जुत्ती पटियाले दी आ, लाहौर दिया वालिया … गीत इन दिनों काफी धूम मचा रहा है … गीत से यह भी पता चलता है कि पटियाले की जूती काफी मशहूर है…, लेकिन फाजिल्का में जो जूती बनी है, शायद ही ऐसी जूती देश में किसी ने बनाई हो…क्योंकि यह जूती कोई आम जूती नहीं है…यह चांदी से बनी हुई जूती है !!! जिस पर करीब 20 तोले चांदी लगाई गई है।
क्यों, है न हैरानी वाली बात…यह जूती फाजिल्का की इंन्दिरा मार्केट में प्रधान की हट्टी के संचालक राजिन्द्र बिल्ला खत्री ने बनाई है… वैसे उनके लिए यह कार्य काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उसने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया… सोचा…मेहनत की और 25 दिनों में बना दी चांदी की जूती…जब राजिन्द्र बिल्ला खत्री से बात की तो उसने बताया कि उसने चांदी की जूती न कभी देखी और न ही कभी सुनी थी, लेकिन ग्राहक की चुनौती उसके सामने थी। जिसे वह पूरा करना चाहता था… जूतियों में अलग-अलग तरह की कढ़ाई करने में माहिर बिल्ला खत्री ने बताया कि बस एक चुनौती के कारण ही इस चांदी की जूती का जन्म हुआ है।
चांदी की जूती को बनाना कोई आसान काम नहीं था…खत्री ने पहले चांदी को गालने (पिंगलाने) के लिए एक सुनियारे को दी… गलने के बाद चांदी का पत्तरा तैयार किया … फिर उस पर विभिन्न प्रकार के डिजाइन ट्रेस किए… उन डिजाइनों को जूती की शेप देकर चांदी की जूती तैयार कर डाली…जूती का तला चमड़े से बनाया गया है ताकि चलते समय चांदी को किसी तरह का नुकसान न हो।
अब बात करते हैं इस जूती को बनवाने वाले की…जिस ने यह जूती बनवाई है..वह अबोहर के रहने वाले लधू राम हैं, जिन्होंने 21 हजार रूपये में यह जूती आर्डर पर बनवाई है…सिर्फ अपने शौंक को पूरा करने के लिए…और शौंक का कोई मूल्य नहीं होता।
सावधान इंडिया, बहने और संतोषी मां जैसे बेहतरीन टी.वी. सीरियल्स की फेमस एक्ट्रैस व बॉलीवुड अभिनेत्री शिजू कटारिया दिल में बहुत बड़ी तमन्ना पाले हुए है, तमन्ना भी बॉलीवुड के महानायक को लेकर है … खैर तमन्ना काफी बड़ी है … मगर शिजू कहती है कि वह उसे पूरा करने के लिए कड़े से कड़ा परिश्रम भी करेंगी। दरअसल उसकी तमन्ना है कि उसकी लाइफ पर शिजे एंट्रटेनमैंट की तरफ से जो फिल्म बनाई जानी है, उसमें शिजू के दादा कृष्ण लाल कटारिया का किरदार बॉलीवुड जगत के महानायक अभिताब बच्चन करें … वैसे महानायक ने सरहदी जिला फाजिल्का के क्षेत्र फाजिल्का में कोई फिल्म नहीं बनाई, लेकिन शिजू कहती हैं कि ज्यादातर फिल्म फाजिल्का में ही फिल्माई जाएगी।
मुंबई की गलियों की कचोरी उसे कैसी लगी, यह तो मैने पूछा नहीं, लेकिन फाजिल्का की कचोरी के बारे में तो उसने तुरंत बोल दिया … वाओ … वैरी टेस्टी … बोली … गली की नुक्कड़ पर खड़ा था कचोरी वाला … बचपन में भी उनसे ही कचोरी खाती थी… आज भी खाई … इसके अलावा यहां को तोशा व वंगा भी उसे सबसे अधिक टेस्टी लगता है … यहां से जूती खरीदकर तो वह बंबे जरूर लेकर जाती है … ऐतिहासिक धरोहरों से उसे काफी मुहब्बत है… बोली … घंटा घर के आसपास चक्कर लगाना आज भी बढिय़ा लगता है … उसने यहां के आर्मी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद ग्रेजूऐशन की शिक्षा अबोहर से हासिल की। उसके बाद उसने चंडीगढ़ में अपनी शिक्षा हासिल की। वहां वह मिस कॉलेज भी चुनी गई और पिछले 17 साल से वह मुम्बई में रह रही है।
शिजू कटारिया ने 85 से अधिक टीवी सीरियलों में काम किया है। इनमें कई सीरियल तो काफी प्रसिद्ध हुए हैं। सावधान इंडिया, बहने और संतोषी मां की भी काफी सराहना हुई है। इसके अलावा वह आधा दर्जन फिल्मों में काम कर चुकी हैं। गोधन, निर्मला आदि उसकी चर्चित फिल्में रही हैं। वह बोनी कपूर, नाना पाटेकर, मनोज वाजपेयी के अलावा कई प्रसिद्ध डायरैक्टर गुलजार साहिब आदि के साथ फिल्मों में काम कर चुकी हैं। (सहयोगी- रितिश कुक्कड़)
सियासत और प्रशासन चाहे तो चार सप्ताह में बन सकता है नशा मुक्त पंजाब
नशे के नाम पर पंजाब काफी बदनाम हो चुका है। पंजाब में नशे को खत्म करने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। जगह जगह सैमीनार लगाए जा रहे हैं। अब तो यह अभियान स्कूलों तक पहुंच गया है, बच्चों को तो यहां तक कहा गया है कि अगर उनके आसपास कोई नशा बेचता है तो इसकी जानकारी स्कूल टीचर को दें। स्कूल टीचर वह सूचना पुलिस तक पहुंचाएंगे। वहीं पुलिस इन दिनों नशा तस्करों पर धड़ाधड़ पर्चे काट रही है। उन्हें काबू कर रही है। मगर यह नहीं सोचा जा रहा कि इसमें असली दोषी कौन है. . . ? सियासत और प्रशासन . . . दो ही तो नाम सामने आते हैं. . . अगर यह दोनों चाहें तो नशा खत्म करना वाक्य ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का ब्यान . . . चार सप्ताह में नशा खत्म कर दूंगा . . . सच्च साबित हो सकता है . . . ऐसा ही एक वाक्य गांव मुहम्मद पीरा (भारत पाकिस्तान की जीरो लाइन के निकट बसा गांव) में भारत विभाजन से पहले का है . . . गांव के जैलदार अकबर खान की बदौलत गांव क्राइम मुक्त था . . .गांव में क्राइम जीरो . . . गांव के बुजुर्ग नैण सिंह बताते हैं कि गांव मेें अगर कोई युवक डिजाईन वाले बाल संवार कर चलता तो जैलदार अकबर खान के कहने पर गांव का एक खोजा उसे पांच जूते मारता था . . . जिस कारण हर व्यक्ति सिर पर कोई कपड़ा या पगड़ी बांधकर चलता . . . महिलाएं के सिर पर भी दुपट्टा जरूर होता . . . अगर यहां तक होता तो फिर उस गांव में पुलिस का क्या काम . . . वास्तव में ही गांव क्राइम मुक्त था।
लंबे कद व मोटी आंखों वाला अकबर खान गांव पक्का चिश्ती में कचहरी भी लगाता था. . . उसका दोस्त था पंजा सिंह . . . एक गांव निकट के गांव शरींह वाला (शायद ये गांव पाकिस्तान में है) का चाकर सिंह शराब निकालने के आरोप में पकड़ा गया . . मुहम्मद पुलिस उसे पकड़ लाई . . . पंजा सिंह ने अकबर खान को इस बारे में जानकारी दी और छुड़ाने की बात कही . . . मगर अकबर खान नहीं माना . . . हालांकि उसके संदेश पर ही चाकर सिंह को पुलिस छोड़ सकती थी, लेकिन अकबर खान ने कहा कि तेरी यारी छोड़ सकता हूं पंजा सिंह . . . अपराधी का चेहरा न खुद देखूंगा और न ही अपनी जैल के किसी व्यक्ति को देखने दूंगा . . . जा . . आज से तुम मेेरे यार नहीं . . .उनकी दोस्ती टूट गई . . . मगर अकबर खान ने उन गांवों में कभी नशे वाले की मदद नहीं की . . . मेरे मौहल्ले के ही हाकम सिंह (जो अकबर खान की खेती करते थे) बताते हैं कि उनकी कहानी विभाजन के बाद भी बरसों तक बच्चों को सुनाई जाती रही . . . हाकम सिंह तो आज भी बताते हैं कि अगर सियासत और प्रशासन चाहे तो श्री गुटका साहिब भी हाथ में पकडऩे की जरूरत नहीं . . . नशा चार हफ्तों में खत्म हो सकता है . . .
