यापार यूरोप की मंडियों तक पहुंचा। रेल नैरोगेज लाइन वाया कोटकपूरा, बठिंडा और ब्रॉडगेज लाइन वाया मैकलोडगंज से कराची तक जाती थी और फिर वहां से बंदरगाहों के जरिए यूरोप की मंडियों तक माल पहुंचाया जाता… देखते ही देखते फाजिल्का एशिया की प्रसिद्ध मंडियों की कतार में जा पहुंचा। ऊन के महान व्यापार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुल्तान, हवेली, मिंटगुमरी, बहावलपुर, बीकानेर आदि क्षेत्रो सें व्यापार के लिए ऊन यहां आती थी। फैक्ट्रीयों के अलावा ऊन का बाजार भी था…जहां ऊन की मंडी लगती थी। यहां के अधिकांश लोग ऊन का कारोबार करते थे… ऊन के व्यापार की चमक-दमक देखकर ही बाहरी इलाकों से कई लोग यहां पहुंचे…यहां ऊन की दो किस्में थी, एक सावनी वूल और दूसरी चेत्री वूल… यहां मैरीनो किस्म की भेड़ सबसे बेहतर थी। मैरिनों भेड़ लम्बे रेशे वाली थी। यहां भारी संख्या में लघु उद्योग …पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे तक इस कारोबार को अपनाए हुए थे…गंाव जंडवाला भीमेंशाह के स. इकबाल सिंह भट्टी ने बताया कि कॉलेज रोड पर शिवपुरी के नजदीक एक विशाल मैदान था…जहां भेडों को नहलाया जाता था…वहीं भेडों की ऊन उतारी जाती थी… मुल्तानी चुंगी के नजदीक ऊन की क्वालिटी सुधारने के लिए एक कुआं था… जहां ऊन धोने का काम किया जाता था…यहां करीब चार एकड़ जगह थी… जहां ऊन साफ की जाती थी…यह कारोबार कचहरी रोड से लेकर सरकारी एम. आर. कॉलेज तक फैला हुआ था…शायद यही कारण है कि घंटाघर के निकट के बाजार का नाम आज भी ऊन बाजार है…इस बीच ऊन के व्यापार पर कभी दरिया की बाढ़ ने अपनी गिद्ध दृष्टि डाली तो कभी विश्व युद्ध ने, लेकिन यहां के साहसी लोगों ने इसे बनाए रखा और व्यापार को प्रफुल्लित किया। मगर भारत विभाजन के बाद यह व्यापार ठप्प हो गया…विभाजन के बाद लोग यहां से विभिन्न स्थानों पर पलायन कर गए…कराची तक चलने वाली ट्रेन बंद हो गई और व्यापार खत्म हो गया…अगर अब यहां बाकी कुछ बचा है तो वह है ऊन मंडी की अमिट यादें . . . . . और सिर्फ यादें।(जारी )
मुसलमानों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया…उनमें कई ऐसे थे…जो महिलाओं की इज्जत लूटने की फिराक में थे…कोई जान से मारना चाहता था तो कोई माल लूटने के चक्कर में था…इज्जत न जाए…इसलिए उनके परिवार कुछ महिलाओं ने घर के खुले आंगण में बने कूएं में छलांग लगाकर खुदकशी कर ली…उनके एक मुस्लिम दोस्त खुदा हयार ने वहां से बचाया और उन्हें चक्क नूर मुहम्मद रेलवे स्टेशन पर पहुंचाया…इसके बाद भी इस परिवार ने जो कष्ट झेले…उन्हें सुनकर एक बार तो आम आदमी की भी आंखों में अश्क बह ही जाते हैं…मगर जिस परिवार के साथ यह हादसा हुआ है…
Kumhari wala Head
उस पर क्या बीती होगी…यह परिवार तो आज भी उस बात को याद करके सहम सा जाता है…वर्ना यह परिवार वो परिवार था…जो दलेर था और आज भी वैसे ही दलेर है…भारत विभाजन से पहले यह परिवार लाहौर जिले की सीमा पर स्थित गांव कुम्हारी वाला में रहता था…इन दिनो फाजिल्का जिले में रहता है…कालड़ा जाति के इस परिवार का मुखिया था लाला जट्टू राम…पाकपटन और कुम्हारी वाला में इनकी करीब 1500 एकड़ भूमि थी…अमीर और दलेर कौम के जट्टू राम का कद छोटा था और बड़ी पगड़ी बांधते थे…कद भले ही छोटा था…मगर दलेरी की महिमा दूरदराज तक भी मशहूर थी…एक बार जग्गा डाकू उनकी हवेली में डाका मारने के लिए पहुंचा…इस दौरान जग्गा डाकू के दोस्त झंडा सिंह निर्मलके और ठाकुर सिंह मंडियाली भी उनके साथ थे…
लाला जट्टू राम को पता चला तो फायर करते हुए ललकारा…बोला…अगर तुम्हे कोई चीज चाहिए तो ले जा सकते थे…अगर मेरे किसी आदमी को मारा तो एक के बदले दस मार दूंगा…जग्गा भी सूरमा था।…उसकी बहादुरी पर खुश हुआ और खाली हाथ लौट गया…इसके बाद जग्गे ने एक सुनार के घर में डाका मारकर वहां से सोना लूटा और बही खातों को आग के हवाले कर दिया…वैसे कालड़ा परिवार धार्मिक परिवार था…इसकी मिसाल इससे मिलती है कि गांव के पंचायती मंदिर में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में पूरा परिवार सेवा करता था…
Sulemanki Head
बात विभाजन की हो रही है तो बात 25 अगस्त 1947 की भी बता दूं…जब विभाजन के बाद हिन्दू-मुस्लिम टकराव हो गया…लाला जट्टू राम के पोत्र राज कुमार कालड़ा बताते हैं कि दादा जी की गली में मुसलमानों का एक झुंड हथियारों से लैस होकर आ धमका…कत्ल-ए-आम शुरू हो गया…लाला जट्टू राम की हवेली के निकट कुआँ था…कई महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए उसे कुएं में छलाग लगाकर अपनी जान दे दी…वहां से उनके मुस्लिम दोस्त ने निकाला और चक्क नूर मुहम्मद रेलवे स्टेशन पर पहुंचाया…वहां भी मुसलमानों ने उन्हे घेर लिया और एक हवेली में ले गए…जहां उन्हें मुस्लमान बनने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन वहां से किसी तरह से वह बच निकले तो रास्ते में उन्हें फिर घेर लिया गया…जहां उन्हें गोमास खाने के लिए मजबूर किया गया…जो महिलाएं उनके साथ थी…वह घुंघट निकालती थी और उनके आगे मुस्लमानों ने गौमास परोस कर रख दिया…
