शिक्षा का मंदिर: जहां मिलती थी फारसी, उर्दू, अर्थमेटिक और बीज गणित की शिक्षा

Govt School Village Channal Wala Fazilka

ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत मेें पश्चिमी शिक्षा देने का उद्ेदश्य था कि उनके कार्यालयों में कार्य करने के लिए एक टीम तैयार हो जाए। साथ ही ब्रिटिश सभ्यता और संस्कृत का प्रचार और प्रसार हो। भारतीय शिक्षा का प्रसार करना उनका का उद्देश्य नहीं था। उनकी नजर में व्यापार ही सब कुछ था। मगर भारतीय नेताओं की ओर से दबाव डालने के बाद यहां महाजनी स्कूलों की स्थापना की गई। इसलिये उन्होंने औद्योगिक प्रशिक्षण के लिये महाजनी स्कूल चलाए। जो शुरू में नाकाम रहे। इनमें कामयाबी हासिल करने के लिए उन्होंने फाजिल्का तहसील के गांव महराणा (महराजपुर) में 1875 में प्राइमरी स्कूल की स्थापना की। जिसे 1878 में मिडल स्कूल का दर्जा दिया गया। अंग्रेजों का मक्सद था, अंग्रेजी शासन प्रबंध को चलाने के लिये शिक्षित वर्ग तैयार करना। इस मक्सद में कामयाब होने के लिये उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देने के लिये नई शिक्षा प्रणाली शुरू की। जिसके तहत गांव रत्ता खेड़ा में इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल शुरू किया गया। यह दोनों स्कूल पंजाब शिक्षा विभाग के तहत थे। यहां फारसी, उर्दू, अर्थमेटिक और बीज गणित की शिक्षा दी जाती थी। इससे अंग्रेजों को काफी फायदा हुआ। उनके पास पहले भारतीय लोगों की मुश्किलें सुनने के लिये अंग्रेजी भाषा में बातचीत करने वाले लोगों का वर्ग नहीं था। वह भी तैयार हो गया, लेकिन शिक्षा प्रणाली महंगी थी, इसलिए अधिकतर लोग शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाये और वह अंग्रेजों की कठपुतली बनकर रह गए।

Govt Fazilka Islamia Model High School

           इसके बाद 1881 की जनगणना अनुसार फाजिल्का में एंग्लो स्थानीय भाषा मिडल स्कूल खोले गए। जिनमें नागरी शिक्षण और उर्दू शिक्षण का स्कूल था। जो नगर कौंसिल के तहत था। जिसे बाद में इस्लामियां स्कूल का नाम दिया गया। इन्हें 1918 में हाई स्कूल का दर्जा दिया गया और 1926 में सरकार ने इन स्कूलों को अपने तहत कर लिया। तीन दिसंबर 1926 को सर जॉर्ज अंडरसन डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इन्ट्रक्शन पंजाब ने स्कूल का उद्घाटन किया। स्वतंत्र भारत में फाजिल्का के सरकारी हाई स्कूल के प्रथम मुख्यध्यापक बिशन दास शर्मा थे, जो 23-07-1947 से 08-09-1948 तक स्कूल में रहे। इस स्कूल में 1913 में बनी गोल कोठी है। इसके अलावा लेक्चरर पम्मी सिंह की ओर से कबाड़ से जुगाड़ लगाकर फाजिल्का विरासत भवन बनाया गया है। जिसमें विरासत की अमूल्य वस्तुएं सजाई गई हैं। इससे पहले आर्य समाज की ओर से नारी शिक्षा के प्रचार के लिए 1904 में आर्य पुत्री पाठशाला की स्थापना की गई। जिसकी आधारशिला डीएवी कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल महात्मा हंस राज ने रखी। वहीं इस्लामियां स्कूल विभाजन के बाद बंद कर दिया गया। इसका कारण यह था कि इलाके में अधिकांश मुसलमान इस स्कूल से शिक्षा हासिल कर रहे थे और विभाजन के बाद वह पाकिस्तान चले गए। इसके बावजूद उन्होंने फाजिल्का की याद को अपने साथ रखा और पाकिस्तान के जिला पाकपटन में सरकारी फाजिल्का इस्लामियां हाई स्कूल बनाया। शिक्षा नीति को और सफल बनाने के लिये खट्टिïयांवाला बाग (प्रताप बाग) के किनारे 1913 में एडवर्ड मेमोरियल विंग की स्थापना तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर एम. एम. एन. बॉस्वर्थ स्मिथ ने की।

Govt Girls S.S.School Fazilka

           सरकारी हाई स्कूल से अलग करके 1936 में यहां लड़कियों के लिये सरकारी हाई स्कूल की स्थापना की गई। स्कूल खुद में एक मिसाल था। स्कूल सरकारी हाई एवं साधारण स्कूल (लड़कियां) की तरह था। क्षेत्र का यह एक मात्र पहला स्कूल है, जहां छात्रावास बना हुआ था। सब से पहले यहां मुख्याध्यापिका के रूप में मिस मौसमी की नियुक्ति की गई। स्कूल को चलाने में इनकी अहम भूमिका रही। इसके अलावा कुमारी हयात, कुमारी बट्टï, कुमारी मेहता, कुमारी दत्ता, कुमारी सिंह, कुमारी अमरजीत कौर, कुमारी प्रीतम कौर व रेणु कामरा आदि ने बतौर मुख्याध्यापिकाएं और प्रिंसीपल के रूप में सराहनीय योगदान दिया। आज स्कूल तरक्की की राह पर अग्रसर है।1942 में श्री सनातम धर्म पाठशाला का आगाज किया गया। (Lachhman Dost WhatsApp 99140-63937)

GHS Fazilka Session 47-48

इतना महान रहा है मेरा शहर !!!!

पंजाब और दिल्ली के बीच व्यापार का रास्ता रहा हैबेशक पैट्रिक एलैगजंडर वन्स ऐगन्यू ने 1844 में यहां बंगला बनवाया, लेकिन इसका अर्थ कतई नही लिया जा सकता कि यह क्षेत्र पहले नही थाक्षेत्र थालोग छोटेछोटे गांवों में रहते थेइनके बीच कच्चा रास्ता थाजहां से राजामहाराजा गुजरते थेलाहौरपाकपटनऔकाड़ा से दिल्लीवहां से अफगानिस्तान तक व्यापार होता थायह भी पता चल गया कि औकाड़ा दिल्ली सडक़ फाजिल्का में से होकर जाती थीइनमें से ही एक सडक़ फाजिल्का से अबोहरमलोटसिरसा जाती थीइन सडक़ों पर पुराने सिक्के मिल चुके हैं।

    सरकारी रिकॉर्ड मुताबिक फाजिल्का-अबोहर के आसपास के क्षेत्र से सांढ़ और घुड़सवार सिक्के मिल चुके हैं जो किंग ऑफ ओहीयूड अबाऊट ए.डी. 1000 के थे…

दिल्ली के अलाऊदीन मुहम्मद के सिक्के भी मिले…दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन सोमी शाम्स उद्दीन इल्तुतमिस (1211-1236)…बलबन (1266-1286)…लालुद्दीन फिरोज…अल्लाऊदीन मुहम्मद…मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351)…फिरोजशाह तुगलक (1351-1388) के जमाने के सिक्के मिल चुके हैं…जो रिकॉर्ड में दर्ज हैं।

नई खोज – 150 साल पुराने मील पत्थर ने इतिहास में जोड़ी एक और कड़ी !!!

विशाल भारत की सबसे लंबी चौड़ी सडक़ों में शुमार रही एक सडक़ फाजिल्का तक पहुंचती थी। यह सडक़ नरेला से शुरू होकर वाया सिरसा से होते हुए फाजिल्का के निकट सतलुज दरिया तक पहुंचती थी। बरसों पुरानी इस सडक़ का एक मील पत्थर गांव मौजम के एक घर में मिला है। इसका पता फाजिल्का के इतिहासकार लछमण दोस्त ने लगाया है। उन्होंने बताया कि फाजिल्का और सिरसा के निकट पक्की सडक़ें एक या दो मील तक ही लंबी थी। जो कच्ची सडक़ हजारों मील लंबी थी वो फाजिल्का से गुजरती थी। इसके बाद कच्ची सडक़ जिला औकाड़ा (अब पाकिस्तान में) तक जाती थी।

अंग्रेजी फारसी पर लिखा है सिरसा

लछमण दोस्त ने बताया कि यह मील पत्थर गांव मौजम के रहने वाले राम सिंह पुत्र करतार सिंह के घर में मिला है। घर की बुजुर्ग महिला गहलो बाई ने बताया कि सतलुज दरिया में बाढ़ के कारण उनके खेत के निकट मिट्टी का टिब्बा सा बन गया। वहां से धीरे धीरे मिट्टी हटाई जाती रही तो नीचे से मील पत्थर निकला। जो उन्होंने एक यादगार के तौर पर अपने घर में रख लिया। इस मील पत्थर पर अंग्रेजी फारसी में सिरसा 90 लिखा हुआ है।

