
ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत मेें पश्चिमी शिक्षा देने का उद्ेदश्य था कि उनके कार्यालयों में कार्य करने के लिए एक टीम तैयार हो जाए। साथ ही ब्रिटिश सभ्यता और संस्कृत का प्रचार और प्रसार हो। भारतीय शिक्षा का प्रसार करना उनका का उद्देश्य नहीं था। उनकी नजर में व्यापार ही सब कुछ था। मगर भारतीय नेताओं की ओर से दबाव डालने के बाद यहां महाजनी स्कूलों की स्थापना की गई। इसलिये उन्होंने औद्योगिक प्रशिक्षण के लिये महाजनी स्कूल चलाए। जो शुरू में नाकाम रहे। इनमें कामयाबी हासिल करने के लिए उन्होंने फाजिल्का तहसील के गांव महराणा (महराजपुर) में 1875 में प्राइमरी स्कूल की स्थापना की। जिसे 1878 में मिडल स्कूल का दर्जा दिया गया। अंग्रेजों का मक्सद था, अंग्रेजी शासन प्रबंध को चलाने के लिये शिक्षित वर्ग तैयार करना। इस मक्सद में कामयाब होने के लिये उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देने के लिये नई शिक्षा प्रणाली शुरू की। जिसके तहत गांव रत्ता खेड़ा में इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल शुरू किया गया। यह दोनों स्कूल पंजाब शिक्षा विभाग के तहत थे। यहां फारसी, उर्दू, अर्थमेटिक और बीज गणित की शिक्षा दी जाती थी। इससे अंग्रेजों को काफी फायदा हुआ। उनके पास पहले भारतीय लोगों की मुश्किलें सुनने के लिये अंग्रेजी भाषा में बातचीत करने वाले लोगों का वर्ग नहीं था। वह भी तैयार हो गया, लेकिन शिक्षा प्रणाली महंगी थी, इसलिए अधिकतर लोग शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाये और वह अंग्रेजों की कठपुतली बनकर रह गए।

इसके बाद 1881 की जनगणना अनुसार फाजिल्का में एंग्लो स्थानीय भाषा मिडल स्कूल खोले गए। जिनमें नागरी शिक्षण और उर्दू शिक्षण का स्कूल था। जो नगर कौंसिल के तहत था। जिसे बाद में इस्लामियां स्कूल का नाम दिया गया। इन्हें 1918 में हाई स्कूल का दर्जा दिया गया और 1926 में सरकार ने इन स्कूलों को अपने तहत कर लिया। तीन दिसंबर 1926 को सर जॉर्ज अंडरसन डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इन्ट्रक्शन पंजाब ने स्कूल का उद्घाटन किया। स्वतंत्र भारत में फाजिल्का के सरकारी हाई स्कूल के प्रथम मुख्यध्यापक बिशन दास शर्मा थे, जो 23-07-1947 से 08-09-1948 तक स्कूल में रहे। इस स्कूल में 1913 में बनी गोल कोठी है। इसके अलावा लेक्चरर पम्मी सिंह की ओर से कबाड़ से जुगाड़ लगाकर फाजिल्का विरासत भवन बनाया गया है। जिसमें विरासत की अमूल्य वस्तुएं सजाई गई हैं। इससे पहले आर्य समाज की ओर से नारी शिक्षा के प्रचार के लिए 1904 में आर्य पुत्री पाठशाला की स्थापना की गई। जिसकी आधारशिला डीएवी कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल महात्मा हंस राज ने रखी। वहीं इस्लामियां स्कूल विभाजन के बाद बंद कर दिया गया। इसका कारण यह था कि इलाके में अधिकांश मुसलमान इस स्कूल से शिक्षा हासिल कर रहे थे और विभाजन के बाद वह पाकिस्तान चले गए। इसके बावजूद उन्होंने फाजिल्का की याद को अपने साथ रखा और पाकिस्तान के जिला पाकपटन में सरकारी फाजिल्का इस्लामियां हाई स्कूल बनाया। शिक्षा नीति को और सफल बनाने के लिये खट्टिïयांवाला बाग (प्रताप बाग) के किनारे 1913 में एडवर्ड मेमोरियल विंग की स्थापना तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर एम. एम. एन. बॉस्वर्थ स्मिथ ने की।

सरकारी हाई स्कूल से अलग करके 1936 में यहां लड़कियों के लिये सरकारी हाई स्कूल की स्थापना की गई। स्कूल खुद में एक मिसाल था। स्कूल सरकारी हाई एवं साधारण स्कूल (लड़कियां) की तरह था। क्षेत्र का यह एक मात्र पहला स्कूल है, जहां छात्रावास बना हुआ था। सब से पहले यहां मुख्याध्यापिका के रूप में मिस मौसमी की नियुक्ति की गई। स्कूल को चलाने में इनकी अहम भूमिका रही। इसके अलावा कुमारी हयात, कुमारी बट्टï, कुमारी मेहता, कुमारी दत्ता, कुमारी सिंह, कुमारी अमरजीत कौर, कुमारी प्रीतम कौर व रेणु कामरा आदि ने बतौर मुख्याध्यापिकाएं और प्रिंसीपल के रूप में सराहनीय योगदान दिया। आज स्कूल तरक्की की राह पर अग्रसर है।1942 में श्री सनातम धर्म पाठशाला का आगाज किया गया। (Lachhman Dost WhatsApp 99140-63937)









































