लेकिन महिलाओं ने गौमासको घुंघट का सहारा लेकर कपड़े में ही छुपा लिया। वहां ध्यान चंद, पार्वती, रघुनाथ राए और हंस राज को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया…जब वहां पहुंची गोरखा और डोगरा रेजीमेंट…तो उन्होंने वहां से बचाया…जब वह सुलेमानकी हैड पर पहुंचे…फिर मुस्लिमों के एक काफिले ने उन्हें घेर लिया और महिलाओं की इज्जत को तार-तार करना चाहा, लेकिन महिलाओं ने इज्जत को हाथ नहीं लगाने दिया और सुलेमानकी हैड से छलांग लगाकर जान दे दी…इस कत्लेआम के गवाह राज कालड़ा के पिता लाल चंद कालड़ा, ताया लाला लखपत राए कालड़ा और चाचा राम कृष्ण कालड़ा के अलावा हरबंस लाल कालड़ा, सतनाम राए कालड़ा, इशर सिंह कालड़ा आदि परिवारों सहित बामुश्किल फाजिल्का पहुंचे और यहां आकर बस गए…आज भी जब वह 25 अगस्त को याद करते हैं तो उनकी आंखों में अश्क बहने लगते हैं…उनकी याद में श्री हनुमान मंदिर में पाठ पूजा भी की जाती है।(कलम@ कृष्ण तनेजा-92566-12340)
1947 का गदर…खौफनाक मंजर…अगर कोई भूलना भी चाहे तो मुमकिन नहीं…विभाजन के दौरान इधर अबोहर, मलोट तक…उधर पाकपटन तक…रक्त ही रक्त…चाहे वह समासाटा से फाजिल्का आने वाली ट्रेन हो…या फिर जरनैली सडक़ यानि बॉर्डर रोड … दोनों रक्त से भरे…क्या नहर…सूए…नाले… सब रक्त से लाल … लाशें … लाशें … और लाशें … कोई बुजुर्ग की…कोई लडक़ी या महिला की…कोई दूधमुंहें बच्चे की तो कोई किसी अन्य उम्र के व्यक्ति की…मौत किसी का मजहब देखकर उनके सिर पर नहीं मंडराई…सिर्फ और सिर्फ मजहब ही मौत को खींचकर लाया…कोई मजहब के नाम पर हत्यारा बना तो कोई मजहब के नाम पर लुटेरा…मगर दोनों के खून का रंग एक जैसा … Fazilka To Haveli … Pakpatten तक … Karachi… Ferozepur… Lahor … Amritsar …Hoshiyarpur … दिल्ली … यह कहा तो क्या कहा… पूरा देश था… सिर्फ एक था …मगर दो टुकड़े हो गए… लाखों लोग इधर से उधर … उधर से इधर … फाजिल्का की सरहद से चार लाख लोग आए और गए …काफिलों के काफिले … एक ही रास्ता था …बॉर्डर रोड … कोई और रास्ता नहीं था … दूसरी तरफ दरिया था न … इसलिए …बॉर्डर रोड ही एक मात्र रास्ता था … सुलेमानकी हैड पार करके आए थे लोग … बॉर्डर रोड के रास्ते से … इस रास्ते पर लाशें ही लाशें … आर्मी एक काफिले को रोक लेती …
फिर दूसरा काफिला आगे जाता … इसके बावजूद जहां आमने सामने हुए … वहीं टकराव … फाजिल्का के गांधी नगर में भी टकराव … राजा सिनेमा के निकट खूनी टकराव हुआ … आखिरकार यहां प्रशासन को हवाई फायर करने पड़े … अगर शमशेर सिंह की माने तो उन्होंने अपने 6 माह के बच्चे को जब पानी पिलाना चाहा तो वह मौजम माइनर पर पहुंचे … पानी का रंग लाल था … उसने पत्नी का दुपट्टा लिया … पानी में भिगोया … और बच्चे के बुल गीले कर दिए … काफी थक चुके थे वो राम नगर (पाकिस्तान) से परिवार सहित पैदल आए थे न इसलिए … जब वह अबोहर रोड पर गांव रामपुरा पहुंचे तो उन्हें शवों के उपर से गुजरना पड़ा … उधर रेलवे स्टेशन पर पाकिस्तान से आई ट्रेन जब रूकी तो रक्त से सने डिब्बे … शवों के ढेर … पास स्टेशन के सामने एक कूंआ था … वो भी लाशों से भरा हुआ …
मैं मलोट था … वहां मुझे एक बस स्टैंड पर एक बजुर्ग मिला …उसने भी फाजिल्का आना था … एक बस में बैठ गए हम … बातें चली तो बोला … विभाजन के बारे में न पूछें … खैर उससे रहा भी न गया … आंखों में अश्क भरकर बोला … मैने दुख झेला है … परिवार सहित ट्रेन पर फाजिल्का तक आ तो गया … मगर जब साधू आश्रम रोड पर पहुंचा तो मुझ पर काफिर टूट पड़े … देखा तो मैं और मेरा परिवार भागने लगा … जिधर किसी को जगह मिली … तीन साल का बच्चा मेरे पास था … काफिर मेरे पीछे तो उन्होंने मुझे पकड़ लिया … मेरी जेब में 70 रूपये थे निकाल लिए… मारपीट करने लगे … मैने रोका तो एक ने एकदम से बच्चे के पेट में नेजा मार दिया … मैं चिल्लाया … मगर चल न सका … दूसरे काफिले की आवाज सुनकर वो भाग गए … बहते अश्कों से बोला … फाजिल्का के गांव गंजू हस्ता जाता हूं…रिश्तेदारों के पास … मगर रेलवे स्टेशन के निकट उस रोड पर नहीं जाता … रोड तो क्या … रेलवे स्टेशन पर भी नहीं जाता … विभाजन के बाद कभी ट्रेन पर नहीं चढ़ा … देखता हूं तो दर्द होता है … वो दर्द … जो विभाजन ने दिया था … आज तक नहीं भूला … न मुझे … न किसी अन्य को … जिसने इस दंश को झेला है।
कोई व्यक्ति अपनी मां, पत्नी व बच्चों की अपने हाथ से हत्या कर दे…सुनते ही आत्मा तक कांप उठती है…मगर जब सवाल धर्म का हो…आत्म सम्मान को हो…तो यह सबकुछ संभव है…अगर बात हिन्दु परिवार की हो तो वह धर्म के लिए परिवार नहीं देखता…ऐसा हुआ है…और…ऐसी घटना को अंजाम दिया है…फुटेला परिवार ने…बात दिनों या महीनों की नहीं…बात दशकों की है…वो भी उस समय…जब देश के दो टुकड़े हुए थे…यानि…जब देश का विभाजन हुआ था…उस समय Hans Raj phutela ने अपनी ही माता दानी देवी को तलवार से शहीद कर दिया…Hans Raj phutela की पत्नी की कुर्बानी भी देखों…रोना नहीं…सम्मान होता है…इस बात से…जब वह जमीन पर लेट गई और पति से बोली…मेरे टुकड़े कर दो…Hans Raj phutela ने उसके चार टुकड़े कर दिए…फिर सात भाईयों की बहन सत्यदेवी भी ऐसी कुर्बानी देने से नहीं चूंकी…उसने भी इस तरह शहादत का जाम पी लिया…फिर उसने अपनी भाभी सत्यादेवी को शहीद किया गया…6 माह का बच्चा भी था…जब उस पर चमकती तलवार आई…तो उसकी आंखों ने देखा…शायद खेल हो…उसकी मुस्कराहट ने तलवार को रोक दिया…मन डोल गया…वह उसे गोद में उठाकर चल दिए…फैसला लिया…इस नन्हें बच्चे को जीने का अधिकार देंगे..