Gehlo Bai

औकाड़ा तक जाती थी सडक़

यह कच्ची सडक़ नरेला (अब उत्तर दिल्ली का जिला) से शुरू होकर जिला हिसार पहुंचती। सडक़ हिसार के बीचोबीच से गुजरकर जिला सिरसा और डबवाली तहसील से होती हुई फाजिल्का पहुंचती थी। फाजिल्का से यह सडक़ मौजम गांव तक जाती थी। जहां से सतलुज दरिया पार करने के लिए किश्ती में जाना पड़ता था। दरिया पार करने के बाद सडक़ औकाड़ा शहर तक जाती थी, जो सिंधपंजाबदिल्ली रेल लाइन पर मिंटगुमरी जिले में मौजूद है।

Lachhman Dost Historian

पाविन्दा व्यापारी करते थे प्रयोग

उन्होंने बताया कि इस सडक़ का प्रयोग अधिकांश पाविन्दा नामक व्यापारी करते थे तो काबूल कंधार से चलकर दिल्ली में व्यापार के बाद उत्तर पच्छित इलाकों में पहुंचते थे। पाविन्दा व्यापारी सर्दी के दिनों में जिला सिरसा से होकर फाजिल्का पहुंचते थे और यहां से आगे अपना कारोबार के लिए चले जाते थे। व्यापारी अपने ऊटों पर व्यापारिक वस्तुओं को भरकर लाते थे। ऊटों की संख्यां दो-चार नहीं, सैंकड़ों होती। जब वह चलते तो ऊंटों की एक बड़ी कतार होती थी।

MileStone

फाजिल्का के यह दुर्लभ चित्र हैं बॉस !!!

फाजिल्का की बढ़ा झील का नक्शा देखते हुए लोक सभा के पूर्व स्पीकर Ch. Balram Jakhar – साथ हैं Laxmi Narayan Perival
भारत विभाजन से पहले की डाक टिकट – Stemp Half Anna
129 years old – Lamp
आसफवाला शहीदों की समाधी का 1stचित्र

भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की समाधि लेने के बदले फाजिल्का ने दी इतनी बड़ी कुर्बानी ! ! !

शहीदे आजम स. भगत सिंह ने फाजिल्का में अपने कदम रखकर जहां इस धरती को पवित्र किया, वहीं शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की समाधि लेने के बदले फाजिल्का ने बहुत बड़ी कुर्बानी दी है…उसी कुर्बानी के चलते फाजिल्का की भौगोलिक स्थिति बिगड़ गई और अनेक वीर जवानों को भारत-पाक 1965 व 1971 युद्ध में शहादत देनी पड़ी…इसके बावजूद फाजिल्का को नजरअंदाज किया गया है…जिस कारण फाजिल्का पिछड़ गया है।

शहीदे आजम स. भगत सिंह को याद करने वाले नेताओं में ऐसे कम नेता है, जिन्हें पता हो कि 60 के दशक से पहले तीनों शहीदों की समाधि पाकिस्तान के कब्जे में थी…जन भावनाओं को देखते हुए 1950 में नेहरू-नून-मुहाइदे के तहत फैसला लिया गया था कि पाकिस्तान से शहीदों की समाधि वापस ली जाए…करीब एक दशक की इस ऊहापोह के बाद पाकिस्तान ने फाजिल्का का अहम हिस्सा मांग लिया…जिस कारण फाजिल्का के 12 गांव और सुलेमानकी हैड पाकिस्तान को देना पड़ा।    

जो इलाका पाकिस्तान को दिया, वह सैन्य दृष्टि से काफी अहम था…यह इलाका देने से फाजिल्का के कई गांव पाकिस्तान की नजर के निकट आ गये और इलाका तिकोन आकार का बन गया…जिस कारण पाक के साथ हुए दो युद्धों में फाजिल्का को काफी नुकसान उठाना पड़ा।     

पाक को बारह गांव देने के कारण फाजिल्का सैक्टर में पाक से हुए युद्धों  में 216 सैना के जवानों को कुर्बान होना पड़ा…यह शहीद देश के विभिन्न राज्यें के रहने वाले थे…जिन की समाधि गांव आसफवाला में बनाई गई है…इसके बावजूद इस धरती को न तो शहीदों की धरती घोषित किया गया है और न ही स्मारक धरोहर घोषित किया गया है।

स. भगत सिंह ने फाजिल्का में ठीक करवाई थी अपनी पिस्टल ! ! !

3 अक्तूबर 1928 में साईमन कमिशन लाहौर पहुंचा तो वहां भारतीयों ने कमीशन की डटकर खिलाफत की। इस पर ब्रिटिश अधिकरियों ने अन्यों देश भक्तों सहित लाला लाजपत राय जैसे सरीखे नेता पर भी लाठियां बरसाई। 17 दिसंबर 1928 के दिन जब लाला जी की मौत हो गई तो भगत सिंह ने इसका बदला लेने की ठान ली। बदला लेने के लिए स. भगत सिंह ने ब्रिटिश अधिकारी सार्जेंट स्कॉट समझकर मोटर साईकल पर आ रहे सार्जेंट सांडर्स को गोली से उड़ा दिया। जिससे ब्रिटिश सम्राज्य में खलबली मच गई और ब्रिटिश अधिकरियों ने स. भगत सिंह को ढूंढने का अभियान तेज कर दिया। स. भगत सिंह अनेक जगह से होते हुए फाजिल्का तहसील के गांव दानेवाला में पहुंचे।

जहां उन्होंने अपने देश भक्त साथी स. जसवंत सिंह दानेवालिया के घर में पनाह ली। स. भगत सिंह दिन के समय भेष बदलकर अन्य देश भक्तों के साथ अपने सबंध कायम रखते और रात के समय दानेवालिया के घर लौट आते। जहां वह स. जसवंत सिंह के बाहर वाले घर की हवेली में ठहरते। स. भगत सिंह वहां कई महीनों तक रहे। वहां से जाते समय स.भगत सिंह ने गांव के लुहार हाजी करीम से अपनी पिस्तौल की मुरम्मत करवाई। 1929 में गिरफ्तारी के बाद स. भगत सिंह ने पुलिस को यह बता भी दिया कि इस दौरान उन्होंने कहां-कहां पनाह ली? इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने गांव में छापामारी करके घर-घर की तलाशी ली और ग्रामीणों से स. भगत सिंह के बारे जानकारी हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन किसी भी ग्रामीण ने स. भगत सिंह के गांव में छुपे रहने की बात नही बताई। (इस बात का खुलासा पंजाब के पूर्व इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस भगवान सिंह की पुस्तक 20वीं सदी दा पंजाब पृष्ठ नं.78 पर किया गया है) 

When the Simon Commission arrived in Lahore on 3 October 1928, the Indians there protested against the commission and made the Khilafat. On this, the British superintendents of the country including Lala Lajpat Rai, along with other countrymen, also raided ladders. On 17th December, 1928, when Lala Ji died, Bhagat Singh decided to take revenge. To take revenge Bhagat Singh blamed Sgt Sanders, who came to the motor cycle, as British officer Sergeant Scott. This led to a stir in the British Empire and the British officers did. Speed ​​up the campaign to find Bhagat Singh S Bhagat Singh, through many places, reached Phajilka Tehsil’s village, Danavala. Where he is a devotee of his country. Jaswant Singh took refuge in Danawalia’s house. S Bhagat Singh kept changing his identity during the day while other countries kept their relationship with the devotees and returned to the home of Danawaliya at night. Where he is Stay in the mansion of a house outside Jaswant Singh. S Bhagat Singh stayed there for several months. While going from there, Mr. Bhagat Singh made a pledge of his pistol from Lohar Haji Karim of the village. After the arrest in 1929 Bhagat Singh also told the police that where did he take refuge during this period? After this, the British police conducted raids in the village and searched the house and demanded from the villagers. Attempted to get information about Bhagat Singh, but any villager Bhagat Singh did not talk about being hidden in the village

क्यों पड़ा सादकी व सुलेमानकी पोस्ट का नाम ?


BORDER GATE

इंडिया में नाम…सादकी पोस्ट…पाकिस्तान में नाम …सुलेमानकी पोस्ट…बीच में सरहद…भारतीय समय शाम के साढ़े पांच बजे…एक कदम की दूरी पर स्थित पाकिस्तान में समय का आधा घंटा अंतर…यानि पांच बजे…जब दोनों देशों के बीच रिट्रीट सैरेमनी होती है तो लोगों में जोश भर आता है…देश भक्ति के नारे गूंजते हैं…रिट्रीट सैरेमनी के बारे में किसी अन्य ब्लॉग में लिखेंगे…आज बताते हैं भारत की सादकी पोस्ट व पाकिस्तान की सुलेमानकी पोस्ट के बारे में…इनका नाम सादकी और सुलेमानकी क्यों पड़ा…?