अगर आप इससे सहमत हैं तो इस बात को अन्य लोगों तक पहुंचाए ताकि किसी बहन का भाई . . . पत्नी का सुहाग . . . बच्चों के सिर से पिता का साया, भाई से भाई व दोस्त से कोई दोस्त सदा के बिछुड़ न सके।
जिन गलियों में खेले, पले और बड़े हुए . . .अचानक एक दिन वो गलियां छोडक़र जाना पड़ा . . . गए भी उस जगह, जहां से कभी यहां लौटकर न आए . . . भले ही दूरी करीब 65 किलोमीटर की है, लेकिन एक दिल के दो टुकड़े ऐसे हुए कि उनमें एक लकीर पड़ गई . . . वो लकीर, जो कभी एक न हो सकी . . वो लकीर, जिसे कोई पार न सका . . . अपनी जन्म भूमि तक पहुंचने के लिए कड़ा परिश्रम करना हरेक के बस का नहीं . . . आखिर नेताओं को ऐसी क्या मजबूरी थी कि वो दुश्मनों के झांसे में आकर एक दूसरे के दुश्मन बन गए . . .वो भी सदा के लिए . . . पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए . . . हमें ऐसी मजबूरी में क्यों डाला गया- . . . भले ही वो अपने घर-बार या जन्मभूमि को साथ नहीं ले जा सके. . . लेकिन जन्मभूमि और अपने स्कूल का नाम साथ जरूर ले गए . . . स्कूल का नाम रखा . . . फाजिल्का इस्लामिया हाई स्कूल, जो आजकल पाकिस्तान के जिला पाकपटन में है. . . वही स्कूल, कभी फाजिल्का में हुआ करता था . . . भारत का विभाजन क्या हुआ . . . लाखों लोगों को अपना सबकुछ छोडऩा पड़ा . . . कईयों के परिवार बिछ़ुड़ गए, कई मारे गए . . . जख्म वो मिले, जो आजतक नहीं सिल पाए . . कभी सिलेंगे भी नहीं . . . मगर स्कूल को फाजिल्का का नाम देकर उन्होंने याद को यादगार बना लिया है।
तेरी दुनिया से होके मजबूर चला
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला
तेरी दुनिया से
इस क़दर दूर के फिर, लौट के भी आ न सकूँ
ऐसी मंज़िल के जहाँ, खुद को भी मैं पा न सकूँ
और मजबूरी है क्या?
और मजबूरी है क्या,
इतना भी बतला न सकूँ तेरी दुनिया से होके मजबूर चला
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला
तेरी दुनिया से (Film- Paviter Papi Song)
Fazilka in Pakpattan ! ! !
The streets that played, grew up and grew. . They suddenly had to leave the streets one day. . . They also went to the place from where they never came here and did not come. . . Even if the distance is about 65 kilometers, but two pieces of a heart become such that there is a streak in them. . . The streak that could never be one. . The streak, which no one could cross . . Not everyone can work hard to reach their birth place. . . After all, the leaders had such compulsion that they became enemies of each other by coming to the enemies’ hoax. . That too for ever. . . For generation rate generation . . Why was it put in such compulsion that the song of the Pavitter Pappi was compelled by your world? . . teri duniya se door, ho k mazboor chala, main bahut door, bahut door, bahut door chala. . .Even if she could not take her home or the birthplace. . . But the birth place and the name of your school were definitely taken along. . . Name the school. . . Fazilka Islamia High School, which is now a days in Pakistan’s Pakpattan. . . The same school, used to be in Fazilka. . . What is the partition of India? . . Millions of people had to leave their everything. . . Many families got separated, many died. . . He wounds, which can not be cured. . Never even seals. . . But by giving the name of Fazilka to the school, he has made memories memorable.
शहर के बीच सेठ की विशाल कोठी के साथ बरगद का विशाल पेड़ . . . जिस पर चिडिय़ा का घोंसला था . . . चिडिय़ा और सेठ की नन्हीं बच्ची परी के बीच शायद सात जन्म का रिश्ता था . . . तभी तो दोनों में गहरा प्यार था . . . जब तक दोनों एक-दूसरे को देख न लें, उन्हें खाना हजम नहीं होता . . . परी सुबह उठती और दाना पानी चिडिय़ा को खिलाती . . . चिडिय़ा भी चीं-चीं करती हुई उससे हठखेलियां करती . . . बंगला नुमा विशाल कोठी में एक ही तो पेड़ था, जिस पर कई पक्षी रहते थे। परी के पिता की कारोबार काफी लंबा चौड़ा था . . . अच्छी जमीन जायदाद थी. . . भाई बहन नहीं होने के बावजूद परी ने खुद को कभी अकेला नहीं समझा . . .चिडिय़ा थी न. . जिसे वह अपनी दोस्त मानती थी।
एक दिन परी पेड़ के नीचे गहरी नींद सो रही थी . . . काला नाग उसकी चारपाई के पास आ गया . . . चौकीदार व माली भी उस समय नहीं थे. . . नाग परी की चारपाई पर चढऩे का प्रयास करने लगा . . . इससे पहले कि वह परी की चारपाई पर चढक़र उसे डसता. . . चिडिय़ा ने सांप को चोंच मार दी. . . सांप रेंगकर भाग गया . . . जब परी की नींद खुली तो उसकी चारपाई पर चिडिय़ा बैठी थी. . . दोनों फिर से खेलने लगी।
परी का पिता कोठी का दायरा विशाल करना चाहता था. . . मगर अकेला पेड़ ही उसमें रूकवट बन रहा था . . . उसने नौकर से कहा कि पेड़ को काटवा दिया जाए ताकि कोठी का दायरा विशाल व सुंदर किया जा सके . . . दो तीन घंटे में ही पेड़ काट दिया गया. . . चिडिय़ा उड़ गई, उसका घोंसला गिर गया . . . अंडे भी टूट गए . . . काफी देर तक चिडिय़ा दिवार पर उदास बैठी रही . . . क्या करती, उसके पास कोई चारा नहीं था. . .स्कूल से परी लौटी तो वहां न पेड़ था और न ही चिडिय़ा . . . हाय . . . कहां गया पेड़. . . कहां गई मेरी दोस्त . . . माली आया और बोला, बेटा . . . पेड़ कुछ रूकावट बन रहा था, जिस कारण बाबू जी ने पेड़ कटवा दिया . . . मतलब अब पेड़ की छाया नहीं मिलेगी, मेरी दोस्त चिडिय़ा नहीं आयेगी . . . कभी नहीं आएगी . . . बोलते हुए परी एकदम नीचे गिर गई . . . माली, चौकीदार दोनों भागे और परी को उठाया. . . एक ने मालिक को फोन पर सूचना दी . . . पिता आते ही चिल्लाने लगा, परी . . परी . . . मेरी लाडली परी . . . क्या हुआ है तुझे . . . आंखें खोल परी . . . मुख से बोल. . . बोल परी, मैं तेरा पापा हूं . . उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई . . .चौकीदार व माली भी घबराए हुए थे . . . परी बोली, अब वो नहीं आयेगी . . . कौन नहीं आयेगी . .. उसके बिना मैं जिन्दा नहीं रह सकती, अगर जिन्दा रह भी गई तो दोस्त के बिना जिन्दा रहने का क्या फायदा. . . पापा बोले, परी, कौन नहीं आयेगी, बोलो परी, मैं तेरा पापा हूं, तेरे लिए मैं दुनिया की हर चीज पैदा कर दूंगा . . . इतने में डाक्टर भी आ गया. . . नब्ज चैक की . . .बोला . .. सॉरी. . . यह सुनते ही चीख पुकार . . . रोने की आवाजें . . . आसपास काफी लोग आ गए. . . कोई धांधस बंधा रहा था तो कोई रो रहा था . . .