Roshan Lal Phutela
.मगर जब सोचा…मुकाबला मुसलमानो से है…अगर बच्चा उनके हाथ लग गया…तो…सारी जिंदगी उनकी गुलामी करेगा…तब फिर उठी तलवार…उसे भी धरती मां पर न्यौछावर कर दिया। यह दर्दनाक कहानी है फुटेला परिवार की…जिसके बारे में आज हम बात कर रहे हैं…यह जुबानी दास्तां कृष्ण तनेजा को बताई है…फाजिल्का के गांधी नगर निवासी सेवानिवृत अध्यापक प्रेम कुमार फुटेला ने…वह बताते हैं यह घटना पाकिस्तान के जिला मिन्टगुमरी, तहसील पाकपटन के गांव बशीर पुर की है…उन्हें यह दुखदायी घटना उन्हें उनके पिता हंस राज फुटेला ने बताई थी…उस समय उनका आढ़त व करियाणे का बड़ा कारोबार था…उस समय राम चंद फुटेला घर के मुखी थे…किसी समय हंस राज फुटेला, मुलख राज फुटेला, रोशन लाल फुटेला व बाबू राम फुटेला की काफी धूम थी…
Babu Ram Phutela
प्रेम फुटेला बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने उन दिनों तहसील पाकपटन प्रचारक माननीय श्री विश्वनाथ की प्रेरणा से अपने परिवार के साथ साथ अन्य हिन्दु परिवारों को भी बचाने का निर्णय लिया…जो मुसलमान हिन्दुओं की बहु बेटियों को उठाकर ले जा रहे थे…उनका डटकर मुकाबला किया और कई हिन्दु परिवारों को बचाकर भारत पहुंचाया…वह बताते हंै उस समय मंडी बशीर पुर को मुस्लिमों ने चारों तरफ से घेर लिया…बोले…दो दिन में या तो धर्म बदल कर लो…या फिर आपकी हत्या होगी और महिलाएं उठा ली जाएंगी…खुद की हत्या तो मंजूर थी…मगर कोई महिलाओं की तरफ बुरी नजर से देखे…उन्हें मंजूर नहीं था…धर्म परिवर्तन…कभी नहीं…इसलिए घर की महिलाओं और बच्चे को धर्म पर कुर्बान कर दिया…यह कुर्बानी देने वाला परिवार फाजिल्का की गांधी नगर की सीता राम मंदिर गली में सपरिवार कुशलता से रहते हैं।Writer- Krishan Taneja 92566-12340
वहां घोषणा हुई…जो मिन्टगुमरी से आए हैं वो परिवार सहित अंबाला चले जाएं…उन्हें वहां जगह मिलेगी…अंबाला पहुंचे…दो दिन इंतजार किया…फिर सोनीपत में जगह अलॉट होने की बात कही गई…वहां से भी खाली हाथ लौटना पड़ा…फिर फिरोजपुर लौट आए…वहां 6 माह काटे…वहां से फिर चले रंगले बंगले फाजिल्का की तरफ…जहां वह 12 साल तक किराए के मकान में रहे…बाद में बजाजी बाजार में कपड़े का कारोबार शुरू किया…आज परिवार के साथ खुशी से जीवन यापन कर रहे हैं।(Writer- Krishan Taneja 92566-12340)
वह बताते हैं कि उनके पास बैलगाडी, घोड़ा या मोटर गाडी नहीं थी…विभाजन हुआ…वह परिवार सहित पैदल ही चल पड़े…खाली हाथ…कुछ आटा…घी वगैरा था…पता नहीं था…कहां जाना है…न कोई मंजिल…न ठिकाना…चल पड़े भगवान के सहारे…कच्चा रास्ता था…कहीं लाशें मिली तो कहीं कटे हुए हाथ…पांव…धड़…सिर…कहीं कुंआ लाशों से भरा हुआ था…बस जुबान पर एक ही शब्द था…हे भगवान…किसी ठिकाने पर पहुंचा दे…आखिर वह पहुंच गए…एक शरणार्थी कैंप में…जो कुछ मिला…भगवान का प्रसाद समझ कर खा लिया…बाद में गांव जंडवाला में मेहनत मजदूरी कर अपना व परिवार का पालन पोषण किया…उस समय 3 रुपये प्रति दिहाड़ी मिला करती थी…उन्होंने गांधी चौंक पर कंडा लगाया…तूड़ी तोल कर बेचनी शुरू की…दो बरस तक गरीबी के घेरे न बांधे रखा…बाद में डीएफएसओ चौ. लाल सिंह ने 1952 में उन्हें डिपो की अलाटमैंट कर दी…2338 रुपये भारत सरकार को देकर उन्होंने अपनी करियाने की दुकान की रजिस्ट्री करवाई…26 अक्तूबर 2003 उनकी धर्मपत्नी पारवती देवी का निधन हो गया…बड़े बेटे शाम लाल का 31 दिसंबर 2011 को निधन हो गया…96 वर्ष की आयु…नजर व दांत एक दम सही सलामत…सुबह 4:30 बजे उठने का नियम है…कोई नशा नहीं…वह अपने पुत्र कृष्ण लाल जसूजा बहु सुषमा रानी, पौते पौतियों व पड़पोत्र के साथ हंसी खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। (Writer-Krishan Taneja 92566-12340)
विभाजन तो कई देशों में हुआ है…कई देशों को आजादी मिली है…बर्बादी तो हरेक देश में हुई…मगर जो कुछ भारत के विभाजन दौरान हुआ…वो किसी अन्य देश में नहीं हुआ…हत्याएं…दंगे…रेप…क्या नहीं हुआ देश के विभाजन के दौरान…जिसका दर्द विभाजन का डंक झेलने वालों की पीढीय़ां भी नहीं भूल पाई हैं…जब तक इतिहास रहेगा…शायद…भारत विभाजन का दर्द…बातें…चलती रहेंगे…विभाजन का दर्द हिन्दु…सिख और मुसलमानों…यानि…हरेक समुदाय ने झेला है…चाहे वो राइशजादा हो या गरीब…दर्द सबको मिला…इनमें एक मुहम्मद सरवर बोदला भी थे…जिन्होंने फिरोजपुर हलका मुहम्मदन से 1946 में विधानसभा चुनाव लड़ा था…वह Fazilka से करीब 10 किलोमीटर दूर Village Behak Bodla में रहते थे…आज उनके बारे में बात होगी।
Masjid in Village Behak Bodla Fazilka
उस समय इलाके में Muhammad sarwer bodla famous नाम था…या यूं कह लें…तूती बोलती थी…उनके अहलकार रह चुके S. Bishan Singh बताते हैं कि मियां बोदला के घर जब बेटी पैदा हुई थी…तब उन्होंने गांव की तरफ आने वाले हर व्यक्ति को 5-5 रूपये दिए थे…उपहार के रूप में…मियां बोदला ने पढ़ाई की थी…वलायत से…पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह रेलगाडी से फाजिल्का पहुंचे तो यहां उनके स्वागत के लिए लोगों की लंबी कतार लग गई थी…कटोरों में चाय व हलवा बांटा गया…यहां से उसे मोटर गाडी में बिठाकर गांव ले जाया गया।