SADQI POST (INDIA)

सादकी पोस्ट

सादकी पोस्ट का नाम सादकी नहर के नाम पर रखा गया…फाजिल्का और बहावलपुर रियासत की भूमि को सिंचाई के लिए पानी की भारी किल्लत थी…उसे पूरा करने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के सिंचाई विभाग की ओर से 19वीं सदी के पहले बीस वर्षों में नहरें बनाने का कार्यक्रम शुरू किया गया…इलाके में सबसे पहले सादकी नहर खोदने का कार्य शुरू किया गया…यह कार्य 1882 में पूरा कर लिया गया।

सुलेमानकी पोस्ट

SULEMANKI POST (PAKISTAN)

पाकिस्तान में सुलेमानकी हैडवर्कस है…जिसका उपयोग सिंचाई व बाढ़ नियत्रंण के लिए किया जाता है…बहावलपुर के नवाब अमीर सादिक मोहम्मद खान (V) और ब्रिटिश सरकार के कहने पर 1922-1927 के बीच इस परियोजना को मुकम्मल किया गया…सुलेमानकी हैडवर्कस के दाहिने किनारे ब्रिटिश पंजाब में 1925 में पाकपट्टन नहर का निर्माण किया गया…जबकि बाई तरफ सादकी नहर है…बस इन्ही सादकी व सुलेमानकी के नाम पर ही दोनों देशों में पोस्टें हैं…सादकी पोस्ट पर सीमा सुरक्षा बल के जवान और सुलेमानकी पोस्ट पर पाक रेंजर्स रिट्रीट सैरेमनी करते हैं।(Lachhman Dost Whats App 99140-63937)

Why was the name of Sadqi and Sulemanki post ?

Name in India… Sadqi Post… Name in Pakistan… Sulemanki Post… Retreat ceremony held here like wagha of Amritsar and Husainiwala of Ferozpur … Indian time  five and half in the evening…  Whereas 5 o’clock in Pakistan … Half an hour of major time difference at a step distance… No there ua no difference at all but only watches of the both Country shows the difference and bcoz of  their standard time …When there is a retreat ceremony between the two countries, people get excited… Desh bhakti slogans chanted…let we have another blog on some other day about the retreat ceremony  … Today, it’s about sadqui post and  Sulemanki post… Why did they named it Sadki and Sulemanki …?

Sadqi Post (INDIA)

The Sadaqi post was named after the Sadaqi Canal… The lands of the princely states of Fazilka and Bahawalpur had a huge shortage of water for irrigation…To fulfill this, the first twenty of the 19th century by the Irrigation Department of the British Govt, the program of canals were started…The first digging of the Sadaqi Canal was started in the area…This work was completed in 1882.

Sulemanki post (Pakistan)

Pakistan has Sulemanki headworks…which are used for irrigation and flood control …this was built by the efforts of Nawab Amir Sadiq Mohammad Khan (V) of Bahawalpur And the project was completed between 1922-1927 by the British Government …Pakpattan Canal was built in 1925 in British Punjab on the right bank of Sulemanki Headworks … while on the left is Sadqi Canal … There are posts in both countries in the name of Sadaqi and Sulemanki … Border Security Force personnel at Sadqi Post and Pak Rangers perform Retreat Ceremony at Sulemanki Post.

गंग कैनाल के निर्माता-महाराजा गंगा सिंह का-बंगले से गहरा नाता

महाराजा गंगा सिंह…जिनके नाम पर गंग कैनाल है…जानते हैं आप कि वह फाजिल्का भी आते रहे हैं…वह सेठ शोपत राए पैड़ीवाल व मदन गोपाल पैड़ीवाल के दोस्त थे…जब कैनाल का निर्माण हो रहा था तो वह कई कई दिन तक यहां रूकते थे…आज उनके द्वारा बनाई गई गंग कैनाल की बात करते हैं…

Gang Canal

    बीकानेर रियासत को पानी देने वाली गंग केनाल फाजिल्का के क्षेत्र से होकर गुजरती है…इसे सतलुज वैली प्रोजेक्ट समझोते के तहत बीकानेर रिसायत को पानी देने के लिए बनाया गया है…बात 1899-1900 की है…जब बीकानरे रियासत में अकाल पड़ गया। तब बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने केनाल के लिए ब्रिटिश साम्राज्य से अपील की… पंजाब के चीफ इंजीनियर आर.जी. कनेडी ने 1906 में सतलुज वैली प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की तो महाराजा गंगा सिंह को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया…तब महाराजा गंगा सिंह लार्ड कर्जन के पास शिमला पहुंचे…क्योंकि बहावलपुर रियासत की ओर से इसकी खिलाफत की जा रही थी…इसलिए केनाल निकालना आसान नहीं था… बहावलपुर रियासत का तर्क था कि रिपोरियन नियमानुसार बीकानेर रियासत का इस पानी पर कोई हक नहीं है… मगर पंजाब के गवर्नर सर डैंजिल इबटसन को महाराजा से हमदर्दी थी और 1912 में योजना बनाकर तैयार कर ली गई। मगर पहले विश्व युद्ध के कारण यह कार्य अधर में लटक गया… इसके बाद 4 सितंबर 1920 को पंजाब, बहावलपुर और बीकानेर रियासत में सतलुज घाटी प्रोजेक्ट समझौता हुआ…महाराजा गंगा सिंह ने केनाल की जिम्मेदार रैवन्यू कमिश्नर जी.डी. रूडकिन को सौंप दी…

Gang Canal

केनाल पर करीब तीन करोड़ रूपये खर्च आने का अंदाजा था…महाराजा द्वारा 5 दिसंबर 1925 को हुसैनीवाला में गंग नहर का नींव पत्थर पंजाब के गवर्नर सर मैलकम हैले, चीफ जस्टिस ऑफ पंजाब सर सादी लाल, सतलुज वैली प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर ई.आर. फाए की मौजूदगी में रखा गया…इस केनाल का नाम महाराजा गंगा सिंह के नाम पर गंग केनाल रखा गया… हुसैनीवाला से शिवपुर तक इसकी लंबाई 129 किलोमीटर है। उस समय यह नहर दुनियां की सबसे लंबी नहर थी… महाराजा ने पंजाब क्षेत्र में नहर और रेस्ट हाउस बनाने के लिए सारी भूमि पंजाब सरकार से खरीद की थी…पांच वर्ष में चूने से तैयार की गई यह केनाल अब सीमेंट बजरी और ईंटों से बनी अन्य नहरों से मजबूत है…26 अक्तूबर 1927 को शिवपुर हैड से केनाल का पानी छोडक़र महाराजा द्वारा इसका उद्घाटन किया गया… इस मौके पर वायसराये ऑफइंडिया लार्ड इरविन के अलावा कई राज्यों के राजा-महाराजा और नवाब भी मौजूद थे…अगर गांव जंडवाला खरता की तरफ से गंग कैनाल पर जाएं तो यहां अकबर पुल है…जिसे मुस्लमान अकबर खां (जंडवाला खरता) ने बनवाया था।(Lachhman Dost Whats App 99140-63937)

सम्भल जाएं बॉस !!! जिला फाजिल्का के यह हैं खतरनाक चौंक 🚗🚗

फाजिल्का में कई दुर्घटनाग्रस्त क्षेत्र हैं…किसी भी घर का कोई चिराग न बुझे…इसलिए इन खतरनाक चौंकों का ध्यान रखें…खुद भी … और अन्य को भी बताएं…

Fazilka –

1. Near Fazilka Co-operative Sugar Mills (Khui Khera)

2. Y Junction (Near D.C. Office)

3. T Point Malout Chowk

4.Lal Batti Chouk, near Sanjeev cinema

5.Near Dhani khara wali – opposite G.P.S. Malout Road

Jalalabad

6.Bus Stand

7.Araian wala Chowk

8.Shaheed Bhagat Singh Chowk

9.Tiwana Mour

10.Nimwala Chowk

11.Opposite Police Station Ghubaya

Abohar

12.Hanumangarh Bypass Chowk Abohar

13.Abohar Bypass (Towards Fazilka)

14.Abohar Bypass (Toward Malout)

15. Sito Bypass (Abohar Road)

15. Alamgarh (Ganganager Road)

Baluana

15.Baluana (Abohar – Malout Road

ईसाई महिला ने किया गुरू ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश ! ! !

Guru Nanak Dev ji

12 अगस्त 1947 … पाकिस्तान के गांव चक्क के एक हिन्दू चौधरी परिवार के घर बच्चे की किलकारी गूंजी…बधाई हो चौधरी साहिब, पोता हुआ है …मरियम दाई (नर्स) ने चौधरी को खबर दी तो लड्डूओं का मर्तबान देकर व कुछ पैसे देकर चौधरी परिवार ने मरियम को जल्दी जल्दी विदा कर दिया … परिवार के हाव भाव व आधी अधूरी खुशी ने मरियम को बता दिया था कि परिवार किसी अनजानी सी जल्दी में है। बैलगाडी से लिफ्ट लेकर अपने गांव पीर धानी को लौटते हुए सहयात्रियों से मरियम को पता चला कि देश के रहनुमाओं ने जिस स्वतंत्रता पत्र पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया है, वास्तव में वह विभाजन का पत्र है…देश के दो टुकड़े होने जा रहे हैं…हवेली और पाकपट्टन के बीच के इन गांवों का इलाका पाकिस्तान में रहेगा…देश में दंगे छिड़ चुके हैं व हिन्दू सिख परिवार इधर से उधर वाले हिंदुस्तान की ओर जा रहे हैं…ग्रामीणों को लंबी चौड़ी जानकारी तो नहीं थी, लेकिन हिन्दू परिवारों को इतना पता था कि किसी भी हालत में सतलुज दरिया के उस क्षेत्र में पहुंचना है…हिन्दू परिवारों को लूटा जा रहा था व क़त्ले आम हो रहा था।