कई दिन बीत गए . .. परी के पिता को परी व चिडिय़ा खेलते हुए नजर आते . . . आवाज आई . . .पापा. . . यहां पेड़ लगा दो. .. पेड़ बड़े हो जाएंगे तो मैं आऊंगी .. . मेरी दोस्त चिडिय़ा भी आयेगी . . . हम दोनों यहां खेलेंगी . . . रौणक फिर से शुरू हो जाएगी . . . उसने पेड़ उगाए. . . पेड़ बड़े हो गये और उस पर चिडिय़ों की चीं चीं शुरू हो गई।
अचानक चिडिय़ों की चहचहाहट से मेरी आंख खुल गई . . . देखा तो सुबह के 9 बज चुके थे . . .गली में देखा तो एक समाजसेवी संस्था के सदस्य घर घर पौधे बांट रहे थे. . . मेरे पास आये और बोले . . . पौधे लगाओ और चिडिय़ों चहचहाहट सुनो . . . मन और दिमाग दोनों को शांति मिलेगी . . . मैने भी पौधा लिया और अपने घर के सामने लगा दिया . . . आज वही पौधा वटवृक्ष बन चुका है . . .
अगर आप सहमत हैं तो पौधे रोपित करो ताकि किसी की परी और चिड़ी की सुरीली आवाज हर घर में गूंजती रहे . . . .
ओ री चिरैया – नन्ही सी चिड़िया
अंगना में फिर आजा रे
अंधियारा है घना और लहू से सना
किरणों के तिनके अम्बर से चुन्न के
अंगना में फिर आजा रे
हमने तुझपे हज़ारों सितम हैं किये
हमने तुझपे जहां भर के ज़ुल्म किये
हमने सोचा नहीं -तू जो उड़ जायेगी
ये ज़मीन तेरे बिन सूनी रह जायेगी
किसके दम पे सजेगा अंगना मेरा
(नोट: आनंद उत्सव दौरान उक्त पर आधारित एक कोरियोग्राफी करवाई गई थी।)
ब्रिटिश साम्राज्य में लुधियाना – फिरोजपुर – फाजिल्का से होती हुई ट्रेन कराची तक लेकर जानी थी. . . इसके लिए रेल पटरी बनाने का काम तकरीबन मुकम्मल हो चुका था . . . रेलवे स्टेशन कहां कहां बनाए जाने हैं . . . इस बारे में विचार चल रहा था . . . बात सेठ चानन मल व हजूर सिंह के गांवों में आकर अटक गई . . . दोनों लैंडलार्ड थे . . . दोनों चाहते थे कि उनके गांव में रेलवे स्टेशन बने ताकि उनके गांव भविष्य में तरक्की की तरफ बढ़ सकें . . . उस समय फिरोजपुर के डी.सी. एम.आर. सचदेव थे और उन्होंने दोनों को बुला लिया . . . जब फैसला न हुआ तो डी.सी. ने शर्त रख दी कि जो अपनी मंडी को सुंदर बनाएगा, उसके गांव में रेलवे स्टेशन बनाय जाएगा . . . बस फिर क्या था . . . सुंदर मंडिय़ां बनाने का काम शुरू हो गया . . . लेकिन सेठ चानन मल ने सुंदर मंडी बनवाई. . . सुंदरता भी क्या बात थी . . . गांव भी पूरा स्वच्छ . . . गंदगी का नाम तक नहीं . . . डी.सी. ने दौरा किया तो दोनों मंडियां एक से बढक़र एक थी, लेकिन चानन मल की मंडी की सुंदरता अधिक थी. . . डी.सी. ने घोषणा कर दी कि मंडी चानन वाला में रेलवे स्टेशन बनाया जाएगा . . . साथ ही यह शर्त भी रख दी कि चानन वाला स्वच्छता में भी अव्वल रहना चाहिए . . . कहते हैं कि बरसों तक चानन वाला मंडी की स्वच्छता के चर्चे दूर दूर तक रहे . . . वैसे मंडी हजूर सिंह भी कम नहीं थी . . . मगर स्वच्छता की कुछ कमियां पाई गई. . . जिस कारण वहां रेलवे स्टेशन तो नहीं बनाया गया, लेकिन एक सुंदर गेट जरूर बनाया गया, जिस का उद्घाटन डी.सी. एम.आर. सचदेव ने 1935 में किया था . . . सोचता हूं कि अगर देश के विभाजन के बाद भी इसी तरह से शर्तों का दौर जारी रहता . . . लोग सहयोग देते रहते तो गांव सुंदर होते . . . स्वच्छता बरकरार रहती. . . बीमारी का प्रकोप न के बराबर होता . . . और . . . आज देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को स्वच्छ भारत अभियान चलाने की जरूरत हीं न पड़ती. . . फिर भी जब जागो, तब सवेरा . . . आज भी इस तरफ कदम बढ़ाया जाए तो आने वाली पीढ़ी को जरूर इसका फायदा मिलेगा . . . अगर आप चाहते हैं कि मेरा गांव स्वच्छ हो तो इस बात को दूसरों तक पहुंचाएं , ताकि हर गांव और शहर सुंदर व स्वच्छ बन सके . . .
भांडे कली करा लो . . . गीत तो आपने सुना होगा . . . गलियों में भांडे कली करा लो.. की आवाजें लगाने वाले भी देखे होंगे . . . मगर अब तो वह कभी कभार ही दिखाई देते हैं. . . वो भी कभी त्योहारों के मौसम में . . . दीपावली पर्व से पहले धनतेरस के अवसर पर लोग पीतल के नए बर्तन खरीदते हैं और पुराने बर्तन भी कली करवाया करते हैं। मगर फैशन की हवा क्या चली कि तकरीबन हर घर में सेहत के लिए हानीकारक धातुओं के बर्तन जीवन का अंग बन गए हैं। तांबे व पीतल के बर्तन तो पुरानी परंपरा बनकर रह गई है . . . जिस कारण बर्तन कली करने वाले कारीगरों पर हानीकारक धातुओं की परंपरा की परत चढ़ गई है . . . यानि बर्तन कली करने वाले . .
वैसे भी लोगों का रूझान अब सिल्वर, स्टील व प्लास्टिक के बर्तन की तरफ अधिक है . . . क्योंकि यह पीतल व तांबे से सस्ते पड़ते हैं . . . वैसे भी इनकी लुक, डिजाइनिंग बढिय़ा है . . नए पीतल का रेट स्टील से तीन गुणा ज्यादा है। प्लास्टिक के बर्तन को रेट तो डिजाइन के हिसाब से बिकते हैं . . . शादियों में आम परिवारों में पीतल, तांबा व कांस्य का बर्तन देने की परंपरा है . . . कडाही, बाल्टी, गडवी, पतीला आदि दहेज के रूप में दिए जाते हैं . . . अब तो यह परंपरा भी खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. . . कुछ समय पहले की बात है . . . जब लोग गंगा जाते थे तो निशानी के रूप में पीतल व तांबे की कोई निशानी लेकर आते थे. . . अब बहुत कम . . . जबकि एक समय यह भी था जब सोने चांदी के जेवरात की तरह पीतल व चांदी के बर्तनों को पूंजी के रूप में रखा जाता था . . . जरूरत होती तो उसे बेच दिया जाता . .