Mian Bodla (Photo- Amjad Ali Sardargarh )
जहां उन्होंने खुदा को सिजदा करने के लिए पक्की मसीत बनवाई थी…बताते तो यह भी हैं कि गांव Hasta Kalan to Behak Bodla तक एक सुरंग भी थी…कारण…बिशन सिंह बताते हैं कि मियां का चिश्तियों के साथ नहरी पानी को लेकर विवाद था…शहतीर वाला के पास थी नहर…चिश्ती कहते थे…पानी सिर्फ हमारे लिए है…बोदला कहते थे…पानी हमारे गांवों के लिए है…इस बारे में तो बात फिर किसी ब्लॉग में होगी…क्योंकि बात देश के विभाजन की चल रही है तो यह भी बता दूं। जो मुझे कुछ साल पहले संत राम इटकान ने बताया था…कि मियां बोदला ने D.S.P.Chownk Fazilka…इसके निकट एक हवेली का निर्माण करवाया था…हवेली निर्माणाधीन थी…देश के विभाजन की घोषणा हो गई।
M.S.Bodla With His bodyguard (Photo- Amjad Ali Sardargarh )
मियां बोदला का अंग्रेजों में भी काफी प्रभाव था…फाजिल्का इलाके से भी प्रेम था…अफसरों पर भी दबदबा था…वह बोले…इलाका छोडक़र नहीं जाऊंगा…चाहे कुछ भी हो जाए…कई दिनों तक यहां रहे…आखिर S.D.M. Diwan Chand ने उसे सुरक्षा का वायदा किया…दवाब भी बनाया…फिर उन्हें Village Behak Bodla छोडऩा पड़ा…लंबी चौड़ी हवेली…हरे भरे खेत…हजारों की तादाद में पशु…सबकुछ यहां रह गया…हाँ, S.D.M. की तरफ से किये गए वायदे मुताबिक Gold और अन्य कीमती सामान (जो वो उठा कर ले जा सकते थे) लेकर दरिया तक पहुँचाया गया …वह अपनी पत्नी नवाबो और बेटी व अन्यों के साथ मोटर गाडी में बैठे…पूरा काफिला साथ था…Village Noor Shah के निकट…दरिया गुजरता था…उसका एक किनारा भारत के साथ…दूसरा किनारा पाकिस्तान के साथ…वह मोटरगाडी पर दरिया तक पहुंचे…वहां काफी समय तक रोए…फिर धरती को सिजदा किया और किश्ती में बैठकर चल दिए… …उनकी मोटर गाडी बरसों तक उस गांव की फिरनी पर खड़ी रही…मगर वो पहुंच चुके थे…एक नए देश Pakistan …जहां वह 7 may 1951 to 14 oct 1955 तक पाकिस्तान पंजाब विधान सभा के सदस्य (M.L.A,) बने…Muslim reserve seat -5 Mintgumri से…पाकिस्तान सरकार ने उसे Hakam-a-Allah of the khaksar Tehreek in Punjab के खिताब से नवाजा…कहते हैं कि पाकिस्तान में उसे काफी भूमि व हवेलियां भी दी थी…जहाँ वो रहे…मगर यहाँ…उन की हवेलियां… बनकर रह गई सिर्फ और सिर्फ… मलबे का ढेर …वहVillage Behak Bodla में आज भी मौजूद है।
at back : Sukhdev Raj Vohra and wife Sawarn Kanta in Front : Son Arun Vohra and His wife Veena Vohra
हदबंदी के लिए उनके साथ Chiman Lal Maini, Satpal, Sukhdev or Balwant Singh पटवारी थे…दो कानूनगों भी…सभी Pakistan के पटवारियों व काननूगो के साथ बैठक करते…ताकि पिल्लरों को लेकर दोनों देशों में किसी तरह का कोई विवाद न हो…जब पाकिस्तान में बैठक होती थी तो वह यहां से केले व पान के पत्ते लेकर जाते…ताकि पाकिस्तान के पटवारियों को दी जा सके…रिटर्न गिफ्ट…यानि बदले में…उपहार…रंगला दातुन, पक्खी और सेंधा नमक मिलता था…सख्ती तो उस समय भी थी…जिसकी मिसाल वह बताते हैं…एक बार जब वह बैठक के लिए पाकिस्तान के लाहौर में थे तो चिमन लाल मैनी बिना सूचना दिए अपने मामा के घर चला गया था…बाद में पता चला कि इस कारण उसके मामा को पाकिस्तान की खुफिया एजैंसी के कर्मियों ने उठा लिया था।
Sukhdev Raj Vohra 15 अक्तूबर 1932 को Teh. Kasoor, Distt. Lahor -Pakistan में गुरांदित्ता मल वोहरा के घर माला देवी की कोख से पैदा हुए…वहां इस परिवार की 16 एकड़ भूमि थी और फालसे व अन्य फलों का बाग था, जिसका फालसा तोडऩे पर उन्हें दो पैसे प्रति किलो खर्च मिलता था…बचपन था…इसलिए उनके लिए तो यह खर्च काफी था…इसके साथ ही वह फालसे के पत्तों का बंडल बनाते और दुकानों पर जाकर बेच आते…जिसका खर्च उन्हें अलग से प्राप्त होता…मगर जब विभाजन हुआ तो उन्हें फिरोजपुर के अर्बन ऐरिया में सिर्फ छह एकड़ भूमि ही मिली।
at back : Sukhdev Raj Vohra and wife Sawarn Kanta in Front : Arun Vohra (Son), Alisha Vohra (Grand Daughter) , and Veena Vohra (Daughter in law)
बात उनके बचपन से शुरू हुई तो उन्होंने बताया कि उनकी प्राथमिक शिक्षा कसूर के सरकारी प्राइमरी स्कूल से हुई और मिडल भी कसूर से की…मगर दसवीं कक्षा दिल्ली से पास की…जब वह 15 वर्ष के हो गए तो देश का विभाजन हो गया… ज्यादा पता नहीं था कि Partition क्या होता है…मगर जब वह Partition दौरान पैदल आ फिरोजपुर की तरफ आ रहे थे तो रास्ते में लुटेरों ने उनके काफिले पर हमला बोल दिया…काफिले ने मुकाबला किया…मुकाबला कड़ा था…सुखदेव राज वोहरा के पिता गुरां दित्ता व भाई बलदेव पर लुटेरे भारी पड़ गए और उनकी हत्या कर दी गई…इस दर्द ने उन्हें अंदर से झंझोड़ कर रख दिया, लेकिन एक दर्द यह भी साथ रहा कि विभाजन की लूटपाट के चलते उनके चाचा राम कृष्ण पाकिस्तान में ही छुप गए…जो करीब छह माह बाद भारत आए।