मरियम नाम की यह महिला दाई का काम करती थी व उसका गांव हवेली व पाकपट्टन के मध्य में पीर धानी के नाम से था…कुंवारी थी व अब तक शादी नही की थी…मरियम मैथोडिस्ट मतावंलबी थी, जिनकी आबादी उस क्षेत्र में कम थी…जिस कारण अभी तक उसकी शादी नहीं हुई थी…आसपास के गांव कुम्हारीवाला, चक्क, बेला व कई अन्य गांवों में वह इकलौती दाई …गर्भवती महिलाओं के जापे करवाने के बाद जो भी बधाई व दाना पानी उसे मिल जाता था उसी से उसका अच्छा गुजारा हो जाता था…बाकी वक्त प्रभु यीशू का गुणगान व लोगों से मेल मिलाप रखने में बीतता…मरियम का काम ऐसा था कि आसपास के आठ दस गांवों में हिन्दु मुस्लिम परिवारों का बच्चा बच्चा उसे जानता था…जानते भी क्यों नहीं, सबने उसके हाथों अथवा उसकी दिवंगत मां के हाथों जन्म लिया था…मरियम के दिल में हिन्दू मुस्लिम धर्म को लेकर कोई मतभेद नहीं थे, लेकिन ज्यादातर काम उसको हिन्दू सिख परिवारों की तरफ से मिलता था…कह सकते हैं कि उसकी आजीविका हिन्दू चौधरी परिवारों व सिख परिवारों पर निर्भर थी। अगले दिन 13 अगस्त के सूर्योदय ने खबरों के विकराल होने की सूचना दी…खबरें सही थी या मात्र अफवाहें, लेकिन खतरनाक थी…दंगे हिन्दू सिख बनाम मुसलमान के बीच थे व ईसाईयों को टारगेट नहीं बनाया जा रहा था जो इसाई प्रस्तावित पाकिस्तान में रूकना चाहे तो रूक सकते थे, जाना चाहे तो जा सकते थे, लेकिन उन्हें लूटा पीटा या मारा नहीं जा रहा था…इसलिए क्षेत्र के इक्का दुक्का के ईसाई परिवार जिसमें उसके भाई भाभिया भी शामिल थे, सब शांत थे, लेकिन हिन्दू सिख परिवारों में हड़बड़ी मची हुई थी…देखते ही देखते 3-4 घंटो में आसपास के सारे गांव हिन्दू सिख परिवारों से खाली हो गये …कुछेक परिवारों में सिर्फ इक्का दुक्का पुरूष कुछ जरूरी कामों के लिए रूके थे, लेकिन उनके परिवार जा चुके थे…मरियम के अपने रिश्तेदारों को इतनी फिक्र नहीं थी, लेकिन मरियम की आजीविका वाले सारे परिवार तो जा चुके थे …आखिरकार मरियम ने भी अपने समान को ट्रंक व पोटली में बांधा और अकेले सतलुज के उस पार जाने का निर्णय लिया…लुट जाने को मरियम के पास ज्यादा संपत्ति कुछ नहीं थी तो भी गले में क्रॉस उसकी सुरक्षा के लिए काफी था…ज्यादा से ज्यादा कोई उसे गौमांस खाने को मजबूर कर देता …इससे ज़्यादा कुछ नही क्योंकि ईसाईयों को तो निशाना बनाया ही नहीं जा रहा था…मरियम पैदल ही चल दी हवेली के रास्ते फाजिल्का की ओर … कोई साधन न भी मिले तो भी सफर के हिसाब से मरियम को अंदाजा था कि वह 14 अगस्त की सुबह तक सतलुज के उस पार पहुंच जायेगी … शाम तक वो हवेली पहुंच जायेगी और उसके बाद तो उसे अकेलापन महसूस नहीं होगा, क्योंकि जाने वालों के झुंड मिलेंगे … हवेली तक का सफर उसे दिन के उजाले में अकेले ही तय करना था क्योंकि इस ओर का क्षेत्र पहले ही खाली हो चुका था।

चलते चलते मरियम गांव चक्क पहुंची तो पूरे गांव में सन्नाटा था …हिन्दू सिख परिवारों का यह गांव पूरा खाली हो चुका था … इस गांव का एक एक परिवार मरियम को जानता था तो सूना गांव देखकर मरियम की आंखें भर आई … गुरुद्वारे के नजदीक से गुजरते वक्त पता नहीं उसे क्यूं ऐसा लगा कि गुरुद्वारे के अंदर से उसे आवाज दी गई है…गांव के इस ग्रंथी परिवार व गुरुद्वारे में भी उसका आना जाना था तो सर पर दुप्पटा रखकर गुरुद्वारे के अंदर चली गई … ग्रंथी परिवार अपना सामान समेट कर क्वार्टर खाली करके जा चुका था, लेकिन मुख्य कमरे में गुरू साहिब का प्रकाश हो रहा था … सिख परिवारों में आना जाना रहने की वजह से उसे सिख मर्यादा का बहुत ज्ञान था … उसने गुरू ग्रंथ साहिब को रूमाले में लपेटा और उसे अपना तीसरा लगेज मानते हुए लेकर चल दी … इस बात से वह अंजान थी कि वह आवाज सचमुच गुरुद्वारे के अंदर से आई थी या उसके अंतरमन से … खैर तीसरे लगेज का भार को महसूस किये बिना वह हवेली पहुंच गई।

खैर मरियम मौसी के मुंह से बचपन में सुनी इस कहानी को फाजिल्का पहुंचने तक के पूरे वृतांत को सुनाकर मैं ब्लॉग को लंबा नहीं करता, लेकिन सतलुज दरिया पार करने के बाद उसके आगे यह सवाल था कि फिलहाल वो कहां जाये जो अपने आजीविका वाले परिवारें को ढूंढना तो अगले एक दो माह का काम था तो तब तक शरण कहां ली जाये … स्वभाविक रूप से उसने अपने धर्म के परिवारों के बारे में पूछा तो उसे मालूम पड़ा कि फाजिल्का (बंगला) शहर के समीप इस्लामाबाद बस्तीनुमा गांव में कुछ ईसाई परिवार रहते हैं … खैर मरियम उन परिवारों के मध्य पहुंच गई व उसे शरण भी मिल गई, लेकिन उसके तीसरे लगेज में गुरू ग्रंथ साहिब थे, जिसे प्रकाश मान करना जरूरी था, इसाई परिवार के घर में तो हो नही सकता था … पता करने पर मालूम हुआ कि आसपास कोई गुरूद्वारा तो नहीं है, लेकिन पास की मस्जिद को खाली करके मौलवी परिवार पाकिस्तान जा चुका है व मस्जिद खाली है … मरियम ने उस मस्जिद की सफाई की, उसे अच्छी तरह धोकर पवित्र किया और अपने से जो बन पड़ी व्यवस्था के मुताबिक गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर दिया … आसपास सिख परिवार तो नहीं थे, लेकिन 1950 के दशक में बहुत से हिन्दू परिवार भी गुरुद्वारे में आते जाते थे तो हिन्दू चौधरी परिवारों ने मस्जिद को गुरुद्वारे में बदल दिया … इस सत्य घटना पर सोशल इंजीनियरिंग के ज्ञाता, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील व मशहूर ब्लॉगर इंकलाब नागपाल ने कहा कि मरियम जैसी रूहों का कोई धर्म नही होता … ईसाई परिवार में जन्म लेने के कारण दुनिया उसे ईसाई के तौर पर जानती होगी लेकिन ऐसी रूहों को किसी धर्म या समुदाय से जोडक़र देखना उनका अपमान करना है … नागपाल ने कहा कि छोटी उम्र होने के कारण वो अपनी रूह को उस वक्त पहचान न पाई जब उसे गुरुद्वारे के अंदर से आवाज आई … वो आवाज़ दरअसल उसके अंतस से उठी होगी लेकिन उसे मालूम न पड़ा , बाद के वर्षों उसे मालूम हो गया होगा लेकिन बच्चों को कहानी सुनाते वक्त शायद इसका जिक्र नही किया … ऐसी रूहों को किसी धर्म संप्रदाय से जोडक़र हमें नही देखना चाहिए … श्री नागपाल ने कहा कि यह सत्य घटना प्रेरणा दायक है व इस पर फिल्म भी बननी चाहिए … उन्होंने इतिहास से जुड़े इस गुरूद्वारे के एसजीपीसी या स्थानीय गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा सुध न लेने पर हैरानी जताई …
पाठकों को बता दूं कि बाद में मरियम की शादी चर्च के फादर ने फाजिल्का के ही एक ईसाई समुदाय के लडक़े से करवा दी थी, इसलिए उसे आजीविका के लिए फाजिल्का छोडऩे की जरूरत नही पड़ी … मैं व मेरे दोस्तों ने बचपन में मरियम के मुंह से यह कहानी सुनी है, लेकिन यह कहानी न होकर सच्च है जो फाजिल्का के मौहल्ला नई आबादी इस्लामाबाद के गुरूद्वारा साहिब की दीवारों में दर्ज है जो अभी भी मस्जिद नुमा है, लेकिन एसजीपीसी ने इसे कभी नहीं संभाला

Guruduara Nai Abadi Islamabad Fazilka

फाजिल्का की यह लेडी सुपरकॉप !!!