अगर माहिरों की माने तो सेहत के लिए पीतल, तांबा व कांस्य बेहद उपयुक्त धातुएं हैं। देश की आजादी से पहले अंग्रेज कैदियों को जेलों में जो खाना देते थे वह भी पीतल या तांबे के बर्तन में ही दिया जाता था। मगर अब प्लास्टिक व अन्य हानीकारक धातुओं को रिवाज अधिक होने के कारण बीमारियों में भी इजाफा हो गया है . . हां. . . कुछ लोग डाक्टरों के सुझाव के बाद पीतल व तांबे के बर्तनों का प्रयोग जरूर करने लगे हैं . . . इससे पहले कि हमें डाक्टर कहें . . . क्यों न हम खुद ही पीतल या तांबे के बर्तन को प्रयोग में लें . . . .
Bhande Kali Kara Lo.. Bhande Bhande Kali Kara Lo.. Bhande Bhande Kali Karaa Lao Praata De Paod Lawaa Lo Kadaahiya De Thalle Lawaa Lo
सांस्कृतिक पुरातन एवं म्यूजियम विभाग से मिल चुका है हैरीटेज का दर्जा
माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट इंकलाब नागपाल घूमने के बहुत शौकीन हैं. . .रघुवर भवन पहुंचे तो बोले . . यह क्या ! ! ! 1901 में बना रघुवर भवन तो खंडहर बन चुका है . . . खंडहर में तो कुछ जान होती है . . . लेकिन यह तो बेजान हो चुका है . . . तेज आंधी या तेज बारिश आने से इसके गिरने की संभावना अधिक है . . . फाजिल्का के उत्तर की तरफ मौहल्ला नईं आबादी इस्लामबाद के अंतिम छोर पर बनेरघुवर भवन के हालात तो वाक्य हीदयानीय हैं . . . मैने कहा . .तीन कमरे टूटे हुए . . . छत्त पर चढऩे के लिए सीढ़ीयां टूट हुई और मुख्य गेट का कुछ हिस्सा भी बीते दिन टूट गया . . . खैर, इंकलाब नागपाल की जिज्ञासा को देखते हुए मैने बताया कि यह ऐतिहासिक इमारत ब्रिटिश भवन निर्माण और वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसकी वास्तुशैली भारतीय, मुगलकालीन एवं ब्रिटिश वास्तुकला के घटकों का अनोखा संगम है. . कारीगरों की हस्तकला की खूबसूरती को देखकर एक बारगी तो 21वीं सदी के भवन निर्माण कला माहिर भी दाद देते हैं। आलोकिक सुंदरता से भरपूर भवन की शोभा एक अचंभा है। बंगले के निर्माण के बाद निर्मित इस भवन की तर्ज पर आज की ग्रीन बिल्डिंगस तैयार की जा रही हैं . . . भवन के उत्तर दिशा की ओर मुख्यद्वार है। आर्च कंट्रक्शन से सजे द्वार के ऊपर ओम रघुवर भवन लिखा गया है। इसके नीचे ठेकद्वार अंकित है। मुख्यद्वार के ऊपर हिन्दू देवता शिवजी का प्रतीक नाग अंकित किया गया है। जो हिन्दु वास्तुकला के घटकों का एकीकृत संयोजन है। यह हिन्दू मन्दिरों में भी पाया जाता है। मुख्यद्वार पर ही विजय और हर्ष का प्रतीक गुलाबी रंग के दो स्तंभ मुगलशैली की वास्तुकला को दिखाते हैं। सतम्भों पर बाहर से नजर आने वाली कलाकृति मुगलकालीन भवन निर्माण कला और ब्रिटिश भवन निमार्ण कला के सुमेल को बड़े ही सुंदर रूप से दर्शाते हैं। इसके प्रवेशद्वार की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसके स्तम्भों पर फूल और पत्तियां तराशी गई हैं। इसे तराशने वालों ने इतनी कुशलता से तराशा है कि मन प्रसन्न हो उठता है। भवन अपने आप में एक ऊंचे मंच पर बनाया गया है। इसकी नींव के प्रत्येक कोने से उठने वाली दीवारें भवन को पर्याप्त संतुलन देती हैं।
गलियारे में दक्षिण की ओर शयन कक्ष है। शयन कक्ष के दाएं और बाएं के दो छोटे कमरे हैं। जिनके द्वार पूर्व और पश्चिम की तरफ खुलते है। भवन के केन्द्र में खुला हाल बनाया गया है। जहां सर्दी के मौसम से बचने के लिए चिमनी बनाई गई है। जहांं बैठकर आग का लुत्फ उठाया जाता है। चिमनी को इस ढ़ंग से बनाया गया है कि आग का धंूआ चिमनी के जरिए बाहर चला जाता है। ब्रिटिश काल की तर्ज पर निर्मित इमारतों में ऐसी चिमनी मिल जाती है। उसके दोनो ओर दो कमरे हैं। जिनमें हाल से गेट द्वारा अंदर जाया जा सकता है। कमरे दिल्ली के लाल किले में निर्मित दीवाने-आम और दीवाने-खास की यादों को ताजा करते हैं। भवन के पीछे दक्षिण की तरफ तीन कमरे हैं। जिनका दरवाजा दक्षिण की तरफ है। कमरों की खासियत यह है कि सभी कमरों को गेट के द्वारा मुख्य हाल से जोड़ा गया है। इनके बीचो-बीच घुमावदार 22 सीढीयां बनाई गई थी। जिससे कमरों की छत्त पर पहुंचा जा सकता था। कमरों की छत्त द्वारा मुख्य हाल की छत्त पर चढऩे के लिए फिर आठ सीढ़ीयां बनाई गई थी। जिनसे मुख्य हाल की छत्त पर पहुंचा जा सकता था। मुख्य हाल के ऊपर चार गुम्बद सुशोभित हैं। इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है। भवन के चारों ओर छोटे गुम्बदों की सख्या दस है। छोटे गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार की प्रतिलिपियाँ ही हैं, केवल नाप का फर्क है। छत्त पर चढक़र चारों ओर नजर दौडाऩे से बाधा झील के हरे भरे वृक्ष, बंगला, गोल कोठी, ओलिवर गार्डन, रेलवे स्टेशन और शहर की अन्य इमारतों की शोभा को निहारा जाता है। कला के अद्भुत नमूने रघुवर भवन का भीतरी वातावरण हर मौसम में रहने के लायक बनाया गया है। उत्तर दिशा की तरफ मुख्यद्वार का निर्माण इस तरह किया गया है कि पूरा दिन भवन के हर हिस्से में रोशनी और हवा का तालमेल बना रहे।
सर्दी के मौसम में भवन के गलियारे तक सूर्य की किरणें पहंचती हैं। भवन की मोटी दीवारों में 18 इंच और 36 इंच की ईंटों का प्रयोग किया गया है। दीवारों की चिनाई पक्की ईंटों, चूना और सूर्खी की गई है। भवन निर्माण में बाखूबी दिखाने वाले कारीगरों ने भवन में ईंटों की चिनाई इंग्लिश और फलेमिश जोड़ से की है। भवन में गर्मी के मौसम दौरान ठंड और सर्दी के मौसम में गर्मी का अहसास होता हैे। भवन के कमरों में प्रकाश के लिए चारों दिशायों में रोशनदान लगाये गये हैं। भारत-पाक विभाजन से पूर्व अंदाजन 20 एकड़ भूमि के विशाल आंगन में फैले इस भवन के चारों और बाग-बगीचा थे, जो भवन को आनंदमय बना देते थे। बाग के फूलों की महक, अनार, आम, अमरूद और मालटा की मिठास तथा हरियाली से वातावरण ही आन्नदमय होता था। रिमझिम बारिश के मौसम दौरान जब बागों में मोर नाचता तो मदमस्त मौसम का नजारा स्वर्ग बन जाता। कोयल की सुरीली आवाज और चिडिय़ों का चहचहाना कानों मेंं मीठे संगीत का अहसास दिलाते थे। भवन के विशाल प्रांगण में फैले बाग के बीच दो कूएं थे। जिन्हें टिण्डा वाला कुआं के रूप में जाना जाता था। सेठ मुन्शी राम अग्रवाल का परिवार जब फाजिल्का में व्यापार के लिए आया तो उन्होंने यहां भूमि खरीद की। जिसमें रघुवर भवन की इमारत बनी हुई थी। रघुवर भवन की इमारत सबसे पुरानी ऐतिहासिक इमारत है, जिसे हैरीटेज का दर्जा दिलाने के लिए नईं आबादी, टीचर कालोनी, बस्ती चंदोरां और धींगड़ा कालोनी के बाशिंदों ने 2014 में लगातार एक माह तक आंदोलन किया, इसके बाद पंजाब के सांस्कृतिक पुरातन एवं म्यूजियम विभाग ने रघुवर भवन को हैरीटेज का दर्जा दिया . . . मगर दर्जा मिलने के बाद भी न तो विभाग ने संभाला और न ही प्रशासन व सरकार ने. . . उनकी अनदेखी के कारण ही रघुवर भवन खंडहर का रूप धारन कर गया . . .