वोहरा बताते हैं कि विभाजन दौरान वह refugee camp Firozepur में आ गए…इसके बाद 1948-49 में सतलुज दरिया में बाढ़ आ गई…बाढ़ भी इस कदर कि दरिया का बांध ही टूट गया…पानी तेजी से फिरोजपुर की तरफ बढ़ा तो वह अन्य लोगों के साथ रेलवे पुल पर आकर बैठ गए…बताते हैं कि बाढ़ का पानी कासू बेगू गांव तक पहुंच गया था…इसके बाद वह अपनी मोसी के पास दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने दसवीं कक्षा पास की। साथ ही 30 रूपये प्रति माह नौकरी भी की। रिश्तेदारों व बुआ के बेटों ने सहायता की और उन्होंने डेढ़ वर्ष का पटवार कोर्स किया…इसके बाद 22 दिसम्बर 1953 को उन्हें पटवारी की नौकरी मिल गई…डयूटी Mamdot में लगी, जहां उन्हें साढ़े 32 रूपये मासिक वेतन मिलता था।
at back : Sukhdev Raj Vohra and wife Sawarn Kanta in Front : Dr. Raman Vohra (Grand son), Arun Vohra (Son), and Veena Vohra (Daughter in law)
30 अप्रैल 1955 को इनकी शादी बलवंत राएपुरी-सरसवती की बेटी स्वर्ण कांता से हुई…इनके घर दो बेटियों व 3 बेटों ने जन्म लिया। 1966 में घल्लू इनका तबादला फाजिल्का के गांव घल्लू में हुआ और इन्होंने अपनी रिहायश Fazilka में कर ली और यहां स्थायी तौर पर बस गए।
वह 40 दिन के भारत भ्रमण दौरान चारों धाम की छह बार यात्रा भी कर चुके हैं…यादों को ताजा करते हुए 1965 के भारत पाक युद्ध के समय अपने दोस्त गुरदियाल सिंह को काफी याद करते हैं, क्योंकि इस युद्ध दौरान गुरदियाल सिंह ने वोहरा परिवार की एक माह तक अपने पैतृक घर मोगा में रखकर काफी सेवा की थी…जिन पर वह आज भी मान करते हैं…दो बार परमिट पर पाकिस्तान जा चुके श्री वोहरा को मान तो बचपन के दोस्त मुहम्मद सैय्यद व सतपाल पर भी करते हैं…बचपन में उनके साथ जो खेले थे। 1990 में सेवानिवृत सुखदेव राज वोहरा के सुपत्र गुरमीत राए मंडी सुपरवाइजर रिटायर्ड हैं और शरनपाल कनेडा रहते हैं, जबकि अरूण कुमार पटवारी हैं। (कृष्ण तनेजा फाजिल्का 92566-12340)
कोई काफिला इधर आ रहा था तो कोई उधर जा रहा था…कोई मोटर गाडी पर था तो कोई बैलगाडी पर…मगर उनके पास न मोटर गाडी थी न ही बैलगाडी…उम्र भी सिर्फ 9 वर्ष…खिलोनों से खेलने के दिन थे…खिलौनों की जगह सिर पर था…वो दर्द…वो बोझ…जो उस समय सबके सिर पर था…चाहे वो हिन्दु हो…चाहे सिख या फिर मुसलमान…अकेला तो कोई नहीं…अकेला मिलता तो मार दिया जाता…महिला अकेली दिखाई देती तो काफिर उस पर टूट पड़ते…कई तो अपनी अस्मत बचाने के लिए दरिया या हैड में कूद गई…कई हैवानियत की बली चढ़ गई…इस बीच ही एक काफिला था…उसी में था नन्हा बालक जोगिन्द्र सिंह…जिसे आज लोग जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह तनेजा के नाम से जानते हैं…उनसे मिलने मैं गांधी नगर पहुंच गया…विभाजन की कुछ जानकारी लेने के लिए…दुआ सलाम हुई…चाय की चुस्कियां का दौर भी चला…फिर शुरू हुई उनकी दास्तान।
Joginder Singh
जिला लाहौर के शहर चूहनी 15 सितम्बर 1938 को दरबारा सिंह व माता महेन्द्र कौर के घर में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया… जो भारत विभाजन के बाद फाजिल्का में जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ…विभाजन से करीब एक साल पहले ही उनके पिता दरबारा सिंह की मौत हो चुकी थी…जिस कारण वह विभाजन का दर्द उनके दिल में ही दब गया…जिन्दगी का हर बोझ उनके सिर पर था…हालांकि स. प्रताप सिंह उनके बड़े भाई थे और फाजिल्का में काफी समय तक नगर कौंसिल में कर्मचारी रहे…जोगिन्द्र सिंह खुद दर्जी का काम करते रहे हैंं, लेकिन उनके खानदान में पहले कोई दर्जी नहीं रहा…उनके पिता स. दरबारा सिंह व स. दरबारा सिंह का भाई व पिता दोनो हकीम थे।
पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि वह विभाजन से पहले गांव खाने पीरे की में रहते थे…वहां हिन्दुओं का सिर्फ एक परिवार था और एक परिवार सिख था…जबकि बाकी सभी परिवार मुस्लिम थे… मगर इन सभी में भाईचारा और मुहब्बत काफी थी…किसी भी धर्म का पर्व हो, वह एक दूसरे को मिठाई देना न भूलते और बधाई भी देते हुए उस पर्व को मिलजुल कर मनाते थे। हालांकि आजकल शहरों की दूरी काफी निपट गई है, लेकिन उस समय दूरियां काफी थी…एक याद को फिर ताजा करते हुए वह बताते हैं कि वह पहली बार अपने चाचे के साथ घोड़ी पर शहर गए थे। समय भी विवाह का था और बरात घोड़ों पर गई थी…वह दिन उन्हें आज भी याद है कि उसके साथ उसका हमउम्र चाचे का बेटा भी था।
S.Joginder Singh Taneja with his wife Joginder Kour
विभाजन के समय सतलुज दरिया उफान पर था…वहां से गुजरते हुए वह जलालाबाद (प) के गांव घागां में आकर बस गए…वहां उन्होंने करीब पांच वर्ष सघंर्ष किया और बाद में फाजिल्का में अपने ननिहाल सरदार गुरबख्श सिंह सचदेवा के पास आकर रहने लगे…1952 में इन की शादी होदां गांव निवासी ग्रंथी सरदार गन्डा सिंह की बेटी जोगिन्द्र कौर से हुई… वह बताते हैं उन्होंने दर्जी का काम उस्ताद हरी देव छिम्बा से सीखा और दर्जी के काम की बरीकियां उन्होंने अपने मामा के बेटे से सीखीं…इनके घर तीन बेटों और तीन बेटियों ने जन्म लिया। उन सभी की शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके हैं।
Joginder Singh-Joginder Kour with His Late Grandson Sukhwinder Singh