महाराष्ट्र कैडर की एक ऐसी पहली महिला आईपीएस अधिकारी, जिसने मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के पद पर तैनात होकर फाजिल्का का सम्मान दिया है … जन्म फाजिल्का में…प्राथमिक शिक्षा फाजिल्का के डीसी मॉडल स्कूल में… उस के बाद Govt girls sin. Sec. school Fazilka… वाद विवाद प्रतियोगिता हो या कोई नाटक…क्रिकेट खेल में भी अच्छी पकड़…

पिता ओ.पी.चड्ढा सीमा सुरक्षा बल में थे। उनकी पोस्टिंग फाजिल्का में थी…1971 में उनका यहां से तबादला हो गया…मीरा ने माफिया राज को खत्म करने में अहम रोल निभाया था…दाऊद इब्राहिम कासकर…छोटा राजन गैंग के कई सदस्य…सलाखों के पीछे…सिर्फ मीरा चढ्ढा की बदौलत…1994 में जलगांव में एक बड़ा सेक्स स्कैंडल भी पकड़ाया था…

जिसमें स्कूल की बच्चियों से लेकर कॉलेज की लड़कियों को देह व्यापार के व्यवसाय में ढकेलने की बात सामने आई थी…इस स्कैंडल का खुलासा करने में मीरा का खास रोल रहा…मीरा बोरवाणकर की निगरानी में मुंबई ब्लास्ट के आरोपी याकूब मेमन को फांसी दी गई थी…उनकी इस बहादुरी और पे्ररणा के चलते फिल्म बनी थी मर्दानी…जिसमें मुख्य किरदार रानी मुखर्जी ने निभाया था…

तस्वीरें बताती हैं कि फाजिल्का की याद में भी दम है बॉस

Govt Fazilka Islamia Model High School Pakpattan

Before the Partition of India, there was Islamia school near Sanjiv Cinema of Fazilka… When the country was partitioned, the Muslim families who moved here built a school in Pakistan city of Pakpatan in 1953 to keep the memory of Fazilka… which was named… Government Fazilka Islamia High School… which is spread over 19 Kanal place… so it is said that even Fazilka has a memory, Boss…

Govt Fazilka Islamia Model High School Pakpattan

भारत विभाजन से पहले फाजिल्का के संजीव सिनेमा के निकट इस्लामिया स्कूल था…देश का बटवारा हुआ तो यहां से गए मुस्लिम परिवारों ने फाजिल्का की याद को बनाए रखने के लिए 1953 में पाकिस्तान के शहर पाकपटन में एक स्कूल बनाया…जिसका नाम रखा गया…सरकारी फाजिल्का इस्लामिया हाई स्कूल…जो 19 कनाल जगह में फैला हुआ है…इसलिए कहते हैं कि फाजिल्का की याद में भी दम है यार…

Govt Fazilka Islamia Model High School Pakpattan

फाजिल्का तक पहुंचेगा 6650 करोड़ रूपये का प्रोजैक्ट !

भारत पाक के बीच तलखी के बावजूद 6650 करोड़ रूपये का प्रोजैक्ट तापी फाजिल्का तक पहुंचेंगे। इस बारे में पाक के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी हां कर दी है…उनका कहना है कि इस प्रोजैक्ट को बीच में नहीं रोका जाएगा…विश्व में पेट्रोलियम पदार्थों के कम होते भंडार और वाहनों में प्रदूषण रहित एलएनजी को इंधन के रूप में बढ़ रहे प्रयोग से उत्साहित एशियन डिवेलपमेंट बैंक के साउथ एशियन एनर्जी डिवीजन द्वारा भारत और पाकिस्तान में एलएनजी

की आपूर्ति करने के लिये पाइप लाइन उजेबिकिस्तान के दौलताबाद से हर्ट, सोख, कंधार, चमन, बोस्टन, डेरा गाजी खान, मुल्तान और हवेली से फाजिल्का पहुंचनी है। इस परियोजना पर 6550 करोड़ रुपये (पाइप लाइन बिछाने पर खर्च 1650 करोड़) खर्च आएगा। अगर यह परियोजना फाजिल्का पहुंचती है तो जिला फाजिल्का देश विदेश में चमक जाएगा। यानि तापी परियोजना वास्तव में फाजिल्का के लिए फायदे का सौदा साबित होगी।

Indo Pak Border-Retreat Ceremony Time has been Changed …

Timing- Sadqi Border Fazilka

भारत पाक सरहद की सादकी पोस्ट पर रोजाना रिट्रीट सेरेमनी होती है…इंडिया की तरफ सीमा सुरक्षा बल के जवान रिट्रीट सेरेमनी में हिस्सा लेते हैं तो पाकिस्तान की तरफ से पाक रेंजर…पाकिस्तान की तरफ सुलेमानकी पोस्ट है…इन दिनों मौसम में बदलाव आया है…जिसके चलते रोजाना होने वाली रिट्रीट सेरेमनी का समय बदल दिया गया है। पहले रिट्रीट सेरेमनी का समय पहले 5.00 pm था, मगर अब रिट्रीट सेरेमनी ( from 16 nov) शाम 4.30 बजे होगी…यह भारतीय समय अनुसार है, पाकिस्तान में उस समय शाम के 4.00 बजे होंगे।

Sadqi Border Fazilka

There is a daily retreat ceremony at the Sadqi post of Indo-Pak border … Border Security Force personnel from India side take part in the Retreat ceremony, then Pak Ranger from Pakistan … Sulemanki post from Pakistan … The weather has changed… due to which the time of daily retreat ceremony has been changed. The time of the first retreat ceremony was at 5.00 pm, but now the retreat ceremony will be at 4.30 pm… This is according to Indian time, it will be 4.o0 pm in Pakistan at that time.

Sadqi Border Fazilka

सांदल बार से फाजिल्का और जलालाबाद पहुंची झूमर

झूमर दक्षिण पंजाब का मशहूर लोक नाच है। भारत विभाजन हुआ तो Sandal Bar (सांदल बार) के इलाके में रहने वाले अधिकांश लोग Fazilka or Jalalabad के इलाके में आकर बस गए। जहां उन्होंने लोक नाच झूमर की शान को बरकरार रखा और देश विदेश में इसे प्रसिद्ध किया। दरअसल विभाजन से पूर्व Jhoomer में Pokhar Singh और Jammu Ram का नाम काबिले तारीफ रहा है। विभाजन के बाद जम्मू राम गांव नूरशाह में आकर बस गए, जबकि Pokhar Singh गांव झोटियां वाली में आकर रहने लगे। यहां उन्होंने चिराग ढ़ाणी बसाई। पोखर सिंह का जन्म 15 अगस्त 1914 को मिन्टगुमरी जिला के गांव तूतवाली जिला मिंटगुमरी (पाकिस्तान) में स. पंजाब सिंह के घर माता केसां बाई की कोख से हुआ। पोखर सिंह के छह भाई थे तो सबसे बड़ा लछमण सिंह पंजाब विधान सभा के सदस्य भी रहे। आप बचपन से कुश्ती और मुदगर उठाने के साथ-साथ आप झूमर के बहुत शौकीन थे। आपकी शादी संतो बाई से हुई और आपके घर चार बेटे व पांच बेटियों ने जन्म लिया। बाबा Pokhar Singh की मौत के बाद उनके बेटे कुलवंत सिंह लोक नाच झूमर के जरिए इलाके की शान बनाए हुए हैं।

Pokhar Singh with lakshmi chahuan and his wife at shimla song and drama division

           फाजिल्का में आने के बाद भी उन्होंने झूमर लोक नाच को प्रसिद्ध किया। बात 1967-68 की है। तब गांव लालो वाली के बेदी परिवार की ओर से भारी मेला लगाया जाता था और इसकी धूम दूरदराज के क्षेत्र में भी थी। . लाजिन्द्र सिंह बेदी ने मेले में झूमर का मुकाबला करवाया। अन्य टीमें तो मुकाबले के पहले दौर में ही बाहर हो गई। मगर पोखर सिंह और जम्मू राम की टीम में कड़ा मुकाबला हुआ। मगर बाबा पोखर सिंह की टीम ने मुकाबला जीत लिया और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया। कहते हैं कि जब महारानी विकटोरिया गोल्डन जुबली मनाने के लिए भारत आई तो बाबा पोखर सिंह ने झूमर में बोलियां डालकर उसका विरोध किया। पोखर सिंह ने विकटोरिया को जुगनी कहकर संबोधित किया। 26 जनवरी 1961 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बाबा पोखर सिंह को सोने के तगमें से नवाजा। इसके अलावा आपने देश विदेश में अनेकों पुरस्कार हासिल किए। अब बात करते हैं झूमर की। पुरुषों द्वारा किया जाने वाला पंजाब झूमर नृत्य अविभाजित भारत के दक्षिणी पंजाब के शहर फाजिल्का का एक विशेष लोकनाच है। इसका यह नामकण झूम से लिया गया। घूमर नृत्य हरियाणा की युवतियों का लोकप्रिय नृत्य है, जो होली, गनगौर अथवा तीज जैसे त्यौहारों पर किया जाता है। घूमर नृत्य में जहां युवतियां, गोलाकार में झूमते हुये तालियां बजाकर एवं गीत गाते हुये यह नृत्य करती हैं। वहीं झूमर लोकनाच करने वाले गोलाकार घेरे में ढ़ोल की थाप पर झूमकर ताली बजाकर लगात्मकता के साथ लोकनाच करते हैं। झूमर के अंतिम चरण स्थिति में नर्तक दोदो के जोड़े में तेजी से घूमते हैं। नृत्य के समय गाये जाने वाले गीतों में समसामयिक विषयों पर हास्य और व्यंग्य शामिल होता है।