आप भारत के सरहदी शहर फाजिल्का में हो या फिर पाकिस्तान के पाकपटन शहर में। अगर आपने वहां से मिठाई खरीदनी हो तो वहां किसी से भी पूछ लें . . . यहां प्रसिद्ध मिठाई कौन सी है . . . हरेक का जवाब हो . . . तोशा . . . जी हां . . . यह मिठाई का नाम है और तोशा का मतलब है सुख, शांति व संतोष . . .सुनहरी भूरे रंग की मिठाई . . . एक परंपरागत पंजाबी मिठाई . . . वैसे मूल रूप से यह मिठाई फाजिल्का की नहीं है. . . पाकिस्तान के शहर पाकपटन से आई है . . . वो भी भारत विभाजन के दो साल बाद. . . जल्दी ही इसकी मिठास देश भर में प्रसिद्ध हो गई . . . यह ही एकमात्र ऐसी मिठाई है, जिसे पांच दिन तक सही सलामत रखा जा सकता है. . . अगर टूर पर जाना हो या किसी अन्य राज्य में जाना हो। लोग तोशा ले जाना नहीं भूलते। लोग इसे दिल्ली, मुंबई, गोआ, बंगलोर आदि राज्यों में इसे यादगार तोहफे के रूप में लेकर जाते हैं तो फाजिल्का आने वाले व्यक्ति भी इसे साथ ले जाना नहीं भूलते। पाकिस्तान में बने तोशे में खोया और पनीर प्रयोग नहीं किया जाता। मगर फाजिल्का में कॉटेज चीज प्रयोग किया जाता है। इससे तोशा स्वादिष्ट तैयार होता है और तोशे की कोमलता में भी इजाफा होता है। कई तरह की चूरन के युनिटो से तैयार तोशा वास्तव में ही पंजाब की असली स्वादिष्ट मिठाई है।
The famous sweet dish of India’s border city Fazilka and Pakistan’s Pakpatan is Tosha.
If you are in the border town Fazilka in India or in Pakpatan city of Pakistan and you want to buy sweet dish from there, then ask anybody there and you will get the same name from everyone and that’s famous name Tosha.It is the name of a sweet. Tosha means happiness, peace and contentment. Sour brown traditional Punjabi dessert.By the way, this sweet was not originated in Fazilka. It was originated in city Pakpatan of Pakistan after two years of India and Pakistan partition.Soon its sweetness became popular all over the country.This is the only such sweet dish which can be kept safe for up to five days.If you have to go on a tour or go to another state for few days then do not forget to take it. People take it as a memorable gift in the states of Delhi, Mumbai, Goa, Bangalore etc. If someone is visiting Fazilka then he will not forget to take it along.The tosha which is made in Pakistan they do not use condensed milk and cheez but in Fazilka these both are used to make tosha which makes it soft and delicious.Tosha is prepared by several types of Churan units is indeed the real delicious dessert of Punjab.
Famous singer and playback singer Mehdi Hassan, who is famous in Pakistan, has
been the first choice for Ghazals. Though Mehndi Hassan was born on July 18,
1927 in the village Luna of Jodhpur district of
Rajasthan state of India.
He stayed here till the partition of India,
but after partition he went to Pakistan.
Even though he stayed for 20 years in India, but during this time he left
his many sour sweet memories here. His memory is also included in the city of Fazilka, which is located
on the Indian border. Then he was only eight years old. When he came to Fazilka
(Bangla) with his father.
Remember it is attached
Mehndi Hassan used to sing songs in childhood. His father, Ustad Azim
Khan, was a famous singer. The matter is in 1935, when he came to a program
with his father at the bungalow (current DC house) of Fazilka. This was his
first profomenus. During this time Mehdi Hassan sang the ghazal in Dhruupad and
Khayal tal. It has been disclosed by books written by music and by ghazal
singer Dr Vijay Praveen.
So came Fazilka
Mehdi Hassan’s father wanted to become a State singer. He said this
about D.C. of Sirsa district. J.H. The request was made from Oliver. Oliver
wanted to hear his perception so that the decision could be taken. For this
reason Mehndi Hasan and his father had come to Fazilka. Where he gave his
proforma. But Oliver did not give him the title of a Raj singer.
देश में एक नाम के कई गांव तो हो सकते हैं, लेकिन एक गांव के दो-दो नाम बहुत कम नजर आते हैं। पंजाब में कई ऐसे गांव हैं, जिन्हें दो दो नामों से पुकारा जाता है। कई सरकारी कागजातों में बकायदा गांवों के दो दो नाम दर्ज हैं। कई गांवों में तो साइन बोर्ड पर भी दो दो नाम दर्ज हैं। स्कूलों और दुकानों के आगे भी दो दो नाम लिखे गए हैं। इन सब के बीच उर्फ लिखा गया है। यानि एक गांव को दो नामों में से किसी भी एक नाम से पुकारा जा सकता है।
विभाजन से पहले और बाद के नाम
भारत विभाजन से पहले पंजाब के कई गांवों में मुसलमानों की संख्या अधिक थी और मुसलमानों ने उन गांवों को जो नाम दिया था, वह नाम आज भी पुकारा जाता है। विभाजन के बाद जब मुसलमान पाकिस्तान चले गए और हिन्दु सिख उन गांवों में आकर बस गए। उन्होंने इन गांवों को अपना नाम भी दे दिया। जिस कारण कई गांवों को दो दो नामों से जाना जाता है। अगर जिला फाजिल्का के इन गांवों पर नजर दौड़ाई जाए तो अधिकांश गांवों के नाम में एक नाम मुसलमानों की ओर से रखा गया नजर आता है। जबकि बाद में आकर बसे हिन्दु – सिख परिवारों ने इन गांवों को अपना नाम भी दिया। मिसाल के तौर पर फाजिल्का का गांव कुतुबदीन उर्फ बेरीवाला है।
इन गांवों के दो-दो नाम
फाजिल्का के गांव ही नहीं फाजिल्का को भी दो नामों से पुकारा जाता है। कई लोग आज भी फाजिल्का को बंगला नाम से पुकारते हैं। वहीं फाजिल्का के गांव घड़ूमी उर्फ गुरमुख खेड़ा, राम नगर उर्फ जट्टवाली, चिमनेवाला उर्फ जोरा जंड, ढिप्पांवाली उर्फ गोदां वाली, ओडियां उर्फ मुहम्मदपुर, झोट्टियांवाली उर्फ रतनपुरा, पाकां उर्फ जमूरावाला, ढ़ाणी मुंशी राम उर्फ आबादी बहक, बेरीवाला उर्फ कुतुबदीन, कोठा उर्फ लुकमानपुरा, मुहार खीवा उर्फ भैणीके, मुहार सोना उर्फ नाकी के, न्योलां उर्फ शेमन, घुडिय़ाणी उर्फ लशकरदीन, नूरशाह उर्फ वल्लेशाह उत्ताड़, म्याणी बस्ती उर्फ अब्दुल खालिक, आवा उर्फ वरियाम पुरा आदि के दो दो नाम हैं।