जलालाबाद से फाजिल्का आने के बाद उन्होंने अपनी मौसी जी के बेटे गोपाल सिंह के साथ घंटाघर के पास दर्जी की दुकान खोली…15 वर्ष की आयु में उन्होंने फाजिल्का के नजदीकी गांव में सिलाई मशीनें बेचने का काम शुरू किया…और साथ ही कपड़े का काम भी गांव में श्ुारू किया था…दिल्ली और अमृतसर से कपड़े लाकर गुरू नानक क्लाथ हाउस के नाम पर दुकान खोली…उन्होंने बताया कि दुकान के हिसाब-किताब के लिए कृष्ण लाल शर्मा जो उस वक्त रोशन लाल खुंगर के पास मुनीम का कार्य करते थे…उन्हें अपनी दुकान पर 25 रूपये मासिक वेतन पर मुनीम रखा…उस के बाद उन्होंने किसी पडिंत के पास लण्डे सिखें… दुकान का हिसाब-किताब भी खुद देखने लगे। जत्थेदार जोगिन्द्र सिंह अकाली दल बादल में बरसों तक महासचिव रहे। उनकी पूर्व मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल के साथ काफी नजदीकियां थी…स. बादल जब भी फाजिल्का आते तो उनकी दुकान पर जरूर पहुंचते
बात 1982 की है, जब रात के समय वह अपनी माता के पास बैठे थे…माता ने उन्हें जिन्दगी के कई तुजुर्बे सांझे किए…अच्छाई और ईमानदारी की जिन्दगी का अमूल्य तोहफा बताया…बातें अभी जारी थी कि उनकी माता महेन्द्र कौर इस फानी जहां को अलविदा कर गई…मां के साथ उनका वही आखरी सफर था…जैसे विभाजन से पहले उनकी पैतृक भूमि …चूहनी…चूहनी शहर…चूहनी शहर का आखरी सफर था…देश का विभाजन।(Writer- Krishan Taneja 92566-12340)
Krishan Taneja with Joginder Singh & His Friend Bihari Lal Setia
विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में एक है हड़प्पा सभ्यता…जो फाजिल्का से करीब 111 किलोमीटर दूर है…उस शहर में रहते थे पंजाब राम ढल्ला…जो इन दिनों फाजिल्का के मौहल्ला गांधी नगर में रह रहे हैं…जिंदगी के 84 बसंत देख चुके खुशमिजाज और हरदिल अजीज व्यक्तित्व के मालिक पंजाब राम ढल्ला का घर पूछा तो गली में खेल रहे एक बच्चे ने तुरंत उसकी पहचान तक बता दी…बच्चे ने तो यहां तक बता दिया कि वह घर के आंगण में कुर्सी पर बैठे हैं…
मैं (कृष्ण तनेजा) और मेरा साथी राजेश सेतिया ने जब पंजाब राम ढल्ला से बातचीत की और विभाजन से पूर्व के निवास व याद पलों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताने में न तो कोई संकोच किया और न ही कुछ याद किया…जवाब भी ऐसे दिया कि जैसे कल की बात हो…1935 को जिला साहीवाल के शहर हड़प्पा में सावन राम – सत्तां बाई के घर पैदा हुए पंजाब राज ढल्ला बताते हैं कि उनके पिता सुनार का काम करते थे…शेर चंद(रमनदीप के पिता) व पहलवान चंद (मदन लाल व राकेश कुमार के पिता) सहित पांच बहनों के भाई पंजाब राम…
Punjab Ram with his Grand son
पाकिस्तान के हड़प्पा शहर में आज भले ही मुस्लिमों की संख्या अधिक है, लेकिन उस समय वहां हिन्दु बहुताद में थे…शहर में ही सरकारी मिडल स्कूल था, जिसमें वह चौथी कक्षा में पढ़ते थे और दिवान चंद, मुकंद लाल, अमर लाल, कसतूरी लाल, मुहम्मद शफी, केवल कृष्ण, सलेम, वजीर, गुल मुहम्मद उनके सहपाठी थे…हैडमास्टर मिठ्ठा मल्ल थे और चुनी लाल, गुलाम फरीद, मुहम्मद हुसैन, लोकू राम, हरी चंद, गुलाम जिलानी, मलिक खां अध्यापक थे…अभी उन्होंने पांचवीं कक्षा में दाखिला लिया ही था कि भारत विभाजन हो गया…जिनके साथ वह बड़े प्यार और भाईचारे के साथ रहते थे, वहीं एक दूसरों के दुश्मन बन गए…पता नहीं था कि घर बार छोडऩा पड़ेगा…अचानक उनके घर में मुस्लिमों ने धावा बोल दिया और घर में पड़ा करीब डेढ़ किलो सोने के आभूषण व एक क्विंटल दस किलोग्राम चांदी के आभूषण लूट लिए…वह किसी तरह से वहां जान बचा कर निकले और 50-60 हिन्दुओं के काफिले को सैना के चार जवान उन्हें एक ट्रक में लाकर अमृतसर में शराणार्थी कैंप में छोड़ दिया…वहां कुछ दिन का दर्दभरा जीवन यापन के बाद वह जालंधर के डीएवी कालेज में लगे शरणार्थी कैंप में पहुंच गए…जहां सरकार ने इन्हें वस्त्र व राशन वगैरा दिया…पीछे की यादे, दोस्त बने दुश्मने और बर्बाद हुए जीवन को संभालने के बारे में वह सोचते और रात कट जाती…पता नहीं था कि जीवन में क्या होगा, जीवन कैसे कटेगा, रिश्तेदार कभी मिलेंगे या नहीं…कई दिन बाद सोनीपत में रहने वाले उनके रिश्तेदारों को पता चला तो वह उन्हें लेने के लिए जालंधर पहुंच गए…कुछ हौंसला बंधा और वह वहां से सोनीपत के मिशन स्कूल में बने शराणर्थी कैंप में चले गए…वहां करीब दस माह तक रहे और फिर वहां से फिरोजपुर के गांव कासूबेगू के शराणर्थी कैंप में पहुंच गए…उनकी किस्मत थी कि वह पूरे भरे परिवार के साथ दुख झेलते झेलते आखिरकार फाजिल्का में आकर बस गए।
जहां इन्हें सरकार ने 4500 रूपये उस जगह व समान के दिए जो वह हड़प्पा में छोडक़र आए थे…उस पैसे में से इन्होंने घर बार बसाया…इस पैसे में से दो मकान इनके चाचे व एक मकान पंजाब राम ढल्ला ने बनवाया…प्रति मकान लागत 682 रूपये थी…घर बार बना तो रोजगार की चिंता…हाथ में हुनर था और रोजगार की तलाश भी थी…तब इन्होंने खेतीबाड़ी के औजार दाती, कस्सी, कुल्हाड़ी आदि बनाने का काम शुरू कर लिया…फिर वह चिंतामुक्त होने लगे…बरसों के दर्दों को वह भूले नहीं थे, लेकि न चेहरे की मुस्कान के पिछले पर्दे में छिपे दर्द को कोई नहीं जानता था…मगर 1958 में निहाल चंद-भरीयां बाई की सुपुत्री राम प्यारी उनकी जीवन साथी बनी…उनके घर चार बेटे और तीन बेटियों ने जन्म लिया और इन किलकारियों ने पंजाब राम ढल्ला के जीवन के सब कष्टों और दर्दों को भुला दिया।