parvarik team of baba pokhar Singh

           फाजिल्का प्रसिद्ध झूम नृत्य के गीत लोकपारम्परिक काव्यों पर आधारित श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होते हैं। नर्तकों की वेषभूषा साधारणत्या सफेद होती है। यह लोकनाच तीन पड़ावों में होता हैं, एक धीमी ताल, दूसरा तेज ताल और तीसरा बहुत तेज ताल। कई विद्वानों ने इसे झूमर की ताल, चीना झडऩा और धमाल भी कहा हैं। यह लोक नाच खुली जगह, घेरे का आकार, अपनेअपने लोक गीत के बोल द्वारा ढ़ोल पर किया जाता है। इसकी शुरूआत धीमी और अंतिम में तेज जोशीली होती है। इस दौरान जो भी गीत बोले जाते हैं। उनमें पशुओं, वृक्ष और प्रेमी के मिलने की तड़प का जिक्र ज्यादा होता हैं।

Jhumar Pitama – Baba Pokhar Singh 

Chhundar is a famous folk dance of South Punjab. When India was partitioned, most of the people living in Sandal Bar area settled in the area of ​​Phazilka and Jalalabad. Where he retained the fame of the Folk Dance chandelier and made it famous in the country abroad. In fact, before the partition, the names of Pokhar Singh and Jammu Ram have been praised in the Jhumar. After the partition Jammu Ram Village settled in Noorshah, while Pokhar Singh lived in the village Jotis. Here he built a chirag cabinet. Pokhar Singh was born on August 15, 1914, in Tintwali district, Mintgumari (Pakistan), in village Mintuguri district. The house of Punjab Singh came from the womb of Keshan Bai. Pokhar Singh had six brothers while Lakhman Singh, the eldest was also a member of the Punjab Legislative Assembly. Apart from lifting wrestling and mugger from your childhood, you were very fond of chandelier. You got married to Santo Bai and you have born four sons and five daughters. After the death of Baba Pokhara Singh, his son Kulwant Singh has made the pride of the area through the folk dance chandu.

           After coming to Fazilka, he also popularized the Jhumar Lok Dancing. The point is 1967-68. Then a massive fair was organized by the Bedi family of the village Lallo and its fog was also in remote areas. S Mr.Lajinder Singh Bedi fought the chandelier in the fair. Other teams were out in the first round of the match. But the team of Pokhar Singh and Jammu Ram got a tough fight. But Baba Pokhar Singh’s team won the contest and they were awarded the prizes. It is said that when Queen Victoria came to India to celebrate Golden Jubilee, Baba Pokhar Singh opposed it by putting bids in the chandelier. Pokhar Singh addressed Viktoria as Jugni. On January 26, 1961, Prime Minister Pandit Jawaharlal Nehru received Baba Pokhar Singh from the gold medal. Apart from this, you have got many awards abroad. Let’s talk now of the chandelier. The Punjab chandar dance by men is a special festival of undivided India, the city of Fazilka, southern Punjab. This name was taken from Jhoom. Ghoomar dance is the popular dance of the women of Haryana, which is done on festivals like Holi, Gangaur or Teej. In the Ghoomar dance, where the girls dance and dance while singing and singing in the sphere, they dance. On the other side of the chandeliers, the chandeliers are roaming on the thunderstorm and chanting them with rhythm. In the last phase of the chandelier, dancers roam fast in couple of pairs. Songs that are played at the dance include humor and satire on contemporary subjects.

           Fazilka’s famous Jhoom dance songs are full of popular expressions based on traditional poetry. The dancers’ dress is usually white. This locals are in three stages, a slow rhythm, another fast rhythm and the third very fast rhythm. Many scholars have also called it the rhythm of chandeliers, china flashes and dhamal. This folk dance is done on the open space, the shape of the circle, the voice of his folk song, on the wall. Its beginnings are slow and strong in the last and final. Whatever songs are said during this time. They are more concerned about meeting animals, trees and lovers 

All Photoes with Thanks 

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हंस बनकर उड़ गई ‘शीश महल’ की पुष्पा

Singer Pushpa Hans

   India Partiotion से पहले Old Abohar Road Fazilka पर मार्केट कमेटी थी। उसके साथ ही फौजदारी केसों के प्रसिद्ध Adv. Rattan Lal Kapoor का घर था। जनक रानी की कोख से एक बेटी ने 30 नवंबर 1917 (कुछ लोग 17 नंवबर 1927 बताते हैं) को जन्म लिया। बच्ची का नाम Pushpa रखा गया। परिजनों ने उसे फाजिल्का से प्राइमरी शिक्षा दिलाई। यह वही पुष्पा है, जो बड़ी होकर Pushpa Hans के नाम से प्रसिद्ध हुई और अपनी सुरीली आवाज के जरिए फाजिल्का का नाम देश विदेश में रोशन किया। पुष्पा हंस की शादी 1948 में कर्नल हंस राज चौपड़ा से हुई। इस बीच वह फिल्मों में काम करती रही, लेकिन उनका तबादला दिल्ली हो जाने के कारण वह फिल्मों में काम करना छोड़ गई। मगर उन्होंने अपनी पहचान को कायम रखा और 1989 और 1982 में उन्हे वेस्ट सिंगर अवॉर्ड के अलावा 26 जनवरी 2007 को राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजा। इसी वर्ष पंजाब अकेडमी दिल्ली की ओर से पंजाबी भूषण अवॉर्ड और 2007 में ही दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की ओर से लाइफ टाइम अचीवमेंट कल्पना चावला एक्सीलेंस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद फाजिल्का की पुष्पा हंस  8 दिसंबर 2011 को संसार को सदा के लिए अलविदा कह गई।

    बचपन में ही उसे गुनगुनाने का शौंक था, लेकिन उसके पिता को अच्छा नहीं लगता था। मगर पुष्पा के नाना पंडित विष्णू दिगंबर पालूस्कर संगीत के शौकीन थे। वह पुष्पा से कुछ कुछ सुनते रहते। उन्होंने रतन लाल कपूर को समझाया। एक दिन संगीत शास्त्री पंडित ओंकार नाथ उनके घर आए और पुष्पा को कुछ सुनाने के लिए कहा। पुष्पा ने उन्हें ऐसा गीत सुनाया कि पंडित ओंकार नाथ उनकी आवाज के कायल हो गए। उन्होंने भी वकील कपूर को समझाया और वकील कपूर ने हां कर दी। इसके बाद लाहौर यूनिवर्सिटी से उन्होंने संगीत की बेचूलर डिग्री हासिल की। वहीं उसने संगीत शास्त्री पंडित ओंकार नाथ शास्त्री, किरण घराने की सरस्वती बाई, उस्ताद चंद्रकांत और विनायक राए पटवर्धन से करीब 10 साल संगीत की शिक्षा हासिल की। उन्होंने अपनी गायकी का दौर 1942 में लाहौर रेडियो स्टेशन से शुरू किया। उस समय वहां गायक श्याम सुंदर, शमशाद, तसंचा जान बेगम और उमराव जिया खान भी मौजूद थे। इस दौरान ही उन्होंने शिव कुमार बटालवी के दर्द भरे नगमों को लेकर पन्ना लाल के संगीत के तहत फिलिप्स कंपनी द्वारा प्रथम एलबम शिव कुमार बटालवी के गीत टाइटल को अपनी सुरीली आवाज का लिबास दिया। जिसकी बटालवी ने भी सराहना की। भारत सरकार की ओर से इसकी लता मंगेश्कर और आशा भोंसले के साथ डाकूमेंटरी भी तैयार की गई।