धरती में कुंआ तो आप ने देखा है, लेकिन क्या कभी धरती के ऊपर भी कुंआ देखा है . . . शायद नहीं . . . मैने देखा है . . . इसकी फोटो इस पेज पर आप देख रहे हैं . . . यह फोटो मैन 24 मई 2015 को क्लिक की थी . . . बस यूं ही . . . मैं किसी सर्च में जुटा हुआ था . . . जब बाधा गांव के निकट रेत खदानों में पहुंचा तो धरती पर कुछ गोलनुमा चीज देखी . . . देखने की इच्छा हुई तो वहां पहुंच गया और तुरंत फोटो क्लिक कर ली. . . मुझे तो पता नहीं था कि यह क्या है ? . . मगर एक पेड़ के नीचे बैठे कुछ मजदूरों ने पूछा तो उन्होंने बताया कि यह कुंआ है . . . धरती पर कुंआ ! . . मेरी हैरानी को भांपते हुए वो बोले, दरअसल यह कुंआ पहले धरती में था, लेकिन रेत खदानों की रेत जब गहराई तक उठाई गई तो यह कुंआ निकला . . . मुझे यह मतलब नहीं था कि रेत खदान के ठेेकेदार इतनी गहराई से रेत निकाल रहे हैं. . . मेरा मकसद सिर्फ खोज थी. . .खैर, दिन, महीने, साल बीत गए. . .पता नहीं चला। पिछले दिनो 6 जून को जब फाजिल्का के क्लॉक टावर का बर्थडे था तो वहां आयोजित कार्यक्रम में मुझे बुलाया गया. . . वहां माननीय बुलाकी राम जी पैड़ीवाल भी थे. . . बातें करते करते बात कुंए की भी चल निकली. . . श्री बुलाकी राम जी ने बताया कि वहां एक कुंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था . . . उसके निकट अंग्रेज फांसी लगाते थे। वह भी कहते हैं कि यह मैने बुजर्गों से सुना है. . .फांसी के बाद शव पुरानी कचहरी की बैक साइड (सब जेल फाजिल्का के पास) बने एक कमरे में रखा जाता था और वहां डाक्टर पोस्ट मार्टम करते थे. . . शायद यही कारण है कि उसके पास अब जो रोड है . . . उसे डैड हाऊस रोड कहते हैं. . . यह एक अलग बात है, लेकिन इतनी गहराई से खदानों में से रेत निकालना मतलब सरकार को नुकसान देना . . . आखिर कब तक चलता रहेगा यह सिलसिला ???? ———————————————————— Well on earth! ! ! You have seen well in the earth, but have you ever seen well on earth? . . Probably not. . . I have seen . . You see this photo on this page. . . This photo I clicked on 24 May 2015. . . Just the same . . I was mobilized in a search. . . When the sand reached the sand mines near the village, then there was a few things on the earth. . . If there was a desire to see, he reached there and immediately clicked the photo. . . I did not know what it is? . . But some workers sitting under a tree asked if they said that this is well. . . Well on earth! . . While wondering about my surprise, he said, in fact, this well was in the earth first, but the sand of the sand mines was raised to the depths when it was raised to depth. . . I did not mean that the siege of the sand mines were extracting sand from such depth. . . My purpose was only to search. . . Well, days, months, years have passed. . .not found. On June 6, when the book tower of Fazilka’s clock tower was there, I was called in the program organized there. . . There was also the honorable Bulaki Ram Ji Pariwal. . . Talking about things went well. . . Mr. Bulaki Ram Ji told that there was a well, whose water was very sweet. . . The British were hanging near him. He also says that I have heard this from the elderly. . After the funeral, the body was kept in a room made of the backside of the Old Kachhari (near Sub Jail Fazilka) and there used to be a doctor post mortem. . . Perhaps this is the reason that the road that is now near him. . . It’s called the Dead House Road. . . It is a different matter, but taking sand out of the mines so deeply means giving a loss to the government. . . How long will it last?
सुनो, सुनो, सुनो . . . विधान सभा सीट फाजिल्का मुहम्मदन रूरल पर चुनाव मार्च में होंगे . . . इस सीट पर Unionist Party की तरफ से बाघ अली सुखेरा (अबोहर) और मुस्लिम लीग की तरफ से मुहम्मद दीन भंडारा (गांव दिवान खेड़ा) चुनाव लड़ रहे हैं। सभी वोटर मुहम्मदन थाने में जाकर अपनी वोट का प्रयोग करें . . . वोटर ने जिस उम्मीदवार को वोट देनी है, उसका नाम लिखवाएं . . . ताकि आपका नया एम.एल.ए. चुना जा सके . . . गांव के एक चौराहे के बाद दूसरे चौराहे और दूसरे गांवों में यह मुनादी की जा रही थी। यह बात 1946 की है, जब पंजाब विधान सभा के चुनाव हुए थे और उनका परिणाम 21 मार्च 1946 को आना था। हालांकि उस समय लोगों में आज के चुनावों जितनी रूचि नहीं थी, फिर भी जो वोटर वोट के लिए थाने जाते थे। उनका थाने में नाम, पता लिखा जाता था . . . फिर पूछा जाता था कि आप ने किस उम्मीदवार को वोट देनी है . . . सिपाही द्वारा यह एक रजिस्टर पर लिखा जाता था और दूसरे रजिस्टर में दूसरा सिपाही दस्तखत करवाता था या अंगूठा लगवाता था . . . वोटिंग का यह सिलसिला कई दिन तक चलता था। परिणाम घोषित हुए और पंजाब विधान सभा के लिए 166 एम.एल.ए. चुने गए। अगर फाजिल्का की बात करें तो बाघ अली को 61.9 प्रतिशत मत मिले और वह एम.एल.ए. चने गए। 1947 में देश के विभाजन की घोषणा हो गई और उनका कार्यकाल 4 जुलाई 1947 तक ही रहा। वह अबोहर की सुखेरा बस्ती को छोडक़र मुस्लिम परिवारों के साथ मैकलोडगंज रोड से पाकिस्तान चले गए। इस छोटे कार्यकाल में आपके इलाके का जो एम.एल.ए. चुना गया, आप उसका नाम देख सकते हैं।
Before India Partition ! Who was your MLA ?
Listen. . . Listen . .
. Listen . . . Vidhan Sabha seat will be
held in the elections on Fazilka Mohammedan Rural. . . On behalf of the
Unionist Party, the Bagh Ali Sukhera (Abohar) and Muhammad Din Bhandara (village
Divan Khera) are contesting from the Muslim League on this seat. Use your vote
in all Voter Mohammedan police station. . . Write the name of the candidate,
who has to vote for the voter. . . So that your new M.L.A. Could be chosen. . .
This was being done in the other intersection and in other villages after an
intersection of the village. This is from 1946, when the Punjab
Legislative Assembly elections were held and the results were to come on 21
March 1946. Although at that time people were not as interested in today’s
elections, even then those voters used to go to the police stations for votes.
His name was written in the police station. . . Then it was asked that you have
to vote for which candidate. . . It was written by the soldier on a register and
in the second register the second soldier had signed or used thumb. . . This
series of voting lasted for several days. The results were declared and 166
M.L.A. for the Punjab Legislative Assembly.
Selected. If you talk about Fazilka, then Bagh Ali got 61.9 percent votes and
he got MLA Made The partition of the country was announced in 1947 and its
tenure remained till 4 July 1947. He left Pakistan
with McLodganj Road,
leaving the Sukhera settlement of Abohar with Muslim families to Pakistan. The
MLA of your area during this short tenure Chosen,
you can see his name.