Punjab Ram with his sons and grand son Karan Verma
हालांकि यहां भी उनका रोजगार अच्छा था, लेकिन उनका एक सपना था कि वह किसी अन्य देश में पहुंचकर अपनी कला का लौहा मनवाए…इस सपने को पूरा करने लिए वह 1980 में इराक की राजधानी बगदाद पहुंचे, जहां करीब 6 माह तक बार-बैडरिंग का काम किया… इस बीच इरान और इराक में युद्ध छिड़ गया तो वह अपने देश भारत लौट आए…1997 को वीजा लगवाकर वह 28 दिन के लिए अपने बेटे के साथ पाकिस्तान स्थित अपनी जन्म भूमि हड़प्पा शहर में पहुंचे…जहां वह 120 गुणा 70 फीट की अपनी हवेली पहुंचे, जहां फाजिल्का के दूसरे विधायक बाघ अली सुखेरा के रिश्तेदारों का डेरा बना हुआ था…मगर वहां उनके पड़ोसी निहाल चंद बठला, माहला राम बठला व गोपाल चंद बठला का परिवार रहता था…न ही बठला परिवार की चारपाई व वाण की दुकान थी…न ही वहां सावन भक्त की करियाने की दुकान थी। वहां लाल चंद के आटे की चक्की भी कहीं नजर न आई…उसकी दिल कहता था कि वह बोघे माछी का तंदूर की रोटी खाए, लेकिन वहां बोघा माछी तो नहीं था, हां उसकी पुत्रवधु नूरी उसी तंदूर पर रोटी बना रही थी…जिसे देखकर पंजाब राम ढल्ला बचपन की यादों में गुम हो गया…यह भी पता चला कि वहां वो रामलीला भी बंद हो चुकी थी…जिसका मंच संचालन रोशन लाल सिडाना करते थे…रावण का अभिनय सांझा राम नारंग और ताडक़ा का अभिनय नानक दास नानकू बाखूबी निभाते थे…मगर वहां 9 गज पीर की मजार जरूर थी…जहां पूरी रोनक थी। वहीं नानकसर गुरूद्वारा में हर साल चेत्र मास की 4 तारीख को मेला लगता था…जहां दूर दराज से लोग पहुंचते थे…पंजाब राम ढल्ला ने नानकसर गुरूद्वारा के अलावा कृष्णा मंदिर में भी माथा टेका…
पंजाब राम ढल्ला पाकिस्तानी गायकी के काफी मुरीद हैं। गायक मलकू, मंसूर मलंगी, जाफर अली, मुरातब अली की गायकी में मोहित होने वाली श्री ढल्ला बताते हैं कि हड़प्पा के साथ गांव है लक्कां वाला चक्क है, जहां अल्ला दत्ता लूने वाला गायक का प्रोग्राम था।…उनकी गायकी के भी मुरीद थे…इसलिए वह प्रोग्राम सुनने के लिए पहुंच गए…जहां अल्ला दत्ता लूने वाला का गीत जित्थे चलेंगा, चल्लूंगी नाल तेरे वे टिकटां दो लै लईं . .. . सुना तो लुत्फ आ गया…दिल तो करता था कि वह वहां रहें, लेकिन दोनों देशों में बनी सरहदों ने उन्हें इजाजत नहीं दी…वैसे पंजाब राम ढल्ला की यादशक्ति की भी दाद देनी पड़ेगी, क्योंकि वह इस आयु में भी अपनी सातवीं पीढ़ी तक याद है…उन्हें याद है कि वह आडेदान ढल्ला के बाद मुल्तानी राम, मोती राम, सज्जन राम, रज्जन राम, सावन राम तक पंजाब राम ढल्ला को याद है। अगर उनकी आगे की पीढ़ी की बात करें तो उनके बेटे प्रेम कुमार, केवल कृष्ण, राज कुमार व रतन लाल हैं और अगली पीढ़ी में पोते राहुल, चेतन, ललित कुमार व कर्ण कुमार हंै। भले ही उनका परिवार हराभरा है, लेकिन उनकी जीवनसाथी श्रीमती राम प्यारी 10 फरवरी 2016 को उन्हें अलविदा कह गई।
विभाजन भारत का…एक देश था…1947 में दो टुकड़े हो गए…कोई जानता नहीं था कि दंगे भी होंगे…एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ेगा…अगर यह पता होता तो एडवोकेट गोकल चंद कुक्कड़ और लाला सुनाम राय एम.ए. Mukatsar की कचहरी में न जाते…उन्हें क्या पता था कि देश के विभाजन की घोषणा के बाद सबकुछ बंद हो जाएगा…न बसें चल रही थी…न ट्रेन…काफी समय की इंतजार के बाद एक ट्रक आया…दोनों ट्रक पर चढ़ गए…अबोहर पहुंचे और अबोहर बायपास पर उतर गए।
वहां खड़ी थी मुसलमानों की एक टुकड़ी…उन्होंने दोनों को पकड़ लिया…बोले…जान से मार दो इन्हें…मगर दोनों का रूतबा था…नाम बताया तो इनकी सूचना M.L.A तक पहुंचाई गई…दोनों को अबोहर की सुखेरा बस्ती की एक हवेली में बैठे M.L.A. Bagh Ali Sukhera के पास ले जाया गया…एडवोकेट गोकल चंद के सुपुत्र एडवोकेट उमेश कुक्कड़ बताते हैं कि उनके पिता और लाला सुनाम राय एम.ए. को विधायक सुखेरा ने चाय पानी पिलाया…मिया सुखेरा ने राय साहेब कुंदन लाल, दौलत राम नागपाल, बिहारी लाल अहूजा, सरदारी लाल कटारिया, परमानंद सेतिया और गंगा राम मिड्ढ़ा को बुलाया…दोनों को कोई मार न दे…इसलिए दोनों को उन्हें सौंप दिया…अब बात करते हैं कि मिया बाघ अली सुखेरा की दास्तान की।
बात 1828 की है, जब फाजिल्का और अबोहर रेतीला इलाका था…तब मौजूदा हरियाणा स्टेट के शहर फतेहाबाद के गांव बिगड़ से कई मुस्लिम परिवार अमरा सुखेरा के नेतृत्व में अबोहर आकर बस गए…उस समय अबोहर के पश्चिम की ओर भटनेर, मलोट, गुड्डा, सलेमशाह और गोरदियाणा गांव थे…दक्षिण-पश्चिम की तरफ करीब 100 मील तक कोई गांव नहीं था…ब्रिटिश साम्राज्य के कैप्टन थोरेबी ने अबोहर के आसपास के गांवों को आबाद करने के लिए 777 स्केयर किलोमीटर जगह अमरा सुखेरा व अन्य मुसलमानों को लीज पर दे दी…मुस्लिम परिवारों ने अबोहर में 1400 घर बनाए…जिस कारण अबोहर की एक बस्ती का नाम सुखेरा बस्ती पड़ गया।