    पुष्पा हंस ने 1948 में विनोद के संगीत में पंजाबी फिल्म चमन में बतौर पार्शव गायिका अपनी पहचान बनाई। इसमें उसका कुलदीप कौर पर फिल्माया गया गाना सारी रात तेरा तकदी आ राह था जो पंजाबी फिल्म संगीत का क्लासिक है। इस गीत के जरिए पुष्पा हंस रातो रात बुलंदियों के शिखर पर पहुंच गई। एक दिन राज कमल स्टूडियों के मालिक शांता राम पुष्पा हंस के घर आए और पहले उसके गीत सुने। बाद में उसकी तस्वीरें ली और चले गए। दूसरे दिन वह फिर घर आए और उन्होंने पुष्पा हंस को फिल्म अपना देश के लिए बतौर हेरोइन बनने का न्यौता दिया। फिल्म प्रोड्यूसर व डायरेक्टर सोहराब मोदी की 1950 की फिल्म शीश महल और रोशन लाल मल्होत्रा की फिल्म काले बादल में भी पुष्पा हंस बतौर हेरोइन आई। पुष्पा हंस ने सुनील दत्त की अजंता आर्टस मंडली के साथ मिलकर सरहदी क्षेत्र में बंकरों पर डटे सैनिक जवानों के लिए कई प्रोग्राम पेश किए। पुष्पा हंस 17 साल दि ईवस वीकली की संपादक रही। B.R.Chopra की Film ‘Ek Shola’ और G.P. Sippy की Film शहंशाह में भी पुष्पा हंस से बतौर हेरोइन एग्रीमेंट किया गया, लेकिन परिवार सहित रांची चले जाने के कारण यह फिल्म नहीं हो पाई। बाद में एक शोला (1956) में माला सिन्हा और शहंशाह में शमशाद बेगम को शामिल किया गया। पुष्पा हंस ने दो हजार से भी अधिक गीत गाए। 1979-80 में वह आशा सिंह मस्ताना के साथ कनेडा गई और वहां कुलदीप दीपक के साथ दोगाना हो गया कुवेला रिकॉर्ड करवाया। इसके अलावा उन्होंने निजामूद्दीन ओलिया और अमीर खुसरो पर आधारित डाकूमेंटरी मूवीज में भी अहम योगदान दिया। इसके अलावा पुष्पा हंस ने काबुल, लंदन कनेड़ा, अमरीका, फ्रांस, सिंघापुर, जर्मनी, आबूधाबी और दुबई आदि देशो में पंजाब भाषा और पंजाबी साहित्य को एक अलग पहचान दी।

भारत विभाजन से पहले चलते थे – अब बंद क्यों है हिंदी स्कूल ?

हिन्दी दिवस पर विशेष

भारत विभाजन से पूर्व फाजिल्का शहर में हिन्दी की शिक्षा देने के लिए 2 स्कूल चलाए जाते थे। विभाजन के बाद दोनों हिन्दी स्कूल बंद कर दिये गए हैं। जबकि एक स्कूल 1904 में बना आर्य समाज स्कूल आज भी चल रहा है। हिन्दी स्कूल बंद होने से क्षेत्र में हिन्दी भाषा को गहरा धक्का लगा है। बता दें कि विभाजन से पूर्व फाजिल्का में मुस्लिम समुदाय अधिक था जिस कारण फाजिल्का के अन्य स्कूलों में उर्दू भाषा का ज्ञान दिया जाता था।

साधू आश्रम में था हिन्दी स्कूल

Sadhu Ashram Fazilka

स्वामी केशवानंद देशभक्त सामाजिक कार्यकर्ता थे, उन्होंने अनाथ अनपढ़ बच्चों के लिए देश भर में 300 स्कूल बनवाये। इनमें 1904 में फाजिल्का के साधू आश्रम में हिंदुओं के लिए भी एक ही पाठशाला बनाई गई। जहां हिंदी की शिक्षा दी जाती थी। 1933 में उन्होंने अबोहर में दीपक नामक प्रेस लगाई, जहां सिर्फ हिन्दी में ही काम किया जाता था। उन्होंने 100 पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद किया। मगर उनकी ओर से बनाया गया स्कूल आज बंद है।

विभाजन से पूर्व यहां भी चलता था स्कूल

भारत विभाजन से पूर्व वान बाजार में श्री राम कीर्तन सभा की ओर से भठेजा जंझ घर में हिन्दी का स्कूल चलाया जाता था। मुस्लिम समुदाया अधिक होने के कारण अन्य स्कूलों में उर्दू का ज्ञान दिया जाता था। हिन्दी स्कूल में मास्टर चिमन लाल मोंगा मूल चंद सेठी शिक्षक रहे हैं, लेकिन विभाजन के बाद यह स्कूल भी बंद हो गया।

सरकार हिन्दी से कर रही है अन्याय

हिन्दी के रिटायर्ड लैक्चरर अशोक मोंगा ने बताया कि पंजाब में हिन्दी का स्तर गिरने का कारण पंजाब सरकार की ओर से हिन्दी को प्रोत्साहन न देना है। उन्होंने बताया कि पहले अंग्रेजी पहली कक्षा से शुरू की गई थी। जबकि हिन्दी तीसरी या चौथी कक्षा से शुरू होती है। उन्होंने कहा कि हिन्दी पहली कक्षा से शुरू हो और अंग्रेजी चौथी कक्षा से शुरू होनी चाहिए। उन्होंने मांग की है कि सरकार को चाहिए कि पंजाबी और हिन्दी भाषा को बराबर का प्रोत्साहन दिया जाए ताकि अन्य राज्यों में नौकरी करते समय किसी को परेशानी न हो। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा हमारी राष्ट्रीय भाषा है, हर देश की अपनी राष्ट्रीय भाषा है और वहां उसी भाषा में ही हर काम होता है, जिस कारण वह विकासशील देश हैं।

Arya Putri Pathshala Fazilka

कसूर से फाजिल्का तक…जूती का सफर

Indo-Pak Culture

जूती कसूरी, पैरी न पूरी, हाय रब्बा वे सानू तुरना पिया…भारत विभाजन से पहले गायिका सूरिन्द्र कौर केलोकगीत की इन मशहूर पंक्तियों ने कसूर की जूती को अमर कर दिया है…यह गीत विभाजन से पूर्व संयुक्त भारत की याद दिलाता है और दशकों बाद भी यह लोकगीत कानों में गूंजता है…बेशक कसूर पकिस्तान के हिस्से आ गया, लेकिन फाजिल्का में भी कसूर की जूती उपलब्ध है…जूती का तला प्लेन था, मगर उत्तरी भारत में सीधे तले की बनी जूती को कसूरी जूती कहा जाता है…कसूर में जूती के कारोबार से जुड़े कारीगर विभाजन के बाद यहां आकर बस गए और आज वे इस कलाकृति को संजीव रखे हुए हैं…उन्होंने हाथ से बनी जूती की कारीगरी को जिन्दा रखकर फाजिल्का को पंजाब का ऐसा क्षेत्र बनाया है, जहां की जूती सब से अधिक मशहूर है। माना जाता है कि रस्सी को बाटकर और घास फूस से पैर ढककर चलने से ही जूती की शुरूआत हुई है…साधु-संत उस समय चरण पादुकाएं पहनते थे…चमड़े की जूती बनाने की शुरूआत मुगलकाल से हुई… जूती की खासियत यह है कि जूती में पैर को आराम मिलता है और पैर का आकार भी कम बढ़ता है…चमड़े से बनी जूती पसीना सोख लेती है…फैशन के दौर में फाजिल्का की जूती ने एक अलग पहचान बनाई है…

जूती पंजाब के लोगों की शान है…आजादी से पहले जूतीयों के कारीगरों का केन्द्र बिन्दु रहे फाजिल्का की पंजाबी जूतीयां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। देंश विदेश में इनकी धूम है…तिल्लेदार, मोतीयों, कढ़ाई वाली जूतीयां, लक्कमारवी, बेलबूटे वाली, जालबूटा, प्लेन, घोड़ी, खोसा, पुठ्ठी घोड़ी वाली, साठ बूटा, स्पॉट, स्पेशल स्पाट, दिल्ली फैशन, मैटरो जूती, लक्की जूती, कन्ने वाली जूती, फैंसी, तिल्लेदार, सिप्पीमोती, दबका वर्क, फुलकारी वर्क, धागा वर्क और जरी वाली कढ़ाई आदि जूती काफी मशहूर हैं…जूती कई कारीगरों के हाथों से निकलकर तैयार होती है…जालंधर व अन्य महानगरों से चमड़ा मगवाया जाता है…इस कारोबार में महारत पाने वालों का कहना है कि …चमड़ा की धूलाई के बाद उसे जूती का माप दिया जाता है…उसके बाद जूती पर कढ़ाई के लिए भेजा जाता है…कढ़ाई करने वाली युवती सोनिया, रजनी व पुष्पा रानी और राधे श्याम ने बताया कि फाजिल्का ऐसा क्षेत्र है जहां हाथ से बारीक कढ़ाई की जाती है…कढ़ाई करते समय उन्हें काफी परिश्रम करना पड़ता है, ध्यान से कढ़ाई करनी पड़ती है…जिस पर काफी समय व्यय होता है…इसके बावजूद उन्हें पूरी मेहनत नहीं मिलती, लेकिन परिवार का पेट भरने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता है… इसके बाद जूती अन्य हाथों में जाती है, जहां तली तैयार की जाती …तली के बाद पन्ना और फिर सिलाई करने के बाद जूती तैयार हो जाती है…इसके बाद जूती शोरूम में पहँुचती है…फाजिल्का की जूती पंजाब में प्रसिद्ध है…

भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, प्रताप सिंह कैरो, सरदार दरबारा सिंह, सरदार बेअंत सिह, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल जब भी फाजिल्का आये हैं, वे जूती खरीदना नहीं भूले…बादल परिवार तो खासकर फाजिल्का की जूतियों पर नाज करता है…फाजिल्का के करीब 2000 लोग इस काम से अपना पेट पाल रहे हैं…होटल बाजार मेंं जूतीयों की कई दुकानें हैं…दीपालपुरिया की हट्टी के संचालक रोशन लाल खत्री ने बताया कि जूती बनाने के साथ-साथ वह जूतीयां बनाने के लिए फे्रम भी खुद ही तैयार करते थे। नईं दिल्ली, पटियाला, अमृतसर, जालंधर, चण्डीगढ़, सिरसा और बठिंडा जैसे बड़े शहरों के व्यापारी यहां से जूतीयां बनवा कर ले जाते हैं और अमेरिका, कनाडा, जापान जैसे देशों में सप्लाई करते हैं।