Punjab Legislative Assembly
Second Assembly (March 21, 1946 to July 4, 1947)
SPEAKER
Diwan Bahadur S.P. Singha,
M.A., LL.B. (West Central Punjab —
Indian Christian)
(March 21, 1946 to July 4, 1947)
DEPUTY SPEAKER
Sardar Kapur Singh,
B.A., LL.B. (Ludhiana East
— Sikh, Rural)
(March 26, 1946 to July 4, 1947)
PREMIER
Malik Sir Khizar Hayat Khan Tiwana,
K.C.S.I., O.B.E. (Khushab — Muhammadan Rural)
MINISTERS
1. Chaudhri Lahri Singh,
B.A., LL.B. (Rohtak North — General, Rural) — Minister of Public Works
2. Mian Muhammad Ibrahim Barq (Alipur — Muhammadan,
Rural) — Minister of Education
3. Mr Bhim Sen Sachar,
B.A., LL.B. (Lahore City — General, Urban) —
Finance Minister
4. Nawab Sir Muzaffar Ali Qizilbash (Lahore — Muhammadan,
Rural) — Minister of Revenue
5. Sardar Baldev Singh
(Ambala North — Sikh, Rural) — Minister of Development
MEMBERS
1. Abdul Ghafur Khan, Chaudhri (Shakargarh — Muhammadan,
Rural)
2. Abdul Hameed Khan,
Khan Sahib Sardar (Muzaffargarh — Muhammadan, Rural)
3. Abdul Hamid Khan, Rana,
B.A., LL.B. (Pakpattan — Muhammadan, Rural)
4. Abdul Hamid Khan,
Sufi (Karnal — Muhammadan, Rural)
5. Abdul Haq, Mian (Okara — Muhammadan,
Rural)
6. Abdul Sattar Khan, Mr (Mianwali North
— Muhammadan, Rural)
7. Ahmad
Jan, Maulvi (North-West Gurgaon — Muhammadan, rural)
फाजिल्का: उम्र जवानी की, तेवर बहादुरों जैसे और देश पर मर मिटने का जज्बा। यह गाथा है फाजिल्का के उन 6 नौजवानों की जिनकी आयु उस समय 17 से 20 के करीब थी। वह नौजवान थे प्रेम फुटेला, जनक झांब, राजकुमार जैन, सुभाष फुटेला, आद लाल जाखड़ व महेश गुप्ता। जो उस समय आरएसएस और जनसंघ के सरगर्म कार्यकर्ता थे। जिन्होंने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के आदर्शो पर चलते हुए जवानी की उम्र में अपने घर परिवार की चिंता छोडक़र मानव अधिकारों के हो रहे हनन के विरुद्ध आवाज उठाने का फैसला किया, लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि भगत सिंह व उसके साथियों ने विदेशी सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी और इन नौजवानों ने अपने ही देश में अपनी ही सरकार द्वारा अपने ही लोगों के विरुद्ध किए जा रहे मानव अधिकारों के हनन के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जिसके परिणाम स्वरूप उक्त युवकों से बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया था जिसका विशेष उल्लेख आपातकाल के बाद प्रकाशित हुई लगभग 2000 पृष्ठों पर आधारित पुस्तक (आपातकालीन संघर्ष गाथा) में भी किया गया है। सरकार खिलाफ सत्याग्रह सरकार के बर्बरतापूर्ण रवैये के चलते देश भर में सरकार के विरुद्ध उठी चिंगारी फाजिल्का में भी आ पहुंची। और एक बड़े आंदोलन का रूप धारण कर गई। जिसे कुचलने हेतु तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दमनकारी नीति अपनाई थी, जिसका फाजिल्का के इन युवकों ने डटकर का विरोध किया था और अपने प्राणों की परवाह न करते हुए 26 जून 1975 को शुरू हुए आपातकाल के तहत 14 नवंबर 1975 को फाजिल्का के 5 नौजवानों ने सत्याग्रह करने का फैसला किया। गांधी चौंक से निकले यह युवक घास मंडी, बजाजी बाजार और चौंक घंटाघर से होते हुए जब प्रताप बाग पहुंचे, जहां पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया और थाने में बंद कर दिया। ऐसे देते थे यातनाएं आपातकाल पर लिखी पुस्तक में इस बात का वर्णन किया गया है कि पुलिस ने इन युवकों को पकडक़र पहले जमीन पर उल्टा लिटाकर एक पुलिस वाला गर्दन पकड़ लेता था, दूसरा पांव तीसरा कमर और एक पुलिस वाला उस समय के थानेदार विचित्र सिंह और डीएसपी की हाजिरी में जोर से हंटर लगाता था। फिर पुलिस की दूसरी यातना शुरू होती थी। घोटना जिसके नाम से आदमी मौत मांगता है। घोटने से व्यक्ति जीवन भर नकारा हो जाता है, घुटने काम करना बंद कर देते हैं। इसमें उल्टा लिटाकर पांवों के बीच से घोटना रखा जाता था और पांवों को 2 पुलिस वाले उपर की ओर खींचते हैं। एक पुलिस वाला बाली को उपर से खींचता था। दूसरा पुलिस वाला पांवों के उपर मुक्का मारता था। जिसके उपरांत दर्द से आदमी कराह उठता था। इस प्रकार जब दूसरी यातना समाप्त होने के बाद तीसरी यातना कुर्सी नाम से शुरू होती थी। कुर्सी यातना से व्यक्ति की हथेलियां कुर्सी के नीचे रख दी जाती थी और एक मोटा पुलिस वाला कुर्सी के उपर बैठ जाता थी। एक पुलिस वाला बाएं पांव को तो दूसरा पुलिस वाला दाएं पांव को अपनी तरफ खींचता था और दो पुलिस वाले जांघों पर मुक्के लगाते थे। जब न्यायालय में पेश किया गया और 5 दिन का पुलिस रिमांड मांगा गया। 3 दिन का और पुलिस रिमांड मिल जाने पर पुलिस वालों ने न्यायालय में बयान दिया कि पांचों के पास बम व बारूद बनाने की फैक्ट्री बरामद करने के लिए पुलिस रिमांड बढाया जाए ताकि इन आतंकवादियोंं को सख्त सजा दी जा सके। इन लोगों ने भी काटी जेल एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार फाजिल्का के हरबंस लाल घीक, हंस राज सपड़ा, वैद अमरनाथ, तारा चंद भूडी, वैद्य गुलाब राय जुनेजा, जगसेवक अरोड़ा, अमरनाथ चावला, ओंकार नाथ शर्मा, हंस राज तिन्ना, प्रेम धूडिय़ा, वेद प्रकाश पाहवा, अशोक डोडा, अशोक वाटस, प्रोफेसर राम प्रकाश कांसल ने भी सरकार का विरोध किया था और उन्हें भी जेल की सजा काटनी पड़ी थी।
फोटो: इमरजैंसी दौरान फाजिल्का के प्रताप बाग में रैली निकालते हुए फाजिल्का के लोग।
भूल गए कि याद है वो गब्बर सिंह, जिसकी दहशत कई गांवों में फैली हुई थी। जब भी कोई बच्चा रोता था तो उसकी मां उसे कहती थी कि सो जा, नहीं तो गब्बर ङ्क्षसह आ जाएगा। याद है न सभी को गब्बर सिंह की दहशत . . . यह फिल्म शोले में था जो 1975 में बनी थी. . . ऐसा ही माड़े खां था, लेकिन वो डकैत नहीं, सिर्फ चोर था. . वो भी अकेला. . .सतलुज दरिया किनारे उसका गांव था दोना सिकंदरी . . . पुलिस में उसकी पूरी दहशत थी . . . उसका दोस्त फाजिल्का मुहम्मदन थाने में दरोगा था और ब्रिटिश अधिकारियों ने उसके दोस्त जहान खां की डयूटी लगा दी कि वह माड़े खां को पकड़े …बचपन के दोस्त थे . . जहान खां ने दोस्त को पकडऩे की बजाए दरोगा की नौकरी से इस्तीफा दे दिया . . . माड़े खां जब दो चार दरोगों के हाथ न आया तो उसे पकडऩे के लिए 12 दरोगों की डयूटी लगा दी गई। कुछ दिन बाद माड़े खां पकड़ा गया. . . उसे थाने लाया गया . . पीटा गया. . . माड़े खां बोला . . जितन मर्जी पीट लेना . . . लेकिन मुझे कोई अपशब्द न बोलना . . . वो पिटता रहा, चोरी की बात न कबूली . . . दरोगा बोला, उल्टा लटका दो साले चोर को. . . बस फिर क्या था. . .दरोगे पर टूट पड़ा . . .पुलिस ने उसे घोड़े के पीछे बांधकर घसीटना शुरू कर दिया . . . किसी तरह वह भाग निकला . . . पुलिस ने उस पर गोलियां चलाई . . . पीठ पर गोली लगी . . . इससे पहले कि दूसरी गोली लगती, माड़े खां ने सतलुज दरिया में छलांग लगा दी . . . पुलिस दो दिन तक उसे ढूंढ़ती रही . . . तीसरे दिन उसका शव दरिया के पास झाडिय़ों में मिला . . . फिर भी पुलिस ने उस पर कई गोलियां चलाई . . . जब कोई हरकत न हुई तो उसकी लाश को उठाया गया . . . अगर हाकम सिंह (जिसने यह बताया) की बात माने तो भारत विभाजन तक किसी दरोगे ने चोर डाकू को गाली नहीं निकाली थी . . . , लेकिन आज कई ऐसे भी पुलिस वाले हैं जो अपशब्द के बिना बात ही नहीं करते . . . शायद यही कारण है कि पुलिस और आम लोगों के बीच कुछ दूरियां हैं . . . जिन्हें खत्म करने की जरूरत है।