इन परिवारों का मुख्य कारोबार पशु पालन था…इनके पास करीब एक लाख पशु थे…जिनके लिए वार्टर बनाए गए…पशुओं की नस्ल अच्छी थी… दूध भी काफी था…जिनसे वह रोजाना लगभग 60 मन घी निक ालते थे…इस घी को बेचकर जो उन्हें कमाई हुई, उससे उन्होंने राज्य में कई बस्तियों का निर्माण करवाया…इसके बाद उन में से कई परिवार फाजिल्का आकर बस गए। फाजिल्का में बसने वाले वट्टू परिवारों के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे… 1944 में अबोहर की सुखेरा बस्ती में मियां सुखेरा ने अपनी अम्मी जान की याद में मस्जिद का निर्माण भी शुरू करवाया…मगर भारत विभाजन हो गया और मस्जिद का निर्माण अधूरा रह गया।
लैंडलॉर्ड होने के कारण भारत सरकार की ओर से बाघ अली सुखेरा को मैंबर ऑफ पार्लियामेंट अफेयर्स नियुक्त किया था…बाघ अली सुखेरा के दिलशाद हुसैन सुखेरा, मियां गोहर अली सुखेरा, मियां मुस्ताख अहमद सुखेरा और मियां नाजिर अहमद सुखेरा को अपनी बाजू मानते थे…उनके बल पर वह फाजिल्का मुहम्मदन सीट से विधायक बने…उनका कार्यकाल 21 मार्च 1946 से लेकर 4 जुलाई 1947 तक रहा…विधायक बनने के बाद जालंधर डिवीजन के कमिश्नर ए.सी. मेकलोड सुखेरा बस्ती अबोहर में उनके घर बधाई देने पहुंचे थे…यानि देश भर में इस परिवार का रूतबा था।
मगर विभाजन ने उनके रूतबे को भी निगल लिया…सबकुछ बिखर गया…हजारों गऊओं को यहीं छोडऩा पड़ा…हवेलियां सुनसान हो गई…जो हिन्दु…सिख…मुस्लिमों की एकता की बात करते थे…वही एक दूसरे के दुश्मन बन गए…एक बड़ा काफिला…मिया सुखेरा की अगवाई…हिन्दुमलकोट की रास्ता…पार किया तो उनके कदम एक नए देश में पड़े…जिसका नाम था…पाकिस्तान…इसके बाद 1952 में वह एक बार अबोहर की सुखेरा बस्ती में आए…बड़े बेटे इकरम सुखेरा के साथ…अपनी जन्म भूमि को सिजदा किया…फिर वो ऐसे गए…वहीं के बनकर रह गए…हमेशा के लिए…
Bagh ali Sukhera with A.C. Maclode & ect. sukhera faimlies
सियासत और धर्म की कटरता से मिले इस दर्द से पहले सबके मन में था…आजादी के सुनहरे भविष्य का लालच …देश की जनता ने भारत विभाजन का जहरीला घूंट पी लिया…एक प्रश्न के नीचे दबा वो जहरीला घंूट…जिसका जवाब न तो आप के पास है और न ही मेरे पास…किसी को आज तक नहीं मिल पाया उसका जवाब…बटवारे से हरेक को ऐसा दर्द मिलेगा…यह तो कभी किसी ने सोचा भी नहीं था…हत्याएं…दुष्कर्म…दंगे…यह तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा…जिन्होंने Indo pak partition के बारे में सोचा था…सबका मत था कि धर्म ने नाम पर बटवारा होगया और आराम से हो जाएगा…पर हुआ नहीं…
वो नेता…जिनका लोगों पर प्रभाव खत्म हो चुका था…युवा पीढ़ी…जिनके पास रोजगार नहीं था…वो भटक गए…समाचार और अफवाहों का दौर…जो बराबर चलता रहा…आग में घी का काम करता रहा…धर्म के नाम पर…लालच …हवस…डकैती का धंधा…इन सबके अलावा कई अन्य कारण भी थे…कारण जो भी हों…मगर जो हो गया…वो अब लौट कर नहीं आ सकता…युवा लड़कियां…जिन्होंने अपनी आबरू बचाने के लिए दरिया में छलांग लगा दी…कोई हैड से कूद गई…किसी ने खुद को खत्म कर लिया…काफिलों पर काफिले टूट पड़े…बच्चे, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग…किस धर्म में लिखा है कि इन की बली ले लो…कौन चाहता था उजडऩा…मगर उजडऩा पड़ा…खासकर Punjab को बर्बाद होना पड़ा…
Indo Pak Border (Fazilka)
पंजाब के टुकड़े हुए…सरहद के साथ लगते शहर … Fazilka…Ferozepur…Amritsar Or Gurdaspur…जहां की सरहद से लोग अधिक उधर से इधर और इधर से उधर गए…लाखों लोग…अगर पंजाब में सबसे ज्यादा त्रासदी की बात करें तो फाजिल्का ने सबसे अधिक दर्द झेला…1941 की जनगणना मुताबिक जिला फिरोजपुर में मुस्लमानों की संख्या 45.1, अमृतसर में 46.5 और गुरदासपुर में 50.2 प्रतिशत थी…मुस्लिम परिवार विभाजन की घोषणा होते ही भारतीय क्षेत्र छोडक़र पाकिस्तान की ओर चले गए थे, लेकिन पाकिस्तान से भारतीय पंजाब में आकर बसने वाले हिन्दु सिक्ख परिवार सितंबर के तीसरे सप्ताह आए थे…भारतीय क्षेत्र मेंं प्रवेश करने से पहले हजारों की टोलियों का कत्ल-ए-आम हुआ…उन दिनों इस ओर सतलुज दरिया में जलस्तर बढ़ा हूआ था…जिसके चलते लोगों को इस ओर पहुंचने में भारी दिक्कत हुई…लोगों ने बैलगाड़ी, बस या रेल के जरिए फाजिल्का बॉर्डर पार किया…जिनके पास कोई साधन नहीं थे…वे टोलियां बनाकर इस ओर पहुंचे…इन सबकी संख्या चार लाख थी…जबकि अमृतसर बॉर्डर से तीन लाख पचास हजार…गुरदासपुर से बार्डर पार करने वालों की संख्या दो लाख पचास हजार थी… इन्होंने 18 सितंबर से 29 सितंबर 1947 तक बार्डर पार कर भारत में प्रवेश किया…Pakistan के Mintgumri से हिन्दु सिख परिवार फाजिल्का और आसपास के क्षेत्र में आकर बस गए…इस तरह अन्य हिन्दु सिख परिवार Kasoor To Firozepur…Lahor to Amritsar और Narowaal to Dera Baba Nanak में आकर बस गये…आज भी विभाजन की टीस याद आते ही एक बारगी तो शरीर दहल उठता है…
अगर उधर की आवाम…इधर की जनता…चाहे तो क्या नहीं हो सकता…सियासत भी चाहे तो…सबकुछ संभव है…इन्डो पाक महासंघ बन जाए…तो…विशाल भारत…दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने की क्षमता रखता है…भारत में क्षमता है…एक बार फिर…सोने की चिडिय़ा बनने की…