            इन्दिरा मार्केट में स्थित न्यू फुलकारी जूती पैलेस के संचालक सुभाष चंद्र सांखला और संजय साखला बताते हैं कि जूतीयों के बाजार ने एक लंबा दौर देखा है…फाजिल्का में आज हालात यह हैं कि जूतीयों के कारोबारी आर्थिक तंगी झेल रहे हैं…जूती बनाने के लिए चमड़े के दाम आसमान को छू रहे हैं…कई कारीगरों के हाथों से तैयार हुई जूती दूकान पर पहुंचती है तो ग्राहक पूराने दाम पर ही जूती मांगते हैं…जबकि जूती बनाने के पदार्थ महंगा होने के कारण उन्हें मुनाफा कम होता …यही कारण है कि अब तक  कई परिवार इस काम को छोड़ चुके हैं, मगर यह कहना मुनासिब होगा कि फैशन के इस दौर में फाजिल्का की जूतीयां न सिर्फ नयां स्टाइल स्टेटमेंट गढ़ती है, बल्कि सैंकड़ों लोगों को रोजगार भी मुहैया करवा रही है…कभी लाखों रूपए का व्यापार करने वाले कारीगरों को सुविधाएं देने की काफी जरूरत है ताकि वह लोग इस उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकें। क्योंकि इस खूबसूरत जूती के कारण ही कहते हैं कि जुत्ती करे मुटियार दी चीकू-चीकू—-जद तुरदी मडक़ दे नाल ओए जुत्ती चूँ-चूँ करदी आ।

नवाबों सा आनंद देती है बान की चारपाई और मूढ़ा

एक युग थाजब लोग खुले आसमान के नीचे धरती पर सोते थे, लेकिन समय के साथसाथ मनुष्य का दिमाग विकसित हुआ और अपनी जरूरत मुताबिक वस्तुएं बनाने लगापहले मनुष्य जंगल से घासफूस लेकर आता और उसे नीचे डालकर उस पर सो जाताघास पर सोने से आराम मिलाफिर उसकी सोच बदली और जंगल से ऐसी लकड़ी मिली, जिसकी उसने चुगाठ बना लीघास की रस्सी बनाई और तैयार कर ली चारपाईसमय बदला और वाण से चारपाई बननी शुरू हो गईशीशम की लकड़ी के पावे और चुगाठ को शकल देकर जब वान से चारपाई तैयार की जाती तो उस पर आराम करने का भरपूर आनंद प्राप्त होता थाचारपाई की खासियत बताते हुए किसी कवि ने लिखा है।

वे थानेदारा ! ऊच्ची हवेली पा !

वे थानेदारा ! दो मंजीयां दी था !

असीं वी सों गए, तुसीं वी सों गए,

भूंजे सोऊगी तेरी मां

आप वान से बनी चारपाई पर बैठो या फिर मूढ़े पर…इन पर आराम फरमाने से शरीर तो तंदरूस्त रहेगा ही और जो आनंद आएगा वो अलग…भले ही कारीगरों का यह एक रोजगार है, लेकिन आजकल इनका प्रयोग कम होने के कारण उनका रोजगार भी धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है…जबकि हमारा यह अमीर और पुराना विरसा है…जबसे फाजिल्का आस्तित्व में आया है…तब से ही दस्तकारी यहां के लोगों का रोजगार बना हुआ है…मगर आधुनिक विज्ञानिक व पदार्थवादी युग के बहाव में आए परिवर्तन और आज के फैशन के कारण दस्तकारी अलोप होने लगी है…बैठने के लिए मूढ़े की जगह कुर्सी और सोफे ने ले ली है…वान से बनी चारपाई के प्रयोग की जगह मार्किट में प्लास्टिक की चारपाई को प्राथमिकता दी जाने लगी है…जिन वस्तुओं को कड़े परिश्रम से कारीगर ने तैयार किया था…वह तो मार्किट में सस्ती और आसानी से मिल जाती है…जिस कारण दस्तकारी की कदर-ओ-कीमत कम होने लगी है।

Mooda

पंजाब की धरोहर-फुलकारी

Indo-Pak Culture

लोकी पहनदे वलायती टोटे, मैं फुलकारी नूं…पंजाबी कवि की यह पंक्ति फुलकारी का महत्व बताती है…भले ही पुराना पहनावा और आभूषण एग्रीकल्चर युनिवॢसटी लुधियाना के अजायब घर की शान बनकर रह गई है, लेकिन भारत पाक सरहद पर बसे गांवों के तकरीबन प्रत्येक घर में लड़कियों की ओर से की गई हाथ की कढ़ाई और सिलाई से बना पहनावा आम मिल जाता है…

     दशकों पहले लड़कियों की शिक्षा की तरफ कम ध्यान दिया जाता था।वह सिर्फ घरेलू कार्य करती थीघर में बैठे कढ़ाईसिलाई और कताई की कला को उन्होंने ऐसे चार चंाद लगाए कि यह पंजाबी संस्कृति की अनमोल कला बन गईबेटी जन्म लेती तो मां को केवल बेटी के दहेज की चिंता होतीउस दहेज ने कढ़ाई, सिलाई और कताई को जन्म दियाउस समय की उपज है फुलकारी। आज से करीब आठ दशक पहले फुलकारी कला अपने यौवन पर थीतब युवतियों को उनकी माताएं फुलकारी कला में निपुण कर देती थीयुवतियां पीपलों की छाया में चरखे पर सूत काततीफिर जुलाहे से खद्दर बुनवाती और उसे रंग करके उसकी फुलकारी निकालती थीफुलकारी निकालने वाला खद्दर लाल, काला या पीले रंग में रंगा जाता थाकपड़े पर धागों की गिणती करके उस पर डिजाइन तैयार किया जाता थाकढ़ाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले मौटिफ मेंं मोर, तोते, चिडिय़ा, शेर, हाथी और बेलबूटे होते थे।

     समय ने रंग बदला और कढ़ाई की सामग्री भी बदल गई, लेकिन कढ़ाई का तरीका आज भी वही है। फुलकारी कला के कई रूप हैं, जैसे बागवास्तव में यह हस्तकला का सर्वोत्तम नमूना हंैं।वस्त्र पर इनकी कढ़ाई के नीचे से तो कपड़ा नजर ही नही आताइस पर फूल जैसे प्राकृतिक मौटिफ भी निकाले जाते हैंयह कपड़ा जब महिलाए सिर पर ओढती हैं तो विवाह का नजारा ही बदल जाता हैंविवाह पर बाग फुलकारी तोहफे के रूप में भी दिया जाता हैंमहिलाएं इस तोहफे को बहुत संभाल कर रखती हैं

     दूसरी फुलकारी चोप हैं, जो सिर्फ किनारे पर कढ़ाई के रूप मेंं होती हैं…सोभ्भर फुलकारी का तो कहना ही क्या! थोड़ी-थोड़ी जगह छोडक़र की गई कढ़ाई बड़ी प्यारी लगती हैं…शगुन मुताबिक सोभ्भर फुलकारी नानी आपनी दोहती को शादी मेें देती हैं…जिस पर नथली जैसा डिजाइन बुना होता हैं…इसके अलावा भी कई फुलकारियां हैं…जो महिलाओं के दिमाग की खोज हैं…तकरीबन हर दूसरी लडक़ी के सिर पर फुलकारी कला का नमूना देखने को मिलता हैं…गांव के पीपल की छाया में युवतियां फुलकारी निकालती हैं तो शगुनों के गीत उनके हाथों की सफाई को चार चांद लगा देते हैं…अगर पंजाबी लोकगीत सुने तो उनमें फुलकारी का भी जिक्र आता हैं…पंजाबी गायक बलकार सिद्वू ने भी आपने गीत- तू फुलकारी कढ़दी, कढ़े तेरी फुलकारी साडी जान- में फुलकारी की प्रशंसा का खुलकर जिक्र किया हैं…लडक़ी शादी के बाद जब ससुराल जाती है तो वहां उसकी नंनद भी अपनी भाभी के हाथ से कढ़ाई की गई फुलकारी को संभाल कर रखती हैं और तारीफ के साथ भाभी को श्ुाभाशीष देती हुई कहती हैं- वीर मेरे ने कुड़ती दित्ती, भाभो ने फुलकारी, लेकिन अफसोस है कि आज फुलकारी का तोपा हाथ से कम और मशीनों से ज्यादा निकाला जाता हैं…इसलिए ही तो पंजाबी गायक गुरदास मान ने अलोप हो रही फुलकारी कला पर एक गीत बनाया हैं, जो आज भी कानों में गंूजता हैं- घघरे वी गए, फुलकारियां वी गईयां, फिर भी ग्रामीण युवतियां ने अलोप हो रही इस विरासत को कायम रखा हुआ है। (Lachhman Dost Whats App No. 99140-63937)