Gabbar Singh Daku . .Marey Khan Thief. . . And the common man . . ? Forget that he remembers Gabbar Singh, whose panic was spread in many villages. Whenever a child was crying, her mother used to tell her to go to sleep, otherwise Gabbar will come along. Do not remember everyone’s panic of Gabbar Singh . . This movie was in Sholay which was made in 1975. . . It was such a bad thing, but he was not a mobster, only a thief. . He is also alone. . His village was on the banks of the river Saltuj. . . His whole terror was in the police. . . His friend Fazilka was in the Mohammedan police station and the British officials dutted his friend Jahan Khan that he was caught in the madden … was a childhood friend. . Jahan Khan resigned from Doroga’s job rather than grab a friend. . . When the two four donors did not come to the door, 12 duties were imposed for arresting them. A few days later, the mud was caught. . . He was brought to the police station. . was beaten. . . Do not forget . Beat up . . But do not speak abusively of me . . He beat, did not say the theft . . Do not talk, hang upside down, two thieves. . . What was there. . There was a break on the door. . The police started pulling him behind the horse and scrambling. . . Somehow he ran away. . . Police fired bullets at him. . . The pill was shot on the back. . . Before the second bullet took place, Maadha Khan jumped into the Satluj Darya. . . The police searched for him for two days. . . On the third day, his body found in the rocks near the river. . . Still the police fired several bullets on him. . . When no action was taken, his corpse was raised. . . If Hukam Singh (who told this to be told), then till the partition of India, no rogue had abused his thieves. . . , But today there are many police who do not talk without sarcasm. . . Perhaps this is the reason that there are some distances between the police and the common people. . . Those who need to be eliminated.
पीहू . . . नन्हीं बच्ची . . . आवाज में दर्द लिये बोली, पापा, मैं पौधे को पानी लगाकर लौट रही थी तो एक आंटी आई और उसने पौधे के साथ घर का कूड़ा फैंक दिया . . . मुझे नहीं पता, पापा . . कोई ऐसा हल निकालो कि कोई भी कूड़ा पौधे के साथ न फैंके। चलो कोई बात नहीं, हल निकालते हैं. . . मैने फिलहाल उसे टालने की कोशिश की। वो भी समझ रही थी कि मुझे टालने की कोशिश की जा रही है . . . तपाक से बोली, आईडीया . . . पेड़ों पर चित्रकारी कर दो . . . । चलो ठीक है . . . कर दें। मैने फिर टाल दिया, लेकिन उसका आईडीया मेरे दिमाग में घूमता रहा। पेंट की दुकान से पूछा . . पर्यवरण प्रेमियों से पूछा और अंत में जब वन विभाग के अधिकारियों ने भी बोल दिया कि वाटर पेंट से पेड़ को कोई नुकसान नहीं तो मैने भी शुरू कर दिया पीहू का आईडीया . . . मगर मैं चित्रकारी में कमजोर था। हां, मेरी पत्नी संतोष चौधरी अच्छी चित्रकारी कर लेती है . . . वो भी साथ . . . फाजिल्का की ऐतिहासिक धरोहर व हैरीटेज का दर्जा प्राप्त इमारत रघुवर भवन के निकट जामुन के पेड़ पर संतोष चौधरी ने ऐसा चित्र बनाया . . . जिसमें चिड़िआ एक बर्तन में पानी पी रही थी . . . जो भी वहां से गुजरता . . . चित्र की तारीफ करता . . . मेरी गली की तीन चार लड़कियां भी हमारे परिवार के साथ पेड़ों पर चित्रकारी में जुट गई। बस फिर क्या था . . . गली में 24-25 पेड़े थे, जिन्हें पेंट कर दिया . . . किसी पेड़ पर जानवर तो किसी पर पक्षी . . . कईयों पर पानी, बिजली बचाने का संदेश . . . गली की शुरूआत पर पीपल का पेड़ है, जिस पर स्वागतम लिखा गया। शहर के प्रताप बाग के करीब 250 पेड़ों पर भी चित्रकारी की . . . सहयोगी थी विशु तनेजा . . . फिर कई स्कूलों में पेड़ों पर चित्रकारी की . . . आखिर यह काफिला भारत पाकिस्तान सरहद पर स्थित सादकी बॉर्डर, जहां भारत पाकिस्तान के बीच रिट्रीट सैरेमनी होती है, पर खड़े दर्जनों पेड़ों पर तिरंगा, शेर, मोर, सैना के जवान, टैंक आदि की चित्रकारी की। वास्तव में ही पीहू का आईडीया काम आया . . . सुंदर पेड़ों के किनारे अगर कोई गंदगी फैंकता तो उसे पता था कि पेड़ की सुंदरता में कमीं आएगी . . . बिजली के पोल पर भी सुंदर पेंटिंग किये जाने के कारण वहां भी लोगों ने गंदगी फैंकनी बंद कर दी . . . भले ही कई जगहों पर हमारा सम्मान हुआ . . . मगर मेरे दिल में बेटी के प्रति सम्मान बढ़ गया . . . अब फिर उम्मीद है कि शायद पीहू कोई नया आईडीया फिर से देगी और शायद वो आईडीया भी अच्छा होगा . . . पर्यवरण को स्वच्छ बनाने के लिए दिए गए एक आईडीये की तरह।
A Baby’s Idea
Peehu . . Baby girl . . Bid for the pain in the voice, Papa, I was returning the water after planting a antenna and he hung the house waste with the plant. . . I do not know, Papa. . Take any sort of solution that no garbage can be sprayed with the plant. Let’s not solve anything, solve it. . . I tried to avoid it at the moment. He was also understanding that I was trying to avoid. . . Speak-to-speech, Idea. . . Drawing on the trees . . . Let’s go . . Do it. I again defied, but his idea rotated in my mind. Asked the paint shop. . inviorment lovers asked and in the end when the officials of the forest department also said that there was no harm to the tree due to water paints, I also started the idea of Peehu. . . But I was weak in painting. Yes, my wife Santosh Chaudhary is doing fine paintings. . . With that too . . Santosh Chaudhary made such a picture on the Jamun tree near Raghuwar Bhavan, a land owned by Fazilka’s historic heritage and heritage building. . . In which the bird was drinking water in a vessel. . . Whoever passes there. . . The picture is appreciated. . . Three of my four street girl’s girls also got engaged in painting with trees on our families. Just what was then . . There were 24-25 trees in the street, which were painted. . . On some tree, birds on someone . . Water on many, water saving power . . At the beginning of the street there is a Peepal tree, which is written on the welcome page. Painting around 250 trees of Pratap Bagh of the city. . . The associate was Vishu Taneja (W/O Mr. Krishan Taneja). . . Then painted trees on many schools. . . After all, this convoy painting of tricolor, lion, peacock, saina jawans, tank etc. on dozens of trees standing on the Sardinia border on the India-Pakistan border, where there is a retreat saramani between India and Pakistan. In fact, Peehu’s ida came in handy. . . If someone shuffles a mess on the edge of the beautiful trees, then he knew that the beauty of the tree will be reduced. . . Due to the beautiful paintings on the electricity pole, people also stopped shaking the dirt. . . Regardless of our respect in many places . . But in my heart my respect for the daughter increased. . . Now again hope that Pahu will give a new Idea again and maybe that ID will be good too. . . Like an id given to make the observation clean.